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Full text of "Kavyadhara"

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हमारा अनुपम काव्य-साहित्य 


बन्दना के बोल 


(महात्मा जी के प्रति श्रद्धा के फूल) 
हरिकृष्ण प्रेमी! २।) 


रूप-दर्शन : दरिकृष्ण प्रेमी” ६) 
श्राँखों में : हरिकृष्ण “प्रेमी” २।) 
बलिपथ के गीत : जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द! ३) 
रावण महाकाव्य : दरदय!लुसिंह ५) 
काव्य-धारा : संग्रह-कर्तो डा० इन्द्रनाथ मदान ३॥) 
२॥) 
प्राखोत्सगं : देवीदयाल चतुवंदी 'मध्तः  १॥) 
राजधानी के कवि : 


गीत-गोविन्द (सचित्र पद्मानुवाद ) : 
विनयमोहन शर्मा ५४) 


मधु-सञ्चय : संग्रह-कर्ता बालकृष्ण राव 


कील तथा त्यागी. ३) 


प्रथम सुमन : सत्यवती शर्मा १) 
अमृतप्रभा : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंह ॥&) 
झ्रम्वपाली : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंह ३॥) 


राधा-कृष्ण : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंद २॥) 
संकलिता : राजेश्वरप्रसाद नारायणृतिंह  २॥) 
बाल-कविता संग्रह 
एक था राजा, एक थी रानी : चिरंजीत १) 


नटखट के गीत : चिरंजीत १) 
बाल-मेला : शम्भूनाथ शेष! ॥) 
नव-प्रभात : चन्द्रिकाप्रसाद मिश्र ॥) 


हमारा पुरस्कृत साहित्य 
१. रावण महाकाव्य : हरदयालु सिंह वर्मा ५) 


२. साहित्य-विवेचन : 
क्षेमचन्द्र सुमन तथा योगेन्द्र मल्लिक ७) 


विसेजन : प्रतापनारायण श्रीवास्तव ६) 


३ 

४. रूप-दर्शन (कविता) : हरिक्ृण प्रेमी ६) 
५. दापथ (नाटक) को २॥) 
६. उद्धार (नाटक श २) 
। 


' बलिपथ के गीत : 
जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द' ३) 
, स्मंपण ; *. 


€. हिन्दी कविता में युगान्तर : 
डॉ० सुधीनद्र ८) 
१०. इन्सान (उपन्यास) : यज्ञदत्त छर्मा ४) 


११. मेने कहा गोपालप्रसाद व्यास ३) 
१२. आय का मुस्ना (तीन भाग) 
सावित्रीदेवी वर्मा १३॥) 
१३. भूगोल के भोतिक श्राधार 
रामस्वरूप वश्षिष्ठ ६) 
१४. शिवालक की घाटियों में : विद्यानिधि ५) 
१५. सध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ : 


डाँ० सावित्री सिन्हा ८) 


१६. काव्यालंकार सूत्र 
श्राचाययं विश्वेश्वर १२) 


१७. डूबते मर्तूल (उपन्यास) नरेश मेहता ४) 
१८. सचिनत्र गृह विनोद अरुण ८) 


१६. चन्दा मामा का देश 
सनन्‍्तोष नारायण नौटियाल ३) 


२०. विन्ध्य-भूमि की लोक कथाएँ : 
श्रीचंद जैन अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव १) 
२१. प्राचीन भारतीय परम्परा श्लौर इतिहास : 
डॉ० रांगेय राघव १२) 
२२. स्वप्न-भंग नाटक :  हरिक्ृष्य प्रेमी १॥) 
२३. विष पान : » जम अर्थ 


है । 


आत्माराम एण्ड संस, कश्मीरी गेट दिल्ली-६ 


न कक 


शिवदानसिंह चोहान 


हिन्दी-कविता का विकास 


श्रीधर पाठक से लेकर भ्रब तक के सत्तर-पत्रहत्तर वर्ष हिन्दी (ख़ड़ीबोली) कबिता के जन्म 
आर विकास के अ्रभूतपूर्व वर्ष हें । त्रोत से निकली क्षोरा धारा जंसे भ्रपनी यात्रा में मार्ग की उप- 
त्यकाओं, वन-प्रान्तरों और समेदानों का पानी समेट कर विशाल धारा बन जाती है, श्लोर कोटि-कटि 
एकड़ भूमि को सींचती और उर्बर बनाती हुई भागे बढ़ती है, उसी तरह प्रारम्भ में एक-दो कंठों से 
फूट-निकली हिन्दी-कविता आज एक विशाल धारा बन गई है, जिसके संगीतमय भ्रहरह गर्जन में 
सेकड़ों समय झर उदीयमान कवियों के कंठों का सम भ्रौर विषम स्वर ॒ध्वनित है, भौर वह कोटि- 
कोटि हिन्दी-भाषियों के हृदयों को रस-प्लावित कर नये विचारों श्रोर भाषाओ्रों की खेती के लिए 
उर्वर (चेतन-संस्क्रत) बना रही है। 

इस काव्य-धारा के प्रवृत्यात्मक विकास का पभ्रध्ययन इन तीन युगों में बॉँट कर करना 
अपेक्षित है--( १) पू्व-छायावाद-युग (२) छायावाद-युग (३) उत्तर-छायावाद-युग । 

इस काल-विभाजन का छायाबाद ही प्रमाण है। छायावाद का विस्तार दोनों महपयुद्धों के 
बीस-इक्कोस वर्षों की काल-अ्रवधि है । छायावाद युग से पहले की कविता में किसी समय कोई एक 
ही प्रवृत्ति या विचारधारा सर्ज-प्रधान नहीं रही । उत्तर-छायावाद युग में भी श्रभी तक हिन्दी-काव्य 
को कोई प्रवृत्ति इतनी प्रभुत्वशाली और व्यापक नहीं हो पाई कि उसके नाम पर युग को भ्रभिहित 
किया जाय । इस काल-विभाजन का छायावाद प्रमाण इसलिए भी है कि पूर्ण और पश्चात्‌ को काव्य 
धाराएं और प्रवृत्तियाँ छायाबाद से भ्रन्तरंग रूप से सम्बन्धित हें । श्रोधर पाठक से हिन्दी-कविता 
की जो परम्परा चली, वह छायावाद की ही पूर्ब-गामिनी थी । छायावाद के पूर्ग-चिह्नू उसमें प्रगट 
थे, और उसके बहिरंग को देखकर आालोचकों भौर इतिहासकारों ने भ्रपने रजिस्टर में प्रवृत्तियों के 
चाहे जितने खाने खोल दिए हों, उसका स्वाभाविक विकास छायावाद की ओर ही था, क्योंकि युग 
की प्रगतिशील चेतना झौर अ्रनुभूति श्रश्नात रूप से इस दिशा में ही विकास कर रही थी। इसी 
भ्रकार उत्तर-छायावाद युग की कविता भी छायावाद से ही निसृत है । छायावादी काव्य के ह्ास- 
चिह्न इसमें प्रकट हें । छायावादो प्रवृत्ति एक संशिलिष्ट प्रवृत्ति थी, किन्तु उत्तर-छायावाद युग में 
उसको संहिलिष्ट भावना विश्युंबलित हो गईं; जिससे काव्यानुभूति के तार बिखर गये । छायावादो 
कविता का स्वर बिखर गया । कुछ कवियों ने छायावाद के समाज-परक तत्वों में नये विचार भरकर 
सच्ची श्रनुभूति के बिना ही प्रगतिशीलता का स्व॒र-संघान करना चाहा, तो कुछ ने उसके व्यक्तिपरक 
तत्वों की गठरी सहेज कर प्रयोगशीलता का बोद्धिक घत्मकार दिखाया । दोनों श्लोर खोखला भ्रात्म 
प्रदर्शन ही भ्रधिक रहा, जीवन के हुषं-विधाद और उसकी समस्याश्रों की सामिक भ्रभिव्यक्ति बिरल 


हो गई । इसलिए प्रारम्भ की साथरण, सरल, इतिवृत्तात्मक किन्तु ब्रिकासोन्मुखी हिन्दी कविता; 


र काब्य-धारा 


दोनों महायुद्धों के बीच की श्रपने पूर्ण उत्कर्ष पर पहुंची छायाबादी कविता श्रौर उत्तर-छायावादयुग 
की पथम्नष्ट अ्रधबा पथ-खोजी; दुरूह भ्रथवा गद्यात्मक कविता में एक-सूत्रता है। जिसे हमारे इति- 
हासकार बड़े गर्ग से “राष्ट्रीय कबिता कहते हें (मानों उन चन्द उद्बोधनात्मक कविताओं और 
तुकबन्दियों के भ्रतिरिक्त सब कुछ भ्र-राष्ट्रीय हो), वह भी इस सूत्र में ही श्रनिवायंतः गुंथी हुईं है । 
राष्ट्रीय-जागरण के करोड़ में ही हिन्दी-कबिता का जन्म श्लौर विकास हुआ है, इसलिए राष्ट्रीय-भावना 
कहीं दृश्यस्तर की वस्तु-योजना को लेकर तो कहीं गहरी श्रन्तःप्रवृत्ति की सृक्ष्म, मार्मिक श्रभिव्यक्ति 
के रूप में व्याप्त रही है । ठ 

जिस कविता को हिन्दी में छायावादी कहकर पुकारते हें, वह वस्तुतः पाश्चात्य देशों की 
'रोमांटिक' (स्वच्छुन्दताबादी ) कविता की अनुरूपिणी है। बंगला से लेकर “छायावाद” नाम तो उन 
विरोधियों का विया हुआ है जिनमें यथातथ्यवादी, अ्रभिधा-शेली में लिखी तुकबन्दियों या परम्परा- 
विहित धारिक-भावना से लिखी कबिताओं के भ्रतिरिक्त किसी प्रकार की भी संश्लिष्ट श्रौर अ्रनु- 
भूति-प्रधान कविता को समभने की क्षमता ही नहीं थी। किन्तु यह शब्द प्रचलित होकर रूढ हो 
गया झौर स्वयं स्वच्छुन्दतावादी कथियों ने इसे अपना लिया। स्वच्छुन्दताबाद की प्रवृत्ति विश्व- 
साहित्य में नई नहीं है । यथार्ंबादी प्रबुत्ति की तरह काल-बिशेष की विशेष परिस्थितियों में यह 
वस्तुजगत्‌ के प्रति संवेदनशील मनुप्य की एक विशिष्ट, किन्तु स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। यह केवल 
एक पअ्रन्ध भाव-प्रतिक्रिया ही नहीं है, बल्कि जीवन झोर जगत्‌ के प्रति एक निश्चित श्रौर मूलभूत 
दृष्टिकोरा भी है। इसलिए हिन्दी की छायावादी कविता को पाइचात्य या बंगला-काव्य की श्रनुकृति 
या अनुवरतिनी नहीं कहा जा सकता, यद्यपि उनसे प्रभावित वह भ्रवश्य है। एक सीसा तक किसी भी 
काल को कविता को स्वच्छुन्दतावादी कहा जा सकता हे जो भाव भ्रोर कल्पना-प्रधान हो, श्रर्थात्‌ 
जिसमें रीति-बद्ध काव्य की तरह रूढ़ि-नियमों, श्नौर सुनिश्चित शास्त्रीय परम्परा का निर्वाह न हो । 
इस ब्यापक श्रथ्थ में हम प्राचीन काव्य में भी यत्र-तत्र स्वच्छुन्दतावादी प्रवृत्ति के चिह्न खोज कर 
निकाल सकते हैं । लेकिन श्रठारह॒वीं-उन्नीसवीं शताब्दी के पश्चात्य काव्य और साहित्य की एक 
विशिष्ट प्रवृत्ति और जीवन-दृष्टि के श्रर्थ में ही स्वच्छुन्दताबाद या “रोमान्टिसिज्म' शब्द का प्रयोग 
होता है । इस प्रवृत्ति के अंकुर चाहे पश्चिम की प्राचीन और मध्यकालीन काव्य-परम्परा में मिलते 
हों, लेकिन इसका प्रस्फूटन अनेक श्रन्तविरोधी तत्वों के संयोग से एक भ्रभिनव और विशिष्ट रूप में हुआ | 

एक अंग्रेज़ी आ्रालोबक का कहंना है कि स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधि प्रतीक 
सध्यकालीन गाथाओ्नरों का चरितनायक डाक्टर फॉस्टस है, जिसने वर्जित तंत्र-ज्ञान का भ्रध्ययन करके 
स्वयं ईश्वर को चुनौती दी थी। मध्यकालीन जन-साधारण को दृष्टि में डाक्टर फॉस्टस सामन्‍्ती 
सत्ता को चुनौती देने, ज्ञान की उपलब्धि में निरत रहने और “मनुष्य भ्रपने हित-साधन के लिए 
प्रकृति को वश में कर सकता है, इस सानवी विश्वास का प्रतीक था | किन्तु बाद में, स्वच्छन्दता- 
वादियों को दृष्टि में वह भ्रज्ञात और श्रप्राप्य को प्राप्त करने की शाइवत मानव-चेष्टा, वस्तु-जगत्‌ 
से मनुष्य के चिरन्तन श्रोर दुनिवार श्रन्तविरोध का प्रतीक बन गया । मध्यकालीन दृष्टिकोण में 
व्यक्ति की महत्ता ओर शक्ति-सम्भावना में भ्रास्था थी, तो स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण में सनुष्य 
और वस्तु-जगत्‌ में चिरस्थायी संघर्ष और विरोध का विश्वास था। इस प्रकार वास्तविकता और 
उसके सत्य की खोज से विमुख होकर वास्तविकता से ही पालायन करने की चेष्टा करना यथाओर्थ- . 
यादी दृष्टिकोण से स्वच्छुन्दतावादी दृष्टिकोण की ओर संक्रमण है । 

इस स्थान पर हम उन समाजगत कारणों की ओर संकेत ही कर सकते हें जिन्होंने कला 


हिन्दी-कविता का विकास ३ 


और साहित्य में व्यक्तिवाद को जन्म दिया । सध्यकाल से निकल कर मनुष्य ने जब प्रौद्योगिक युग 
में प्रवेश किया, उस समय व्यक्तित की सत्ता के प्रति वह पहली बार व्यापक रूप से सचेतन हुआ । 
क्रांस और इंग्लेंड की प्रौद्योगिक क्रान्तियों ने, जिनके फलस्वरूप मानव-समाज सामन्‍्तकाल से निकल- 
कर पूंजीवादी युग में ग्राया, मनृष्य के श्रधिकारों की घोषणा को थी। यह एक प्रजातांत्रिक सिद्धान्त 
की घोषणा थी, जिसका भ्रयं था कि स्वतन्त्रता श्रौर भाईचारे के वातावरण में हर व्यक्ति शान्ति- 
पूर्वक अपने व्यक्तिगत सुख-सम्मान के साधन जुटा सकता है; कतई झावद्यक नहीं कि उसके 
व्यक्तिगत हित सामाजिक हितों से भ्रनिवार्यंतः टकरायें ही। व्यक्तिवाद की यह स्वोकृति 
समाज की अस्वीकृति पर निर्भर नहीं थी। व्यक्ति-चेतना का यह रूप मनुष्य मात्र की 
चेतना का मुक्तिदायी विकास-चिह्न है। तब से व्यक्तिबाद किसी न किसी रूप में विश्व-मानव को 
चेतना का भ्रभिन्‍न अंग बना हुआ है झौर किसी भी भावी समाज में व्यक्ति को सत्ता और उसकी 
व्यक्ति-परक चेतना को विस्मृत करने के लिए मनुष्य को विवश नहीं किया जा सकता। एक पूर्णतः 
जनवादी अ्रयवा समष्टिवादी समाज में भी व्यक्ति ही समाज के योग-क्षेम का प्रमाण रहेगा, क्‍योंकि 
व्यष्टि और समरष्टि के हितों में वेषस्य भौर असामंजस्य के कारणभूत बर्ग-भेद मिट जायेंगे । लेकिन 
झठारहवॉीं-उन्‍्नीसवीं शताब्दियों की पूंजीवादी क्रान्तियों ने व्यक्ति श्रौर समाज के पारस्परिक साम॑- 
जस्य की सम्भावना की घोषणा तो की परन्तु ब्यबहारतः यह सम्भावना प्रतिफलित न हो सकी । 
नये समाज के ऋर वर्ग-सम्बन्धों ने तत्काल मनुष्य की झ्राशाओरों, इच्छाओं और कल्पनाओों पर कुठारा- 
घात किया । साहित्य की रोमान्टिक या स्वच्छुन्दताबादी धारा ने व्यक्ति श्लर समाज या वस्तु- 
जगत्‌ के इस वेषम्य को चिरन्तन मानकर व्यक्तिवाद की पताका फहराई। नेराश्य-वेदना के भावना- 
कलों के बीच स्वच्छन्दतावाद को धारा प्रवाहित हो चली ।'* जर्मनी के इलीगल, शेलिग भौर फिस्ते 
से सर्वप्रथम सन्‌ १८०० ई० के लगभग स्वच्छुन्दतावाद के काव्य-दर्शन असीम की साधना' को 
बुनियाद डाली थी । यह वर्शन उस युग के बुद्धिवाद झौर क्‍्लासिसिज्म की भावना की प्रतिक्रिया 
के रूप में जन्मा । फ्रांस के रसो और उसके पभ्रनुयाथियों ने इसका अपने ढंग से समर्यत किया । 
जर्मनी की स्वच्छुन्दतावादी धारा बुद्धि-पक्ष की भ्रपेक्षा हृदय-पक्ष को, चेतना की श्रपेक्षा भ्रवचेतना 
या भ्रन्तस्चेतना को, तर्कज्ञान की श्रपेक्षा विव्य-ज्ञान को, प्रतिनिधि मानव-चरित की 
अपेक्षा विशिष्द व्यति-चरित को, मानवता की श्रपेक्षा लोकजनों को, दिवस और धूप को 
अपेक्षा राज्ि ओर ज्योत्स्ता को, भावी समाज की भ्रादर्श-कल्पनाभों की भ्रपेक्षा इतिहास को अभ्रधिक 
मूल्य देती थी । जमंन-धारा का सम्बन्ध मध्यकालीन जीवनादर्शों और ईसाई-घर्म से इतना श्रांगिक 
था कि वह॒ राजनीति में शीघ्र ही प्रतिक्रियाबादी शक्तियों से सम्बद्ध हो गई। लेकिन फ्रांसीसी 


१. विषय-वस्त से साहित्य की प्रवृत्ति का निर्धारण नहीं किया जाता । भ्रृत्ति प्रब्ृत्ति है, जीवन 
और जगत्‌ को देखने की दृष्टि और रागात्मऊ प्रतिक्रिया का वह समन्बित रूप है। स्वच्छुन्दतावादी 
काव्य और कला ने अपनी दृष्टि से जीवन और जगत्‌ के बहुविधि विषयों, वस्तश्रों, भावों और जोवन- 
व्यापारों का कलात्मक वर्णन ओर चित्रण किया है। लोकवार्ता, परियों की कद्दानियों, पौराणिक 
गाथाओं, ऐतिदासिक घटनाओं श्रोर चरित-नायकों से लेकर व्यक्ति-मानस के यूक्ष्माति-सूक्षम संवेदनों 
को अभिव्यक्ति दी है। इसलिए स्वच्छुन्दताबादी या यथार्थवादी प्रवत्ति के अन्तर्गत रखते समय 
किसी रचना के बहिरंग को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि उसके अन्तरंग से म्रांकती हुई कवि-दृष्ट 
आर स्वर को पहचानना चाहिए | 


रु काव्य-धारा 


धारा ने क्रान्ति का समर्थन किया झौर प्रगतिशील बिचारों को धार्मिक श्रभिव्यक्ति दी। अंग्रेज़ी 
में शेली, वायरन झोर प्रारम्भिक उत्थान के वर्ड सबर्थ श्रादि ने स्थच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के जिस 
रूप को अ्रभिव्यक्ति दी वह फ्रांसीसी धारा से मिलती जुलती है। उसकी श्रहंवादी भावनाएँ उदात्त 
और व्यापक हें। कहने का तात्पर्य यह कि श्रपने-अपने देशकाल को विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थि- 
तियों में स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति का भिन्‍न-भिन्‍न रूप-संस्कार हुआ । उसके व्यापक वृष्टिकोश 
में यद्यपि समानता है, किग्तु अभिव्यक्ति में काफी भेद भी है। अ्रनेक ऐतिहासिक विचार-तन्तु 
और प्रवृत्तियों की संश्लिष्ट-योजना स्वच्छुन्दतावादी काव्य में मिलती है, और देश-काल परिस्थिति- 
भेद के भ्रनुसार किसी देश की धारा में यदि एक तत्व की प्रधानता है तो दूसरे देश की धारा में. 
दूसरे तत्व की । श्रतः यह कहना जेसे ग़लत होगा कि फ्रांसीसी धारा जसंन धारा के अ्रनुकरण 
पर चली या अंग्रेज्ञी धारा फ्रांसीसी धारा की भ्रनुवतिनी थी, उसी तरह यह कहना भी ग्रलत होगा 
कि हिन्दी को छायावादी कविता पाश्चात्य ( भला किस देश की ? पाइचात्य में तो जर्मनी, 
फ्रांस, इंगलेगड भ्रादि सभी हैं ) धारा की नक़ल है। झौर यदि फंशन की नकल की जाती हैं तो 
तत्कालीन या समसामयिक फेशन की । सौ वर्ष पुराने फंशन की नहीं । किन्तु उस स्वच्छन्दतावादी 
धारा का तो जिससे छायावाद की कविता प्रभावित है, सत्तर वर्ष पहले भ्रवसान हो चुका था, और 
प्रथम महायुद्ध के बाद की पाइचात्य कबिता स्वच्छन्दतावाद के भ्रवशिष्ट ह्लासोन्मुखी, घोर व्यक्ति- 
वादी, अ्रनास्थावादी और असामाजिक तत्वों को ही एकांगी श्रभिव्यक्ति दे रही थी ॥ छायावादी 
यदि सहसा उनकी परिपादी पर चल पड़ते तो उन पर अनुकरणा-वृत्ति का झ्रारोप सही उतरता | 
वस्तुतः अपने देश-काल की विशिष्ट परिस्थितियों में हमारे कवियों के हृदय में वास्तविक जगत्‌ 
और उसके मानव-संबंधों की जो प्रतिक्रिया हुई, उसकी अभिव्यक्ति देते समय उन्हें उन्‍्नसवीं 
शताब्दी को पाइचात्य ( अंग्रेज्ञी ) स्वच्छन्दतावादी धारा में कुछ सामान्य तत्व मिले जो उन्होंने 
ग्रहण किये ।* छायावादी कवियों ने श्रपना श्रलग साहित्य-दर्शन प्रतिपादित किया, जिसका विवेचन 
प्रसंग आने पर होगा। इस संक्षिप्त भूमिका के बाद हम हिन्दी-कबिता के विकास-क्रम को सरलता 


से समझ सकते हें । 
पूर्व -छायावादी युग 
भारतेन्दु और उनके समकालीन लेखक हिन्दी श्रौर हिन्दू-जाति के उद्धार के लिए आन्दोलन 


करने वाले देश-प्रमी पत्रकार श्रौर प्रचारक ही भ्रधिक थे, कवि और साहित्यकार कम । उनका देश-प्रेम॑ 
एक ओर हिन्दू पुनत्थानवाद की मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिकता तो दूसरी ओर राजभक्ति कीं 


१. सांस्कृतिक मानव-शास्त्र के विद्यार्थी ज!नते हैं कि किसी भी देश वा जाति की जीवन 
तथा विचार:पद्धत में या तो अपने सामाजिक जीवन के विकास की आनन्‍्तरिक आवश्यकताओं के 
तकाजे के फलस्वरूप परिवतन होते हैँ या किसी अपने से उन्नत बांह्य संस्कृति ओर जीवनप्रणाली के 
संपक में आने के कारण, या फिर दोनों कारणों के संयोग से । केंबल पुराणपंथी ही बाह्य-प्रभावों 
को वर्जनीय घोषित कर सकते हैं | यदि सब देश और सब जातीय संस्कृतियाँ आवश्यकतानुसार 
अ।दान-प्रदान से वंचित कर दी जायें तो मानव-समाज की प्रगति-घारा केंचुए की गति से भी मंद पड़ 
जायगी, संभव है कि अनेक संस्कृतियां हासोन्मुखी होकर मिट चलें। बाह्य-प्रभावों में स्वस्थ और 
अस्वस्थ दोनों प्रकार के तत्व होते हैं, लेकिन जीवन का यह नियम है कि अन्ततः स्वस्थ प्रभाव ही 


विजयी होते हैं। 


हिन्दी-कविता का विकास ५ 


अवसरवादिता के संकोर्ण घेरे में हो भ्रन्‍्त तक चक्कर काटसा रहा । श्राश्चर्य की बात तो यह है कि 
उननसवोीं शताब्दी में ही नहीं, बीसदों शताब्दी के पहले दो दशकों तक, भ्रर्यात्‌ छायावादी काव्य- 
धारा के फूट पड़ने से पहले तक के हिन्दी कवि (महावीर प्रसाद द्विवेदी, भ्रयोध्यासिह उपाध्याय 
“हरिश्रौध' भ्रोर मेथिलीशररा गुप्त) इस संकोर्ण घेरे का भ्रतिक्रमणा करने का साहस नहीं कर पाये । 
जातिगत, सम्प्रदायगत ग्रौर भाषा-गत स्वाय्यों से ऊपर उठकर बे श्रपनी वारी में राष्ट्रीय एकता का वह 
उदात्त स्वर नहों फ्‌ क पाये जिसते रबीख्नाथ ठाकुर और इक़बाल के कंठ से निकलकर सारे देश में 
एक नया स्पन्दन भर दिया था । छायावादी कविता ने ही सबसे पहले काव्य-क्षेत्र में इन संकीर्ण सीमाओों 
को तोड़ा । राज-भक्ति को अ्रवसरवादिता उसमें कहीं नहीं मिलती, यद्यपि प्रसाद और निराला में 
हिस्दू-पुनरुत्यानवाद की दूरागत अ्रनुगू ज आरम्भ में कहीं-कहीं भ्रवश्य सुनाई देती रही । भ्रस्तु, प्रधानतः 
सुधारक, प्रच:रक ओर पत्रकार होने के नाते भारतेन्द्रकालीन लेखकों को दिन प्रतिदिन श्रपने-अपने 
सम्पादित पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दू-समाज में प्रचलित कुरीतियों, धारभिक मिथ्याचार, छल-कपट, 
अमीरों की स्वार्यंपरता, पाश्चात्य-सम्यता के रंग में रंगे नये शिक्षित वर्ग की प्रनुकरणव॒त्ति, पुलिस झौर 
कर्मचारियों की लूट-खसोट, भ्रदालतों में प्रचलित भ्रन्याय-प्रनीति, उद्ू के प्रति सरकार के पक्षपात, 
देश को सामान्य दुरवस्था, भ्रकाल, महामारोी के प्रकोप, अंग्रेज़ी शासन के ग्राथिक-शोषण श्रादि के 
संबंध में भ्रपने विचार प्रकट करके पाठकों को सामयिक प्रइनों के प्रति जागरुक बनाना होता था । 
वे इन विचारों को कभी गद्य-लेखों में तो कभी छन्द-बद्ध पद्यों के माध्यम से प्रकट करते थे। कभी- 
कभी इन विचारों को और अ्रधिक प्रभावशाली अ्रभिव्यक्ति देने के लिए वे नाट्य-विधान का भी 
उपयोग करते थे । उनके लेखों श्रौर नाटकों की भाषा तो हिन्दी होती थी, लेकिन नाठकों में झाये 
गीतों और पद्मों की भाषा बहुधा ब्रजभाषा होती थी । भारतेन्दु ने खड़ी-बोली में पद्यरचना करनी 
चाही, किन्तु वें सफल न हुए, निजीव तुकबन्दियाँ ही बन पड़ीं | द्रजभाषा में अपेक्षया उन्होंने कुछ 
साभिक कविताएँ लिखो हैं, जिनमें अनुभूति का योग है। ब्नजभाषा या खड़ी-बोली में भारतेन्दु- 
कालीन लेखकों ने सामयिक विषयों पर जो पद्मात्मक रचनाएं को उन्हें कविता की कोटि में नहीं 
रखा जा सकता, क्योंकि उनमें राजनीतिक-सामाजिक विचारों को ज्यों का त्यों छुन्द-बद्ध करने की 
ही प्रव॒त्ति है, जीवन और जगत्‌ के भ्रनुभव को मर्म-छवियों के माध्यम से मूर्त्त कलात्मक अ्रभि- 
व्यक्ति देकर तयी श्ररथ॑-सृष्टि करने का प्रयास क़तई नहीं है । विचारों और वकक्‍तव्यों को बिना 
अनुभूति के छंद-बद्ध कर देने मात्र से कबिता नहीं पेदा होती | ऐसी छन्दोबद्ध तुकबन्दियाँ ग्राज- 
कल भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं, नये से नये विषयों पर भी, लेकिन उन्हें कबिता 
कहलाने का गोरव नहीं मिलता । स्वयं भारतेन्दुकालीन लेखक भ्रपने को कवि और अ्रपनी पद्मात्मक 
रचनाओं कों कविता कहकर पुकारने में संकोचशोल थे । बाबू बालमुकन्द गुप्त ने लिखाः--- 

“भारत में भ्रब॑ कवि भी नहीं हें औऔलौर कविता भी नहों है । कारण यह है कि कविता देश 
आर जाति की स्वाधीनता से सम्बन्ध रखती है । जब यह देश, देश था और यहां के लोग स्वाधीन 
थे, तब यहां कविता भी होती थी । उस समय की जो बची-खुची कविता भ्रव तक मिलती है वह 
आदर की वस्तु है श्लौर उसका झ्रादर होता है । कविता के लिए अपने देश की बातें, भ्रपने देश 
के भाव और अपने मन को सोज दरकार है । हम पराधीनों में यह सब बातें कहाँ ? फिर हमारी 
कविता क्‍या और उसका गुरुत्व क्‍या ? इससे इसे तुकबन्दी कहना ठोक है। पराधीन लोगों की 
तुकबन्दी में कुछ तो भ्रपने दुःख का रोना होता हे, और कुछ भ्रपत्ती गिरी दशा पर पराई हंसी 
7 कप 


ध्‌ काव्य-धारा 


इसलिए भारतेन्दु या उनके जीवन-काल में जिन लेखकों ने खड़ीबोली में इक्की-वुक्की तुक- 
बन्दियाँ रचीं उन्हें कविता कहना ठीक नहीं । भारतेन्दुकालीन लेखक श्रधिकतर हिन्दी में गद्य भौर 
ब्रजभाषा में पद्म-रचना करते थे । उनके बाद भी उन्‍नीसवों शताब्दी में कोई कवि केवल हिन्दी का 
कवि नहीं हुआ । जिन्होंने भी पद्य-रचना की, हिन्दी श्र ब्रजभाषा दोनों में की । साहित्य की दृष्ठि 
से हिदी-कविता के प्राराम्भक कवियों में केवल तीन नाम उल्लेखनीय हें---भ्रीधर पाठक, नाथ्राम 
शंकर झौर राय देवीप्रसाद पूर्ण । हिन्दी के प्रारम्भिक कवि होने के कारण ही इनका विशेष 
महत्व है । भारतेन्दु ने सन्‌ १८७६ में हिन्दी में तीन पद्य रचे थे, लेकिन तीनों कविताएं “भोंड़ी' 
बन पड़ीं, इस पर उन्होंने उद् कविता के अ्रनुभव को अनदेखा करके और अ्रपनी अ्रसामर्थ्य को 
स्वीकार न करके यह फतवा दे दिया कि हिन्दी में “क्रिया इत्यादि प्रायः दीर्घ मात्रा में होती हैं 
इससे कविता भ्रच्छी नहीं बनती ।” तथा “इससे यह निश्चय होता है कि ब्रजभाषा ही में कविता 
करना उत्तम होता है और इसीसे सब कविता ब्रजभाषा ही में उत्तम होती है ।” बद्रीनारायण 
चौधरी “प्रेमघन', राधाचररणा गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र, श्रम्बिकादत्त व्यास आदि भी इस मत 
के अ्नुगामी थे। गद्य और पद्य की दो भाषायें भारतेन्दु की मृत्यु (सन्‌ १८८५ ई०) तक, श्रपवाद 
छोड़कर बिल्कुल अलग चलती रहीं । श्रीधर पाठक ने सन्‌ १८८६ में 'एकान्तवासी योगी की रचना 
करके यह परम्परा तोड़ी । सन्‌ १८८८ में अ्रयोध्याप्रसाद खतन्नी ने “खड़ी-बोली आन्दोलन” नाम की 
एक पुस्तिका छपाई जिसमें उन्होंने यह सम्मति प्रकट की कि ब्रजभाषा और श्रवधी की रचनाएँ हिन्दी 
की नहीं हें । हिन्दी की कविता हिन्दी में होनी चाहिए। इस प्रइन को लेकर दो दल बन गये + 
श्रीधर पाठक, अयोध्याप्रसाद खत्री और महावीरप्रसाद दिवेदी ने हिन्दी ( खड़ी-बोली ) का पक्ष 
लिया । प्रतापनारायण सिश्र, राय देवीप्रसाद पूर्ण श्रादि ब्रजभाषा की हिमायत लेकर उठे ॥ मनो- 
रंजक बात यह है कि खड़ी-बोली हिन्दी के पक्षधर ब्रजभाषा में भी कविताएं लिखते थे और ब्रज- 


१, इस वक्तव्य में अनेक भ्रान्त स्थापनांएँ हैं | पहला शब्द ही श्रम में डालता है। भारत? 
शब्द का प्रयोग बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने या तो ओपचारिक रीति से किया है, या हिन्दी-भाषी क्षेत्र 
को ही वे समग्र भारत समझ बैठे हैं। अन्यथा “भारत में अब कवि नहीं? वे न लिखते। मिर्जा 
ग़ालिब की मृत्यु हाल ही में हुई थी (सन्‌ १८६६ ई०) ओर यद्यपि इक्तत्राल का रचनाकाल किंचित्‌ 
बाद में शुरू हुआ (सन १८६८ ३०), तो भी 'दाग़”, 'हाली', “अकबर” इलाहाबादी तो उस समयः 
जीवित ही थे, और बेहद लोक-प्रिय थे। उधर बंगाल में माईकेल मधुसूदन दत्त की रचनाएँ युगा- 
न्तर उपस्थित कर चुकी थीं, हेमचन्द्र ओर नवीनचन्द्र सेन के महाकाव्य और देश-प्रेम से ओतप्रोत 
काब्य-अन्थ सामने आ चुके थे ओर साहित्य-गगन में स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर का उदय हो चुका था । 
सन्‌ १८७४ में रवीन्द्र की प्रारम्मिक कविताओं का संग्रह “वनफूल और प्रलाप' के नाम से छपा था, 
फिर श्दू८० में 'बालमीकि प्रतिभा'---संगीत-नाटक, १८८१ में “'भग्न-हृदय” कविताओं का संग्रह, 
१८८रे में “काल-मृगया'---गीति-नाटक आदि रचनाओं के प्रकाशित होने का धारावाहिक क्रम शुरू 
हो गया था और यह सब पराधीन देश में ही | पराधीन देश में ही कबीर, सूर, तुलसी और मीरा 
ने कविता की | अपनी अञ्र-प्रतिभा और श्रपनी अ-कविता के लिये देश की पराधीनता में औचित्य 
खोजना एक समाजशास्त्रीय प्रबंचना को जन्म देना है। किन्तु विचारों के इस कच्चेपन के होते हुए 
भी बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने अपने समय के लेखकों की तुकबन्दियों को तुकबन्दियाँ ही स्वीकार 
करके जो ईमानदारी दिखाई वह आज के लेखकों के लिए. भी अनुकरणीय है। 


॥ 
है 


हे 


हिन्दी-कविता का विकास ७ 


आधा के पक्षपाती खडी-बोली में । फिर भी दोनों शोर से पत्र-पत्रिकाओों में ऐसा जमकर वागयुद्ध 
आला कि एक समय तक झौर सब प्रसंग फीके पड़ गये । श्रपने जन्म-काल में ही पत्रकारों भौर 
अचारकों के नेतृत्व के कारण हिन्दी-साहित्य को कितने ग़लत बिचारों झ्लौर संकीर्ण , भावनाओ्रों का 
भार वहन करना पड़ा है, यह स्वयं झ्पने भ्राप में स्वतन्त्र भ्रध्ययन का विषय है। जो भी हो, इन 
सार्यक-निरयंक बहसों के बीच श्रीधर पाठक, नाथू्राम शंकर झौर राय देवीप्रसाद “पूर्ण' ने 
हिन्दी काव्य-धारा का सूत्रपात किया । तीनों ही साधारण प्रतिभा के कवि थे, लेकिन इनमें नाय- 
रास शंकर (सन्‌ १८५६-१६३२ ई०) का महत्व इसलिए है कि उन्होंने खड़ी-बोली में अ्रति- 
दायोक्तियों से भरे रीतिकालीन ढरें के श्यृंगार-प्रधान कवित्त रचकर यह सिद्ध कर दिया कि भाषा 
पर अधिकार हो तो हिन्दी में भो ब्रजभाषा जैसा शब्द-चमत्कार पैदा किया जा सकता है। उदा- 
हरण के लिए-- 
तेज न रहेगा तेजधारियों का नाम को भी 
मंगल मयंक मन्द मन्द पढ़ जायेंगे। 
मीन बिन मारे मर जायेंगे सरोकर में, 
डूब-डूब संकर” सरोज सड़ जायेंगे॥ 
चौंक-चौंक चारों ओर चोकड़ी भरेंगे मृग, 
खंजन खिलाड़ियों के पंख भढ़ जायेंगे । 
बोलो इन अंखियों की होड़ करने को अब 
कोन से अड़ीले उपमान अड़ जायेंगे |॥ 
नाथ्राम शंकर शर्मा को कविताओं में भ्रनुभूति का योग नहीं है, केवल चमत्कार-प्रदर्शन 
की स्थल भावना है। वे वस्तुतः पुरानी रीतिकाव्य-परम्परा के ही कबि हें, भेद केवल इतना है कि 
उन्होंने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी-बोली हिन्दी में लिखा। इसोलिए छायावाद-युग जहाँ इति- 
बृत्तात्मक पद्य-रचना की परम्परा को पीछे छोड़कर श्रागे बढ़ चला, वहाँ इस तरह को चमत्कार- 
श्रधान संवेदन-शून्‍्य कविताओं को भी उसने पीछे छोड़ दिया। नाथ्राम शंकर शर्मा सन्‌ १६३२ तक 
जीवित रहे, लेकिन काव्यक्षेत्र में उनको प्रतिभा युग का साथ न दे सकी । यही हाल एक सीमा तक 
श्रीघर पाठक और उनके अ्रनन्तर आने वाले इतिवृत्तात्मक पद्च-प्रबन्धों, मुक्तकों. या खण्ड-काब्यों की 
रचना करने वाले कवियों का हुआ । प्रथम म्रहायुद्ध के अन्त तक हो वे पाठकों की रुचि का रंजन 
कर पाये, यद्यपि उनमें से श्रधिकांश कवि छायावाद-युग में भी लिखते रहे । प्रतिभावान्‌ कवियों का 
हिन्दी-गगन में उदय होते ही उनका प्रकाश मन्‍्द पड़ता गया । लेकिन इनको इतिवृत्तात्मक, यथा- 
तथ्य वर्णन-प्रधान रचनाएँ प्रव॒त्यात्मक दृष्टि से छायावाद की ही पूर्वंगामिनी हें, उनमें स्वच्छन्दता- 
बादी भावना के पूर्व-चिह्न प्रकट हें । श्रीचर पाठक, भ्रयोध्यासिह उपाध्याय 'हरिश्रौष', मंथिलीशरण 
गुप्त, रामनरेश त्रिपठी ग्रादि इस प्रकार “छायावादी-युग' की श्रादि-कड़ी हें । 
श्रीधर पाठक (१८५६-१६२८ ई० ) ने सन्‌ १८८६ में लाबनी की शेली पर हिन्दी में 
अंग्रेज़ी की प्रयम स्वच्छुन्दतावादी धारा के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिय के हर॒ुभिट (स्रद्याया८) का 
*एकान्तवासी योगी' ओर फिर “श्रांत पथिक' के नाम से टरंवलर ([737८।|९८४) का अनुवाद 
किया। इनके झ्रतिरिक्त लॉंगफेलों और पारनेल की कृतियों के भ्रनुवाद भी उन्होंने किये । साथ ही 
हिन्दी में उन्होंने स्वतन्त्र प्रकृति-वर्णण को ओर पहली बार ध्यान दिया। ब्रजभाषा की रीति-काब्य- 
परम्परा में प्राकृतिक-दृश्यों के प्रत्ति मनुष्य का सहज भ्रनुराग प्रकट नहीं हुआ । “घट्‌-ऋतु-वर्णन' 


प्ज काव्य-धारा 


श्रादि में परम्परा-बिहित ढंग से प्राकृतिक वृश्यों, पेड़-पौधों, फूल, पशु-पक्षियों ग्रादि का उल्लेख केवल 
नायक-तायिका के भावों का “उद्दीपन' कराने-भर के लिये होता था। वाह्म-प्रकृति के चिर-संसर्ग में 
चलने वाले मनुष्य के नाना कार्य-ब्यापारों का पुराने ब्रजभाषा-काव्य में कोई संकेत ही नहीं मिलता, 
इसलिए संस्कृत-काव्यों की तरह प्रकृति के बस्तु-व्यापारों को काव्य का स्वतन्त्र झालम्बन बनाने या 
पाइचात्य परम्परा के अनुसार “प्रकृति के नाना-रूपों के बीच व्यंजित होने वाली भावधारा का सुन्दर 
उद्घाटन' करने का प्रश्न ही नहीं उठता था । श्रीधर पाठक ने हिन्दी श्रौर ब्रजभाषा दोनों में समान 
रूप से स्वतन्त्र प्रकृति-वर्णन किया, और ब्रजभाषा में कालिदास के “ऋतुसंहार' का श्रत्यन्त सरस 
काव्यमय अनुवाद भी । ब्रजभाषा में ही उन्होंने गोल्डस्सिथ के “डिज़र्टेड बिलिज! ( [025९70९2० 
५१]!9 ४८ ) का “ऊजड़ ग्राम' के नाम से अ्रनुवाद किया। हिन्दी के प्रथम और एक सीमा तक समर्थ 
कवि की भाव-धारा को गोल्डस्मिथ श्रौर कालिदास में सहज श्राधार क्‍यों मिला, यह विचारणीय है । 
गोल्डस्मिथ अ्रठारहवों शताब्दी ( सन्‌ १७२८-७४ ई० ) का लेखक है। सेम्युअल रिकार्डसन, हेनरी 
फील्डिग, स्टर्न और गोल्डस्मिथ अ्रठारहवीं शताब्दी--अंग्रेज़ी-साहित्य के उन श्रेष्ठ लेखकों में से हें 
जिन्हें हम उन्‍नीसवीं शताब्दी के स्वच्छुन्दतावाद श्रोर यथार्थंवाद इन दोनों महान्‌ साहित्य-धाराशं के 
हरकारे कह सकते हैं । इनकी रचनाओं में, विशेषकर गोल्डस्मिथ के काव्य-ग्रंथ 'हरुसिट' और “डिजटेंड 
विलेज' में, उसके उपन्यास “दी विकार श्रॉफ बेकफील्ड' में और नाटक “शी स्ट्प्स टू कॉन्कर' में अंग्रेज़ी 
जीवन के यथार्थ, उसके सहज हास्य-बिनोद, संयम, उदात्त भावना, नेतिक श्राचरण और मानववाद 
का हम विशद चित्रण पाते हें, जिसने गोल्डस्सिथ के बाद जेन आस्टिन; सर वाल्टर स्काट, चॉल्स 
डिकेन्स झौर थेकरे को अंरेज्ञी जीवन की सरलता, सहदयता और श्रादर्शवादिता मिश्चित यथार्थ चित्र 
अंकित करने की प्रेरणा दी । दूसरी ओर गोल्डस्मिथ की रचनाओं में उसकी अ्रप्ती ग्रात्मा भी कल- 
कती है। राग-सम्बन्धों और जीवन-श्रादशों से समन्वित लेखक का व्यक्तित्व उसकी भावुकता में से 
भलक पड़ता है। उसके श्रन्तस्‌ की भाव-धारा स्वच्छन्दतावाद की शोर ऊध्वंगमन करती दीखती है ॥ 
नागरिक समाज के कृन्निम और आ्ाडम्बरपूर्ण वातावरण की अपेक्षा ग्रास्य-जोवन की सरलता के प्रति 
उसके सन का सहज अनुराग है। उसने अपनी रचनाश्रों में ग्राम्य-जीवन और भद्र-समाज के शिष्टा- 
चारों से भ्रनभिज्ञ रुक्ष और गेंवार, किन्तु आत्मीय, सरल और सहृदय ग्रामीणों के अ्रनेक चित्र अंकित 
किए हें। गोल्डस्मिथ ने प्रकृति-प्रेम और प्रकृत-जीवन का काव्यादर्श सामने रखा। नवोत्थित पूंजी- 
वाद को नागरिक सम्यता के प्रति यह भावकतामयी मध्यम वर्गोय प्रतिक्रिया थी। ये तत्व भ्रगली शताब्दी 
की स्वच्छन्दतावादी काव्य-धारा में एक नया जीवन-दर्शन लेकर विकसित हुए। इस प्रकार गोल्डस्मिथ 
और प्रकृति और मानव-स्वभाव के अ्रनन्य कवि कालिदास की क्ृतियों में भ्रपनी भाव-धारा के प्रकाश 
के लिए आधार खोजने का अर्थ है कि श्रीधर पाठक श्रपनी अन्तश्चेतना सें काव्य ओर जीवन के 
श्रादर्शों में आसन परिवतंनों का अनुभव कर रहे थे। उनमें स्वयं इतनी समर्थ प्रतिभा नहीं थी कि 
इन परिवतंनों को कल्पना के योग से सूर्त अभिव्यक्ति दे सकते, इसलिए उन्होंने उनका आ्राभ्रय खोजा, 
जिनकी रचनाओं में उन्हें श्रपने हृदय को ग्ज सुनाई दी । हिन्दी शौर ब्रजभाषा में उन्होंने स्वयं 
श्रपतती श्रनभूति से जो कुछ लिखा वह भी ब्रज, अभ्रववी, राजस्थानी या मेथिली आदि हिन्दी भाषा 
समूह की परम्परागत कविता में एक नया स्वर था--प्रकृति-प्रेम और साधारण जन-जीवन का 
चित्रण :-- 
“बीता कातिक मास शरद्‌ का अन्त हे , 
लगा सकल सुख-दायक ऋतु हेमन्त है । 


हिन्दी-कविता का विकास ६ 


ज्वार वाजरा आदि कभी के कट गये , 
खलयान के काम से किसान निकट गये | 
थोड़े दिन को बेल परिश्रम से थमे , 
रबी के लहलहे नये अंकुर जमे। 
जमीदार को मिली उयाही खेत की , 
मूल ब्याज सब देन महाजन की चुकी | 
उसके घर आनन्द हर्ष खुल मच रहा , 
जिनको कुछ नहीं बचा,काम को टो रहे, 
किस्मत को दें दोष बेठ घर रो रहे । 
खाने भर को जिस किसान को बच रहा || 
ख़्रीफ़ के खेतों में अब सुनसान है , 
रबी के उपर किसान का ध्यान हे। 
जहाँ तहाँ रहट परोह़े चल रहे , 
बरहे जल के चारों ओर निकल रहे । 
जो गेहूँ के खेत सरस सरसों घनी , 
दिन-दिन बढ़ने लगी विपुल शोभा सनी । 
सुन्दर सौंफ सुन्दर कछूम की क्यारियां , 
सोआ, पालक आदि विविधग्तरकारियाँ | 
अपने अपने ठोर सभी ये सोहते , 
सुन्दर शोभा से सबका मन मोहते''' * 
( श्रीघर पाठक, 'हेमन्त' ) 


१. स्मरण रहे कि 'एकान्तवासी योगी” (गोल्डस्मिथ के 'हरमिट! का अनुवाद) सम्‌ १८८६ 
मैं प्रकाशित हो गया था और “हेमन्त” कविता उसके एक वर्ष बाद की रचना है। उनकी मौलिक 
कविता में तुकबन्दी की साधारणता और अनूदित कविता में शेली की प्रीदुता और सरसता का 
अन्तर द्रष्टव्य है | 

दूर एक ज॑गल में जिसका नहीं जगत को कुछ भी ध्यान | 
बाल्य क्यस से बसा हुआ था थृद्ध एक योगी सुज्ञान ॥ 
घास पात था बिस्तर उसका, दीन गुफा सुखवासस्थान | 
कन्दमूल स्वादिष्ट मिष्टफ़ल क्मिल कृपजल भोजन पान ॥ 
जग से अलग अचिंतित निश्नदिन करे मगन ईश्वर का ध्यान | 
एक भजन ही काम उसे, आनंद, सदन भगवत गुनगान | 

( 'एकान्तवासी योगी से ) 

साथ ही, सन्‌ १८८४ में क्जभाषा में लिखो उनको मौलिक कविता 'मेघागमन' का भी 
मिलान कौजिए :--- 

नाना कृपान निज पानि लिए, वपु नील कसन परिवास किए, 
गंभीर घोर अभिम्रान हिए, छकि पारिजात-मधुपान किए 


१० '. काव्य-धाण 


यहाँ प्रकृति-दृश्य श्रपनी इयतता खोकर किसी नाथिका की सुन्दरता के उपमान बने नहीं 
खड़े हैं, न युगल-प्रेमियों के प्रणय-विलास में उद्दीपन का सरंजाम कर रहे । यहाँ सिर्फ हेमन्त-ऋतु- 
कालीन किसात-जीवन और पग्राम्य दृश्य का यथातथ्य, पद्मात्मक वर्णन है । किन्तु इसमें एक नया स्वर 
है, वास्तविक जीवन का रुक्ष संस्पर्श है और कवि की सहानुभूति के प्रसरण के लिए नया क्षेत्र है । 
इसमें छायावाद के बीज हें, लेकिन इतिवृत्तात्मक, वर्णन-प्रधान काव्य का तो यह आरम्भिक रूप 
है । भागे चलकर श्रीधर पाठक की हिन्दी कविताश्रों में भी परिष्कृति और चुस्ती भ्रा गई, लेकिन 
अनुभूति में अधिक गहराई न श्रा पाई । 
हम ऊपर कह चुके हें कि काव्य को भाषा के सम्बन्ध में खड़ी-बोली बनाम ब्रजभाषा का 
विवाद छिड़ते ही लेखक दो दलों में बट गये थे और श्रीधर पाठक, अ्रयोध्याप्रसाद खन्नी और महा- 
वीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी का पक्ष लेकर उठ खड़े हुए। श्रयोध्याप्रसाद खत्नी कवि नहीं थे, महावीर- 
प्रसाद द्विवेदी थोड़े-थोड़े कवि भी थे, किन्तु श्रौर बहुत-कछ थे । छायावाद-युग के पूर्ण प्रसार तक वे 
हिन्दी-क वियों के प्रेरक, पथ-प्रदर्शक और नेता रहे । सन्‌ १६०३ में द्विवेदी जी ने 'सरस्‍्वती' (प्रयाग ) 
पत्रिकां का संपादन-कार्य संभाला । उस समय तक हिन्दी का साहित्यिक रूप स्थिर न हो पाया था। 
गद्य-लेखक व्याकरण की भूलों, विषय-प्र तिपादन की शिथिलता और श्रव्यवस्था पर ध्यान ही न देते 
थे। कविगरा खड़ी-बोली में ब्रजभाषा और अ्वधी के शब्दों और क्रियाओ्ों का प्रयोग मनमाने ढंग 
से करते थे। द्विवेदी जी ने भाषा-संस्कार का श्रान्दोलन छेड़ दिया । गौरीशंकर मिश्र, कामता प्रसाद 
गुरु और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने इस कार्य में उत्तका हाथ बेंटाया । उन्होंने विषयानुरूप गद्य-शली 
का आदर्श सामने रखा । कविता के क्षेत्र में उन्होंने कोई नया आ्रादर्श नहीं रखा । श्रीधर पाठक ने 
इतिवृत्तात्मक, या यथातथ्य वर्णवात्मक (नंचुरलिस्टिक) शेली का प्रयोग किया था, यद्यपि उनकी 
भावना था प्रवृत्ति कुछ-कुछ स्वच्छन्दतावादी थी । द्विविदी जी ने भी इस शली को ही प्रोत्साहन दिया। 
बंगला की कोमल-कान्त पदावली की श्रपेक्षा मराठी की इतिवत्तात्मक शेली उनके मल के अश्रधिक 
झनुकल थी । उनकी स्वयं श्रपती लिखी कविताओं का भ्रधिक महत्व नहीं है, किन्तु उन्होंने अपने 
संपादनकाल सें जिन उदीयमान कवियों का सार्ग-प्रदर्शन किया उनकी कृतियों से हिन्दी-कविता 
गौरवशाली हुई है । पुर्ब-छायाबाद-युग़ के कवियों में श्रयोध्यासिह्‌ उपाध्याय 'हरिऔषधर', गयाप्रसाद« 
शुक्ल 'सनेही' और मेथिलीशरणा गुप्त की काव्य-प्रतिभा अपने पूर्णविकास के लिए इतिवृत्तात्मक 
शली की शुधष्क-ती रस सीमाओ्रों का अतिक्रमरण करके यग-जोवन की व्यापक समस्याओं का काव्यो- 


छिन छिन पर जोर मरोर दिखा+त, पल पल पर आक्ृति-कोर म्ुक्रावत 
बनेराह बाट -श्यामता चढ़ावत, वेधव्य बाल वामता  वढ़ावत 
यह मोर नचावत, सोर मचावत, स्वेत स्रेत क्य पॉति उड़ावत ॥ 
सीतल सुगन्ध सुन्दर अमंद, नन्‍्दन ग्रधून मकरन्द विन्द 
मिश्रित समीर बिन घीर चलावत 
अंधियार रात, हाथ न दिखात, बिन नाथ बाल विधवा डरात 
तिन के मन मंदिर आय लगावत 
छिन गर्जि गजि पुनि लर्जि त्र्जि निज सेन सिखावत तर्जि तर्जि 
दुन्दुभि घरनि आकाश लचावत 
मल्लार राग ग्रावत विह्यग, सुख पावत आवत मेघ महावत 


हिन्दी-कविता का विकास ११ 


खित चित्रण करने की झोर उन्मुख हुई । छायावादी-युग में भी इस मार्ग पर चलने वाले अ्रनेक 
प्रतिभाशाली कवि सामने श्राये, जिनमें से माखनलाल चतुर्वेदी, रामतरेश त्रिपाठी, गोपालश रण सिह, 
गुरुभक्तालह भक्त, सियारामशररा गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द' और 
इयासनारायणा पाण्डे के नाम उल्लेखनीय हें । प्रवोध्यासिह उपाध्याय 'हरिऔध' झ्ौर सुभव्राकुमारी 
चौहान के प्रतिरिक्त, सौभाग्य से, ये सभी कवि जीबित हें औऔलौोर उनका रचना-क्रम जारी है । 

मैथिली शररा गुप्त को 'कालानुसरण की क्षमता भ्रर्थात्‌ उत्तरोत्तर बदलती हुईं भावनाओं 
झौर काव्य-प्रशालियों को ग्रहएा करते चलने को शक्ति! का उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 
किया है । किन्तु यह बात न्यूनाधिक रूप में वर्णनात्मक शेली के उपरोक्त सभी कवियों पर लागू होती 
है। काव्य-क्षेत्र में ये किसी 'वाद' से बंधकर नहीं चले, यद्यपि गाँधीवाद का सर्वाधिक प्रभाव इनकी 
विचारधारा पर पड़ा है। ग़ालिब के शब्दों में इन सब कवियों की स्थिति कुछ ऐसी रही है-- 

चलता हूँ थोड़ी दूर हरइक तेज रो के साथ | 
पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को में॥ 

इस बीच राष्ट्रीय झ्ान्दोलन में जो उतार-चढ़ाव आये, राष्ट्रीय-चेतना में जितनी विचार- 
धाराएँ प्राकर मिलों उन सब को श्रनुगूंज इनकी कविता में मिलती है, साम्प्रदायिक संकीणंता और 
सम्राज-सुधार को भावना से झ्राग बढ़कर इनका मानव-पश्रेमी हृदय दलित-पीड़ित किसान-मज़दूरों के 
प्ार्तनाद या शंखनाद या दोनों को सुनने में समर्य हुआ है। राष्ट्रीय-संग्राम में इन्होंने श्रपनी उदबो- 
घनात्मक बारी से योग दिया है । भ्रतीत के गौरव-गान गाकर इन्होंने जनता में स्वाभिमान जगायां 
है । इनकी कविता में भारतेन्दुकालीन या द्विवेदीकालीन इतिवृत्तात्मक कविता की शुष्कता नहों है, 
बल्कि विषयानुक्‌ल काव्योचित लालित्य, सरसता और झ्ोज भी है, यद्यपि शेली मूलतः वर्णनात्मक 
ही है ॥ म्रावश्यकतानुसार इन कवियों ने संस्कृत वृत्तों में भी कविता को और हिन्दी के मात्रिक 
छल्दों में भी और छायावादी कविता से प्रभावित होकर श्रतुकान्त और छन्द-मुक्त कविता भी लिखी 
है । इन्होंने प्रबन्ध-काव्य, खण्ड-काव्य और प्रगीत-मुक्तकों की भी रचना की है। विशेषकर अपने 
णीतों में इनमें से अधिकांश ने छायावाद को देखा-देखी लाक्षरिक व्यंजना और श्रप्रस्तुतों की 
योजना भी करनी चाही है, लेकिन इस तरह के प्रयोग बहुत सफल नहीं हुए। उनकी अन्तःप्रकृति 
आर काव्य-मनोभूमि से छायावादी शैली का पूरा मेल नहीं बंठता, लगता है जेसे यत्न-साध्य ऊपर 
से झोढ़ा हुआ परिधान है, भ्रन्तर्भाव को प्रकट करने के लिए भ्रभिव्यक्ति का स्वाभाविक रूप-प्रकाश 
नहीं । उनकी दृष्टि मूलतः बहिमु खी है, इसलिए राष्ट्र-जजीवन की सम-सामयिक हलचलों में निरन्तर 
रमसती चलो आई है, भ्रन्तमु खी होकर व्यक्ति-चेतना को अ्रगसम गहराइयों में नहीं उतर पायी । 
विद्येषकर लोक-प्रचलित पौराणिक आाल्यानों, इतिहास वृत्तों और देश की राजनीतिक घटनाओं से 
इन्होंने अपने काव्य की विषय-वस्तु कों सजाया है, इन अहख्यानों, वृत्तों और घटनाओ्रों के चयन में 
उपेक्षितों के प्रति सहानुभूति, देशानुराग और सत्ता के प्रति विद्रोह का स्वर मुखर है। यह एक 
प्रकार से राजनीति में राष्ट्रीय श्रान्‍योलन झौर काव्य में स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति के बीच पलने 
भ्रौर बहने वाली कविता को बहिम्‌खी धारा है, जिसने हिन्दी-भाषी जनता को ग्राधुनिक जीवन के 
व्यक्ति-समाज-सम्बन्धी गहरे तात्विक प्रइनों के प्रति नहीं, तो राजनीतिक पराधीनता और राष्ट्रीय 
संघर्ष की ग्राववयकता के प्रति सचेत बनाने में बहुत बड़ा काम किया है। स्थूलस्वरूप से इस धारा 
को राष्ट्रीय-धारा कह सकते हें, लेकिन छायावादी कविता भी भ्र-राष्ट्रीय नहीं है। एक ही जीवन- 
वास्तव को ये स्थल और सूदम, बहिम्‌खी और श्रन्तमुखी प्रतिक्रियाएँ हें। बल्कि छायावादी 


१२ काव्य-धारा 


कवियों ने झराधुनिक जीवन के केन्द्रीय प्रइनों को उठाकर राष्ट्रीय-चेतना में गहरी श्रन्तदूं ष्टि पैदा 
की है। सामान्यतः ये बातें इस समूची धारा के बारे में कही जा सकती हैं, किन्तु हर कवि का 
व्यक्तित्व, प्रतिभा, कृतित्व भौर शेली का भ्रपना बेशिष्ट्य है । 

प्रयोध्यासिह उपाध्याय. (सन्‌ १८६५-१६४१ ई०) भारतेन्द्रु के जीवन-काल में ही 
कविता करने लगे थे, किन्तु उस समय वे ब्रजभाष। में लिखते थे । सन्‌ १८८२ में उन्होंने “भीकृष्ण 
शतक' की सत्रह वर्ष की भ्रवस्था में रचना की, जिसमें सौ दोहे संग्रहीत हैं। इसके श्रनन्तर 
सन्‌ १६१४ में “प्रिय-प्रवास' के प्रकाशित होते तक वे ब्रजभाषा में ही काव्य-रचना करते रहे । 
सभी रचनाएँ कष्ण-सम्बन्धी थीं, जिनमें कहीं कृष्ण को परब्रह्म के रूप में, तो कहीं मानव-रूप में 
. चित्रित किया गया था। '“खड़ी-बोली श्रान्दोलन' के प्रभाव में श्राकर उन्होंने “प्रिय-प्रवास' की 
रचना के पूर्व भी हिन्दी में कभी-कभी कुछ लिखा था, लेकिन' बहुधा उदू के छन्दों और ठेठ बोली 
में ही । “प्रिय-प्रवास' हिन्दी का पहला महाकाव्य है। इसमें उपाध्यायजी ने श्राद्यान्त संस्कृत के वर्ण- 
वृत्तों का प्रयोग किया है । शैली वर्णनात्मक है, जिसमें सुक्ष्म-से-सूक्ष्म भावों की व्यंजना हुई है। 
झ्राचार्य शुक्ल का मत है कि “इसकी कथा-वस्तु एक महाकाव्य क्‍या अ्रच्छे प्रबन्ध-काव्य के लिए भी 
अरपर्याप्त है। भ्रतः प्रबन्ध-काव्य के सब भ्रवयव इसमें कहाँ भ्रा सकते ।” हमारा मत शुक्ल जी के 
मत से किचित्‌ भिन्‍न है । यह ठीक है कि महाकाव्य होने के लिए काव्य-वस्तु भी इतनी विशाल 
होनी चाहिए कि उसमें जीवन का सर्वांगीणा चित्रण हो सके । लेकिन “प्रिय-प्रवास' की संक्षिप्त 
कहानी--कृष्ण का ब्रज से मथुरा को प्रवास और फिर लोट कर झआाना--श्रौर उसकी काव्य-वस्तु दो 
भिन्‍न चीजें हूँ । रूढ़ि-रीति-प्रस्त दृष्टि के कारण ही यह भेद ऊपर से दिखाई नहीं देता। 'हरिओऔध' 
जी की विशेषता यह है कि उन्होंने इस छोटी-सी कहानी के भीतर ही कृष्ण-जीवन का पूरा वृत्त 
झौर उसके माध्यम से समाज के विविध अंगों, समस्या्रों श्रादि को ऋलका दिया है। कृष्ण के 
घले जाने पर ब्रजवासियों में कृप्ण-सम्बन्धी चर्चाएँं चलती हें, अऋधो के आगमन पर छे महीने तक 
कृष्ण की बाल-लीलाएँ झोर ब्रज की जनता की रक्षा के निमित्त किये गये कार्य-कलाप झोर ब्रज 
को स्मृतियाँ मुखर हो उठती हें । इस प्रकार काव्य-वस्तु केवल कृष्ण के प्रवास-प्रसंग तक ही सीमित 
नहीं है । यदि भोर भी सूक्ष्मता से देखा जाय तो प्रबन्ध-रचना श्र यथार्थ-चित्रण की पद्धति का 
मनोरम रूप प्रिय-प्रवास सें व्यक्त हुआ है--सीधे-साधे एक छोर से दूसरे छोर तक ब्योरेवार कहानी 
का वर्णन करने की श्पेक्षा केन्द्रीय प्रसंग से श्रागेगीछे हटकर स्मृति भौर कांक्षा के योग से जो 
कहानी कही जाती है, वह भ्रधिक मनोवंज्ञानिक भी होती है श्रौर जीवन के विविध श्रन्तसंस्बन्धों 
भर अ्रन्तसू्‌ त्रों को भो उद्घाटित करने में श्रधिक समर्थ होती है। इसलिए वस्तु-योजना का इस 
महाकाव्य में काफो संशिलिष्ट झर विशद रूप मिलता है। यह ठीक है कि संस्कृत के वर्णवृत्तों झोर 
बंगला की कोमल-कान्त-पदावली के कारण शेली जितनी सरस है, उतनी ही बोकिल और 
गतिहीन भी । 

(प्रिय-प्रवास' में कृष्णा अपने शुद्ध-मानव रूप में, विशव-कल्याणकार्य में निरत एक जन-नेता 
के रूप में अंकित किये गये हेँ। प्राचार्य शुक्ल ने 'साक्तेत! की आलोचना करते हुएं यकायक सूत्र- 
रूप में एक भयंकर पुराणपन्थी बात कही है, जो न जाने क्यों “प्रिय-प्रवास' के प्रसंग में कहना वे 
भूल गये । उन्होंने लिखा है--“किसी पोरारिक या ऐतिहासिक पात्र के परम्परा से प्रतिष्ठित 
स्वरूप को मनमाने ढंग पर विकृत करना हम भारी भनाड़ीपन समभते हैं ।” लेखक झोर कलाकार 
को यदि परम्परा से इतना बंध कर चलने की बाध्यता हो तो पोराणिक या ऐतिहासिक भाख्यातों 


हिन्दी-कविता का विकास १३ 


झौर पात्रों को अंकित करने की सार्यकता ही न रह जाय । कोई सच्चा कलाकार प्ननुकृति नहां 
रचता । किसी विषय-बस्तु के द्वारा यदि वह भ्रपने युग की केन्द्रीय समस्याओं का उद्घाटन नहीं 
कर सकता, यवि नये सत्य को भलका नहीं पाता तो केवल पुनरावृत्ति के लिए उस पर कलम या 
तूलिका नहीं उठाता । यह सामान्य नियम है । वाल्मीकि रामायरा में राम का मानव-चरित्र अंकित 
._ हुप्मा है; किन्तु तुलसीदास ने उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम बना दिया है। इनमें से राम के किस रूप को 
परम्परा से प्रतिष्ठित माना जाय ? यवि वाल्मीकि के राम को, तो तुलसीदास का “भारी पश्रताड़ीपन' 
शुक्ल जी को क्‍यों तहीं खला ? या अ्रलोकिक से लोकिक बनाने में ही 'मनमाने ढंग पर विकृत' 
करते का लांछन लगता है ? राधा का ही परम्परा से प्रतिष्ठित कौन-सा रूप है ? जयदेव की 
._ बिलासिनो, प्रेम-विह्लला राधा; विद्यापति की योवनोन्मत्त मुग्धा नायिका जेसी राधा; चण्डीदास 
की परकीया नायिका जेसी राधा; सूरदास की मर्यादा-संतुलित नागरी राधा; नन्‍्ददास की ताकिक 
राधा या रीतिकाल की उच्छ खल, भ्रल्हड़ किशोरो राधा--इनमें से राधा का कौनसा-रूप परंपरा 
प्रतिष्ठित माना जाय ? क्‍या हर युग के कवियों ने अपने जीवनादशों के भ्रनुकूल 'राधा' की कल्पना 
नहीं को ? भ्रयोध्यालिह उपाध्याय ने भी हिन्दी को एक नई “राधा' दी--भआधुनिक युग की प्रबुद्ध 
नारी के रंग में रंगी । वस्तुतः “प्रिय-प्रवास' में उन्होंने समय से पहले ही राष्ट्र-जीवन को एक 
केस्त्रीय समस्या की पूवं-ऋलक दे दी है शोर उसका आदशंबादी, श्रतः स्थूल समाधान भी उपस्थित 
किया है---इस समस्या को बाद में एक गंभीर मनोवेज्ञानिक समस्या के रूप में रवीन्द्रनाथ ठाकुर शोर 
प्रभी कुछ दिन पहले जेनेन्द्रकुमार ने अपने उपन्यासों 'घर और बाहर तथा 'सुखदा' में उठाया। 
'प्रिय-पअवास' में इस समस्या की प्रारस्भिक ऋलक हमें मिली । समस्या है स्थानीय श्रौर सार्वदेशिक, 
व्यक्तिगत और सकल मानवगत हितों,राग-सम्बन्धों के वेषम्य भ्रौर परस्पर समन्वय की। स्वच्छन्दता- 
बाद का यह पहला रूप है, जब व्यक्तिवादी चेतना इतनी मुखर नहीं हुई कि व्यष्टि और समष्टि के 
हितों में दुलिवार वेषम्य दोले झ्लोर अत्यन्त जटिल मनोवेज्ञानिक समस्याएँ पैदा हो गई हों । झ्ादर्श- 
बादी ढंग से दोनों में समन्वय भ्रभी सम्भव है। लेकिन उससे दोनों का श्रस्तित्व नहीं मिट जाता, 
झौर इसको स्वीकृति ही ऐसी करुणाजनक स्थिति पैदा कर देती है, जो काव्य-वस्तु का झ्ाधार बन 
सकी । राष्ट्रीय संघ को आगे बढ़ाने ओर देश की प्रगति में हाथ बंटाने के लिए प्रबुद्ध जनों को 
अपते घर-बार छोड़कर देश के कोने-कोने में श्रलख जगाते फिरना होगा, किन्तु भ्रपने प्रियजनों का 
मोह, क्‍या इस साधना को विफल नहीं कर देगा, प्रिय-जन इस वियोग को सहन कर सकेंगे ? क्‍या 
स्त्रियाँ, प्रेमिकाएं भी इस अ्रनुष्ठान में योग दे सकेगी ?--यह हमारे राष्ट्रीय-जागरण और संघर्ष 
की ही समस्या थी । इसी समस्या को मूर्त्त काव्य-रूप देने के लिए उपाध्याय जी ने ब्रज से कृष्ण- 
प्रवास का साभिक प्रसंग चुना, और बिना किसी प्रकार का “झनाड़ीपन' किये उसके माध्यम से युग- 
जीवन की यह केन्द्रीय समस्या भलका दी । कृष्णा मथुरा गये झौर विश्व-कल्याण झौर राजनीति 
की समस्याझ्रों में इतने उलके कि लोटकर वापस न झ्रा सके, लेकिन उनका हृदय ,ब्रजभूमि में हो 
रमा रहा। उद्धव के समझाने पर ब्रजवासियों को कृष्ण के बाहर रहने की भ्रनिवार्यता समभ में 
था गई ओर विरह-बविदग्ध राधा ने चिर कोमार्य का ब्रत धारण कर लोक-सेवा के लिए झ्पना 
जौवन भ्रपित कर दिया। 
उपाध्याय जी की भय रचनाएं इस कोटि की नहीं बन पड़ीं । उनके दूसरे महाकाव्य “बंदेही 
बनवास' में भी लोक-संग्रह की यही भावना व्याप्त है, लेकिन उसमें उन्होंने कोई नई भूमि नहीं 
नापी । चोखे और चुभते चोपदों में भाषा-प्रयोग का चमत्कार कहीं-कहीं जरूर मिल जाता है, लेकिन 


१४ काव्य-धारा 


उतना ही पर्याप्त नहीं है। 

मेथिलीशररण गुप्त (सन्‌ १८८६) हिन्दी के राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हें। सन्‌ 
१६०७ से ही श्रापकी कविताएँ झ्राचायं महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित 'सरस्वती' में छपने 
लगी थीं । उन दिनों बोल-चाल को भाषा में लिखी इतिवृत्तात्मक कविताश्रों का ही जोर था। गुप्त 
जी ने भी इस शली में लिखना श्रारम्भ किया । सन्‌ १६१० में इनका “रंग में भंग”! नाम का एक 
छोटा-सा प्रबन्ध-काव्य छपा, लेकिन सब से पहले इनकी कीति 'भारत-भारती' के कारण फैली । यह 
मोलाना हाली के “मुस॒हूस' के ढंग पर लिखी गई थी । मौलाना हाली ने मुसहुस की रचना करके 
मुसलमानों में जाग्रति फंलाई थी । गुप्त जी ने भी 'भारत-भारती' में हिन्दुओं के भ्रतीत वेभव और 
गौरव की भश्रपेक्षा में बतंमान हीन-दशा का वर्णन करके हिन्दू-जनता को उदबुद्ध करना चाहा । काव्य 
की म्ं-बोधिनी रसात्मकता न रहने पर भी यह पुस्तक उस समय हिन्दू-युवकों में बहुत लोक-प्रिय 
हुई । इसमें साम्प्रदायिक संकीणंता और श्रग्रेज़ी-राज्य के प्रति भक्ति और प्रशंसा के भाव भी मिलते 
हैं, जो भारतेन्दु-कालीन दृष्टिकोण के श्रवशेष-चिन्ह समभने चाहिए। श्रामे चलकर गुत्त जी की 
दृष्टि श्रधिक व्यापक और उदार मानववादी हो गई । 

उपाध्याय जी और इस धारा के श्रन्य कवियों की तरह गुप्त जी का दृष्टिकोश भी मूलतः 
श्रादर्शवादी और भावनामूलक है। वस्तुन्मुखी मनोवेज्ञानिकता या गहरे संवेदनशील भर्मबोध की 
उनमें भी कमी है, इसलिए श्रगले काव्यग्रन्थों में, यद्यपि उनकी होली का परिष्कार हो गया है 
शौर उन्होंने उत्कृष्ट काव्यों की भी रचना की है, लेकिन नई भाव-भूमियों का उद्घाटन करने 
वाली तल-स्पर्शी दृष्टि क। विकास वे नहीं कर सके, जीवन के केवल गोचर-दृब्य का ही अंकन 
करते रहे । 

“रंग में भंग” के बाद “जयद्रथ-बध', 'गुरुकुल', “किसान', “पंचवरटी', 'सिद्धराज” श्रादि आपके 
नेक छोटे-छोटे प्रबन्ध-काव्य छुपे, जिनमें से जयद्रथ-बध श्रौर पंचवटी को साहित्य-क्षेत्र में काफ़ी 
सम्मान मिला । इस बीच श्राप वर्षों तक अ्रपने सहाकाव्य 'साकेत' की रचना में संलग्न रहे, जो 
सन्‌ १६३१ में प्रकाशित हुआ । 'साकेत' और उसके बाद “यज्ञोधरा' गुप्त जी की स्थायी कीति के 
दो स्तम्भ हें। 'साकेत” रचकर गुप्त जी ने सहाकाव्यों की परम्परा में एक युगान्तर उपस्थित कर 
दिया । उपाध्यायजी की राधा कवियों की कभी उपेक्षिता नहीं रही,जयदेव से लेकर 'रत्नाकर' तक ने 
राधा के काव्य-चरित्र का अंकन किया था । लेकिन राम-काव्य की परम्परा के कविगण अ्रयोध्या से 
बनगमसन करते ही राम के साथ-साथ लंका तक तो भ्रमण कर आते थे, मगर अयोध्या औ्रौर वहाँ के 
लोगों का ध्यान भी न लाते थे । विशेषकर लक्ष्मण से वियुकत उमिला तो उपेक्षित ही रह जाती थी। 
गुप्त जी का भावनाशील कवि-हृदय राम के साथ वन-गमन को तत्पर नहीं हुआ, अ्रयोध्या में ही रम 
रहा । इसलिए 'साकेत'; और साकेत के नायक भरत और नायिका उमिला हें । 

साकेत के राम वाल्मीकि के लोक-प्रतिनिधि, वीर-चरित और तुलसीदास के मर्यादा पुरुषोत्तम 
लीलावतारी राम से भिन्‍न हें। वे एक सामान्य मानव हें और अपनी मानवता के उत्कर्ष 
द्वारा ही ईश्वरत्व के अधिकारी हैं । भरत, उभिलां, कंकेयी, सुमित्रा आदि सभी 
सामान्य सानव-प्राणी हें । यद्यपि उनके व्यक्तित्व अलग-अलग और विशिष्ट हैं । हर पात्र के 
व्यक्तित्व की मर्यादा की रक्षा करते हुए गुप्त जी ने व्यक्तिवाद और समत्व की भावनाओं का 
समन्वय करने की चेष्टा की है। इसके साथ ही साकेत में तत्कालीन राजनीतिक आन्‍्दोलनों की भ्रनु- 


हिन्दी-कबिता का विकास १५ 


. भू भी सुनाई देती है, ज॑से उ्िला द्वारा सैनिकों को श्रहिसा की शिक्षा देना, प्रजा के श्रिकारों 


की चर्चा, राम के वनगमन के प्रवसर पर भ्रयोध्यावासियों का सत्याग्रह, विश्व-बन्धुत्व और मानव- 


बाद के झादशों की प्रतिष्ठा ग्रादि। ये सामयिक घटनाओं के प्रभाव हें, जो कवि ने काफो सावधानी 


८ के 


2६ आज 4 


 फीफीक मशीन | 


से प्रहएा किये हें । साकेत में वर्णनात्मक और प्रगीतात्मक दोनों शेलियों का सम्मिञश्रण है। पहले 
झाठ सर्गो में रास के ग्रभिषेक की तेयारी से लेकर चित्रकूट में भरत-मिलन तक, कथया-सूत्र वर्ण- 


. ज्ञात्मक झोली में व्यवस्थित रूप से चलता है। इसके बाद नवें सर्ग में उमिला की वियोगावस्था को 


सनस्थितियों का प्रयोतात्मक वर्णन है । कथा-सूत्र इस बीच थमा रहता है । दसवें सर्ग में उभिला 
झपले शदवकालोीन भ्रतीत का स्मरण करती है । ग्यारहबें-बारहें सर्गों में सहसा भरत के बाण से 
हसुसान के गिरने को घटना के पदचात्‌ भ्रयोध्या के राज-परिवार के देनिक-जीवन को राँकी मिलती 
है झौर शत्र॒ुघ्त ओर मांडवी के मुख से दण्डकारण्य से लेकर लंका तक की घटनाएँ सुनने को मिलतो 
हैं । भ्रन्त में, राम के वापस लोटने और लक्ष्मएा-उभिला-मिलन से काव्य की समाप्ति होती है। 
इन झ्न्तिम चार सर्गो में, विशेषकर दो सर्गो में वस्तु-व्यापार का काव्योचित बिकास नहीं हो 
पाया, जिससे काव्य में शिथिलता झ्रा गई है । ऐसी ओर भी अनेक त्रुटियाँ दिखाई जा सकती हें, 
किन्तु फिर भी समग्र रूप से साकेत एक श्रेष्ठ काव्य है और उसने आधुनिक महाकाव्यों की पर- 
म्परा का सूत्रपात किया है । 
यशोधरा की रचना प्राचीन चम्पू के ढंग की है ।। मारिक भावों की व्यंजना गीतों में 
है झौर कया-सत्र कहों-कहीं गद्य में है । गुप्त जी ने लिखा है कि यश्लोधघरा की ओ्रोर संकेत उभिला 
ले ही किया । बुद्ध यशोधरा को आाबी रात के समय सोती छोड़ कर चले गये । उभिला के लिए 
भ्रविध का सहारा था, लेकिन यशोधरा के लिए वह भी नहीं था। उसे त्याग का गौरज भी नहीं 
मिल पाया । उपेक्षिता यशोघरा के मन को पीड़ा, उसकी समस्त आ्ात्मा का उपालसम्भ केवल इतना 
है कि वे उससे कहकर क्यों न गये : 
जायें, सिद्धि प्रार्वें वे सुख से 
दुखी न हो इस जन के दुख से-- 
उपालंभ दूं में किस मुख से ? 
आज अधिक वे भाते / 
सख्ि वे, मुझ से कहकर जाते । 
बिरहिएी यशोघरा और कुमार राहुल का चरित्र-चित्रण इस काव्य में झ्रत्यन्त करुणोत्पादक 
झोर सामिक हुआ है | प्रबन्ध-काव्यों के भ्रतिरिक्त, मुख्यतः छायावाद के प्रभाव में गुप्त जी गीत- 
मुक्‍्तकों को ओर भी भुके । साकेत के नवें सर्ग और यज्ञोघरा के गीतों पर भी लाक्षण्क व्यंजना 
का प्रभाव दिखाई देता है । उनको स्फुट कविताझ्रों के संग्रह “मंकार' और “मंगल-घट' में विशेष 
रूप से इस शंली के गीत संकलित हें । 
इन दो महाकवियों के भ्रतिरिक्त इस धारा में ओर अ्रनेक प्रतिभा-सम्पन्त कवि योग देते 
भ्राये हें । गयाप्रसाद शुक्ल सनेही (जन्म १८८३ ई०) की सरल-कोमल और झोजस्वी कविताएं 
काफी लोक-प्रिय रहो हें । तू हे गयन किस्तीर्ण तो मैं एक तारा क्षुद्र हूँ” की विनय-शील भाबु- 
कता के साय-साय उनमें 'जी न चुराओ रण से, समर सूरवत डटे रहो? का उद्धत घोष भी है । 
साखनलाल चतुर्वेदी “एक भारतीय आत्मा' (जन्म १८८८ ई०) की कविता उनके कर्मठ राष्टु- 
सेबी जीवन की समतल पर चली है । उनके व्यक्तिबाद को परिणाति देश के स्वतन्त्रता-संग्राम में 


१६ काब्य-धारा 


बलिदान होने की भावना में हुई--“मुम्के तोड़ लेना बन माली / उस पथ पर <देना तुम फेंक । 
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक |”? रामनरेश त्रिपाठी (जन्म १८८९ ई०) के 
तीनों खंड-काव्य 'पथिक', “मिलन झोर “स्वप्न' जो सन्‌ ३० के राष्ट्रीय-भ्रान्दोलन के दिनों प्रत्येक 
राष्ट्प्रेमी युवकके कण्ठहार बने हुए थे, भ्रभी तक विस्मृत नहीं हुए । इन प्रबन्ध-काव्यों में त्रिपाठीजी 
ने उपाध्याय जी या गुप्त जी की तरह पौराणिक झाख्यानों या इतिहास के पात्रों को नहीं लिया, 
स्वयं अपनी कल्पना से उनके पात्रों की सृष्टि की । इनके झ्रधिकतर पात्र उनकी देश-भक्ति-पूर्ण 
भावनाओं के प्रतीक बन कर सामने शभ्ाते हें । श्रादर्शोन्मुखी भावना-प्रधान शैली और 
भाव-भूमि के कारण हो बे सर्वांग-सजीव पात्रों की सृष्टि नहीं कर पाये, लेकिन युग की भाव- 
नाओं के साथ मिलकर उनकी भाषा श्र भ्रभिव्यक्ति इतनी सजीव है कि सहज ही प्रभाव डालती है । 
स्थल-स्थल पर प्रकृति-चित्रण का भी भव्य-रूप देखने को मिलता है--“ग्रतिक्षण नूतन वेष बनाकर 
रंग-विरंग निराला | रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद माला |?? तीनों काव्य देश- 
भक्ति की भावना से प्रेरित हें। “स्वप्न! में मनोवेज्ञानिक ढंद्न्‍ध भी मिलता है । प्रियतमा के प्रेम-साहचर्य 
का सुख और अ्रसंख्य पीड़ित जसों के श्रातंनाद को सुनकर जाग्रत कतंव्य-विवेक दोनों श्रपनी-अपनी 
झोर झाकर्षित करते हें । इस तरह प्रेम और कतंव्य के इन्द्र को लेकर चलने वाला यह काव्य राष्ट्रीय- 
झान्दोलन द्वारा उठाई समस्या फो ही श्रत्यन्त मासिक ढंग से प्रतिबिम्बित करता है। ठाकुरगोपाल 
दरणरसह (जन्म १८६१ ई०) की यह प्रार्थना भ्रभी तक बिस्मृत नहीं हुई--'प्रथ्वी पर ही मेरे पद 
हों, दूर सदा आकाश रहे? प्रौर इस पृथ्वी पर ही खड़े होकर उन्होंने नारी को दुलहिन के सुहाग- 
भरे रूप में भी देखा और देवदासी, उपेक्षिता, भ्रभागिनी, भिखारिनी, वीरांगना के समाज-बिकृत 
प्रभागे रूप में भी। तभी "तेरे दुःख की दुःख ज्वालाएं, मेरे मन में हैं छुन्द हुईं? का चीत्कार कवि 
के हृदय से निकल पड़ा। उन्होंने हिन्दी में ब्नजभाषा के छंदों का सफलता-पूर्वक प्रयोग किया और 
उनकी भाषा झौर शली श्रत्यन्त सरस और मासिक है। सियारामशरण गुप्त (जन्म १८६४ ई०) 
करुण-भावना के कवि हैं । उनकी कविताओ्रों में सात्विक और श्ञान्त भाव प्रकट हुआ है, विचार-तल 
पर वे गांधीवाद, मानववाद और कुछ-कुछ रहस्यवाद से प्रभावित हैं, भौर श्रपनी कविताओं में इन 
विचार-जन्य अमूत्त भावनाओ्रों की संजूषा भी सजाते हें। भ्रनूप शर्मा इसके विपरीत हिन्दी में वीररस 
के कवि प्रसिद्ध हें। श्रापने कवित्त छंद में हिन्दी को सुघरता से ढाला है। आरम्भ में आप ब्रज- 
भाषा के ही कवि थे, लेकिन फिर हिन्दी में लिखने लगे। ऐतिहासिक और सामाजिक सभी विषयों 
पर झापकी दृष्टि गई है। 'सुनाल' नाम के खंड'काव्य में अंकित कुणाल के चरित्र ने सबसे पहले 
लोगों का ध्यान झ्राकर्षित किया । श्रठारह सर्गों के भीतर संस्कृत के शिखरणी, मंदाक्रांता, ख्ग्धरा 
झ्ादि वर्ण-वृत्तों में श्रापने बुद्ध-चरित को लेकर “सिद्धार्थ' एक महाकाव्य भी रचा। इसके पदचात्‌ 
झापने और भी अ्रनेक खण्ड-काब्य और फुटकर कविताएँ लिखी हैं। श्राधुनिक ज्ञान-विज्ञान द्वारा 
उद्घाटित सृष्टि और जीवन-सम्बन्धी नये तथ्यों को भी भ्रापने मारमिक रूप में काव्योचित श्रभिव्यक्ति 
दी है। गुरु भक्तसिह भक्त (जन्म १८६३ ई०) को लोग छायावाद की “नई धारा' के कवियों में 
भी गिनते हैं, क्योंकि प्रकृति-चित्रण के लिए भाप प्रसिद्ध हें। लेकिन वस्तुतः श्राप पूरी तरह दोनों 
में से किसी एक धारा में नहीं खपते । आपके प्रबन्ध-काव्य “न्रजहाँ की स्मृति श्राज भी शेष हैं। 
सन्‌ ३४-३४ के दिनों 'न्रजहाँ' उतनो ही लोक-प्रिय थी, जितना 'पथिक' और “सिलन' । श्रापकी 
शैली प्रधानतः वर्ण उत्मक है, और भाषा सरल और मुहावरेदार । लेकिन इस धारा की यशस्वी 
कवियित्री हें दिबंगता सुभद्रा कुमारी चौहान (सन्‌ १६०४-१६४७ ई०) । इनकी वर्णनात्मक शैली 


हिन्दी-कविता का विकास १७ 


में जो भाव-तस्मयता, ग्रोजस्विता भौर प्रवाह है वह प्रन्यत्र दुर्लभ रहा । उनको कबिता के दो स्वर 
हैं, एक में राष्ट्रीय भावनाझ्रों का स्फूतिदायी उद्धोष, तड़प श्रौर श्रोज है तो इूसरे में पारिवारिक 
जीवन की सरसता, वात्सल्य की गरिमा भ्ौर मबुरता फो व्यक्त करने वाली सुकुमारता और कोम- 
लता है । गहरे, दा्शनिक विचारों और व्यापक विश्व-बोध का उनकी कविता्रों में यदि श्रभाव है 
तो उसकी क्षति-पूर्ति पारिवारिक और ढेश्ञा-प्रेम को उत्सगं-भावनाझ्रों ढ्वारा हो जाती है, जिससे वे 
सहज हो हृदय को छू लेतो हें। “चमक उठी सन्‌ सत्तावन में कह तलवार पुरानी थी ! बुन्देले 
हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी- खूब लड़ी मरदानी वह तो भाँसी वाली रानी थी /?” 
ने हर भारतवासी का मस्तक ऊँचा उठाया है । जिस समय हमारे भारतेन्द्रकालीन कवि “धन्य 
तिहारों राज, अरी मेरी महारानी !” (प्रतापनारायण मित्र) लिखकर “भारतेक्वरी', “आ्रार्येब्वरी', 
श्माता', 'देवी', विक्‍्टोरिया को प्रशस्तियाँ गाते थे शौर सन्‌ सत्तावन के राज-ब्रोह की-- दिसी मृढ़ 
प्रिपराही कद्भुक ले कुटिल प्रजा संग | कियो अमित उत्पात, रच्यो निज नासन को ढंग ॥? (बद्री- 
नारायण 'प्रेमथन') कहकर सनत्त्संना कर रहे थे, उन्हीं दिनों ब्रज ओर बुन्देली के लोक-गीतों में जनता 
के कण्ठ से भ्रतायास ये कृतज्ञता-भरे शब्द फूट रहे थे--'खूब लड़ी मर्दानी, अरे रॉसी वाली 
रानी ।* सगरे प्िपाहियों को पेड़ा जलेबी, आपने चबाई गुड़घानी | अरे झाँसी वाली रानी, 
खूब लड़ी मर्दानी ॥!” भारतीय जनता की सच्ची भावनाप्रों को व्यक्त करने वाले इस लोक-गीत 
का उद्धार झ्ौर संस्कार करके सुभद्राकुमारी चोहान स्वयं चिरकाल के लिए भारतीयों की कृतज्ञता 
की पात्र बन गई हैं । इससे भ्रधिक ओजल्वी जन-गीत हिन्दी में और कोई नहीं रच सका । इस 
प्रसंग के अंत में इयामतारायणा पांडे (जन्म सन्‌ १६१० ई०) विशज्ेष रूप से उल्लेखनीय हें । दोररस 
झोर करुणरस के श्राप प्रसिद्ध फवि हें । आप की वर्णनात्मक झोली भ्रन्य कवियों को अपेक्षा भ्रधिक 
अगल्भ और वेगवती है । “हल्दी-घाटी' नाम से १७ सर्यों में रचे गये झ्ाापके महाकाव्य में युद्ध का 
श्रावेगपूर्ण भ्लोर चित्रमय सजीव वर्णन जगनिक कवि (सन्‌ ११७३ ई०) का “आल्हा' का स्मरण 
दिलाता है-- वारिद के उर में चमक-दमक, तड़-तड़ थी बिजली तड़क रही | रह-रह कर जल 
था बरस रहा, रणघीर भुजा थी फड़क रही ॥** “'केरी दल को ललकार गिरी, कह नागिन 
सी फुफ़कार गिरी | था शोर मोत से बच्तो-वचो, तलवार गिरी, तलवार गिरी |?? में भावा, श्रणि- 
व्यक्ति और भावना का आवेग तो बहुत है, लेकिन व्यापक वस्तृन्मुखी जीवन दृष्टि का झभाय है । 
इसके अतिरिक्त हमारा विचार है कि जिन्होंने मुस्लिम राजत्व-काल से ऐतिहासिक घटना-असंग 
लेकर स्फुट कविताओं या प्रबन्ध-काव्यों की रचना की है, उनके पात्र चाहे शिवाजी और प्रताप जेसे 
बोर-चरित्र ही क्‍यों न हों, वे देश की. सामथिक परिस्थिति में व्यापक राष्ट्रीय भावना का पोषण 
करने में सफल न हो सके, ऐसी रचनाश्रों में सर्वजनीनता के स्थान पर साम्प्रदायिक संकोर्णता का 
आा जाना अनिवार्य है । एकता-विधायिती साम्नाज्य-विरोधी स्वातंत्य-भावना में ऐसी रचनाएँ कवि 
द्वारा न चाहने पर भी सध्य-कालीन भारत के हिन्दु-मुस्लिम संघर्ष को स्मृतियों को जगाकर अनि- 
वारयंतः एक विक्षेप उपस्थित कर देतो हें, जो शुद्ध राष्ट्रीय-भावना का उदात्त स्वरूप स्थिर करने 
में बाधक होती है । पौराणिक या पू॑-मध्यकालीन झख्यान भारतीय हिन्दू अऋबवा बोद्ध-संस्कृति के 
प्रतीक होते हुए भी सर्वजन-संयेद्व हो सकते हैं, या कम-से-कम राष्ट्रीय-भावना में विक्षेप नहीं 
उपस्थित करते । 

; हमने राष्ट्रीय जाग्रति से प्रेरित श्लादर्श-भावना का रूप-संस्कार करके भ्रधिकतर निर्वेयक्तिक 
दृष्यस्तर पर क/ब्य-रचना करने वाले वर्णनात्मक पद्धति के उन मुक्य-मुख्य कबियों को ही लिया 


जि काव्य-धारा 


है जिनका कतित्व झ्रपनी धारा की सामान्य परिधि के भीतर भी विशिष्ट श्रौर महत्त्वपूर्ण है । 
श्रीधर पाठक से लेकर ध्यामनारायरा पाण्डेय तक इस धारा का प्रवाह कभी विच्छिन्न नहीं हुआ | 
काल-क्रम की दृष्टि से, प्रिय-प्रवास भौर इतर कुछ रचनाओं को छोड़ कर, इस धारा की श्रधिकांश 
रचनाएँ भी छायावाद-यग में या दो महायुद्वों के बीच ही रची गईं, लेकिन फिर भी हमने उन्हें 
पूर्व -छायावाद-युग में ही रखा है, क्योंकि यह धारा जिस काव्यादर्श को लेकर चलती रही--इसके 
दाब्द-प्रयोग, भाषा परिपाटी, श्रनुभूति-प्रकार, श्रन्तः स्वर, चित्रण-क्रम, वस्तु-विन्यास आदि श्रादि-- 
वह पूर्व-छायावाद-युग का ही काव्यादर्श है। इसके भाव-संकेत श्रौर भावना-संस्कार भी पूर्व-छायावाद- 
युग के हैं । छायावाद-युग में काव्यादर्श बदल गया, कवियों क। विश्व-बोध, उनकी जीवन-दृष्टि और 
उनकी श्रनुभूति श्नौर श्रभिव्यंजना का रूप-प्रकार सभी मौलिक रूप से बदल गये, जिससे ये कवि 


भी प्रभावित हुए । किन्तु फिर भी छायावाद की मुख्य-धारा में पुरानी धारा का पूरी तरह पर्यवसान 
नहीं हो पाया । 
छायावाद-युग 

हम पहले कह चुके हें कि छायावाद या स्वच्छन्दतावाद की सूलवर्तो भावना आधुनिक 
शझ्रौद्योगिक युग से प्रेरित व्यक्तिवाद है। इस वक्तव्य का पूरा श्रर्थ समक लेना चाहिए । प्रारम्भ में 
श्राचायं द्विवेदी श्र श्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल जंसे भ्रालोचकों ने भी छायावादी कवियों पर पाइचात्य 
कविता का भ्रनुकरण करने का आरोप लगाया था। बाद में जब छायातादी कविता की मान्यता 
प्राप्त हो गई तो हिन्दी-आलोचकों ने यह स्वीकार कर लिया कि छायावादी कविता हमारे देश की 
राष्ट्रीय जाग्रति की हलचल में ही पनपी और फली-फूली है श्रौर इसकी मुख्य प्रेरणा राष्ट्रीय और 
सांस्कृतिक है । यह दूसरी स्थापना सत्य के श्रधिक समीप है। किन्तु यही बात इतिवृत्तात्मक पद्धति 
के उन काव्यों के बारे में भी सत्य है, जिनका विवेचन हम अभ्रभी कर आये हें। इसलिए इस बात 
को स्पष्ट समझ लेने की जरूरत है कि यदि हमारा देश पराधीन न होता श्रौर हमारे यहाँ राष्ट्रीय 
झान्दोलन की श्रावश्यकता न रही होती, तो भी श्राधुनिक श्रौद्योगिक समाज (पूंजीवाद) का 
विकास होते ही काव्य में स्वच्छन्दतावादी भावना और व्यक्तिवाद की प्रवृत्ति मुखर हो उठती । 
इसलिए छायावादी कविता राष्ट्रीय श्रान्दोलन या जाग्रति का सीधा परिणाम नहीं है; बल्कि 
पाइचात्य श्रर्थ-व्यवस्था और संस्कृति के सम्पक में आने के परिणाम-स्वरूप हमारे देश और समाज 
के बाहरी श्रौर भीतरी जीवन में जो प्रत्यक्ष और परोक्ष परिवर्तन हो रहे थे, उन्होंने जिस तरह 
सामूहिक व्यवहार और कर्म के क्षेत्र में राष्ट्रीय एकता की भावना जगाई और राष्ट्रीय संघर्ष को 
प्रेरणा दी, उसी तरह सांस्कृतिक क्षेत्र में उसने स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति को प्रेरणा दी । जिस 
तरह राष्ट्रीय जाग्रति और राष्ट्रीय श्रान्दोलन हमारे बाह्य कर्म-जीवन को समग्र-रूप से संचालित 
करने लगा, उसी तरह स्वच्छन्दताबादी प्रवृत्ति हमारे अश्रन्तरस्थ भावों और आकांक्षाओं को संचा- 
लित करने लगी । इस प्रकार राष्ट्रीय जाग्रति और स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति दोनों ही ने आधुनिक 
युग की सामान्य परिस्थितियों से जन्म लिया। राष्ट्रीय जागरण और आ्रान्दोलन की प्रेरणाएँ 
सामयिक और बाह्मयस्तर की होने के कारण श्रधिक बलवान होती हें । उन पर समूचे देश का 
सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक विकास निर्भर करता है। इसलिए अ्रधिक व्यापक और 
तलस्पर्शों होते हुए भी सांस्कृतिक भावना का रूप-विन्यास राष्ट्रीय जाग्रति से प्रभावित होता है। 
इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि देश की प्राचीन संस्कृति और पाइचात्य काव्य-साहित्य के प्रभावा 
को गृहण करती हुई छायावादी कविता राष्ट्रीय जागरण के करोड़ में पनपी और फली-फूली । 


हिन्दी-कविता का विकास ५६ 


व्यक्तिवाद अपते प्राप में बुरी चीत नहों है, न यह भ्रसामाजिक भावना हो है, किन्तु 
पाश्चात्य वेशों के ह्लातोन्मुखी पूंजीवाद के युग में व्यक्तिवाद को परिणाति बहुधा ऐसी भ्रहंवादो, 
स्वार्थ-प्रेरित, प्रात्म-केन्द्रित, ्रसामाजिक और प्रसंतुलित मनोवृत्तियों के रूप में हुई है, कि किसी को 
#पक्तिवादी' कहना दुर्वंचत-सा बन गया है । बस्तुतः बिकासोन्मुखी पू जीवाद के युग में “व्यक्तिवाद' 
सानव-चेतना के एक झभिनव विकास की सूचना देता है । मध्यकालीन सामंती समाज में व्यक्ति के 
मनोभावों और व्यक्ति के भ्रथिकारों का प्रइत ही नहीं उठता था । कर्तव्यों की एक अट्ट श्यूंखला 
में व्यक्ति का भ्रन्तर्बाह्म जीवन बंधा हुआ था। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में समाज-सम्बन्ध इस 
इकतरफ़ा भित्ति पर नहीं खड़े रह सकते थे। व्यक्ति समाज की इकाई है । इन इकाइयों से मिलकर 
हो समाज बनता है, इसलिए समाज के प्रति व्यक्ति का कर्तव्य है तो व्यक्ति के प्रति भी समाज का 
कतेंव्य है, प्रस्यया समातता का कोई श्रर्थ ही नहीं रहता । व्यक्तिवाद इस प्रकार एक साप्राजिक 
झावदयकता को चेतना का रूप लेकर ही पैदा हुआ । झ्ागे चलकर पूंजीवादी समाज ने नये भ्रप्र- 
त्यक्ष पूंजी-सम्बन्ध स्थापित करके व्यक्ति के आ्राध्यात्मिक और भोतिक विकास के मार्ग बर्ग-सीमित 
कर दिये झौर युग को स्वच्छुन्दतावादी भावना प्रतिक्रिया-स्वरूप पूंजीवाद से द्रोह न करके सारे 
समाज और सामाजिकता से ही द्रोह कर बेठी । यह पूंजीवादी व्यवस्था की आन्तरिक असंगतियों 
झोर छ्ास को कहानी है । किन्तु इससे व्यक्तित्व या व्यक्ति की सत्ता की स्वीकृति का प्रइन अपनी 
संगति नहीं खो बेठता । 

हमारे देश में जिस समय व्यक्ति-भावना का जन्म हुआ उस समय राष्ट्रीय-चेतना का भी उदय 
हुआ । इसलिए व्यक्ति-भावना का प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय आज़ादी की भावना से गठबन्धन हो गया, 
झौर नई छायावादी कविता का व्यक्तिवाद अ्सामाजिक पथों पर न भटक कर राष्ट्रीय नवजीवन 
को उदात्त ग्राकांक्षा का गम्भीर मर्म-वेदन लेकर मुखरित हुआ । रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी से पहले 
ही बंगला-काव्य में स्वच्छुन्दतावाद की धारा प्रवाहित कर चुके थे, जिसने एक नई काव्य-भूमि के 
बिस्तृत सीमान्त खोल दिये थे । उनका व्यक्तिवाद स्वयं अपने पार्थिव जोवन के सुख-वुःख से ऊपर 
उठकर जाति, वर्ण, देश और समाज की सीमाझों को पार करता हुआ विद्व-बन्धुत्व और मानवी- 
सीमाओं में असीस भोतिक और आध्मात्मिक विकास की सम्भावनाओं का दर्शन कर रहा था । 
उत्की गोचर में भ्रगोचर को खोज अ्रं।र पार्थिव में दिव्य का अवतरण ओर प्राण-प्रतिष्ठा करने 
की साधता मानव-जोवन की अनन्त सम्भावनाझ्रों का सत्यान्वेबण करने का हो नेतिक प्रयास था। 
इन उदात्त भावनाओं और दार्शनिक चिन्तन ने व्यक्तिगत अ्ननुभूति का रूप धारण करके प्रगीता- 
त्मक अभिव्यक्ति पायी, क्योंकि कवि का संवेदनशील व्यक्ति-हृदय उस समय “मानवता का स्वच्छ 
मुकुर' बन गया था, जिसमें हमारे देश को ही नहीं, मानव-मात्र को झ्राशाओ्रों-आकांक्षाओं, सुख-दुःख 
झोर राग-विराग का सम्पूर्ण वेदन प्रतित्रिम्बित हो रहा था। कवि बाह्म-जीवन में से प्रतिनिधि- 
अरित्रों का तिर्माण किये बिना ही प्रत्येक्र व्यक्ति के भ्रन्तर्भावों को छू सकता था, उन्हें भ्रपनी संबे- 
बला और अनुभूति का अंग बनाकर मासिक चित्रों को भाषा में क्‍्रभिव्यक्ति दे सकता था। ब्यक्ति- 
हृदय या व्यक्ति-चेतना समाज-हृदय झौर समाज-चेतता से भी एकात्म थी। इसलिए प्रारम्भिक 
छायावादी कविता का रुदन-क्दन, व्यक्तिगत रुवन-कन्दन, के साथ-साथ रूढ़ि-बद्ध, पराधीन झौर 
संघर्षशील भारतीय समाज का ही रुदन-ऋन्‍दन था । कवि का 'में' प्रत्येक प्रबुद्ध भारतवासी का 'में 
था, इस कारणा कवि की विवयगत दृष्टि ने अपनी सृूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रनुभूतियों को व्यक्त करने के 
लिए जो लाक्षणिक भाजषा प्लोर भ्रप्रस्तुत योजना-शेली भ्रपनायी, उसके संकेत भ्रोर प्रतीक हर ब्यक्ति 


२० काव्य-धारा 


के लिए सहज प्रेषणीय बन सके । छायाबादी कवियों की भावनाएँ यदि उनके विशिष्ट वेयक्तिक 
दुखों के रोने-धोने तक ही सीमित रहतीं;। उनके भाव यदि केवल झ्रात्म-केन्द्रित ही होते तो उनमें 
इतनी व्यापक प्रेषणीयता कदापि न झा पाती । “निराला ने लिखाः-- 
“मैंने??''मैं?? शेली अपनाई 
देखा एक दुखी निज भाई 
दुख की छाया पढ़ी. हृदय में 
झट उमड़ वेदना आईं |”? 
इससे स्पष्ट है कि व्यक्तिगत सुख-दुखों को श्रपेक्षा अपने से 'श्रन्य' के सुख-दुखों की श्रनुभूति 
ने ही नये कवियों के भाव-प्रवण झशौर कल्पनाशील हृदयों को स्वछन्दता की श्रोर प्रवत्त किया।._ 
प्रारम्भ में हिन्दी के प्रमुख आलोचक छायावादी कविता के इस युगीन रूप को न पहचान 
सके, यद्यपि हिन्दी के पाठकों में ये कविताएं लोक-प्रिय होती जा रही थीं । बाबू मैथिलीशरण गुप्त, 
श्रीधर पाठक्त, मुकुटधर पाण्डेब श्रौर पंडित बदरीनाय भट्ट ने छायावादी-युग से पहले कुछ गीता- 
त्मक रचनाएँ की थीं और उनमें कहीं-कहीं रहस्प-भावना की पुट भी दी थी । लेकिन इन रचनाओं 
के भाव-संस्कार पुराने शोर धार्मिक ही थे । यहाँ तक तो उस युग के श्रालोचकों को सह्य था, लेकिन 
हिन्दी-काव्य परम्परा-विहित मार्ग को छोड़कर नितान्त नयी भाष!), पद्धति और श्रथथ-भूमि की सृष्टि 
करने लगे, यह उनके शास्त्र-ज्ञान भर पूर्व-ग्रहों को तीत्र चुनोती थी, जिसके लिए वे तेयार न थे । 
सन्‌ १६१३ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबल-पुरस्कार प्राप्त हुआ था, तब से, कम-से-कम उन 
पर सीधे आक्रमण करने का साहस झालोचकों को नहीं रहा था, यद्यपि उनकी कविता को 
बे किसी पूर्व-परिचित, श्ास्त्रोक्त परिपाटी के अन्दर रखकर समझे सकने में असमर्थ थे । 
हिन्दी-आलोचकों ने इस कारण रवॉंद्रगाथ ओर उनकी कविता के प्रति एक आक्रोशपुर्ण 
उदासीनता का भाव अभ्रपना रखा था। वे नहीं चाहते थे कि बंगला-काव्य को रवि बाबू जिन 
झनजाने पथों पर घसीटे लिए जा रहे थे उन पर हिन्दी के उदीयमान कवि भी भटक जायें। 
इसीलिए जब निराला और पन्‍्त की कविताएँ पत्र-पत्रिकाश्रों में छपने लगीं तो हिन्डी-आलोचकों 
ने उनका जमकर विरोध किया । स्वयं अ्ाचाये द्विवेदी ने इस विरोध की शुरूआत की और बाद 
में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी इस नई धारा के विरुद्ध पर्याप्त लिखा। केवल अपने भ्रन्तिम 
दिनों में ही उन्होंने स्वीकार किया कि “छायावाद की शाखा के भीतर धीरे-धीरे काव्य-शेली का 
बहुत अ्रच्छा विकास हुआ, इसमें सन्‍्देह नहीं। इसमें भावावेश की श्राकुल व्यंजना, लाक्षणिक 
वेचित्र॒य, मृत्त प्रत्यक्षीकरण, भाषा की वक्ता, विरोध-चमत्कार, कोमल पद-विन्यास इत्यादि काव्य 
का स्वरूप संगठित करने वाली प्रचुर सामग्री दिखाई पड़ी ।” छायावादी कविता के विरोध में 
रवीन्द्रनाथ ओर पाइचात्य स्वच्छुन्दतावादी कवियों के अ्रनुकरण का आरोप तो लगाया ही जाता 
था, किन्तु द्विविदी जी का मुख्य आरोप यह था कि इस कविता में प्रासादिकता नहीं है । वे प्रासा- 
दिकता या प्रेषणीयता को काव्य का प्रधान युर मानते थे। आचाये शुक्ल का विरोध इन बातों के 
श्रतिरिक्त, इस बात को लेकर भी था कि छायावादी कवि काव्य-वस्तु को संकीर्ण बनाकर केवल 
अप्रस्तुतों की योजना करने और लाक्षरिक मूत्तिमत्ता और विचित्रता लाने की ओर प्रवृत्त हें और 
प्रेम-क्षेत्र के भीतर ही प्रकांड बेदना, ओऔत्सुक्य, उन्‍्माद झ्रादि की व्यंजना करते हैं, जो रीति-कालीन 
श्रृंगारी कविता का ही, कुछ अदल-बदलकर, प्रत्यावर्तत है। प्रासादिकता या प्रेषणीयता के सम्बन्ध 
- में हम कह चुके हें कि छायावादी कविताएँ धीरे-धीरे लोक-प्रिय होती जा रही थीं क्योंकि युग-चेतना 


द्िन्दी-कविता का विकांस २१ 


का प्रवाह उनके भ्रनुकूल था। रही प्रेम-क्षेत्र के भीतर ही भ्रधिकतर छायावादी-काव्य के सीमित 
रहने को बात, तो इस सम्बन्ध में हमें यह कहना है कि श्रादि-काल से स्त्री और पुरुष का प्रेम- 
सम्बन्ध काव्य, कला और साहित्य की विघषय-बस्तु बनता भ्राया है, इसलिए नहीं कि महान्‌ कबि 
और कलाकार विलासी और श्यूंगारी मनोवृत्ति के व्यक्ति थे, बल्कि इसलिए कि मानव-सम्बन्धों 
में प्रेम का सम्बन्ध न केबल सर्वोच्च है, बल्कि मनुष्य की उच्चतम नेतिक भावना, परदुख-कातरता, 
सौहाई आर सहृदयता को सबसे बड़ी कसौटी भी है। नर-तारी के प्रेम-सम्बन्धों को काव्य-कला में 
रूपायित करने का भ्रर्य है, मनुष्य की उज्चतम उदात्त भावनाश्रों, श्राशाओ्रों, श्राकांक्षाओं झोर 
तत्कालीन सामाजिक जीवन को रूपायित करना। यह सामाजिक जीवन या तत्कालीन समाज- 
सस्बन्ध व्यक्ति और उसके माध्यम से सानव-समाज की प्रगति में सहायक या बाधक हैं, इसका 
मामिक प्रतिबिस्त उस समाज के नर-तारी के प्रेम-सम्बन्धों श्रोर नेतिक धारणाझ्रों, रूढ़ियों और 
सामाजिक आचरणा में मिलता है। इसलिए अधिकतर प्रेम-गीत लिखने के कारण ही छायावादी 
कवियों पर “शूंगारी' होते या “नाना भ्रय-भूमियों पर काव्य का प्रसार” रोक देने का लांछन लगाना 
ब्रसंगल था । छायावादी कविता के तथा-कथित "प्रेम-गीत', वस्तुतः सामन्त-कालीन, रूढ़ि-जर्जर 
व्यवस्था, नेंतिकता और मानव-सम्बन्धों के विरुद्ध भ्रसन्‍तोष ओर विद्रोह के गीत हैं और मानव- 
सम्बस्धों को ग्रधिक व्यापक मालवीय अ्राधार पर संगठित करने को युगीन श्राकांक्षा के प्रति- 
निधि हें । 

हिन्दी-आलोचकों के इस विरोध का एक शुभ परिणाम भी निकला। वड़्‌ सवर्थ ओर शैली 
की तरह छायावादी कवि भी स्वयं श्रपनी कविता के प्रवक्‍ता बने । अ्रपने कविता-संग्रहों की भूमि- 
काओ्रों में उन्होंने कविता के सम्बन्ध में जिन नये व्याख्या-सूत्रों की उद्भावना की, वे परम्परागत 
शास्त्रीय व्याल्याओं से भिन्‍न थे। यद्यपि इन व्याख्याप्रों का मूलभूत दार्शनिक आधार “आझ्रादशंवाद' 
था, भौतिकवाद नहीं, जिसके कारण उन्होंने सामान्यतः काव्य को मनुष्य के शेष कार्य-व्यापारों से 
लिम्त एक असाधारण, लोकोत्तर एवं आध्यात्मिक सर्जन-क्रिया के रूप में देखा, किन्तु फिर भी 
उन्होंने जीवन और यथार्य से उसका अ्रविच्छेद सम्बन्ध भी स्वीकार किया। किसी देश या जाति 
का मुक्ति-प्रयास, उसकी सत्य भ्रौर सोौन्दर्य-निष्ठा उसके काव्य में प्रतिबिम्बित होती है; अनुभूति 
और अभिव्यंजना दो पृथक्‌ क्रियाएं नहीं हें, बल्कि “व्यंजना वस्तुतः अ्नुभूतिमयी प्रतिभा का स्वयं 
परिणाम है;” सन के संकल्प झौर विकल्प इन दोनों रूपों में से यदि विज्ञान विकल्प (विश्लेषण, 
तर्क, प्रयोग-परीक्षा ) द्वारा बस्तु-सत्य को जानने की .,चेष्टा करता है तो कबिता मन की संकल्पात्मक 
अनुभूति द्वारा वस्तु-सत्य को जानने की चेष्टा करती है; जड़ से चेतन का, बाह्या-जगत से अ्रन्तर्जंगत 


का सम्बन्ध कराती है और इस प्रकार मनुष्य को समष्टिगत चेतना और सोन्‍्दर्यानुभूति को जाग- 


रुक करके व्यापक और गहरा बनाती है; सत्य, शिव और सुन्दर केवल बेयक्तिक श्रादर्श नहीं हें, 
बल्कि कविता के सामाजिक श्रेय झ्रोर प्रेय का व्यापक जीवन-सत्य से ग्रन्थि-बन्धन कराके श्रादर्श 
झोर ययार्थ, बुद्धि ओर भाव, व्यक्ति श्रोर समाज के समन्वित और सामंजस विकास के आदर्श हें-- 
इन और इतर ऐसी ही अनेक मासिक तथा दाझ्निक स्थापनाझों द्वारा छायावादी कवियों ने एक 
नये काव्यादर्श, नये सौन्दर्य श्लोर जीवन-मूल्यों का प्रतिपादन किया भर साहित्य के नये प्रतिमान 
स्थिर किये। 


पुराने काव्यानुशासनों से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने काव्य-भाषा, छन्‍्द, भ्रलंकार, बस्तु- 
विन्याल, मूत्त-विधान झोर प्रभिव्यंजना-क्षेत्री में शतशः प्रयोग किये, तुकान्त, अ्रतुकान्त, मुक्त- 


ब्रे कांव्य-घारा 


छुन्‍्द, विषम-चररणा-बन्ध श्राद सभी का नियोजन किया और सीधी-सादी भाव-संवलित भाषा से 
लेकर लाक्षणिक और श्रप्रस्तुत-विधानों से युक्त चित्रमयी भाषा तक का प्रयोग भी किया। प्रगीत, 
खंड-काव्य और प्रबन्ध-काव्य भी लिखे और बीर-गीति, संबोध-गीति, शोक-गीति, व्यंग्य-गीति, आदि 
काव्य के अन्य रूप-विधानों का भी प्रयोग किया। छायावादी कवियों का भाषा और छन्व-प्रयोग 
केवल बुद्धि-विलास, वबचन-भंगिमा, कौशल या कौतुक-वृत्ति से प्रेरित नहीं रहा; बल्कि उनकी 
कविता में भाषा भावों का अनुसरण करते दीखती है और श्रभिव्यंजना श्रनुभूति का । यह ठीक है 
कि छायावादी कविता विषयि-प्रधान (सब्जेक्टिव) है और बहिजंगत्‌ और जीवन की समसस्‍्याएँ 
कवि-बिशेष की व्यक्तिगत शभ्रनुभूतियों के रंग में रंगी हुई प्रतिबिम्बित हुई हैं, किन्तु इसका 
यह परिणाम भी हुआ है कि छायावादी कविता में वाह्म वस्तु, इतिवृत्तात्मक चित्र, प्रकृत, 
यथातथ्य दृश्य श्रौर वर्णन घुसकर विक्षेप नहीं उपस्थित करते, ओर प्रत्येक कविता एक सुश्यृंखलित 
झौर अखंडित भाव-इकाई की रूप-सृष्टि करती है । इसका यह तात्पयं नहीं कि छायावादी कबिता 
एक ही प्रकार की भाव-संवेदना या दृष्टिकोण की कविता है । समग्र रूप से छायावादी कविता 
में विविध भाव-संवेदनाञ्रों और दृष्टिकोणों की भ्रभिव्यंजना हुई है। एक ही कवि की भिन्‍न-भिन्‍न 
कविताश्ों में उल्लास, उत्साह, निराशा और अवसाद से पूर्ण बेयक्तिक श्रनुभूतियों की विवृत्ति देखने 
को मिलती है। प्राचीन वेदान्त-वर्शन, बोद्ध-दर्शन, स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा 
गाँधी, माक्स और अरविन्द के दाशंनिक विचारों और सिद्धान्तों का उनके श्रात्म-चिन्तन पर प्रभाव 
पड़ा है। बहिजंगत्‌ श्रौर जीवन की समस्याञ्रों की कवियों के मानस में जब जेसी प्रतिक्रिया हुई है, 
झपनी व्यक्तिगत श्रनुभूतियों के माध्यम से ही उन्होंने बाह्यजगत्‌ श्रौर जीवन के व्यापारों को 
: प्रतिबिम्बित किया है। इसलिए यद्यपि उनकी वाणी में मनुष्य को महिमा का उद्घोष है, रूढ़ि-ग्रस्त 
समाज के बन्धनों शौर मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध एक नेतिक और न्यायपरक भावना 
का मार्भिक प्रतिवाद है श्र समाज के श्रधिकार-वंचित प्राणियों के प्रति सहज करुणा और सहानु- 
भूति की उदात्त भावना है, तो भी कहीं-कहीं घोर नराइ्य-भरा और श्रात्मपीड़क चीत्कार भी है, 
जो अपने निबिड़-आवेग में उनके श्राधारभूत मानववाद को समाजद्रोही भावनाओ्रों से तिमिराच्छस्त 
कर लेता है। किन्तु ऐसी ह्ासोन्मुखी प्रवृत्तियाँ सन्‌! ३५ के बाद ही अधिक मुखर हुई और कुछ 
विशेष कवियों में ही, नहीं तो प्रसाद, निराला, पंत जेसे भ्रग्रणी कवियों की सहज-प्रवृत्ति सामान्यतः 
अपने व्यक्तिगत सुख-दुखों को वाणी न देकर उनसे ऊपर उठने की श्रोर ही रही है । 

हमने प्रथम महायुद्ध की समाध्ति से दूसरे महायुद्ध के श्रारम्भ काल तक छायावाद-युग की 
व्याप्ति मानी है, किन्तु इस तरह के निश्चित काल-निर्णय केवल सुविधा की दृष्टि से ही संगत 
समभने चाहिए । साहित्य की किसी प्रवृत्ति का झरादि श्रौर भ्रन्‍्त किसी निश्चित तारीख से बाँध 
देना अ्रत्यन्त कठिन काम है। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि युद्ध समाध्ति पर सन्‌' १८ में 
सहसा छायावादी काव्य-धारा फूट पड़ी और दूसरा महायुद्ध शुरू होते ही सन्‌ १६३६ में ह॒ठात्‌ 
विलीन हो गई । छायावादी कविताएँ सन्‌ १६१८ से शुरू हो गई थीं और सन्‌ १६३६ के बाद भी 
होती रहीं; सच तो यह हैं कि श्रब भो रची जा रही हैं । इसलिए इस निश्चित काल-श्रवधि का 
तात्पयं केवल इतना है कि उस बीच छायावाद ही हिन्दी-कबिता की मुख्य-धारा थी, तटवर्ती या 
पाइवंवर्तो धारा नहीं, बल्कि मध्य की मुख्य-धारा। छायावाद के आरंभिक उत्थान में तीन युगावतारी 
प्रतिभा के कवि सामने आये--प्रसाद, निराला और पंत । 

जयशंकर प्रसाद--(सन्‌ १८८६-१६३७ ई०) को हिन्दी मे छायावादी कविता का प्रवर्तक 


हिन्दी-कबिता का विकास २३ 


कहा जाता है । सत्‌ १६१३ से पहले 'प्रताद' जी ब्रजभांषा में ही कविताएं लिखा करते थे शोर 
उत्को ब्रज-कविताझ्रों का संग्रह “चित्राघार' के नाम से प्रकाशित हुआ था + फिर खड़ी बोली में 
'कानत-कुसुम', 'महाराणा का महत्त्व, 'करुणालय' (गीति-नाटअ ) और “प्रेम-पथिक' प्रकाशित हुए । 
इन कविताझ्रों में गोति-काब्य झोर बंगला कविताओं के ढंग की अ्रतुकान्त पदावली को श्रोर 


द उत्तकी प्रवृत्ति का झाभास तो मिलता है, लेकित इनमें श्रभी छायावाद का रूप नहीं कलका था, 


पक १. ६ नल की 


न विशेष नवीनता ही थी । भारतेन्दु-कालीन पंडित अ्रम्बिकादत्त व्यास शोर बाद में श्रोधर पाठक इस 


ढरें की भ्रतुकान्त रचनाएं पहले ही कर चुके थे । स/थ हो, बाबू मेथिलीशरणा गुप्त, बदरीनाथ भट्ट 
और सुकुटघर पाण्डे की इस काल को गीतात्मक रचनाएँ भ्रपेक्षया भ्रथिक नई पद्धति को थीं । उनमें 
वित्रसयी भाषा का प्रयोग भी था और भावना भी स्वच्छन्दतावाद के भ्रधिक निकट थी । प्रसाद जी 
ले भी पीछे नयी पद्धति ग्पनाथी, और सन्‌' १६१८ में उनको २४ कविताओं का संग्रह “ऋरना' 
के नाम से प्रकाशित हुआ। “ररना' की कविताझ्रों को छायावाद की दिशा में उनका पहला प्रयास ही 
समझना चाहिए । उनमें न प्रौढ़ता थी, न कोई विशिष्ट नया स्वर ही, जो उस समय की प्रचलित 
कविताओं से उन्हें प्रन्यतम बना देता । इसीलिए, सम्भवतः सन्‌ १६२७ में “ऋरना' का दूसरा संस्करण 
निकला जिसमें ३१ नई कविताएँ जोड़ी गई, जिनमें छायावादी काव्य-वस्तु शोर शेली की विशेषताएँ 
थीं । स्मरण रहे कि इसके पूर्व ही पंतजी की “बीणा', “प्रन्थि' श्र 'पललव' प्रकाशित हो चुके थे 
झौर निरालाजी की स्फुट कविताएं भो पत्र-पत्रिकाशरों में छपने लगी थों, ओर छाबावादी कविता 
अपने पूर्ण उन्‍्मेष को प्राप्त करके हिन्दी-जगत्‌ में एक युगान्तर उपस्थित कर चुकी थी। प्रसाद जो 
को पहली भ्रौढ़ रचना “आँसू' है जो सन्‌ १€३१ में प्रकाशित हुई । इस प्रकार हम देखते हें कि एक 
महान छायावादी कवि के रूप में प्रसाद जी का विकास पंत और निराला की अपेक्षा धीरे-धीरे, 
लगभग १५ वर्ष की साधना लेकर हुआ । छायावादी कविता के प्रारस्मिक इतिहास में जिस तरह 
पंत का 'पल्लव' और निराला के 'परिमल' का विशिष्ट स्थान है, उसी तरह उसके विकास और 
अन्ततः ह्लास के इतिहास में आँसू' का भी विशिष्ट स्थान है । “आँसू' की रचना उन दिनों हुई थी, 
जब देश में राष्ट्रीय आन्दोलन का जोर था, किन्तु पूं जीवादी संसार एक भयंकर आशर्थिक-संकट में 
फेंसा हुआ था और उस संकट से बाहर निकलने का आस्त्रीकरण झौर युद्ध का मार्ग अपनाये 


. बगैर, उसे और कोई मार्ग न सूकता था । इस आर्थिक-संकट ने भारतीय जनता और भारतीय 


उद्योग-घन्धों को भी अ्रपनी लयेट में लेकर एक निराशा, अश्रनिश्चितता और क्षोम का वातावरण 
वैदा कर दिया था। सन्‌' ३०-३२ का राष्ट्रीय-प्रान्दोलन इस क्षोभ का परिणाम था, किन्तु प्रासाद 
के 'आँसू' ने निराशा और अनिश्चितता को अत्यन्त माभिकता के साथ प्रतिबिस्बित किया । 
निराशावाद और नियतिवाद का गहरा भ्रवसाद इसमें व्यक्त हुआ, जिसने महांदेवी जी के चिरन्तन 
पौड़ावाद, बच्चन के हालावाद और अंचल के भोगवाद की आात्मकेन्द्रित श्रौर श्रहुंवादी प्रवृत्तियों को 
प्रेरित किया । 'आँसू' में प्रसाद जी ने '“प्रेम-बेदना' को दिव्यता से मण्डित कर दिया है, जिसको 
गोद में सुख-दुख दोनों पलते हें । सामाजिक चेतना और स/माजिक उद्योग का तिरस्कार इस कविता 
में दीखता है, क्‍योंकि विस्मृति या चेतना-शून्यता की महारात्रि में ही वास्तविक मिलन-सुख और 
कल्याणा-वर्षा' की संभावना कल्पित की गई है । 
“चेतना-लहर न उठेयी जीवन-समुद्र थिर होगा 
संध्या हो सगे प्रलय की विच्छेद मिलन फिर होगा ।”” 
अपने अगले कविता-संग्रह “'लहर' में प्रसाद जी ने विविध अर्य-भूमियों पर भ्रपनी कल्पना 


२४ काब्य-धारा 


को दोड़ाया । इसको कविताओं में कहीं श्रानन्दवाद की भलक मिलती है, तो कहीं भ्रज्ञात प्रियतसम 
से रहस्यमय भ्रभिसार के चित्र हें, कहीं सजीले स्वप्नों से श्रतुप्ति को मिटाने का प्रयास है तो कहीं 
ब्रह्मवेला का “बीती विभावरी, जाग री? का श्राह्वान है, भ्रौर कहीं “अरब जागो जीवन के ग्रभातः 
की कामना है। किन्तु समग्र रूप से भ्रधीरता, बेदना झौर निराशा का स्वर॒इन कविताओं में भी 
प्रधान है । 

“'लहर' के बाद सन्‌ १६३४५ में 'कामायनी' प्रकाशित हुई। यह छायावाद-युग का महा- 
काव्य है, क्योंकि इसमें एक उदात्त श्रादर्शवादी स्तर पर व्यक्तिवाद की श्रन्तिम परिणति देखने को 
मिलती है। 'कामायाती' की कथा एक पौराशिक-चबृत्त पर श्राधारित है, किन्तु यह वृत्त तो एक 
रूपक है जिसके माध्यम से प्रसाद जी ने मनुष्य के बौद्धिक शौर भावतात्मक विकास और श्राधुनिक 
जीवन के झान्तरिक वेषम्य की वास्तविकता को ही चित्रमयी भाषा में प्रतिविम्बित करने का विराट 
झ्रायोजन किया है। काव्य के मुख्य पात्र सनु, इड़ा और श्रद्धा पौराणिक से भ्रधिक प्रतीकात्मक 
व्यत्रित हें। मनु भाज के श्रात्म-चेतन व्यक्तिवादी व्यक्ति के प्रतीक हें । इड़ा श्राधुनिक पूंजीवादी 
समाज के वर्ग-भेद भर शोबरा की सान्यताभों पर श्राधारित बुद्धि-तत्त्व की प्रतीक है श्र श्रद्धा 
मनुष्य को सहज मानवीय भावनाओं, नेतिक-मूल्यों श्ौर सौहाद्ंता से युक्त मानव-हृदय के झ्रास्था- 
शील श्रद्धा-तत्त्व की प्रतीक है। इन तीन पात्रों के माध्यम से प्रसाद जी ने श्राधुनिक पूँजीवाद-प्रणीत 
सभ्यता श्रौर उसके समस्त श्रन्तविरोधों और श्रसंगतियों का ऊहापोह विवेचन किया है ॥ प्रसाद 
जी ने जिस समय 'कामायनी' की रचना की उस समय गांधी जी के नेतृत्व में चलने वाले राष्ट्रीय 
शान्दोलन ने देश के हर वर्ग में स्वतन्त्रता और भावी राष्ट्-निर्माण के स्वप्न जगा दिये थे, लेकिन 
प्रसाद जी ने इस भ्रादश्शंवादी उमंग की लहर से श्रप्रभावित रहकर उस समाज कौ आ्रावार-भूत 
मान्यताश्रों को जाँचने-परखने का साहसपूर्ण प्रयास किया जिसका निर्माण करने के लिए ये सपने 
जगे थे। भारतीय विचार-धारा में बुद्धि और हृदय-पक्ष के परस्पर विरोध और ह्वत की धारणा 
प्राचीन श्रौर रूढ़ थी । बुद्धि यदि ज्ञान-विज्ञान, सम्यता-निर्माण में योग देती- है, तो मनुष्य में बर्गे- 
भेद, मानव-शोषरण, निरंकुशता, सत्ता-मद शौर भ्रहंकार भी पेदा करती है, और इस प्रकार मनुष्य 
को मानवीयता से दूर खींच ले जाती है । बुद्धि-प्रणीत सभ्यता योग्यतम की विजय की ऋ स्वायें- 
परता के भ्रमानवीय सिद्धान्त पर टिकी है। इसी लिए इस द्वंत की धारणा में श्रद्धा या मनुष्य की 
हादिकता, सहानुभूतिशीलता के प्रति भारतीय मानस और तत्त्व-चिन्तन का विशेष आग्रह और 
झनुराग रहा है। साधारणतया मनुष्य तत्सामयिक स्थिति को ही चिरन्तन समझ लेता है; कम से 
कम उस समय तक जब तक कि उस स्थिति में मौलिक परिवर्तन की संभावनाश्रों का ज्ञान उसे नहीं हो 
जाता । इसलिए प्रसाद जी को इड़ानिर्मित झ्राधुनिक पूजीवादी सम्ध्ता नये विकास की संभा- 
बनाओरं के झभाव में चिरन्तन ही दिखाई दी और उनका संवेदनशील हृदय उससे विद्रोह कर बेठा । 
इस विद्रोह का सहज-प्राध्य अस्त्र बनी भ्रद्धा। बुद्धि का तिरस्कार श्रौर श्रद्धा का गृहर ही उन्हें भ्राधुनिक 
पूँजीवादी समाजके श्रभिशापों से मुक्ति का एकनात्र सा्ग समझ में झ्राया। यह प्रत्यावतंन और पलायन का 
मार्ग भी है और वर्गं-समाज सें व्यक्तिवाद की श्र-सामाजिक परिणति का भी । मनु ने श्रद्धा का त्याग 
करके इड़ा की सहायता से जिस सभ्यता का निर्माण किया वह अपनी समस्त श्री-सम्पन्नता के बाव- 
जद ह्वास-प्रस्त हो गई, क्योंकि उसमें वर्ग-भेद, प्रातंक-दमन, सत्तावाद, शोषण-दारिद्रय, कृत्रिमता 
श्र भ्रहंवाद का बोलबाला हो गया । इस सभ्यता का ध्वंस होने पर मनु का हृदय पुत्रः श्रद्धा कौ 
श्लोर प्रवृत्त हुआ । श्रद्धा उन्हें इस धरती के जन-रव, वेषम्य, वर्ग-भेद और श्रहंमन्‍्यता के दूषित 


हिन्दी -कविता का विकास २५ 


बाताव रण से दूर कंलाश पर्वत के समरसत और सामंजस्पपयूर्ण श्लातन्व-लोक में ले जाती है । इस 
प्रकार प्रम्ततः बुद्धि का तिरस्कार भ्रौर श्रद्धा का स्वीकार प्रसाद जो की, वेचारिक स्तर पर, उस 
इत-घारणा का ही परिणाम है, जिसका हमने उल्लेख किया है । व्यक्तिवाद की इस समाज-द्रोही 
परिणति के बावजूद, 'कामायनी' का विराट रूपक वर्तमान पूंजीवादी समाज को वास्तविकता और 
अन्तविरोधों को इतनी सजीव मूर्सता ओर गहराई से प्रतिबिम्बित करता है कि वह इम युग का 
प्रतिनिधि महाकाव्य बन गया । पूंजीवाद की शापग्रस्त सम्यता से मुक्ति. पाने का वे कोई सामा- 
जिक आादर्श उपस्थित नहीं कर पाये, लेकिन यह सम्यता ज्ञाप, ग्रस्त है और इसका हूास अनिवार्य 
है, एक श्रन्तव्‌ ष्टा की तरह, इसका मासिक चित्रांकन करने में वे सफल हुए । 
सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला' (सन्‌ १८६६) छायावाद-युग के सबसे अ्रधिक सशक्त और भ्रौढ़ 

प्रतिभा के कबि हें । भ्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल “निराला' जी के प्रशंसक नहीं थे, श्रौर उनके समय 
तक हिन्दी-प्रालोचकों की ओर से “निराला का विरोध भी बदस्तूर चल ही रहा था, किन्तु फिर 
भी शुक्ल जी ने यह दिखाते हुए कि “संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के ग्रधिक निकट 
लाने का सबसे श्रधिक प्रयास निराला जी ने किया है,” यह भी स्वीकार किया कि “बहु-बस्तु- 
स्पशिनी प्रतिभा निराल। जी में है ।” स्मरण रहे कि “छावावाद' के प्रति शुक्ल जी का यहो प्राक्षेप 
था कि इस प्रवृत्ति के कारण “नाना श्रयंभूमियों पर काव्य का प्रसार रुक-सा गया” है। श्नतः 
निराला के सम्बन्ध में अपनी ही मान्यता का खंडन करके शुक्ल जी ने एक वस्तुन्मुखी ;प्रालोचक- 
दृष्टि का परिचय दिया। किस्तु इससे निराला जी की काव्य-प्रतिभा की महानता ही भ्रधिक प्रमा- 
णखित होती है । “निराला' इस बीच हिन्दी के उपेक्षित कबि नहीं रहे, सब ने एक स्वर से उन्हें महा- 
कवि मान लिया है। लेकित सन्‌, ३५-३६ तक जिस तरह बिना समक्े-बुझे निराला जी पर चतुर्दिक 
से प्रहार किये जाते थे, उसी तरह बिना सम*रे-बुके भ्रब उन्हें 'महाप्राण', 'महामानव' और “महाकवि' 
घोषित करके अंब-भक्ति और अंब-स्तुति से जेसे उस पुर्व-अयराघ का प्रायश्चित किया जाता है । 
हिस्दी के आलोचक “निराला' की कविता का ठीक-ठीक मूल्यांकत न तब करते थे, न ञ्रब करते हें । 
जीवन में इतने बिकट (और हिन्दी के लिए लज्जास्पद) संघर्ष के बाद “निराला' जी को स्वीकृति, 
यश और मान चाहे भ्रव मिल रहा हो, लेकिन दुर्भाग्य से उनके समूचे काव्य का पूबंग्रह-रहित निष्पक्ष 
और वस्तुपरक मूल्यांकन होना अभी बाक़ी है। डा० रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक “निराला' 
में, तथा पण्डित नन्‍्ददुलारे बाजपेयी और दो-एक आलोचकों ने भ्रपने निबंधों में निराला जी को 
कविता को समभने-समम्राने का प्रयत्न किया है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले 
उनको कविता का मूल्यांकन महाकवि पंत ने श्रपती कविता “अनामिका के कवि श्री सूयंकान्त त्रिपाठी 
के प्रति' में किया था, जो मेरी दृष्टि में आज भी अन्य सभी विवेचनों से अधिक वस्तुपरक और 
गंभीर है श्लोर 'निराला' जी को कविता के वास्तविक सोन्‍्दर्य, भ्रर्थ-गौरव झौर महिमा का सही 
उद्घाटन करता है । 

“बुंद-बंध शव तोड़, फोड़कर पर्वत कारा 

अचल रूढ़ियों की, कवि, तेरी कविता धारा 

मुक्त, अबाघ, अभंग, रजत निर्कर सी निःस्त,-- 

गलित ललित आलोक राशि, चिर अकलुष अविजित ! 

स्कटिक शिलाओं से तूने वाणी का मन्दिर 
॥ शिल्पि, बनाया, - ज्योति-कलश निज यश का घर चिर | 


६ काव्य-धारय 


शिलीभूल सोन्दर्य, ज्ञान, आनन्द अनश्वर 
शब्द-शब्द में तेरे उज्ज्जल जड़ित हिम शिखर | 
शुअ कल्पना की उड़ान, भव भास्वर कलरव, 
हंस, अंश वाणी के, तेरी प्रतिभा नित नव, 
जीवन के कर्दम से अमलिन मानस सरक्षिज 
शोभित तेरा, करद शारदा का आसन निज | 
अमृत-पुत्र कवि, यशः काय तव जरा मरणजित, 
स्वयं भारती से तेरी छत्तंत्री भ्रंकति ।” . 
(पंत : युगवारणी) 

पंत जी की कविता में निराला जी की कविता के उन सभी विशिष्ट तत्त्वों की ओर संकेत 
मिल जाता है, जिनका सम्यक्‌ उद्घाटन उनकी “बहु-वस्तुस्पशिनी' कविताश्रों की श्रपेक्षा में रखकर 
विशद्‌-रूप सें होना श्रभी शेष है। इस संक्षिप्त विवरण में यह कार्य सम्भव नहीं है । यहाँ केवल 
निराला की कविता के विकास की रूप-रेखा ही अंकित की जा सकती है । 

जूही की कली' निराला जी की प्रारम्भिक कविताओं में से है। सन्‌ १६१६ में (जब 
निराला जो केवल २० वर्ष के थे) इस कविता की रचना हुई, किन्तु यह प्रथम. बार प्रकाशित हुई- 
खन्‌ १६२३ में 'मतवाला' के अ्रठारहवें अंक में । मतवाला-काल की उनकी कुछ कविताएँ कलकत्ते 
से प्रकाशित होने वाले संग्रह 'अनामिका' में झा गई थीं, लेकिन ठीक से उनको रचनाओं का प्रका- 
धन सन्‌ १६२६ से ही शुरू हुआ, जब उनका “परिमल' प्रकाश में झ्राया । पंत के 'पल्लव' की तरह 
'वरिमल' की कविताएँ भी छायावाद के उत्कर्ष-काल की प्रतिनिधि रचनाएँ हें । 

अचल रूढ़ियों की पर्वंत-कारा फोड़कर मुक्त, अ्रबाध' निर्भर-सी बहने वाली निराला की 
कविता-धारा का महत्त्व क्षण-स्थायी ही होता यदि यह विद्रोह भ्रसंयत और उच्छ खल होकर केवल 
विचित्र काव्य-प्रयोगों, उक्ति-चमत्कारों भ्रौर छिछले व्यंग और वचन-भंगिमा के श्रात्म-प्रदर्शन में 
लग जाता, जंसा कि रुढ़ि तोड़ने का उपक्रम करने वाले वरंमान प्रथोगवादी कवियों की बचकानी 
छुकबन्दियों से. प्रमारित है। प्रत्युत छायावादी कवियों के विद्रोह ने सामान्यतः, और निराला के 
घिद्रोह ने बिशेषतः, एक उच्चतर नेतिकता और काव्यादर्श की स्थापना में अ्रपने को प्रकट किया । 
'परिमल' की कविताश्रों में व्यक्त कवि का संघ, उसका उदात्त श्नन्तःस्वर, करुखा से सहज द्रवित 
हृदय की विज्ञालता, भ्रन्याय श्रौर उत्पीड़न के विरुद्ध उसका मानवोछित दर्प एक शक्तिशाली 
व्यक्तित्व का सूचक है। भावों के सुक्ष्म-सौदर्य, दाशंनिक यहराई, श्रर्थ की गम्भीरता, श्रभिव्यंजना 
की प्रोढ़ृता ओर वस्तु की विविधता के नाते 'परिमल' की कविताएँ उस समथ तक के छायावादी 
काव्य-साहित्य में बेजोड़ थीं। “जूही की कलौ', 'पंचवटी' झौर “जाग्रति में मुक्षित' श्लादि प्रेम भर 
सौंदर्य के सरस कल्पना-चिन्र भ्रपनी सोन्दर्य-दृप्त श्रावेश्मयी भाषा श्रौर सूक्ष्मतत्ता के लिए प्रसिद्ध 
हैं। 'परिमल' सें निराला के छे बादल-गीत हैं, जिनमें वाबल की अलग-अलग कल्पनाएँ हें । “विधवा' 
में इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी?, 'काल-तारडव की स्मृति-रेखा? श्रौर “व्यथा की भूली हुई 
कथा?-सी भारतीय विधवा का करुण चित्र है। झ्रागे 'भिक्षुक' का कारुणिक चित्र कलेजे के दो 
टूक” करने में समर्थ है। इनके भ्रतिरिष्त श्लौर अ्रनेक कविताएँ हे जिनमें प्रतीक-व्यंजना द्वारा 
निराला ने श्रत्याचार पीड़ित, दलित जनों के प्रति झ्पने हृदय की करुणा उडेली है ! उनका प्रसिद्ध 
भक्षति-गीत “भर देते हो' झ्पने झाराध्य या प्रेमी की स्नेहमयो करुखा के प्रति एक सरल हृदय की 


हिन्दी -कविता का विकास २७ 


निर्ष्याज आस्या से परिपूर्ण है, भ्रौर हृदय में एक सघन कृतज्ञता का भाव जगाता है। इनके भ्रति- 
रिक्त परिमल फो कुछ कविताएँ शुद्ध छायाबाद की हैं, जिनमें अज्ञात से मिलने की कामना व्यक्त 
हुई है । कुछ पर स्वामी विवेकानन्द के रहस्यवाद का प्रभाव है । कुछ कविताप्रों में प्रतीत इतिहास 
की स्मृति दिलाने वाले चित्र हें; तो कुछ में प्रलयंकर शिव के ताण्डव नृत्य का गायन कर श्यूंगार से 
विरक्ति झ्लोर सामाजिक वेषम्य को मिटाने वाली ध्वंसलीला के प्रति श्राग्रह प्रकट किया गया है । 
कुछ में हिन्दू पुनर्जागरणा की भावना को उद्बुद्ध किया गया है झश्लौर कुछ में पौराणिक जीवन के 
चित्र अंकित किए गये हें । कुल मिलाकर “परिमल' में छायावाद की अश्रनेक-मुखी प्रवृत्तियों की 
उदात्त ऋलक मिलती है। राष्ट्रीय चेतना की सूक्ष्म-प्रनुभूतिमयी व्यंजना जितने गम्भीर और प्रोढ़ 
स्वरों में 'परिमल' में हुई उतनी उस समय तक छायावाद के किसी श्रन्य कबि की वाणी में नहीं 
हो पायो । 'परिमल' की कविताझों से सचमुच 'सम्‌ची जाति के मुक्ति-प्रयास' का पता चलता है । 

शथरिमल' के बाद “गीतिका' आई और “गीतिका' के बाद अनाभिका' । “'गीतिका' के छोडे- 
छोटे गीतों में भी 'परिमल' का-सा हो वेविध्य है, एक ही भाव की, विविध स्थितियों में रख कर 
आवृत्ति नहीं है । भावों को ऐसी सुसम्बद्ता और कमनीयता, मानवीय भावनाओं की उदात्त 
भ्रभिव्यक्ति श्रन्यत्र दुर्लभ है । किन्तु गीतिका के भीत उतने लोक-प्रिय न हो सके, इसलिए नहीं कि 
उनमें प्रेषणीयता का श्रभाव है, बल्कि इसलिए कि “निराला' ने इन गीतों के रूप में एक-एक बूंद 
में सागर भरना चाहा है । भाव-सररणि सरल और एकसूत्रीय भी नहीं है, बल्कि उनमें भ्रक्सर एक 
नाटकीय ढंग से विपरीत और विषम भावों को संइिलिष्ट समन्विति की गई है। उनका नाद-सोन्दर्य 
भो नवीन है जो शास्त्रीय या लोक-संगीत में पूरी तरह नहीं समाता। एक-एक गीत को बार-बार 
पढ़ने या गाने से ही उसके भाव और श्रर्थ के शतदल एक-एक कर खुलते हें । किन्तु अनामिका' 
( सन्‌ १६३७ ) के गीतों ओर कविताश्रों में निराला की प्रगल्भ कल्पना को पुनः मुक्त उड़ने का 
झ्रवकाश मिला । “झनासिका' उनका प्रतिनिधि काव्य-ग्रन्थ है, जिसमें उनकी कविता का प्रोौढ़तम 
विकास दिखाई देता है । 

छायावादी कवियों ने स्त्री और पुरुष के प्रेम की जो कल्पना की है वह रीतिकालीन श्वूंगारी 
कवियों की काम-क्रीड़ा की वस्तु और इधर के भोगवादियों झ्र।र प्रयोगवादियों की जेविक स्तर 
पर उतर कर स्त्री को मात्र शारीरिक वासना-पूत्ति का साधन समझने वाली अ्रसामाजिक 
कल्पनाओों से भिन्‍न है। साथ ही भक्त और अध्यात्मवादी कवियों की तरह छायाबादी 
कवियों ने नारी को न सहज भ्रपावन' माता और न ॒प्रगतिवादियों की तरह क्रान्ति-पय में बाबक 
समझ कर उसे सन्‍्देह की दृष्टि से ही देखा। छायावादियों ने (निराला, पन्‍्त, श्रताद, महादेवी 
झादि ने) नारी-पुरुष प्रेम को इन सभी रूढ़ियों या एकांगी दृष्टियों से मुक्त करके एक सहज 
मानवीय आधार पर स्थापित करना चाहा, जिस में एक-दूसरे का भ्राकर्षण, एक-दूसरे के प्रति 
उत्सर्ग और समर्पित होने की सच्ची हादिक भावना ही उनके मुक्त-प्रेम की कसौटी हो, न कि रूढ़ि- 
बन्धन, समाज के भ्रर्थ-सम्बन्ध या मात्र शारीरिक वासना । प्रेन की इस उदात्त और संस्कृत कल्पना 
को, जिसमें नारी के व्यक्तित्व के पूरे गोरव को समान भाव से स्वीकार किया गया था, छुछ लोगों 
ने बायवी प्रेम या भ्रशरीरी वासता का नाम दिया, किसी ने इसे फल्पित झौर क्षयी रोमान्स कहा । 
इसके नव-संस्क्रृति-विधायक रूप को कम लोगों ने ही पहचाना, यद्यपि इस युग के नये समाज-सम्बन्धों 
में छायावादी कविता द्वारा निर्मित लये और उच्चतर मानव-मूल्यों को स्वीकृति स्वयं बिकास-तर्क 
से होने लगी थी । बाद में प्रगतिवादियों ने या प्रयोगबादियों ने नारी-समस्या के भ्रत्नि जो एकांगी 


श्र काव्य-धारा 


दृष्टिकोण श्रयनाये, वे श्राज की सुसंस्क्ृत भ्राधुनिक नारी को मान्य नहीं हैं। न वह जीवन के संघर्य॑ 
में बाधक समझी जाना पसन्द करती है और न जेबिक श्राधार पर, भावनारहित शारीरिक वासना 
की पूर्ति का मात्र साधन हो जाना चाहती है। वह जीवन के हर क्षेत्र में पृर्व की समकक्षिनी बनने 
की श्राकांक्षी है, किसी की वासना-तृप्ति का साधन न बनकर मुक्त-हुदय से श्रपने हुदय का प्रेम देना 
और पश्ना चाहती है । यह प्रेम ही नारी-पुरुष-सम्बन्ध की उच्चतर नेतिक मर्यादा है, युगल-प्रेमियों 
के संयम भ्रौर सामाजिक दायित्व श्र स्वामित्व की कसौटी है । दलित वर्ग के प्रति सहज करुणा के 
भाव की तरह ही नारी के प्रति छायावादी कवियों का यह समानता का भाव भी प्रगतिशील श्रौर 
नई सांस्कृतिक चेतना का छोतक है । 

_“निराला' जी की कविता में श्रौर विशेषकर “अनामिका' में इस सांस्कृतिक चेतना का भव्य 
रूप देखने को मिलता है। 'अनामिका' की पहली कविता “प्रेयसी' में ही यह प्रगट है । इसलिए 
सम्राट एडवर्ड भ्रष्टम के प्रति' में उन्होंने प्रेम के लिए इतने बेड़े साम्राज्य को त्याग देने वाले एड- 
वर्ड भ्रष्टम को बधाई दी है; क्‍योंकि “आलिंगित तुम से हुईं सभ्यता यह नूतन !?? और अनेक _ 
कविताओं में निराला जी ने नारी पुरुष प्रेम को उदात्त श्रभिव्यक्ति दी है। इनके श्रतिरिक्त “अना- 
मिका' में 'तोड़ती पत्थर', 'वे किसान की नई बहू की आ्ाँखें', 'बादल गरजो' “तोड़ो-तोड़ो, तोड़ो कारा' 
श्रादि कविताएँ एक नई प्रगतिशील चेतना की सूचना देती हें। 'सरोज-स्मृति' एक लम्बा 'शोक- 
गीत' (एलेजी ) है, जो उन्होंने श्रपनी पुत्नी सरोज की स्मृति में लिखा है । कुछ श्रालोचकों का मत 
है कि विश्व-साहित्य में इतनी गहन-वेदना श्ौर तीखे व्यंग से युक्त शोकगीत की श्रभी तक रचना 
नहीं हुई । भ्रपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर उठने की चेष्टा 'सरोज-स्मृति' में हृदय को विदीर्ण करने 
वाला मार्भिक उद्गार बनकर फूट पड़ी है--दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ, आज जो 
नहीं कही ।? “निराला जी की काव्य साधना वस्तुतः इस व्यक्तीकरण की महत्‌ चेष्टा की आदि से 
श्रन्त तक प्रमाण है । घोर निराशा छर अवसाद की श्रनुभृतियाँ बरबस दबाने पर भी यद्यपि कहीं- 
कहीं फूठ पड़ती हैं, जेसे, "जीवन चिरकालिक हूदन?, या “में अफ्रेज़ा / देखता हूँ, आ रही मेरे 
दिवस की सांध्य वेला? या दिख चुका जो-जो आये थे सब चले गये, मेरे ग्रिय सब भले गये, 
श्रादि कविताओं में; लेकिन हताश अ्रवस्था में भी उनकी प्रुरुष तेजस्विता भ्रपना श्रात्म-गौरव नहीं 
खो देती, और इस प्रकार वे पाठक में जीवन-संघर्षों के प्रति स्वाभिमान का भाव ही जगाते हें। 
अनामिका' और श्रगले संग्रहों के ऐसे गीतों को व्यक्तिवाद का भ्रसामाजिक रूप नहीं कह सकते, 
क्‍योंकि पीड़ा बिना भेले ही, संघर्ष में बिना टूठे ही पीड़ा और संघर्ष से पलायन करने वाली प्रवृत्ति 
उनमें नहीं है, बल्कि एक ऐसे तेज:पुंज व्यक्ति की सहज श्रनुभूति का गम्भीर, कचोटनेवाला बेदन 
है जो इतना कुछ भेल कर भी नतशिर नहीं है। 'अनतासिका' में ही निराला जी की प्रबन्ध-कबिता 
“राम की शक्ति-पूजा' छपी है। इतने छोटे झ्राकार-प्रकार का महाकाव्य निराला जी. की प्रतिभा 
ही रच सकती थी । “राम की शक्ति-पूजा' बीज रूप में एक महाकाव्य ही है, क्‍योंकि इतने संक्षेप में, 
और राम-कथा के एक प्रसंग को लेकर ही, उन्होंने मानव-हृदय की विविध स्थितियों भर भावनाश्रों 
का सम्पूर्ण चित्रण-सा कर दिया है। 'अनामिका' के बाद “तुलसीदास' में प्रबन्थ-काव्य रचने को इस 
झ्रसाधारण सामर्थ्य का और भी विकास हुआ है । “तुलसीदास' की रचना के बाद निराला जो ने 
नया मोड़ लिया । 'कुक्‌ रमुत्ता', अरखिमा', “बेला', 'नये पत्ते' और “अरंना' में निराला जी ने प्रगति- 
शील विचारधारा के नये वस्तृन्मुखी प्रभाव ग्रहण किये, छायावादी काव्याभरण उतार कर श्रधिक 
सरल और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया । “जमीदार की बनी, महाजन धनी हुए हैं; जय 


हिन्दी-कविता का विकास २६ 


$ के मूर्त पिशाच-बूतेगण गनी हुए है |”? जैसी पंक्तियों में समाज के वर्ग-संघर्ष कौ खुली ऋाँकी 
$॒ है। इस बीच निराला जो का सानसिक स्वास्थ्य गिरता गया, सम्भवतः बाह्य भ्रभावों की चेतना 
और आरात्म-वेदता के गरल को स्वयं पीकर केवल अमृत-दान करने के श्रान्तरिक संघर्ष ने ही उन्हें 
._ झस्वस्थ बनाया है, क्योंकि निराला जी की प्रत्येक कविता से लगता है, जैसे भीतर श्रभिव्यक्ति पाने 
के लिए भावों और प्रनुभूतियों का पारावार उमड़ रहा है, जिसे बाँध तोड़ कर प्लावन करने से 
. कवि को बरवस यासना पड़ रहा है। भ्पनी कल्पना को कु्रेद-क्रेद कर निरर्थक, फालतू या श्रलं- 
. क्वारी ज्ञाब्दों से उतको कविता का भवतर निर्मित नहीं हुआ, बल्कि लगता है जैसे किसी बिपुल-राशि 
मं से उन्हें ग्रपती श्राववयकतानुसार केवल एक स्वल्प-राशि को ही चुनने के लिए बाध्य होना पड़ 
. रहा है--संयम भ्रौर चयन का यह प्रयास उनकी शैली से भी प्रकट है। इसीलिए उनकी कविताओं 
में ध्वनित प्रर्थ कोरे भ्रभिधार्थ से कहीं भ्रधिक गसम्भीर और मर्मभेदी हें। उनको श्रात्म-निष्ठ और 
. सम्ताज-तिष्ठ, रहस्यात्मक श्रौर समाजोन्‍न्मुखी प्रवृत्तियाँ मानवताबोधिनी एक ही समंजस श्रनुभूति 
का प्रकाश हैं । 'अनाभिका' के पश्चात्‌ की कविताओ्रों में उनका समाज-चिन्तन श्रथिक मुखर रहा 
है ।॥ यह उनकी कविता के उतार का काल है। उनमें पहले जेसा काव्य का उत्कर्ष नहीं रहा। 
निराला जी ने श्ञास्त्रोक्त ग्राधार पर कोई महाकाव्य नहीं रचा, किस्तु समग्र रूप से उनका काव्य 
इस युग की प्रवृत्तियों का एक महाकाव्य ही है, जिसमें राष्ट्रीय चेतना और हमारे सांस्कृतिक जीवन 
और चिन्तन को भी घाराएँ अभिव्यक्तित पा गई हैं। उनके भ्रलग-अलग गीत इस महाकाव्य के 
झ्रलग-अलग सर्ग हें । 
सुमित्रानन्दन पंत (सन्‌ १६९०१--)--छायावादी-युग के तीसरे महाकवि हें। पंत जी 
सहाकवि तिराला की तरह संघषं-प्रिय, पौरुष-भावता के कवि नहीं हैं, बल्कि “मेरा मधुकर 
का-सा जीवन; कठिन कर्म है, कोमल हे मन !?? बाले प्रकृति और मनुष्य के सुन्दर रूप 
के कवि हैं । उनकी कविता में इस सौन्दय्य-प्रियता श्रौर स्निग्थ कोमलता का ही रस प्रवाहित है । 
प्रकृति के उग्र रूप या मनुष्य-स्वभाव की क्षुद्रताओं यां सामाजिक जीवन की कुरूपताओं की शोर 
उनका मन सहज शभ्राकर्षित नहीं होता, यद्यपि प्रकृति, मतुष्य और समाज के ऐसे चित्र भी उन्होंने 
अंकित किए हैं । प्रकृति को पंत जी ने अनेक रूपों में चित्रित किया है। प्रकृति के रूप-चित्रण के 
. साथ-साथ, उन्होंने उसे ग्रपनी भावनाओं के सौन्दर्य में रंग कर ऐन्द्रिकता भी प्रदान की है । कभी 
. प्रकृति को नारी रूप में देखा है और अपनी किशोरावस्था में प्रकृति से पूर्ण तादात्म्य का अ्रनुभव 
._ क्र स्वयं झपने को भी नारी-रूप में अंकित किया है। उनकी इस भावना को 'स्त्रेण' और 'अस्वा- 
भाविक' कह कर कुछ भ्आालोचकों ने पंत जी पर भट्द श्रारोप भी किए, मानो पुरुष में नारी-सुलभ 
कोमल भावना कोई अपराध हो । 
पंत जी का रचनाकाल सन्‌ १६१८ ई० से शुरू होता है, जब वे केवल सोलह-सत्रह बर्ष के 
थे । उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ “वीणा।' में संग्रहीत हैं । पंत जी ,की भ्रप्नस्तुत रूपों का मृत्त-विधान 
करने वाली लाक्षणिक शैली का निखार इन प्रारंभिक रचनाझ्रों में भी स्पष्ट है। साथ ही, प्रभी 
बिश्व-चिन्तन का प्राग्रह नहीं है, प्रकृति और मानव-ज्ोवन के प्रति एक कंशोर जिज्ञासा श्लौर 
रहस्य-भावन। की ही प्रधानता है, यद्यपि स्वामी विवेकातन्द, राम-तीर्य और रवीखनाथ के प्रभाव से 
विश्व-प्रेस का रुचिर राग” उनके सहज मानववादी हृदय को भ्राकधित करने लगा था। “'कोौन- 
कौन तुम परिहृत-वसना, म्लान मना, भू-पतिता-सी ? धूल धूसरित, मुक्त-कुन्तला, किसके 
चरणों की दासी !”” और “प्रथम रश्मि का आना रंगिणि ! तूने केंसे पहचाना ? कहाँ, कहाँ 


३० काव्य-घारा 


हे बाल-विहंगिन ! पाया तूने ये गाना !?? झ्रादि जिज्ञासु-हुृदय क्री कोमल-कल्पनाएँ “बीखा'-काल 
की ही हें । 'बीणा' की कविताओं में प्रकृति-प्रेम का उल्लास इतना प्रबल है कि कवि किसी बाल- 
जाल में भ्रपने लोचन उलभा देने के लिए तंयार नहीं है। लेकिन 'प्रन्थि' में पंत जी का यह 
किशोर उल्लास प्रसफल प्रेम की सघन बेदना में परिणत हो गया। 'ग्रन्थ' एक खंड-काव्य है, 
यद्यपि उसमें कहानी का विशेष महत्त्व नहीं है। भील में नाव उलठने पर एक युवक डूब कर बेहोश 
हो जाता है, मूर्छा टूटने पर देखता है कि अपनी जाँघ पर उसका सिर रखे एक युवती उसकी 
परिचर्या कर रही है। दोनों में प्रेम हो जाता है। समाज इस स्वेच्छाचार को रोकने के लिए उस 
युवती का किसी और से विवाह कर देता है। युवक का हृदय इस आधात से तिलमिला कर विषाद 
से भर जाता है । नारी-पुरुष के सहज और पुनीत प्रेम को समाज कितनी निर्ममता से कुचल देता 
है, इस खंड-रूपक की यही कहानी है । 'ग्रन्थि' में कंशोर-सुलभ भावना का प्रदेग भ्रवश्य है, लेकिन 
भाषा और भावों की भ्रभिव्यक्तित में पर्याप्त प्रौढ़ता है, जो उनकी श्रगली रचना “पललव' (सन्‌ 
१६२७) में श्रपनी पूर्णता को पहुँची । 'पल्लव' की भूमिका का भी हिन्दी-काव्य के विकास में एक 
श्रात्यन्तिक स्थान है । इसमें पहली बार पंत जी ने नये काव्यादर्श के प्रतिमान स्थिर किये और 
काव्य-रूढ़ियों और प्राचीन सान्यताञ्रों पर श्राक्मण। किया। 'पललव' की कविताओं में दृश्य-जगत्‌ के 
नाना सुन्दर रूपों का मृत्ते और मांसल चित्रण है और विविय भावों की श्रभिव्यंजना है। 'पल्लव' में 
पंत जी की 'बीणा'-कालीत प्राकृतिक अनुराग की भावना सौंदयं-प्रवधान हो गई है--'वी चि', “विलास' 
बदल, “नक्षत्र', 'मौत-निम्ंत्रण', 'आँसु', 'विश्व-वेणु', “उच्छवास' झ्रांदि इस सौंदर्यभयी कल्पना 
की श्रेष्ठ कविताएँ हैँ । उनकी प्रसिद्ध कविता “परिवर्तन! भी 'पल्लव' में संग्रहीत है ॥ “परिवतंन' 
में पंत जी की एक नई उपलब्धि के दर्शन हुए । लगता है जेसे उनका सौंदर्य-स्वप्न दूढ गया है 
झोर जगत्‌ और जीवन के चिर परिवततेनशील रूप ने उनकी समस्त श्राशाश्रों-आ्राकांक्षाओं को भक- 
भोर दिया है । परिवतंन, प्रकृति और जीवन का शाइवत नियम है, लेकिन इस नियम को समभने 
की दार्शनिक दृष्टियाँ परस्पर विरोधी भी हो सकती हें---एक दृष्टि से परिवर्तन निष्क्रितता और 
निरुपायता और घोर भाग्यवादी नेराइय-भावना को जन्म दे सकता है, दूसरी दृष्टि से परिवतंन के 
नियम की चेतना रूढ़-रीतियों से प्रस्त मानव-समाज को बदल कर नये निर्माण की प्रेरणा दे सकती 
है। झ्राध्यात्मिक दर्शन पहली भावना को जन्म देता है तो वेज्ञानिक भौतिकवादी दृष्टि संसार को 
बदलने की प्रेरणा देती है । पंत जी ने जिस समय “परिवर्तन” की रचना की उस समय उन्त पर 
झ्ाध्यात्मिक दर्शन, विशेषकर उपनिषदों का प्रभाव था, इसलिए उन्होंने “निष्ठर' और “दुर्जेय 
विश्वजित्‌' परिवतंन को एक ऐसे उग्र और विराद रूप में देखा, जिसके श्रागे मनुष्य की इच्छा 
झनिच्छा, सुख-दुख, जीवन-मरण का कोई मूल्य नहीं है । 'परिवर्तत) की यह कल्पना किसी अन्य 
कवि में नियतिवाद श्र निराशावाद के श्रभावात्मक (नेगेटिव) दृष्टिकोण को उभारती, लेकिन 
पंत का सोंदर्यानुरागी संवेदनशील मन सानव-प्रेम से द्रवित हो उठा। '“गुंजन' की कविताओं में 
उनकी कल्पना श्रात्म-चिन्तन श्रौर लोक-कल्याण की भूमियों पर विचरण करती हुई सुख-दुःख में 
समत्व स्थापित करने की श्रोर उन्मुख हुई । श्राध्यात्मिक दर्शन का प्रभाव यहाँ भी प्रबल है, जिसके 
कारण सुख-दुःख की नित्यता को स्वीकार करके उनमें सामंजस्य स्थापित करने की आादशंवादी 
कामना है। लेकिन जीवन के हर्ष-विसर्षों और उच्चादर्शों के प्रेमी कवि का सन इस निष्कियता- 
बादी समन्वय से सन्तुष्ट नहीं हुआ-“लगता अपूर्य मानव-जीवन, में इच्छा से उन्‍्मन-उन्मन |? 
पंत जो स्वभावत:ः संघर्ष-प्रिय या निराज्ञावादी व्यक्त नहीं, जैसा कि उन्होंने स्वयं झपनी कबिता 


हिन्दी-कबिता का विकास ३१ 


के विकास को समझाते हुए “झराथुनिक कवि', भाग २ की भूमिका में कहा है। इसीलिए “गुंजन' 
के गीतों में ही उनके मानवता-प्रेमी दृष्टिकोण का बह रूप गोचर होने लगता है जिस में वे “वर्तमान 
समाज को कुरूपताप्रों से कट कर भावी समाज कौ कल्पना' श्रौर कामना करते दीखते हें। ध्रृंजन 
के बाद को कविताओं में मानव-जीवन को संभावनाझ्रों के प्रति भ्रास्थाशील कवि की कामनाएं 
विविधि रूप-चित्रों के द्वारा व्यक्त हुई हैं । भ्रपने व्यक्तिगत सुख-दुख को वाणी न देकर प्रगतिशील 
मानवता की प्राकांक्षाप्रों को उन्होंने बार-बार प्रार्थना के रूप में मुखरित किया है । 
“नव छवि, नकरंग, नव मधु से 
मुकुलित पुलक्ित हो जीवन”? 
निशचय ही संघर्ष-प्रिय निराला या निराशावादी महादेवी या बच्चन जेंसी हादिकता पंत 
के काव्य में नहीं मिलती । 'पललब' के बाद उनका जग-चिन्तन उन्हें व्यापक कल्याण को भावना 
मं ही सत्य और सौन्दर्य की खोज करने को प्रेरित करता रहा है, जिससे उनके बिचारों की 
दाहनिक १८5-भूमि चाहे उपनिषदों का अ्रद्वंतवाद हो या सास का दन्द्वात्मक भौतिकवाद या गांधी 
झौर झरविन्द का दर्शन, उनको सहानुभूतियाँ बौद्धिक धरातल की ही अ्रधिक रही हें। “गुंजन' में 
उन्होंने यह झ्राग्रह प्रकट भी किया था--तुन्दर विश्वासों से ही बनता रे यह सुखमय जीवन ॥' 
हिल्‍्दी के भ्रतेक विद्वान और भाव-प्रवण झ्रालोचकों को पंत जी की कविता का यह नया मोड़, जो 
ध्युगास्त' , 'युगवाणी' और 'ग्राम्या' में ग्रौर भ्रधिक सुस्पष्ट होता गया, रुचिकर नहीं लगा । उन्हें 
श्वल्लव' की कविताओं को प्रलंकार-सज्जित, ऐन्द्रिक रूप-चित्रों का निर्माण करने वाली सोन्‍्दयं- 
कल्पना के मुक़ाबले में लोक-मंगल की भावना से प्रेरित, दलित-शोषित मानवता के प्रति बोद्धिक 
सहानुभूति व्यक्त करने वाली कविताएं नीरस लगीं । पंत जी ने भ्रपनी सक़ाई में कहा कि “बोद्धि- 
कता भरी हादिकता का ही एक रूप है, वह हृदय की कृपणता से नहीं आती ।” और “युगान्त', 
श्युगवाणी' और “ग्राम्या' को कबिताएं सचमुच हिन्दी-काव्य के लिए एक नए पय का निर्देश करतो 
हैं, जिलमें यद्यपि 'पल्लव' जेसी मांसलता नहीं, लेकिन जीवन के मूत्तं-चित्रों की भी कमी नहीं है । 
._ किन्तु लगता है कि पंत जी के आलोचकों का भय ही ठीक निकला, क्योंकि 'ग्राम्या' के बाद को 
कविताओं में मनुष्य के भावी विकास की भ्रादर्श-कल्पनाएँ, जीवन के व्यापक सत्य की उद्भाबनाएँ 
. और बाह्य और अन्‍्तर्जोबन के समन्वय की दार्शनिक विचारणाएँ बोद्धिक चिन्तन के अतिशय श्रारोप 
के कारण निरी श्रमूर्त (एब्सट्रंक्ट) हो गयी हें। 'प्राम्या' के बाद का पंत-काव्य छायावादी कबिता- 
. डॉली में रचा पंत-दर्शंन बनता गया है । स्वर की उदात्तता, भावनाओं की मानवीयता भर भाषा 
* को सुकुमारता के कारण इन रचनाओं को कविता चाहे कहलें, किन्तु वास्तव में वे दाशंनिक रचनाएँ 
हैं । कल्पना और काव्याभरण तो पंत के दाशंनिक चिन्तन को श्रभिव्यक्ति देने के उपकरण मात्र 
न्‍ ॥ इसीलिए भ्रव झ्रालोचक 'ग्रास्या' से बाद की रचनाओं के काव्यगत सौन्दर्य की विवेचना में न 
पड़कर पंत के समन्वयवादी दृष्टिकोण या दर्शन का ही समर्यन या विरोब करने में प्रवृत्त होते हैं । 
'युगवारी' के गीत-गद्य के बाद 'प्राम्या' में नए जीवन-बोध से प्रेरित कवि ने प्रामोरा-जोवन के 
प्रनेक मूर्त चित्र दिये थे और झाशा बेंघी थी कि उनके बौद्धिक चिन्तन ओर प्रात्म-मन्‍्थय से लोक- 
मंगल की भावना में पूर्णतः पर्यकसलान करके युग-सत्य की उपलब्धि करली है, भ्रौर पंत में पुनः 
॥ की समग्रता पेदा होगी और वे नए सत्य को काव्य की मूर्त भाषा में व्यक्त करेंगे । लेकिन 
की समग्रता पुनः न पैदा हो सको, क्‍योंकि जीवन को कुरूपता झोर विषमता के सामने पड़- 
सामान्य मनुष्य को प्रतिक्रिया उससे संघर्ष करने को या उससे भागकर निराश्षा के गर्त में डूबने 


२ का उ्य-धारा 


की होती है । पंत जी श्रपने साधु भ्रौर उदात्त चिन्तनशौल स्वभाव के कारण इन दोनों प्रकार कौ 
प्रतिक्रियाश्रों से निस्संग रहकर लोक-मंगल भ्रौर केवल बौद्धिक भावना-प्रक्रिया के तल पर नयी 
मानववादी संस्कृति के निर्माण-स्वप्न कल्पना में गूंथते रहे, और कवि से एक मनीषी चिन्तक बन गये । 
अपने स्वभाव की इस विशिष्टता का उन्होंने बार-बार उल्लेख किया है । 
दोनों महायुद्धों के बीच की पाइचात्य कविता में भी बोद्धिकता का ही प्राधान्य है, किन्तु यह 
बोद्धिकता भ्रतिबेयक्तिकता, श्रनास्था, निराशा और सानवद्रोह के रूप में मुख्यतः व्यक्त हुई है। एक 
भयंकर झौर रुग्ण स्नायविक विक्षोभ की प्रतिध्वनियों ने पाइचात्य कविता के अंतरंग जीवन-बोध, 
भाव श्र श्रनुभूति के ताने-बाने को विश्युंबल कर दिया था। पंत की सामाजिक बौद्धिकता इसके 
बिपरीत है, बह एक नए जीवतादर्श के प्रकाश से श्रालोकित है, किम्तु फिर भी इधर की कविता 
देखकर लगता है कि वे कविता में दाहं निक गाम्भीयं नहीं भर रहे, बल्कि दर्शन को काव्य-रूप देकर 
तरल बना रहे हैं। काव्य की दृष्टि से दोनों में भ्रन्तर है। 'युगवाणी' में पंत जी ने घोषणा की थी : 
“बन गये कलात्मक 
जगत के रूप नाम 
जीवन संघर्ष देता खुख 
लगता ललाम |?” 
इससे एक स्वाभाविक झाशा पैदा हुई थी कि आयास बहने वाली “युगवाणी' में युग का 
सम्पूर्ण वेदन प्रतिध्यनित होगा, क्योंकि कवि जीवन-संघर्ष में सुख का श्रनुभव करने लगा है। “आज 
मनुज को खोज निकालो”?, “मुक्त करो नारी को मानव”, “सत्य नहीं वह, जनता से जो नहीं 
प्राण सम्बन्धित!” श्रादि से लगा कि कवि सत्य, शिव, सुन्दर को वर्गों की सीमा में से निकाल 
कर ऊध्व॑मूल संस्कृति को श्रधोमल बनाने के लिए अपने कोमल सन के बावजूद शोषित मानबता 
के कठोर कर्ममय जीवन की वेदना श्लौर नये जीवन और नयी मानवीय संस्कृति के निर्माण की 
संघर्ष चेष्टाओ्रों का मूत्त, भावपुर्ण, चित्रों की भाषा में अंकन करेगा । 'युगवाणी: और 'ग्राम्या' की 
जीवप्रसु', 'चींटी', 'नारी', “दो लड़के', “नि३इ्चय', 'खोज', लेनदेन, “झंका में नीम, “ग्राम युवती, 
गग्रामभौ', “वे श्राँखें', 'धोबियों का नुत्य', 'स्वीट पी के प्रति', भारत माता, “बह बुड्ढा', “गंगा, 
मारों का नाच', “संध्या के बाद', 'रेखाचित्र', 'पतझर' झ्रादि प्रकृति और जीवन के मांसल चित्र 
अंकित करने वाली ऐसी कविताएं हैँ, जिन्होंने छायावादी कविता को एक नया प्रगतिशील काव्या- 
दर्श और जीवन-बोध दिया । सन्‌ १९३८ और १६४५ के बीच इन कविताओं ने प्रगतिशील 
धारा को अ्रपना नया रूप-संस्कार करने की प्रेरणा दी। लेकिन 'प्राम्या' और “युगवाणी' में भी 
श्रमत्ते दाशनिक विचारों को उदात्त उद्गारों के रूप में व्यक्त करने वाली कविताओं की पर्थाप्त 
संख्या है, और झाग की कविताशों में तो यह प्रवृत्ति ही प्रधान हो उठी, झौर 'ग्राम्या' ने जिस 
झ्राशा को अंकुरित किया था, वह पल्‍लवित न हो सकी । 
इस विवेचन के बावजूद, पं त-काव्य को यदि समग्र रूप से देखें तो उनकी सुक्ष्म सौंदय्य- 
दृष्टि श्ौर सुकुमार उदात्त कल्पना हिन्दी काव्य-साहित्य में भ्रनन्य है। लोक-मंगल को साधना 
करने वाले इस महाकवि जैसी युग-जीवन की व्यापक झार्थिक सांस्कृतिक, समस्याप्रों को चेतना भी 
अन्यत्र दुलंभ है । जिस 'परिवर्तंन' को पहले उन्होंने एक भाग्यवादी को दृष्टि से देखा था, 
लोक-मंगल के लिए वे उसी की प्रावश्यकत्त का अनुभव करते हें | 


हर डर ४४ जु 
९ 


हिन्दी-कविता का विकास ३३ 


“यह सच है, जिस अथे-भित्ति पर 
विश्व-सभ्यता आज खड़ी हे 

बाघक है वह जन-विकरास की-- 

उसमें आज अपेक्षित है व्यापक परिवर्तन 


उसे पाटना है इस युग को 

आत्म-त्याग से, 

सहिष्णुता, शिक्षा-समत्व से 

और नहीं तो, ँ 

सत्यागह के शत-शत नि्भेय बलिदानों से ! 
जिससे भू का रक्त-क्षीण शोणित विषण्ण-मुख 
फ़िर प्रसन्‍त्र जीवन मांसल हो, युग शोमन हो ! 
उत्तर शरती अवश्य यंत्र-युग के विप्लव में 
स्ामरण्जस्य नया लायेगी जनमन बांछित 


जिससे 
शिक्षा, संस्कृति, सामूहिक विकास का 
पथ ग्रशस्त हो पायेगा 
युग मानव के हित!” 
. ( उत्तर-शती रूपक से ) 
छायावाद-युग के इन तीन महाकवियों के श्रतिरिक्त इस धारा के अ्रन्य महत्त्वपूर्ण कबियों 
में महादेवी वर्मा, “बच्चन', “दिनकर', भगवतीचरण वर्मा, बालकृष्ण शर्मा “नवीन', उदयशंकर भट्ट, 
रामकुमार वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, 'अंचल' के साथ-साथ जगन्नाथ प्रसाद “मिलिन्द', हरिकृष्ण "प्रेमी, 
मोहनलाल महतो “वियोगी', केदारनाथ मिश्र “प्रभात', गोपालरसह नेपालो, जानकोवल्लभ ज्ास्त्रो, 
. सुमित्राकुमारी सिन्हा, विद्यावती कोकिल, हंसकुमार तिवारी भ्रादि के नाम भी उल्लेखनोय हें । हम 
पहले कह चुके हें कि छायावादी कविता में भ्रनेक प्रवृत्तियाँ और श्रनेक दृष्टिकोस्ों की संइलिष्ट 
प्रभिव्यंजना हुई है । जिन तोन सहाकवियों का हमने ऊपर विवेचन क्रिया है उनकी कविता का 
भ्रन्तःस्वर यद्यपि सर्वत्र उदात्त है और उनकी चेष्टा सदा अ्रपने व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर 
, समूची, जाति के सुख-दुख को भ्रभिव्यक्ति देने की शोर रही है, फिर भो उनके काव्य में एक-रसता 
. नहीं है, यद्यपि उल्लास भी है, मर्मान्‍्तक वेदना भी है, बहिर्मुख भाव-चित्रण भी । साथ ही, ये तीनों 
.. महाकबवि सामन्ती मूल्यों के विरुद्ध युगानुकूल जीवन के व्यापक मान-मूल्य निर्धारित करने की ओर 
... भी सतत्‌ प्रयत्नशील रहे हें । किन्तु सन्‌ १६३० के बाद ही छायावादी-काब्य में श्र भ्रनेक नयी 
. अ्रतिभाएँ मुखर हो उठीं, जिनमें भावों को गहराई भौर श्रावेग चाहे श्रधिक हो, किन्तु वृष्टि उतनो 
| व्यापक नहीं थी । भ्रपने व्यक्तिगत स्वभाव, जीवनानुभव और रुचि के झ्नुसार ये कवि छायावाद 
.. की प्रधानतः एक-एक प्रवृत्ति के गीतकार बनकर प्रागे बढ़े, जिससे उनको कविता में जहां एको- 


३७ काव्य-धारा 


न्‍्मुखी और एक-सूत्रीय सघनता भ्रधिक है तो एक ही भाव की विभिन्‍न अवस्थाओ्रों श्रौर परिस्थि- 
तियों की श्रावृत्ति भी बहुत है श्रौर समग्र-रूप से उनकी काव्य-भूमि का दायरा संकीर्ण हो गया है । 
इस प्रकार स्वछन्दतावाद की परिणति बेयक्तिकता में होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, काव्य का 
उदात्त भ्रन्तःस्वर मन्द पड़ने लगता है श्रौर जीवन-मूल्यों का विघटन शुरू हो जाता है । यह ह्ास 
की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को सम्तग्न रूप में ही समझना चाहिए, श्रन्यथा, प्रत्येक कवि ने 
अंश रूप में हिन्दी-काव्य को नई देन दी है श्रौर उस सीमा तक उसका बिकास किया है॥ 
महादेवी वर्मा (१६९०७--) की कविता में वेयक्तिक अ्रनुभूति के तल पर सामनन्‍्ती समाज 
के बन्धनों में ग्रस्त भारतीय नारी-जीवन की निबिड़ वेदना, पीड़ा श्रौर कहीं-कहीं सुक्ति-श्राकांक्षा 
व्यक्त हुई है। इसी कारण श्रतेक श्रालोचकों ने महादेवी जी को निराशावाद या पीड़ावाद की 
कवियित्री कहा है। स्वयं महादेवी जी ने लिखा है--“दुख मेरे निकट-जीवन का ऐसा काव्य है जो 
सारे संसार को एक-सूत्र में बाँध रखने की क्षमता रखता है। हमारे अ्रसंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता 
की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सकें, किन्तु हमारा एक बूंद भी जीवन को अ्रधिक उबंर बनाये 
बिना नहीं गिर सकता ।' * *विश्व-जीवन में भ्रपने जीवन को; विश्व-वेदना में अपनी बेदना को इस 
प्रकार मिला देना जिस प्रकार एक जल-बिन्दु समुद्र में मिल जाता है, कवि का मोक्ष है ।” इसी 
प्रसंग में उन्होंने पुनः कहा है--“मुझे दुख के दोनों ही रूप प्रिय हैं, एक वह जो मनुष्य के संवेदन- 
शील हृदय को सारे संसार से एक श्रविच्छिन्न बन्धन में बाँध देता है और दूसरा वह जो काल और 
सीमा के बन्धन में पड़े हुए श्रसाौम चेतन का ऋन्‍्दन है । सहादेवी के गद्य में श्रपने संवेदनशील 
हृदय को सारे संसार से एक श्रविच्छिन्न बन्धन में बाँध देने वाले दुख (श्रात्मीयता, करुणा, सहानु- 
भूति) का रूप व्यक्त हुआ है तो उनकी कविताओं में काल ओर सीमा के बन्धत्त में पड़ हुए 
झसीम चेतन (नारी-जीवन के सामाजिक बन्धनों की चेतना) का ऋन्‍दन है ।' श्राध्यात्मिक दर्शन 
झौर विशेषकर बुद्ध की करुणा ने उनकी बेदता की श्रनुभूति को लोक-दृष्टि श्रौर उद्ात्त आधार 
दिया है। कुछ झ्ालोचक इस आ्ाध्यात्मिक दर्शन के कारण ही महादेवी की कविता को रहस्यवादी 
झोर लोकोत्तर सिद्ध करते श्राये हें, किन्तु यदि महादेवी जी के वक्‍तव्य को ही ठीक से परखा जाय 
तो उनको कविता में व्यक्त श्रसीस और श्रज्ञात की चाह और पीड़ा-वेदना का मोह एक “ओर 
वर्तमान समाज के रूढ़ि-बन्धनों में प्रस्त नारी-हृदय का चीत्कार है, तो दूसरी ओर पाठक में दुख 
की गहरी अनुभूति जगा कर इस विषमावस्था के प्रति चेतना (पीड़ित के प्रति आत्मीयता, करुणा 
झौर सौहाद भावना) उद्बुद्ध करने का सूक्ष्म सांस्कृतिक प्रयास है । जहाँ जिस समाज में वर्ग-भेद 
झोर अ्समानता हो; वहाँ श्रधिकार-वं चितों को उनका सामान्य दुख एकता के सूत्र में बाँधता है, यह 
एक ऐतिहासिक सत्य है । हमारे राष्ट्रीय जागरण की जिस साम्नाज्य-विरोधी श्ौर सामान्तवाद- 
विरोधी पृष्ठभूमि में छायावादी कविता का विकास हुआ, उसमें व्यक्तिगत दुख और बेदना के गीतों 
में भी सामाजिक ठुख और बेदना ही प्रतिध्वनित हुई है । इन गीतों -के उपस्ान और प्रतीक बेय- 
क्तिक नहों हैं, बल्कि लोक-चेतना में सहज प्रेषणीय  बाह्म-प्रकृति श्रौर जीवन से लिए गये हें । 
महादेवी जो को विशेषता यह है कि छायावाद ने व्यक्ति ओर समाज की जिस व्यापक असन्‍्तोष- 
भावना को श्रभिव्यक्तति दी उसमें उन्होंने भारतीय नारी के - असन्तोष, निराशा और आकांक्षा के 
स्वर को भी जोड़ दिया । अ्रपनी युग-युगान्तर से चली पाने वाली निगूढ़ व्यथा में भ्रारतोय नारी 
यदि चीत्कार कर उठती है, में नीर भरी दुख की बदली /? तो उसे इसका भी ऐहसास है 
कि वह रात के उर में दिवस की चाह का शर्‌? है। सहादेवी की कविताओं सें पीड़ा और बिरह 


हिन्दी-कबिता का विकास १५ 
की स्थिति के प्रति एक निराशावादी की प्रासक्ति बार-बार व्यक्त हुई है, “मिलन का मत नाम 


द ले में विरिह में चिर मिलन हूँ? या “तुम को पीड़ा में दूँ ढा, तुम में दृददँगी पीड़ा ।! साथ हो 
उन्होंने जीवन भ्लौर सौन्दर्य की भ्राकांक्षा भी भ्रनेकविधि में व्यक्त की है :--- 


“करण्टकों की सेज जिसकी आँधुओं का साज 
झुभग ( हँस उठ, उस प्रफुल्ल गुलाब ही-सा आज 
बीती रजनि, प्यारे जाग |? -' 
महादेवी जी के गीत भ्रपनी सुन्दर चित्रमय व्यंजना के कारण अनूठे है । 
रामकुमार वर्मा--- (सन्‌ १६०५--) पर महादेवी वर्मा की तरह कबीर श्ौर दूसरे रहस्य- 


वादी कवियों का प्रभाव है । उनकी रहस्य-चेतना में भी निराशा का स्वर तीव्र है। साथ ही भ्रज्ञात 


झौर जिज्ञासा को भावना में कहों-कहीं एक बोद्धिक भ्रविश्वास भर सन्देह का 
है; जो जीवन के प्रति उस भ्रविश्वास की ही प्रतिध्वनि है जिसका पूरा विस्फोटक परवतों 


क जदिशों रचनाधों में मिलता है-- 


हि उषे, बतला यह सीखा द्वात कहाँ ? 


यदि)तेरा जीवन जीवन है तो फ़िर हे उच्छुवासः कहा ? 
अपने ही हूँ सने पर तुक को क्षणमर है विश्वास कहाँ ? 
समाजोन्मुखता का परित्याग कर जब्र व्यक्तिवाद भ्रात्म-निष्ठ हो जाता है; तब स्वयं श्रपने 
को सारे विश्व का केख्र मातकर चलने की प्रवुत्ति की अ्रनुगूंज सुनाई पड़ने लगती है :-- 
एक दीपक--किरण कछ हूँ 
धूमत्र जिसके क्रोढृ७ में हे 
उस्तअनबल का द्वाथ हैँ में 
नव अ्भा -लेकर . चला हूँ 
पर जलन: के साथ .ूँ में । 
सिद्धि पाकर भी तपस्या-- 
साधना का ज्वलित क्षण हूँ | 
ऐसे ही भ्रनेक सुन्दर गीतों में वर्मा जी ने भ्रपनी रहस्य-चेतना को व्यक्तिवाद, निराशा 
और सन्‍्देह की भावनाओं में रंग कर प्रकृति श्लौर जीवत के शब्द-चित्र अंकित किये हैं। उनकी 


कविता छायावादी शैलो झ्ौर काव्य-वस्तु से भ्रपने को मुक्त करके नहीं चली, यद्यपि उसमें इस 


शैली के बन्धन कुछ ढीले पड़ते भ्रवश्य दिखाई देते हें । यह कार्य “बच्चन और “दिनकर' ने अपने- 


अपने ढंग से किया, जिन्होंने भ्रपने व्यक्तिगत उद्गारों या लौकिक भावनाझ्रों को व्यक्त करने के लिए 


रहस्य-कल्पना तथा किसी चिर भ्रज्ञात या सविशेष को उद्भावता या मध्यस्थता भ्रावश्यक नहां 
समझी । 

हरिवंशराय “बच्चन/-- (सन्‌ १६०७-) हिन्दी में मधु के गीत लेकर भ्रवतीर्ण हुए । उनकी 
प्रारम्भिक कविताशों पर अंग्रेजों कविता श्लोर उमर खेयाम की रुबाइयों का प्रभाव स्पष्ट है । 
“बच्चन की कविता में स्वच्छुन्दतावादी व्यक्तिवाद ने एक नयी दिज्ञा पकड़ी । “प्रसाद, पंत, 
“निराला', महादेवी की कविता पर प्राचीन भारतीय प्राध्यात्म दर्शनों प्रौर रहस्यवाद का प्रभाव 
था, जिसके कारण उनको कविता में व्यक्तिगत सुख-दुख भौर सामाजिक सुख-दुख में समत्व 


हा 


३६ काव्य-धारा 


स्थापित करते चलने की उदात्त-भावना निरन्तर क्रियाशील दीखती है। इससे उनकी कविता में 
एक ऐसी निस्संगता, निर्वेयक्तिकता, सात्विकता श्रौर मर्यादा है, जो जीवन के संघर्षों में फंसे 
लोगों को वायवी, भ्रशरीरी और काल्पनिक लगी | 


कीइस प्रतिक्रिया हुई भ्रौर “बच्चन” ने मधु श्रौर यौवन के गीत गाने शुरू किये। “बच्चन 
को प्रारम्भिक रचनाओं में प्रबल जीवनाकांक्षा का उन्माद श्राग्रह है, 'है आज भरा जीवन मुरू में, 
है आज भरी मेरी गागर !” लेकिन उनका यह जीवनोल्लास भौर जग का हास-रुदन भूलकर 
मधुमय हो जाने का प्रात्म-केन्द्रित व्यक्तिवाद रूढ़िवादी समाज को रुचिकर नहीं लगा । “बच्चन' 
ने तब सामाजिक-विरोध के बीच, सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए श्रपने मधु-गीतों की 
सृष्टि की । 'कह रहा जय वासनामय हो रहा उद्गार मेरा /? या हैं कुपथ पर पाँव मेरे आज 
दुनिया की नजर में'--सामाजिक विरोध के प्रति कवि के उपालम्भ की सूचना देने वाली कविताएँ 
हैं । इनमें पुरानी सामाजिक मर्यादाश्रों, धर्म, लोकाचार श्रौर नेतिकता के विरुद्ध कवि का विद्रोह 
पूरे ज्ञोर से व्यक्त हुआ्ा है। पुरानी मान्यताओ्रों के प्रति यह प्रतिक्रिया श्रभावात्मक (नेगेटिव) या 
व्यक्तिवादी ही है, जिससे वह उनके स्थान पर, भोगवाद को छोड़कर, कोई नया जीवनादर्श 
स्थापित नहीं कर पाता । “लहरों का निमन्त्रणण' सुनकर वह सामने पड़े श्रम्बुधि में तेर कर उस 
पार जाने को तत्पर होता है क्‍योंकि 'कुछू विभा उस पार की इस पार लाना चाहता हूँ', किन्तु 
झन्त में इस अ्रभियान की कल्पना केवल व्यक्ति की एक उमंग, नई राह शौर पथ पर चलकर 
श्रपने व्यक्तित्व को प्रमारितत करने की श्राकांक्षा में ही सीसित होकर रह जाती है। उसके किसी 
ज्ञात लक्ष्य या परिणाम से कवि सरोकार नहीं रखता। कुछ भी हो “बच्चन' ने जिस दर्प और 
झहंभाव से समाज की मान्यताओं को चुनौती दी, वह सन्‌ १९३५-४० के काल में देश के विषण्ण- 
मन युवकों को बहुत भायी। मर्यादाञ्नों को तोड़ना मात्र भी कभी जीवन की चरम सिद्धि-सी 
दिखाई देने लगती है, विशेषकर उस समय जब मर्यादाएँ भावी-विकास में बाधक बन रही हों | 
लेकिन कोरी प्रभावात्मक प्रतिक्रिया मनुष्य के उदात्त श्रन्तःस्वर को ही श्वनुदात्त नहीं बना देती, 
उसमें घोर निराशा और विफलता का भाव भी उत्पन्त करती है। “बच्चन! की कविताओं में 
वेयक्तिक भ्रहंकार-दर्प के साथ-साथ निराज्ञावाद के भाव भी प्रमुख हो उठे । 


'मधुकलश' की कविताश्रों में भी निराशा का स्वर छिपा नहीं है, स्वयं कवि ने इसकी 
सफाई दी है :--- 
“पूछता जय, हे निराशा से 
भरा क्‍यों यान मेरा! 


मुस्करा कठिनाइयों 
आपत्तियों को दूर टाला, 
घेय॑ धर कर ,संकटों में 


खूब अपने को सम्भाला, 
किन्तु जब ॒प्रकत पढ़ा आ 
शीशपर में सह न पाया 
जब उठा हो भार जीवन 
तब उठाया होठ * प्याला 


हिन्दी-कविता का विकास ३७ 
व्यय कर दिन-रात निंदा 


विश ने जिया थकाई, 
था बहाना एक मसन-+- 
बहलाव का मधुपान मेर। /? 
महादेवीं के कविता-संप्रहों में जेसी एक-सूत्रीय योजना मिलती है, 'बच्चन' के संग्रहों में भी 
वैसी हो योजना है, भ्रर्यात्‌ एक-एक संग्रह के गीतों में एक ही जेसे भावों का उद्रेक करने वाले 
बाह्य झोर प्रास्तरिक-जीवत की स्थितियों झ्ौर प्रसंगों को लेकर गीत-रचना की गई हैं। निशा- 
लिसन्त्रण' में सायंकाल से लेकर प्रातःकाल तक के गौत हें, जिसमें कवि ने एक कल्पित साथी को 
लक्ष्य करके झ्पने हृदय में छाये शोक को सौ गौतों को श्यृंखला में बांचा है। “एकान्त-संगीत' में 
यह कल्पित-साथी भी बिछूड़ गया है और कवि के हृदय की वेदना भी भ्रषिक घनीभूत हो गई है । 
वह बाह्या-जगत्‌ से झपने को भ्रलग करके स्वयं भ्पने में ही डूब गया है। “एकान्त-संगीत' के गीत 
स्वगत हें । कु 
“निश्ञा-निमन्त्ररण' झौर 'एकान्त-संगीत' के गीत 'मघुशाला' झौर “मघुकलश' की कविताप्रों 
की तरह ही लोक-प्रिय हुए । भ्रपनी वेदनासिक्त भावनाओं में रंग कर उन्होंने सरल बोल-चाल की 
भाषा में प्रकृति-दृश्यों भ्रौर भ्रपतो मनोदशाप्रों के जो मूर्त्त शब्द-चित्र अंकित किये वे हिन्दी-कविता 
में एक नई चीज़ ये। क्या तुम तूफ़ान-समझ प्राओगे?”, 'सन्ध्या-सिन्दूर लुटाती है, “यह 
पपीहे की रटन है? , अब मत मेरा निर्माण करो”, “तब रोक न पाया मैं आंयू”, "त्राहि-त्राहि 
कर उठता जीवन”, अब खंडहर भी टूट रहा है? श्रादि भ्रनेक गीत मूर्त चित्रांकन झोर गहरी 
हादिक बेदना के कारर प्रविस्मरसीय हें । छुछ गीतों में वेदतना इतनी घनीभूत है कि कवि ने जीवन 
का तिरस्कार भ्ौर उपहास भी किया है, किन्तु कुछ गीतों में उसका व्यक्तिवाद तिलमिलाकर पूरे 
सालवोचित दर्प से गरज उठा है, ज॑से “विष का स्वाद कताना होगा ।” 'क्षतशीश मगर नतशीरश 
नहीं?, प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !? या “अग्नि-पथ ! अग्नि-पथ ! अग्नि-पथ /? 
यह महान्‌ इश्य हे 
चल रहा मनुष्य है 
अश्रु-स्वेद-रक्त से 
लथपथ / लथपथ ! लथपथ /! 
किन्तु 'बच्चन' के “झ्राकुल भ्रन्तर' तक के गीत मैंने गाक़र दुख अपनाये” की भावना के 
ही गीत हैं भौर उनमें जीवन के प्रति गहरा विक्षोभ, नेराइय भ्ौर भ्रविश्वास व्यक्त हुआ है। “चाँद _ 
सितारे मिलकर बोले” में इस दृष्टि से सुख-दुख को सांसारिक उपलब्धियों की क्षराभंगुरता का 
सा्भिक अंकन है । किन्तु 'सतरंगिनी' ओर “मिलन-यामिनी' की कविताप्रों में इस मर्मान्तक निराशा 
का स्वर पुनः झाशा भर उल्लास में परिणत होते दीखा है, उनका गीत 'नीड़ का निर्माण फ़िर 
फ़िर /” इस नये सोड़ का प्रतीक है । 

* बच्चन के गीतों ने हिन्दी-कविता का एक नया रूप-संस्कार किया । भाषा सरल, मुहावरे- 
वार और व्यक्तिगत वेदना की ग्रनुरूति से मूर्स और भाव-सिक्‍त हो उठी । काव्य-वस्तु का क्षेत्र 
यद्यपि सीमित हो गया लेकिन अ्रभिव्यक्तित में श्रथिक मांसलता और हादिकता भ्रा गई, जिसके 
कारण पअनुभूतियों का प्रेषण प्रधिक सहज बन गया। इस हूास-अ्रक्रिया के दोर में भी एक नया 
उठान-सा श्राया । जीवन के व्यापक प्रइनों से हटकर नये कवियों की एक पीढ़ी को थोढ़ी निःस्वप्न 


भ्झ कांव्य-धारा 


झौर निश्चान्त हो भ्रपने व्यक्तिगत दुखों को गौत-बद्ध करने लगी । व्यक्तिवादी धारा का यह ऐसा 
स्फ्रण था जिसके बाद काव्य-वस्तु, काव्य-भाषा, श्रनुभूति और श्रभिव्यंजना सभी क्षेत्रों में एक 
भयंकर विघटन अनिवार्य हो गया । यह गीत इस बात के प्रमाण हैं कि कवि श्रपनी व्यक्तिगत 
बेदना को मूत्त चित्रों की भाषा में श्रभिव्यक्ति देकर सामाजिक बता रहा है, इसीलिए पाठकों ने 
उनमें अपने दुखों को ही प्रतिबिम्बित होते देखा । लेंकिंन जीवन का यह अत्यन्त सीमित श्रौर एकांगी 
झ्राकलन ही था, इसीलिए जब इन गीतों की आवृत्ति एक फ़ैशन-सीं बन गयीं। तब जो प्रतिक्रिया 
हुई उसने हिन्दी-कविता को झनेक छोटी-छोटी धाराओं में बिखर कर श्रग्रसर होने को विवश 
कर दिया। 
इस प्रसंग में श्री भगवतीचरंण वर्मा, नरेख्र शर्मा भौर रामेश्वर शुक्ल “अंचल' के नाम भी 
उल्लेखनीय हैं। भगवतीचरण वर्मा (सन्‌ १९४०३--) भी “बच्चन' को तरह छायावाद की रहेस्‍्या 
त्मकता और श्राध्यात्मिकता को चुनौतीं देते हुए मंधु, उल्लास और यौवन के गीत गांतें आंगे बढ़े ॥ 
उन्होंने श्रपने योवन् श्रोर प्रेम की आ्राकांक्षाओं को किसी तात्विक चिन्तन या नेतिक अवगणुठन में 
छिपाकर उपस्थित करना उचित नहीं समझा । “बच्चन” की तरह उनकी कविता में भी लाक्षरिक 
व्यंजना या श्रप्रस्तुतों की योजना का अ्रभाव है। व्यंग और श्रतिशयोक्ति की सहायता से उन्होंने 
भी अभिधा में श्रपने भावों को सरल, किन्तु श्रांकर्बक ढंग से व्यक्त करना शुरू किया-- 
हम दीवानों की क्या बस्ती आज यहाँ रहे कल वहां रहे, 
मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उड़ाते जहाँ चले |?? 
यह शआात्म-केन्द्रित 'मस्ती का आलम “मधुकण' झौर “प्रेम-संगीत' की . कविताओं तक हीं 
रहा। “मानव में वर्मा जी की दृष्टि प्रंगतिवाद से प्रभावित होकर संसार में फैले दुःख और उत्पी- 
डत की ओर गई। “कवि का स्वप्न! में मध्‌ से मतवाले मधुवन में मंदन जेंसे सुन्दर युवक 
और रति जेसी सुन्दर युवती के मधुर-प्ररशय की कहानी लिखने के लिए तत्पर कवि ने स्वप्न-भंग 
का चित्र खींचा है-- 
“कवि - संहर्सा सिहरा, काप उठा 
सुन भूखे बच्चों का रोदन, 
पत्नी की पथराई आंखों में 
केन्द्रित था जय का क्रन्दन, 
गन्दे-से टूटे . कमरे में 
होता अभाव का था नंतन 
कवि खड़ा हो गया पागल-सा 
उसके उर में थी कोन जलन ?”? 
उनके कविता-संग्र ह 'मानव' में झभाव-पीड़ित मनुष्यों के प्रति सहानुभूति और करुणा से 
द्रवित भावना के भ्रनेक चित्र हें। उनकी कविता 'जा रही चली भेंसगाढ़ी, चूँ चररमरर, चू चरर- 
मरर? हमारे ग्रामजीवन के सनातन पिछड़ेपन की प्रतीक है। इस प्रकार 'मस्ती का आलम" छोड़कर 
वर्माजी प्रगतिशील भावनाश्रों को श्रभिव्यक्ति देने लगे । #उक्छि हा 
नरेन्द्र शर्मा (सन्‌ १६१३--) की प्रारम्भिक कविताओं में मस्ती और उल्सोस की नहीं 
एक भावुक और कल्पनाशील युवक की प्रेम-यांचनाएँ और विरह-दग्ध हंदय की करुण स्मृतियाँ 
व्यक्त हुई हैं। नरेन्द्र शर्मा की कविताओं का स्वर और उसकी भाषा अनासक्त भोकता का स्वर या 


34% #2७- _- _ ४ 00 
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हिन्दी-कबिता का विकास ३६ 


उसको भाषा नहीं है :-''सुमुख्ि तुमको भूल जाना है असम्सव हे असम्भव /? बाद की कविताध्रों 
में प्रगतिवादी विचारबारा और श्रान्दोलत का श्रभाव भी काफ़ी स्पष्ट है, लेकिन उनकी भावुकता 
उन्हें प्रेम-गीत रचते के लिए बाध्य करती रहती है । नरेन्द्र शर्मा ही पहले कवि हें, जिल्होंने अ्रपने 
सत्र में बुद्धि और भावुकता के बीच चलने वाले-अन्तईन्द्र को निस्संकोच स्वीकार किया । “प्रवासी 
के गोत' को भूमिका में उन्होंते अपने हृदय को “क्षयी रोमांस के प्रति श्रासक्ति' का पश्चात्ताप-भरे 
शब्दों में उल्लेख किया । झागे चलकर “मिट्टी और फूल' की भूमिका में भी उन्होंने स्वीकार किया 
क्ि.“में मस्त को दुबंलताम्रों का कवि हूँ ।' हिन्दी काव्य-साहित्य के इतिहास में कवि द्वारा अभ्रपनी 
बुबंलताओ्रों की ऐसी प्रात्म-स्वीकृति एक नई चीज़ थी । इसमें कवि के युगद्रष्टा या खष्टा रूप के 
ग्रोरब की अ्रस्वीकृति है + यहाँ तक कि स्वयं भ्पने ही 'व्यक्तित्व' को भ्रस्वीकृति है। विचार और 
भावना के तल पर व्यक्तिवाद को परिणति “व्यक्तित्व” के तिरोभाव में ही होती है। श्रागे चलकर 
प्रयोगवादी धारा में कवि के “व्यक्तित्व झौर गरोरव का झोर भी बिलोप. हो गया। फरक़ सिर 
इतना-है कि जहां नरेन्द्र शार्मा ओर फिर “अंचल' में अपने सत्र को दु्बलताओं से लड़ने और मनुष्य 
की प्रगतिशील भावनाओं और अ्राकांक्षाओं को अ्रभिव्यक्ति देने को सजग चेब्टा दिखाई पड़ी, वहाँ 
प्रयोगवादियों में मन को दुबंलताप्रों को ही निरपेक्ष सत्य मानकर उनका ओरोचित्य लिद्ध करते 
को चेष्टा प्रथान हो उठी । नरेन्द्र दार्मा की जिन कविताप्रों में उनके मन का अन्तंन्द्र व्यक्त हुआ 
है।उन्तमें पर्याप्त सामिकता है: “उजड़ रहीं अनगिनत बस्तियों म्रन मेरी ही बस्ती क्या ?? किन्तु 
जिन कविताओं में उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुस्त-दुख से ऊपर उठकर प्रकृति-दृश्यों के भावना-चित्र 
अंकित किये हैं, वे भ्रत्यन्त मधुर और कोमल हैं । रामेश्वर शुक्ल “अंचल (सन्‌ १६१५--) में 
इसके बिपरोत किसी गहरी अनुभूति या सूक्ष्म, कोमल भावना का प्रकाश नहीं है। उनको कविता 
में पहले क्ञा रीरिक वासला शोर लालसा की स्थूल, प्रावेगमग्री प्लोर भ्रतिशयोक्ति-पूर्ण भ्रभिव्यक्ति 
हुईं । भ्रव तक के छायावादी कवियों में नारी के प्रति एक मर्यादाशील समानता और आदर को 
भावनाएँ ही व्यक्त हुई थीं। उन्होंने नारों को सदा मानव्ों श्ौर प्रेयसी के रूप में ही देखा था, 
लेकिन अंचल ने नारी को केवल उपभोग्या स्‍्ज्ो योनि के रूप में ही देखा । उनको वासनाजन्य 
तुष्णा, लालसा झौर प्यास की भावना बहुत ऊपरी तल की है-- 
“एक पल के ही दरत्त में जग्र उठी तृष्णा अघर में 

छः जल रहा परितिप्त-अंग्रों में प्रिपासाकुल पुजारी ।” 

.. उनके सारे वेदन-अन्तवेदन का पर्यंवस्तान 'रति-सुख' में हो होता है। 'मघूलिका', “प्रपराजिता' 
के गीतों में इसो वासता की आवृत्ति-विवृत्ति हुई है। बाद को “अंचल' ने भी अभ्रपनी “क्षयी रोमान्स 
के प्रति अवांछनीय भ्रासक्ति' को घिक्‍्कारा और प्रगतिशील विचारों और भावनाझ्रों को भ्रभिव्यक्ति 
देने लगे । “किरण-वेला' “'लाल-चूनर' आदि में उत्को प्रगतिशील कविताएं संग्रहीत हैं, लेकिन यहाँ 
भी नारी के प्रति उनका दृष्टिकोश उतना ही संकोर्ण है । 

प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी ने व्यक्ति के सुख-दुल, उल्लास-निराश्ञा की प्रनुभूति-प्रवरण 
झौर विषय-प्रधान अभिव्यंजना करते हुए भी जिन नये म्रालब-मूल्यों को सुष्टि को थी, कविता का 
जित नयी अर्यंभूमियों पर प्रसार किया था और काब्य के भ्रन्त:स्व॒र. में : मानववादो उदात्तता को 


जो गरिसा भर दी थी; अंचल तक प्राते-प्राते उन मानव-मूल्यों, भ्रय॑-मूमियों प्ोर भ्रन्तःस्वर की 


उदात्तता का सम्पूर्ण विघटन हो गया श्रोर छायावादी कविता का दायरा संकीर्णतर होता गया । 
छायावादी काव्य के उत्कर्ष भर ह्वास की यह प्रक्रिया हिन्दी-कविता के विकास-क्रम को एक कड़ी 


४० काव्य-धारा 


है । इसी समय प्रगतिवादी विचारधारा राष्ट्रीय-चेतना का नया संस्कार करने लगी थी। पंत, 
निराला, नरेन्द्र शर्मा और स्वयं 'अंचल' इस नई विचारधारा से प्रभावित होकर नये विचारों और 
शोषित-पीड़ित जनता को भ्राकांक्षाओं को भ्रपनी कविता में वाणी देने की श्रोर उन्‍्मुख हुएं। एक 
नये जीवनादर्श श्रौर नये मानवम्‌ ल्‍यों की उद्भावना होने लगी । “दिनकर” “'नवीन' श्रोर उदयशंकर 
भट्ट जेसे भ्रन्य समर्थ कवियों में भी इस नई सानववादी विचारधारा की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देने 
लगीं । भ्रनेक तरुण कवि प्रगतिशील भावनाझ्रों की भ्रभिव्यंजना करने लगे । लेकिन 'अ्रज्ञेय' श्र 
कुछ दूसरे कवि, जिनका व्यक्तिवादी और श्रात्मकेन्द्रित मानस सामाजिक श्राकांक्षाओं के प्रति 
संवेदनाशील होने में सर्वथा श्रसमर्थ था, प्रयोगशीलता के नाम पर विघटन की इस प्रक्रिया को काव्य 
की भाषा शोर श्रभिव्यक्ति के प्रकार में भी घसीट लाये, जिससे प्रयोगवादी धारा की कविता 
झपनी प्रेषणीयता भी खो बंठी | 
छायावाद-युग की समाप्ति के बाद उत्तर-छायावाद युग को प्रगतिशील श्रोर प्रयोगशील 
प्रवत्तियों के विकास-क्रम का विवेचन करने से पहले उन तीन महत्त्वपूर्ण कवियों का उल्लेख कर 
देना भी ज़रूरी है, जो न सम्पूर्णतः छायावादी हैँ, न प्रगतिवादी श्लोर न इतिवृत्तात्मक शैली के ही, 
परन्तु जो इनमें से दो या तीनों घाराशरों के सीमान्त छूते हें । 
बालकृष्ण शर्मा 'तवीन! (सन्‌ १८६७---) की कविता में जहाँ एक श्रोर राष्ट्रीय भ्रान्दोलन 
शोर देशभक्ति से प्रभावित विविध सामाजिक भावनाएँ हैं, वहाँ दूसरी श्लोर रोमान्टिक भावों को 
श्राध्यात्मिक जामा पहनाने का प्रयास भी है। छायावादी कला-चेतना से पृथक्‌ मार्ग पर चलने की 
प्रारस्भिक प्रवृत्ति पुरी तरह विकास नहीं कर सकी, उस पर दाशंनिकता का गहरा रंग चढ़ गया। 
'कुंकुम' में संग्रहीत राष्ट्रीय झ्रान्दोलन, गांधीवाद श्रौर प्रगतिवाद्र से प्रभावित गीतों में उनका 
व्यक्तिवाद “दिनकर” की तरह प्रगति को इतिहास-चेतना का विश्वास-भरा गवं-स्फोत स्वर लेकर 
प्रकट हुआ-- 
“में हैँ भारत के भविष्य का 
मूर्तितान विशास  महान्‌, 
में हूँ अटल हिमांचल-सम थिर 
में हूँ मूर्तिमान बलिदान |”? ः 
देश में तीत्र होते हुए वर्ग-संघर्ष, मजदूर-भ्रान्दोलन श्रौर प्रगतिवादी विचारधारा के प्रभाव 
- में 'नवीन' जो का भाव-प्रवण कवि-हृदय फेंकी पत्तल से उठाकर जठन खाते हुए इन्सान को दुर्दशा 
से सर्माहत श्र कुपित हो उठा और उन्होंने भी शभ्रन्य प्रगतिशील कवियों की तरह भ्रपने कवि से 
सांग की : 
“कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ 
जिससे उथल-पृथल्न मच जाये, 
एक हिलोर इधर से आये 
एक हिलोर उधर से आये।” 
लेकिन इस प्रवृत्ति को 'नवीन' जी श्रागे नहीं ले जा सके, उनके श्रोता ऐसी नई “तान' 
सुनने के प्रतीक्षाकुल ही बने रहे । 'अपलक' श्रोर 'क्वासि' को कविताओं में प्रेम की भावभूमि का 
बाशनिक श्यृंगार करने का प्रयास है। तुम न आना अतिथि बनकर” या "मेरा क्या कालकलन!' 
इस ढंग की प्रतिनिधि रचनाएँ हें । 


हिन्दी-कविता का विकास ४१ 


उदयक्षंकर भट्ट (सन्‌ १८६७--) देश के विभाजन से पहले तक हिन्दौ-क्षेत्र से बाहर लाहोर 
में रहे, जिससे उनको कविताधोों की ओर भझ्ालोचकों का ध्यान कम गया । प्राचीन दर्शन ओर 
इतिहास के विद्वान्‌ होने के कारण भट्टजी ने 'तक्षशिला के खंडहरों में प्राचीन भारतोय संस्कृति का 
स्वर सुनकर झपनी बारी को प्रसारित किया ।' फिर 'राका' और “बिसर्जन' में छायावाद से प्रभा- 
बित होकर उन्होंने वेदना, प्रभाव भोर निराशा के गीत भी गाये, यद्यपि निराशा का स्वर उनके 
सहज प्रास्थाशोल भ्ौर प्रात्म-विश्वासी हृदय के भ्रनुकूल नहीं था। प्रतः जब प्रगतिवादी विचार- 
घारा-हिन्दी-काव्य को प्रभावित करने लगी, उस समय भट्टजो को कविता ने भी नयी दिज्ञा पकड़ी 
शोर उन्होंने 'मानसी' में विश्व के यथार्य-दर्शन की भ्रनुभूतिमय बिवेचना करते हुए भ्रपने प्रन्तिम 
उदृवोधनात्मक गौत में माँग को : 
“समय के सभी स्राथ जीवन बदलते 
समय को बदलता हुआ तू चला चल”! 
इसके बाद एक झाशावादौ को दृष्टि से प्रकृति श्ौर जीवन के भप्रनेक दृश्यों प्लोर मासिक 
प्रसंगों को उन्होंने प्रणली रचनाझों में सरस भ्रभिव्यक्ति दो । भट्टजी को शेली छायावाद के सौमानन्‍्त 
छूतो-भर है, छायावादो नहीं है, यद्यपि भावना कहीं-कहीं स्वच्छुन्दतावादी है। भ्रभिव्यक्ति श्रधिकतर 
शोचर दुष्यस्तर को है, किन्तु कहीं-कहीं अ्रप्रस्तुतों की भी योजना है आर उत्प्रेक्षा ओर विरोधाभास 
को मात्रा भी पर्याप्त है। आशा, उत्साह, कर्म और जाग्रति का सन्देश उनकी कविताओं में बार- 
बार व्यक्त हुआ है, जिसमें प्रगतिशील कविता को अभ्रतिशयोक्ति-पूर्ण व्यंजना के पूरे दर्शन 
मिलते हें : 
“जाग उठा हूँ, जाय उठा हूँ / 
एक बार फ़िर मरण निगल कर, 
सांस-सांत में-- 
घराकाश में, नये प्राण भर / 
जाय उठा हूँ ! जाग उठा हूँ !? 
रामघारीसिह “दिनकर' (सन्‌ १६०६--) सजग सामाजिक चेतना के भाव-प्रवण कवि हें । 
उन्होंने जिस समय लिखना शुरू किया उस समय छायावादी कविता में ह्ासोन्मुली प्रवृत्तियाँ मुखर 
हो उठी थों, उसको व्यापक सार्वजनीन सांस्कृतिक चेतना में वेयक्तिक निराशा और बेदना का स्वर 
प्रधान होता जा रहा था और कविता का श्रेय श्रोर प्रेय केवल कलावादी सोन्दर्य-साथन में सोमित 
होता जा रहा था। इस समय एक झोर इस प्रकार को सोन्दर्य-लघना भौर वेयक्तिक भावनाओं 
की श्रभिव्यक्ति का आकर्षण तो था ही किन्तु दूसरो शोर प्रगतिशील विचारों ने जिस नई सामा- 
जिक चेतना को जन्म दिया था, उसका आकर्षण भी कम प्रबल न था ! हृदय और बुद्धि को 
प्रपनी-अपनो ओर खींचने वाले इल दोनों झ्राकर्षणों के परस्पर इन्द्र के बीच “दिनकर' को भ्पनी 
कविता के लिए नया युगानुकूल मार्ग निकालना पड़ा। “रसवमन्ती' तक को कविताश्रों में उनके 
सोन्दर्योपासक, एकान्त-प्रिय, योवन की उमंगों से तरंधित मन भौर उनके हुदय के श्रतल में बहने 


.. बालो न्याय, मुक्ति और मानव-प्रगति के लिए संघर्ष करने बाली सामाजिक भावना में निरन्तर 


| 


चलने वाले इन्द्र को कलात्मक विवृत्ति मिलती है । उनका व्यक्तित्व प्रयोगवादियों को तरह भ्रपनी 
मध्यवर्गोय विवशताओं के भ्रागे नतशिर होकर अपने कवि-गोरव का हनन नहीं होने देता । “दिनकर' 
के ग्रात्म-सस्थन में उनको सामाजिक-भावना हो विजयो होतो भ्रायी है, भौर इसने उनको प्रभि- 


श्र काव्य-घारा 


व्यक्तित में ऐसा प्रखर प्रावेग भ्ोर प्रवाह पेदा किया है जो भ्रन्यत्र मिलना दुलंभ है । जीवन कौ वर्ते- 
मान देन्यता ओर कुरूपता के प्रति विद्रोह की भावना को तीक्न श्रभिव्यक्ति देने के लिए उन्होंने 


नये बिराट्‌ प्रतीकों, लाक्षरिकता-प्रधान वक्र-भंगिमा श्रौर भाषण-कला में प्रयुक्त होने वाली 
भ्रतिशयोक्ति-पुर्ण भाषा का प्रयोग किया । 


“फ्रेंकता हूँ लो तोड़-मरोड़ अरी निष्ठुरे / बीन के तार, 
उठा चॉदी का उज्ज्जल शंख फूँकता हूँ भेरब-हुंकार । 
नहीं जीते-जी सकता देख विशृत में म्ुक्ा तुम्हारा भाल, 
बेदना-मधु का भी कर पान आज उगल्बू गा गरल कराल |?” 
दीन बालकों का भूख श्रोर दूध के लिए चीत्कार सुनकर कबि दर्प से उठकर चल 


पड़ता है :--- 
“हटो व्योम के मेघ पन्‍थ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं, 


दूध-दूध ओ वत्स, तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं ।” 
इस प्रकार अभ्रपने मन की उमंगों और लालसाओं से संघर्ष करते और जन-कल्याण की 
कामना करते हुए 'दिनकर' ने हिन्दी की प्रगतिशील कविता को वर्तमान जीवन कौ कठोर यथाये- 
चेतना का झ्राधार दिया । "कुरुक्षेत्र! में 'दिनकर' की प्रतिभा का पूरा उन्मेष दिखाई दिया। महायुद्धों 
की विभीषिका से पोड़ित विश्व-जनता की व्यापक शान्ति-कामना इस महाकाव्य में प्रतिबिम्बित हुई 
है । 'दिनकर' ने एक युग-द्रष्टा कवि की तरह श्रतीत इतिहास से कुरुक्षेत्र का प्रसंग चुनकर इस 
युग की केन्द्रीय समस्या--युद्ध श्लौर शान्ति--का उद्घाटन किया है। महाभारत की समाप्ति पर 
विजेता धमंराज युधिष्ठिर इतने भयंकर नरसंहार से क्षुब्ध होकर वाण-शेया पर लेटे पितामह भीष्म 
के पास शपने मन में उठने वाली शंकाओ्रों का समाधान माँगने जाते हैं। महाभारत के '“शान्ति-पर्व॑' 
की भी यही कथा है, लेकिन “दिनकर' ने उसे युगानुकुल श्रभिव्यक्ति देकर प्रगतिशील मानवता की 
शान्ति-भावना को ओर अ्रधिक गहरा बनाया । “कुरुक्षेत्र” केवल विचार-विनिमय का महाकाव्य है, 
उसमें दो व्यक्तियों के बीच मानव-समाज की विविध समस्याञ्रों पर, विशेषकर युद्ध और शान्ति 
की समस्या पर, विचारों का श्रादान-प्रदान ही होता है, इसलिए वहाँ रूढ़ श्र्थों में कार्य-व्यापार 
का विकास खोजना व्यर्थ है। बिचारों का श्रादान-प्रदान भाषण-कला की उदात्त भाव-सम्बलित 
तकं-पद्धति से नये प्रतोकों श्रौर चित्र-भाषा द्वारा मूत्त ढंग से होता है। 
“रस सोखता है जो मही का भीमकाय वृक्ष 
उसकी शिराएँ तोड़ो, डालियाँ कतर दो |” 
शान्ति-स्थापन की समस्या पर धर्मराज की शंकाओ्ों का समाधान करते हुए भीष्म भ्रन्त में 


अंग “आशा के ग्रदीप को जलाये चलो घमेराज, 
एक दिन होगी मुक्त भूमि रख-भीति पे, 
भावना मनुष्य की न राग में रहेयी लिंप्त, 
सेक्ति रहेगा नहीं जीवन अनीति से; 
हार ते मनुष्य की न महिमा घटेगी ओर 
तेज न बढ़ेगा किसी मानव का जीत से; 
स्नेह-बलिदान होंगे पाप नरता के एक, 
घरती मनष्य की बनेगी स्वगे प्रीति से |”? 


दिन्दी-कविता का विकास हुं 


“दिनकर' कविता के इस मानववादी प्रगतिशील पथ पर प्राज भी पूरे उत्साह से 
प्रप्नसर हैं ।" 


उत्तर छायावाद-युग 

छायावादी-कविता के पूर्ण उल्मेष के काल में ही देश को राष्ट्रीय चेतना में एक नया 
मसानवतावादी संस्कार होने लगा था । देश की स्वतन्त्रता का लक्ष्य केवल अंग्रेजों की राजनीतिक 
पराबीनता से मुक्ति पाना भर है, या हर प्रकार के श्राथिक, सामाजिक भौर राजनीतिक शोषण, 
भेदभाव झोर प्रन्यायपूर्ण वर्ग-सम्बन्धों का भ्रन्त करके समानता, न्याय और जनतस्‍्त्र के झाधार पर 
एक नए शोषणा-मुक्त समाज श्रौर एक नई मानवतावादी संस्कृति की स्थापना करना है--यह्‌ प्रइन 
सभी लोक-चेता विचारकों को मथित करने लगा था । गाँधी जी के सत्य, भ्रहिसा और राम-राज्य 
के सिद्धान्तों में स्वतस्त्र-भारत के भावी समाज की रूप-रेखा स्पष्ट नहीं हुई थी। मार्क्स प्रवरतित 
इन्द्वात्मसक भौतिकवादी दर्शन ्रौर सोवियत्‌ रूस में पूंजीवाद का भ्रन्‍्त करके एक नये साम्यवादी 
सम्लाज की स्थापना ने इन लोक-चेता विचारकों को मनुष्य की सामूहिक मुक्ति के एक नए मानववादी 
जीवतादआ से प्रेरित करना शुरू किया। सन्‌ १६३४ के लगभग ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टो (जो 
भारत सरकार द्वारा ग्रवेध घोषित कर दिये जाने पर सन्‌ १६४२ तक गुप्त रूप से कार्य करती 
रहो) और कांग्रेल-समाजवादी दल की स्थापना हो गई थी । इन दलों ने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को 
राजनीतिक-प्राथिक गुलामी से मुक्ति पाने के लक्ष्य के साथ-साथ भारतीय सामन्‍्तवाद के भ्रवश्षिष्ट 
चिह्ढों से किसानों को और भारतीय पूंजीवाद से मजदूरों को मुक्त करके एक शोषण-रहित समाज- 
वादी जनतन्‍्त्र कौ स्थापता का लक्ष्य भी भारतीय जनता के सामने रखा। इस तत्त्ववाद और सामा- 
जिक लक्य में व्यक्ति-मानव और सम्रष्टि-मानव के पूंजीवादकालीन दुनिवार अ्न्तविरोध का प्रशमन 
किसी एक के दमन द्वारा नहीं, बल्कि दोनों के हितों की परस्परिता भौर समन्विति द्वारा ही साध्य 
है । भ्रर्यात्‌ मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण खत्म करके एक वर्गहीत समाज सभी मनुष्यों की उन्नति 
झौर विकास के समान साधन जूटायेगा। व्यक्तित शौर समष्टि का अ्न्तविरोध मौलिक नहीं है, 
परिस्यितिजन्य या झ्ौर स्पष्टता से कहें तो वर्ग-समाजजन्य है । इसलिए वर्महीव समाज में झन्ततः 
व्यक्ति का हित समाज का हित होगा झोर समाज का हित व्यक्ति का हित होगा। ऐसे शोषण- 
मुक्त समाज की स्थापना भ्राज सम्भव हो गई है : विश्व-पूंजीवाद ह्ासोन्‍्मुली और संकट- 
ग्रस्त है और अपनी आात्मरक्षा के लिए युद्ध की तेयारियाँ कर रहा है। ऐतिहासिक सत्य की इस 
चेतना ने भारतीय साहित्यकारों को भी नयी प्रेरणा दी। सन्‌ १६३६ में “भारतीय प्रगतिशील लेखक 
संघ की स्यापना हुई । प्रेमचन्द, रवोन्द्रनाव ठाकुर, जोश इलाहाबादी जेसे श्रग्रणी लेखकों झौर 
कवियों ने इस भ्रान्दोलत का स्वागत ही नहीं किया, उसमें भ्रागे बढ़कर भाग भी लिया । 

हम पहले कह चुके हैँ कि सन्‌ १६३५-४० के काल में छायावादी कविता में हासोन्‍्मुखी 


१--इस विवेचन में हम द्िन्दी की हास्प-व्यंग शेली के कवियों और उनकी कविता का अ्रलग से 
उल्लेख नहीं कर सके हैं, यद्यपि बालमुकुन्द गुप्त, दरिशंकर शर्मा, बेदब बनारसी, कान्तानाथ 
पाण्डेय “चॉच”, वेघड़क बनारसी, गोपाल प्रसाप व्यास और अनेक पुराने ओर नये कवियों की 
हास्य-ब्येर-मयी कविताओं की हिन्दी में उमर्थ परम्परा है। इन कवियों ने राष्ट्रीय इश्टिकोण से 
समाज के जीवन में उठने वाले सामयिक प्रश्नों पर अपने ब्यंगों की बोछार से जन-चेतना 
को उद्‌जुद्ध करने में जो योग दिया हैं वह स्वतन्त्र रूप से अध्ययन का विषय है। 


४७ काव्य-धारा 


प्रवुत्तियाँ सुखरित हो उठी थीं। नये कवियों में व्यक्तिवादी चेतना व्यापक लोक-मंगल कौ दृष्दि 
शोर श्राशा और उल्लास की भावना छोड़कर श्रात्म-निष्ट श्रोर निराशावादी होती जा रही थी । हम 
यह भी देख चुके हें कि 'पन्‍्त', “निराला, 'तवीत', 'दिनकर' श्रादि श्रेष्ठ कवियों में नये सामाजिक 
श्रादर्श से प्रेरित प्रगतिशील भावनाझं श्रौर विचारों की श्रभिव्यक्ति भी होने लगी थी । प्रगतिशील 
श्रान्दोलन ने इस नये उत्थान की प्रक्रिया को नयी स्फूरत और गति प्रदात की । उत्तर-छायावादी- 
युग सें भ्रन्य भ्रनेक तरुण-कवि प्रगतिवाद-प्रेरित नये जीवनादर्श श्लौर जन-मंगल के उत्साह भरे गीत 
गाते हुए सासने श्लाये । इनमें नरेन्द्र शर्मा तो थे ही, शिवमंगलसिह, “सुमन, फेदारनाथ श्ग्नरवाल, 
त्रिलोचन, नागार्जुन, रांगेय राघव श्र रामदयाल पाण्डेय प्रमुख थे। श्रनेक छायावादी ढरें के तरुण 
कवियों--शस्भूनार्थासह्‌ “रसिक' विद्यावती 'कोकिल' श्रादि--में प्रगतिशील विचारों की श्रनुगूज 
सुनायी दी । गांधीवादी कवियों--सोहनलाल द्विवेदी, सुधीन्द्र श्रादि--श्रादि--ने भी नये विषयों पर 
कविताएं लिखीं । यहाँ तक कि व्यक्ति-चेतना से श्राक्रान्त श्रनेक प्रयोगवादी कवि--गिरजाकुमार 
माथुर, गजानन माधव '“मुक्तिबोध', नेमिचन्द जेन, भारतभूषरा श्रग्नवाल, शमशेरबहादुर सिंह, प्रभा- 
कर माचवे, रामविलास शर्मा श्रादि - भी प्रगतिशील धारा से श्रप्रभावित न रह सके, और उन्होंने 
नई पीढ़ी के तरुण प्रयोगशील कवियों को भी स्वस्थ और ठोस विचार-वस्तु देने की प्रेरणा दौ-- 
विशेषकर गिरिजाकुमार माथुर की रचनाश्रों में रूपगत प्रयोग नई श्रौर स्वस्थ विचार-वस्तु की अ्रभि- 
व्यंजता के साधन बने । दूसरे महायुद्ध के पाँच-छे वर्षों के बीच हिन्दी में प्रगतिशील कविता का ही 
सर्वाधिक जोर रहा । उस समय ऐसा लगता था कि इन महान्‌ सामाजिक श्रादशों की प्रेरणा हिन्दी- 
काव्य में एक ऐसा युगान्तर उपस्थितकर रही है जिसका पूर्ण उन्मेष छायावादयुग की तरह ही झनेक 
महान्‌ प्रतिभाश्रों के प्रस्फुटन से महिमाशाली ध्षनेगा। लेकिन तरुण प्रगतिशील कवि स्वतन्त्र रूप से 
किसी नए काव्यादर्श का श्रभी सम्यक्‌ विकास भी न कर पाये थे कि उन्होंने राजनीतिक दलबन्दी 
की मतवादी और साम्प्रदायिक संकीणंताशं में पड़कर अपनी काव्य-प्रतिभा को स्वयं ही कुंठित कर 
डाला । इस बीच, और विशेषकर स्वतनन्‍्त्रता-प्राप्ति के बाद, राजनीतिक दलों की स्पर्धा श्रौर परस्पर 
विरोध ने राष्ट्रीय-जीवन की स्वाधीनता-संग्राम के दिनों वाली एकता को विच्छिन्न कर दिया था, 
जिससे विभिन्‍न राजनीतिक दलों में बेटे हुए इन सभी कवियों का राष्ट्रीय-जीवन से एक प्रकार से 
विच्छेद-सा हो गया । भावना की समग्रता पुनः विश्युंबलित हो गई भ्रौर कवि भ्पने दलगत विचारों 
की श्रनुभूतिहीन विवृत्ति करने लगे । इस बीच कोई ऐसी महान्‌ प्रतिभा का नया कवि नहीं पैदा 
हुआ जो इन दलगत संकीर्णताओों के घेरे को तोड़कर समग्र-भाव से युग-जीवन की नई प्रगतिशील 
चेतना झौर सत्य को सार्वदेशिक और सार्वजनीन स्वर में कलात्मक पअ्रभिव्यक्ति देता। युग-सत्य 
नहीं बदला है, केवल उसका बोध तत्काल मलिन और खंडित हो गया है। इसके लिए विपरीत 
परिस्थतियों से भ्रधिक इन तरुण प्रगतिशील कवियों की भ्रसामर्थ्य श्रौर श्रसंवेदनशीलता ही उत्तर- 
दायी है, जो उन्हें सत्य की उपलब्धि नहीं होने देती, और संकीर्ण प्यों पर भटका देती है । 
उत्तर-छायावाद-युग की दूसरी धारा हिन्दी की वह कविता है, जिसमें व्यक्तिबाद की परिणति 
घोर श्रहंवादी, स्वार्थप्रेरित, श्रसामाजिक, उच्छु खल और असन्तुलित मनोवृत्ति के रूप में हुई है । इस 
कबिता का शायद श्रभी तक श्रन्तिम रूप से नामकरण नहीं हो पाया है, इसी लिए प्रयोगवादी, प्रतीक- 
वादी, प्रपद्मययादी या नई कविता--इन अनेक नामों से इसे पुकारा जाता है। प्रथम-युद्धोत्तरकालीन 
पाइ्चात्य कविता में जिस तरह का व्यक्तिवाद श्रनेक साहित्यकवादों ्रौर प्रवादों की दुहाई देता हुआ 
ह्यक्त हुआ और उसने काव्यकी भाषा, वस्तु-विन्यास और व्यंजनामें जैसे विचित्र बोद्धिक प्रयोग किए, कुछ 


हिन्दी-कविता का विकास ४५ 


उससे मिलती-जुलती या प्रभावित हिन्दी को तयाकथित प्रयोगवादी कविता भी है । इस कविता में रागा- 
त्मक सारण से नये प्रर्य की सुष्टि करके मानव-भावना का संस्कार झ्रौर चेतना का विस्तार करने का प्रयास 
. नहीं है, बल्कि मनुष्य के जीवनबोघ को ही खण्डित झौर विकृत बनाना इसका सहज उद्देश्य दीखता है। 
. प्रयोगशोलता का झ्ाडम्वर तो केवल सम्राजद्रोही भावनाझ्रों प्रौर जीवनके प्रति घोर भ्रनास्या, फुंठा भौर 
_ विद्रूपात्मक उद्‌गारों को एक दुरूह संकेतात्मकू भाषा, श्रस्वाभाविक प्र॒लंकार-योजना झ्ौर भ्रहंवादी 
झौर बहुघा ग्रोछेतल की वचन-मभंगिमा में छिपाने का उपक्रम मात्र है। “झज्ञेय' झ्ौर उनके समान- 
._ घर्मा दूसरे मध्यवर्गो बुद्धिजीवी भ्रपतोी व्यक्ति-चेतना से इतने झ्राऋान्त रहे हें कि वे सामाजिक-जीवन 
के साथ किसी प्रकार के सामंजस्य की कल्पना ही नहीं कर सकते | इस एकान्तिक श्रहंनिष्ठा ने इस 
._ थर्ग के कवियों को प्रत्यन्त 'सेल्फु कान्शस' ओर तुनुक मिज्ञाज बना दिया है भ्रौर चूंकि समाज के 
बीच रहकर हो वे जीवत-यापन करते हें, इसलिए उनको समाजद्रोही भावनाएं झोर जान-बूमकर 
साहित्य भ्लोर जीवन के मूल्यों का विघटन करने की चेष्टाएं लोकचेता श्रालोचकों शोर सहृदय 
पाठकों को कड़ी निन्‍दा को भाजनं बनती झाई हें । इन कवियों की कविताओं में बहुधा इन निन्‍्दाओं 
और झालोचनाझों के संकेत रूप में उत्तर दिए जाते रहे हें भ्लोर श्रपती असमर्थताओों श्रौर दु्बंल- 
ताप्मों का झ्ोचित्य सिद्ध किया जाता रहा है। “अज्ञेय' को कविताओं में अपराथी मनोवृत्ति से को 
गई ऐसी प्रात्मरक्षात्मक भ्रभिव्यक्तियों की बहुलता है । साधारणतया प्रयोगवादी कविताओं में एक 
दयनोय प्रकार की मुंकलाहट, खीक, कुंठा, किश्लोर ओद्धत्य और हीन भाव ही व्यक्त हुआ्ना है, जो 
कवि के व्यक्तित्व को प्रमारितत करने का नहीं, खण्डित करने का मार्य है। महान्‌ कविता का जन्म 
सारे संसार को, सम्राज को, जीवन के प्रगतिशील भझ्रादशों श्लौर नेतिक भावनाञ्रों को एक उहृण्ड 
झौर छिछोरे बालक को तरह मुह बिचकाने से नहीं होता । सामाजिक बन्धनों के प्रति व्यक्तिवादी 
प्रतिवाद का यह तरीका स्वांग बनकर ही रह जाता है। झ्राजकल बड़े संगठित रूप में प्रयोगवादी 
कविता को हिन्दी की नई श्र श्रेष्ठार कविता सिद्ध करने का प्रयत्न चल रहा है । तर्क दिए जाते 
हैं कि उसके झालोचकों में या तो इस कविता को समभने की सामर्थ्य नहीं है या फिर वे झपने 
रूढ़िपस्थी दृष्टिकोण के कारणा इस नये उत्थान का स्वागत नहीं कर पाते। छायावाद के आरम्भ 
में ग्राचार्य शुक्ल भी ऐसा नहीं कर पाए थे। इतिहास की पुनराबृत्ति हो रही है। लेकित इन 
कवियों की प्रात्म-प्रवंचना झौर उनके इतिहास-ज्ञान की शून्यता स्वतः सिद्ध है। 'परिमल' और 
श्वल्लव' को कविताओं की सांस्कृतिक चेतना और व्यापक सामाजिक दृष्टि में उच्चतर जीवन- 
मूल्यों के प्रति एक सहज भ्रास्था थी । उसमें मनुष्य के प्रेम भोर सोन्दर्य को पुनीत भावनाझ्रों को 
खिल्‍ली नहीं उड़ाई गई थी, न मनुष्य को पशुता को गोरवान्वित किया गया था, जिस तरह भश्रज्ञेय 
ने अपनी कविता “माहीवाल से' में किया है । 

“क्रोँंच बेठा हो कभी वलमीक पर 

तो मत समझक-- 

वह अनुष्टुप बाँचता हे ध्ंग्रिनी के स्मरण के-- 

जान ले वह्ट दीमकों की टोह् में हे ।' 
४ यह ठीक है कि प्रयोगवादी कविता में यत्र-तत्र भ्रच्छे भाषा-प्रयोग भी मिलते हैं; लेकिन 
.. उसका अन्‍्तरंग इतना खोखला है कि ऊपर की सारी चम-दमक और पालिश पाठक के मन में भी 

व्यर्यता का भाव ही जगाती है । 

। हिन्दी कविता से समग्र इतिहास को दृष्टि में रखकर हम प्रनिवार्यतः इस परिणाम पर 


४६ काव्य-धारा 


पहुँचते हैं कि प्रयोगवादी कविता कोई नया उत्थान नहीं है; बल्कि छायावादी कविता के ह्लास का 
ही बिकृति-रूप है, भोर हिन्दी की विशाल काव्य-धारा में प्रयोगवादी कबियों की देन श्रभी बूंद के 
समान ही है । ह 

स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद श्रनेक नए कवि पुनः प्रगतिशील सामाजिक भावनाश्रों को अ्रभि- 
व्यक्ति देने की दिशा में श्रागे बढ़े हें । वे सच्चे भ्रर्थों' में प्रयोगशील भी हैं; क्‍योंकि वे श्रपने नये 
जीवन-बोध को भ्रनुभूति को मूत्त भ्रभिव्यक्ति देने के लिए भाषा, शेली और छल्दों में नये प्रयोग भी 
कर रहे हें इनमें भवातरी प्रसाद मिश्र, नीरज, रंग, शील, वीरेन्द्र मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिह, गोपाल- 
कृष्ण कौल, शेष, सर्वेब्वरदयाल सक्सेना, चिरंजीत, नामवरसिह, रमानाथ श्रवस्थी, देवराज “दिनेश 
झौर 'त्यागी' झ्रादि के नाम उल्लेखनीय हैं । 

हिन्दी-काव्य के नये उत्थान श्रौर उसके हारा नये जीवन-मूल्यों के निर्माण की श्राशा, 
सामूहिक मुक्षित के विकास्त के श्रादर्श को एक व्यापक सार्वजनीन सांस्कृतिक चेतना के रूप में अ्रपनी 
श्रात्मा का शनुभूत सत्य बनाकर वाणी देने पर ही निर्भर करती है। यह कार्य भविष्य का कोई 
युगद्रष्टा कवि ही कर सकेगा । किन्तु मनुष्य की सामूहिक प्रगति में विश्वास लेकर चलने वाले 
इन तरुण कबियों का प्रयास उस श्रागामी उत्थान की ही पीठिका तेयार कर रहा है। 


डा० सत्येन्द्र 


कवि ओर काव्य 


काव्य के सम्वन्ध में कोई भी निएइ्चयात्मक भ्रभिमत देना सरल नहीं । ब्रह्म की भाँति काव्य 
के सम्बन्ध में भी विविध मत हें भ्रोर वे परस्पर भ्रत्यन्त भिन्‍न हें । इस सतभेद के दो छोर हें--एक 
छोर पर वे विद्वान्‌ प्राचायं हें जो काव्य को ब्रह्म; उसके भ्रानन्द को ब्रह्मानन्द भ्रयवा ब्रह्मानन्द सहो- 
बर मालते हैं । इनके लिए काव्य शाश्वत है; युग-युग में सत्तावान । 

दूसरे छोर पर वे लोग हें जो काव्य को कार्य-कारण की परम्परा का परिणाम मानते हैं, जो 
इसका केवल ऐतिहासिक महत्त्व स्वीकार करते हैं, ऐसे लोगों में एक सम्प्रदाय उन लोगों का भी है 
जो यह मानते हें कि इस व्यवसाय-युग में गद्य को प्रधानता रहेगी भ्रौर काव्य धीरे-धीरे समाप्त हो 
जायगा । 

और इन दोनों छोरों के बीच में भ्रनेकों प्राच्य भर पाइचात्य जाति के संप्रदाय हें जिनमें--- 
झलंकारवादी, वक्रोक्तिवादी, रीतिवादी, रसवादी, ध्वनिवादी, भ्रभिव्यंजनावादी, कलावादी, छाया- 
बादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादो, भ्रावि हें । 

अ्लंकारवाद, वक्रोक्तिवाद, रीतिवाद, रसवाद, ध्वनिवाद प्राच्य सम्प्रदाय हें। भारतीय 
ध्रालोचक भ्ोर विचारक इन्हें उपेक्षा को दृष्टि से नहीं देख सकता । भ्राधुनिक-युग में नयो भ्रालो- 
चना दृष्टि पाकरं भी उसे इस प्राचीन परम्परा की श्रोर संकेत करना ही होता है । क्योंकि प्राच्य 
हो चाहे पाइचात्य काव्य-रचना में भ्रलंकार किसी न किसी रूप में श्राते ही हें--वक्रोक्ति श्रोर रीति 
तथा ध्वनि और रस भी किसी न किसी भाँति कविता में स्थान पा ही जाते हें । 

शेष नये सम्प्रदाय पाइचात्य प्रणाली श्रोर विचारधारा के सम्पर्क से प्राप्त हुए हें । श्राज भो 
#कविता' नाम से रचलाएँ होती हें। श्राज भी कविता श्रोर काव्य पर आलोचनाएँ झोर विचार लिखे 
जाते हें, यह सत्य है; और वेदों में भो काव्य है, ऐसा लोग मानते हें ।॥ तब सबसे बड़ा झ्राइचर्य यहां 
प्रस्तुत होता है । वेदों से लेकर भ्राजतक काव्य को धारा प्रवाहित होती चली झ्रायी है। वेद भरी 
काव्य है, रामायणा भी काव्य है, कालिदास का मेघदूत भी काव्य है, चन्द का पृथ्वी राज रासो, कबीर 
को साल्नियां, तुलसी का रामचरित, सूर के पद, बिहारी के दोहे, भूषण के कवित्त, गिरधर कविराय 
की कुंडलिया, प्रसाद जी को कामायनी, गुप्त जी का जयभारत, पन्‍त जो का पल्‍लव, निराला जी 
का कुकु रमत्ता, गोपालप्रसाद व्यास का 'एजी कहूँ कि भ्रो जो कहूँ-सभी काव्य संज्ञा से अ्रभिहित 


. होते हूँ । भ्राज सास्तिक पत्रों में साप्ताहिकों श्ोर देनिकों में भी काव्य के दर्शन हमें होते हें । 


* इस समप्नस्त ऊहांपोह से एक तो सत्य यह प्रकट होता है कि काब्य की एक परम्परा है-- 


.._ एक पुष्ट परम्परा है। परम्पराझ्रों का जहां बोझ हमें ढोना होता है, वहाँ उनसे कुछ महत्त्वपूर्ण तत्त्व 


| 
| 


भी प्राप्त होते हें । परम्परा के द्वारा हमें वे भ्राधारभूत तत्त्व ज्ञात हो जाते हैं जिनसे काव्य का 


४८ काव्य-घारा 


स्वरूप निर्मित होता है। इस समस्त स्वरूप-निर्माण का एक फल तो निश्चय ही होना चाहिये कि 
उसके स्वरूप के साथ किसी भी युग में कोई खिलवाड़ नहीं की जा सकती । 

काव्य-रचना प्रत्येक युग में हुई है, और प्रत्येक युग में एक नहीं श्रनेकों व्यक्ति हुए हैं, 
किन्तु उन सबमें से कुछेक को ही 'कवि' होने और काव्यकार होने को सम्मान मिल सका है। 
भवभूति ने काव्य की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में दो बातें लिखीं-- 

१--पृथ्वी बहुत लम्बी-चोड़ी है, यदि काव्य में कुछ काव्यत्व है तो एक स्थान पर नहीं तो 
दुसरे स्थान पर उस काव्य की प्रतिष्ठा हो सकती है । 

२--समय श्रनल्त है, यदि भ्राज नहीं तो कल प्रतिष्ठा मिल सकती है । 

इन दो कारों से भवभूति बहुत श्राश्वस्त था । उसे श्रपनी प्रतिभा में विश्वास था । किन्तु 
झाजतक लिखे जाने वाले श्रग सित काव्य नामक प्रंथों में से केवल कुछेक ही छंट कर ऊपर झा 
सके । इससे यह सिद्ध है कि पृथ्वी की विशालता श्रौर समय की श्रनन्तता भी प्रत्येक कवि के लिए 
सहायक नहीं होती, केवल प्रतिभाशाली ही वह सम्मान पा सकते हें। श्रतः जहाँ तक युग-युग का 
प्रझन है श्राज के श्रालोचक और विचारक को भयभीत होने की श्रावश्यकता नहीं क्योंकि जिन रच- 
माश्रों से श्राज वह क्षुब्ध है, वे सम्भवतः काल पर विजय नहीं पा संकेंगी, समय अ्रपनी तराजू में 
उन्हें तोलकर थोथा समऋ कर एक शोर फेंक देगा । 

पर, आलोचक ओर विचारक अपने युग में भी रहता है, और युग के सुजन-कर्म से उसका 
झौर उसके दायित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह यूग को समझना चाहता है, भ्रपने युग को सम्भला 
हुआ देखना चाहता है, भोर उसे सम्भालने की और भी प्रयत्नशील रहना चाहता है-फिर वह यह 
भी सोचता है कि वह ऐसे युग में ही जन्म लेने वाला सिद्ध हो जिसमें उच्च प्रतिभाएं हुई हें। क्‍यों 
न उसके भ्रपने युग में ही कालिदास-शेक्सपीयर गेठे जंसी प्रतिभाएं उत्पन्न हों जो काल-चक्र में पिस 
न सकें, काल के चंगुल से बची रहें । श्रालोचक तथा विचारक की ये सभी भावनाएं महत्‌ हैं, इसी 
लिए वह अ्रपने युग का पर्यवेक्षण करता है। इस पर्यवेक्षण से उसे विदित होता है कि काव्य-क्षेत्र 
में कहीं कोई भारी श्रम, श्रभाव या अ्रसमर्थता है। 

प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में कुछ भ्रम भ्रवश्य है । बतंमान काल में इतने विवाद और 
बाद हें कि भ्रम होना अस्वाभाविक नहीं । 

सबसे सौलिक भ्रम काव्य के विषय में यह है कि वह 'रूप' (फोम) को महत्त्व दे या “वस्तु 
(मटर) को ही या दोनों को समन्वित रखे । “तथ्य' को महत्त्व दे या सत्य को, या दोनों को ॥ पूर्व 
को महत्त्व दे या पश्चिम को, या दोनों को । परम्परा में चले, या स्वच्छुन्दता को श्रपनाये, या दोनों 
को । बुद्धिवादी हो या हृदयवादी या दोनों का समस्वय करे, पदार्थवादी दृष्टिकोण से चले या अरध्या- 
त्मवादी दृष्टिकोण से या दोनों का समन्वय ढूंढे, श्रादि-आ्रादि ! 

भ्राज का युग है ही संघर्ष का युग--तभी सेथिलीशरण गुप्त ने इसे “'द्वापर की संक्ञा 
दो। किन्तु भ्रम श्राज के युग में ही हो ऐसा नहीं, प्रत्येक युग में क्रम की स्थिति किसी-न-किसी 
रूप में अवश्य रही है। फलतः भय भ्रम का नहीं श्रम से ग्रस्त होने का है। भ्रम-प्रास से बचा जा 
सकता है-ज्ञान के प्रकाश से । किसी भी पहल्‌ श्रथवा पक्ष को कवि अ्रपना सकता है, किन्तु उसमें 
उसे बहुत ईमानदार रहने की झावश्यकता है, श्रोर उस पक्ष से ज्ञान के बलपर तादात्म्य स्थापित 
करने की भ्रावश्यकता है। बिना विषय श्रथवा वस्तु से श्रर्थात्‌ वर्ण्य से तादात्म्य हुए काव्य भ्रमरहित 
नहीं हो सकता अंग्रेज़ी में कहा गया है। '709797708 75 3078 इसी को शझपने यहाँ भी 


कवि और काव्य ४६ 


बताया गया है--“जानत तुमहि-तु्माहि होइ जाई--तत््वमसि' ज्ञान का ही परिणाम है। भ्रतः 
विषय भ्रयवा वस्तु का निश्चंम् ज्ञान ही कवि को भ्रम-प्रास से बचा सकता है। हमें प्राधुनिक काव्य 
के भ्रध्ययन-मनत से यही देखना होगा कि कितने ऐसे कवि हें जो ययार्य में विषय-बस्तु के ज्ञान से 
तादात्म्य प्राप्त करके लिख रहे हें---केवल दादुरावृत्ति ग्रववा श्रुगाल-रोदन नहीं कर रहे । बिना 
तावात्म्य के निजी प्रनुभूति का भ्रभाव रहेगा। अनुभूति-हीन काव्य श्रम-प्रस्त होगा, काव्य नहीं 
कहा जा सकेगा, ओर झानन्व के स्थान पर विषाद और दिग्श्रम पैदा करेगा । इस बौद्धिक युग में 
यह प्र॒त्यन्त आवश्यक है कि इस तावात्म्य-प्राप्ति के लिए उचित ईमानदारी अपने कवि-कर्म के 
विषय में हो । 'ईमानदारी' साथना मार्ग है, ज्ञान उसका ज्ञातव्य है और तादात्म्य प्राप्तव्य है । 
तावात्म्य प्राप्त होते पर कवि सिद्ध कवि हो जायगा | प्रत्येक सिद्ध कवि का अपने विषय के साथ 
निद्चिचत तादात्म्य मिलेगा । यह किसी भी काव्य की परीक्षा से देखा जा सकता है। 
... भ्रम ही नहीं शभ्रभाव भी दिखायी पड़ता है। भ्रमभाव है काव्य के रूपों के भ्रस्थास का । भ्रम 
की स्थिति का पता सहज ही नहीं लगता। किन्तु काव्य के रूपों के अभ्रम्यास के भ्रभाव का पता तुरन्त 
लग जाता है। प्रत्येक विषय या वस्तु जब काव्य का रूप ग्रहण करती है, तब वह भ्रपना एक निजी 
रूप प्रहणा करती है । इतते प्रकार के छन्‍्दों का निर्माण, इतने काव्य-रूपों का सुजन इसी भ्रावश्य- 
कता के कारणा हुआ। झ्राज भी जो नए काव्य-रूप खड़े हो रहे हैं उनमें भी यही मर्म व्याप्त है । हमारे 
भ्रषिकांश आधुनिक कवि इस मर्म से श्रपरिचित हैं। फलतः न तो बर्थ्य-विषय-बस्तु से उनका तादात्म्य 
हुआ है; न रूप का ही ग्रम्यास । यदि वर््य-वियय-वस्तु से तादात्म्य कवि का न हो, किन्तु उस्ते यह 
साधारण ज्ञान हो कि किस रूप में कंसा विषय समा सकता है भौर उस रूप का अ्रम्यास करके 
उसमें विषय को अ्भिव्यक्त करे तो भी वह कवि की संज्ञा का श्रधिकारी हो सकता है । 

भ्राज हमें देखने को यह मिलता है कि रूप का अभ्यास तो किड्चित भी नहीं। प्रयोग प्रत्येक 
युग में होते हैं, प्रयोग प्रयोग के सिद्धान्त के श्राधार पर भी हो सकते हें, किन्तु प्रत्येक प्रयोग के लिए 
कवि में एक ईमानदारी और निश्चंमता तो श्रनिवार्य है। क्‍योंकि विषय भ्रथवा वस्तु के साथ प्रयोग 
का प्रइन झ्रा ही नहों सकता । प्रयोग तो रूपों में ही हो सकता है । कारण स्पष्ट है कि विषय-वस्तु 


: बह कैसी ही हो उद्घाटित हो सकती है, वह प्रयोग का विषय नहीं हो सकती । हाँ, उसके प्रेषण का 


सराध्यम कवि की अपनी वस्तु है। उसमें वह प्रयोग कर सकता है । फलतः प्रयोगवादी के लिए “रूप 
की सत्ता' ही प्रधान है । ऐसा प्रयोगवादी' “भ्रस्तित्ववादी' “ऐग्ज्नस्टेंशियलिक्ष्म' में विश्वास रखने वाले 
की तरह रूपसूष्टि को महत्त्व प्रदान कर सकता है, किन्तु उस दक्षा में उसे इस रूप-ज्ञान के विषय में 
भी निम्नंम होते की भ्रावश्यकता होगी। रूप का सम्बन्ध भ्रक्षर, भ्रक्षर के वर्ण [घ्वनि के रूप, रंग, प्रभाव 
को वर्ण कहेंगे], वर्णों की व्यवस्था [संस्कृत-शास्त्र की रीति], वर्ण समुच्चयः शब्द की सत्ता, उनके प्र्थ 
और अ्र्थयों ओर शब्दों के भ्रक्वर स्वरूप के प्राणा-ध्वनि, उनमें विद्यमान अर्य तथा ध्वनि की गति, 
शब्दों से निर्मित वाक्य, वाक्य की स्फोट-शक्ति---इन सबका जबतक ईमानदारी से सहज ही निर्श्नंम 
ज्ञान प्राप्त कर वह इनसे तादात्म्य प्राप्त नहीं कर लेता, वह रूप-सृष्टि कंसे कर सकता है ? ओर 
कंसे वह प्रयोग का कर्ता माना जा सकता है । फलतः श्राज के कवि को यह सिद्ध करके दिखाने 
की झ्ावश्यकता है कि वह कवियों को दीर्घ परम्परा में भ्रागे की कड़ी है, यों ही कुछ विश्युंखलित 


। . वस्तु नहीं । 


काव्य एक सामाजिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक परम्परा की देन है भ्रौर प्रत्येक वेश-काल में 


बह इसी अनुकूलता के साथ फलता-फूलता है और कल्याणकारी होता है। नयी उद्‌भावनाएँ, नये 


४० काव्य-धारा 


उन्मेष, नूतन सुजन उधार लिए हुए और थेगरी के रूप के नहीं हो सकते, वे परम्परा के बीजों में 
होने वाली देश-काल को नयी रसायन के फल होते हैँ। हमारी कोई भी श्रभिव्यक्ति मात्र व्यक्तिगत 
नहीं हो सकती, उसका एक घनिष्ठ सामाजिक मूल है क्योंकि व्यक्ति श्रत्यंत व्यक्तिगत हो जाने पर 
समाज के लिए मृत हो जाता है; मृत की श्रभिव्यक्षित कल्याण नहीं कर सकती, वस्तुतः तो व्यक्ति 
इतना व्यक्तिगत होते ही या तो श्रात्मघात कर लेगा या समाज से सम्बन्ध विछिन्न करने की स्थिति 
वाला व्यक्ति बन ही नहीं सकेगा । फलतः काव्य के किसी भी सुजन को “व्यक्ति---सत्ता के तर्क 
पर नहीं तोला जा सकता प्रत्येक व्यक्ति अपनी पृष्ठभूमि की भूमिका से पुथकु खड़ा होने की 
कल्पना कर हो नहीं सकता । फिर कोई भी “रूपसूष्टि' परम्परा से श्रामूल विच्छिन्न कंसे हो सकती 
है । श्राज हमारे कवि को उस समस्त परम्परा को हृदयंगम करके ही काव्य का कोई शब्द उच्चारण 
करना चाहिए । किन्तु, यह सामर्थ्य सभी में न होती है; न हो सकती है । यही कारण है कि श्राज 
का कवि किसी एक क्षरिक भाव के उद्भास को ही बहुत श्रधिक महत्त्व प्रदान करके उसे नूतन 
सृष्टि कहने के लिए श्रागे बढ़ता है, या शब्द-योजना की किसी श्रद्भुत प्रणाली की परिकल्पता से 
मुदित होकर उसे एक देन के रूप में श्ाग्रह से प्रस्तुत करने को व्यग्र हो उठता है। फलतः सृष्टा की 
शक्तियाँ बिखर जाती हैं । 

हिन्दी के कबि का श्राज विद्येष दायित्व है। उसे हिन्दी भाषा की सम्पत्ति को ही समृद्धि 
नहीं करना, भारतीय-भाव-सम्पत्ति को समृद्ध करना है ओर विश्व में उसकी चमक को श्रद्वितोय 
सिद्ध करना है ? यह केवल वाग्जाल या भ्रम में भटकने से नहीं हो सकता । इसके लिए कवि-कर्म 
के योग्य निष्ठा की श्रावश्यकता है, प्रतिभा उनमें है इसे माना जा सकता है । 


काव्य की रागात्मकता ओर बोद्धिक प्रयोग 


सबसे पहले भाव-तत््व और काव्यानुभूति के बुद्धिगतत सम्बन्ध को लीजिए। काव्य 
के विषय में भ्लोर चाहे कोई सिद्धान्त निश्चित न हो, परम्तु उसकी रागात्मकता श्रसंदिग्घ 
है। इसे पौरस्त्य भौर पाश्चात्य दोनों ही काव्य-शास्त्र निर्श्रान्त रूप से स्वीकार करते हें । कविता 
सानव-मन का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती है । यह एक विश्वजनीन सत्य 
है, भौर कविता की यही चरम सार्यकता है। ससय-समय पर बुद्धि और राग में थोड़ी-बहुत प्रति- 
योगिता रही हो वह दूसरी बात है, परन्तु कभी भी बुद्धि को रांग के स्थान पर काव्य का प्राणतत्त्व 
होने का सोभाग्य प्राप्त नहीं हुआ । जब कभी बुद्धि-तत्त्व राग-तत्त्व के ऊपर हावी हुआ है, काव्य- 
तत्त्व भी उसी प्रनुपात से क्षीण हो गया है । काव्य का यह मापदंड छोटे-बड़े सभी कवियों के विषय 
में लागू रहा है । दांते, तुलसी, मिल्टन, प्रसाद जिस किसी कवि ने भी बोद्धिक तत्त्व के प्रति पक्षपात 
दिखाते हुए राग की उपेक्षा की है, काव्य के पारखी ने तुरन्त ही उसके बुद्धि-वेभव की प्रशंसा करते 
हुए भी काव्य-गुणा की क्षीणता का निर्णय दे दिया है। इसका निषेध करने का साहस टी० एस० 
इलियर में भी नहीं है । काव्य की सार्यकता इसी में है कि वह राग को संवेदनीय बनाये; बोद्धिक 
तत्त्व को संवेदनीय बनाना काव्य का काम नहीं है। शक्ति का साहित्य भ्रयवा ललित साहित्य 
वस्तु के साहित्य से इसी बात में मूलतः भिन्‍न हैं । यह श्रन्तर, जब तक काव्य का श्रस्तित्व है तब 
तक बना रहेगा, इनका तिरोभाव होने से काव्य के प्रस्तित्व पर ही भ्राघात होता है। प्रयोगवादी 
कवि ने नवीनता की रोक में इसी मूल सिद्धान्त का तिरस्कार कर काव्य के मर्म पर चोट की है, 
झौर इसका परिणाम यह हुआ कि उसकी रचना प्रायः काव्य नहीं रह गई है, उसमें मन को स्पर्श 
भ्रथवा चित्त को द्रवित करने फो शक्ति नहीं रही । दूसरे शब्दों में उसमें रस का भ्रभाव है । पहले 
तो उसका भ्रर्य ही हाथ नहीं पड़ता श्र यदि दिमाग्र को खुरच कर उसका श्रर्य निकाल भी 
लिया जाय तो पाठक के मन॒ का प्रसोदन नहीं नहीं होता, श्रौर उसे एक प्रकोर की खीऋ-सी 
होती है।. 
प्रयोगवादी कवि का दूसरा श्राग्रह है उपचेतन की उलकी हुईं संवेदनाओं का ययावत्‌ 
चित्रण । यहाँ भी वह एक भयंकर मनोव॑ज्ञानिक त्रुटि करता है। भ्रन्तचेंतन की संवेदनाएँ प्रायः 
सभी उलभी होती हैँ । कला या काव्य की सार्यकता ही यह है कि वह उस भ्ररूप को रूप देता है, 
उलभे हुए संवेदनों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। फ्ोचे के सिद्धान्त में थोड़ा भ्रतिवाद 
मानते हुए भी इस बात का विषेध नहीं किया जा सकता कि सहजानुभूति से पूर्व भ्रनुभव का स्वरूप 
..._ संबेदनाओं को गुत्यियों से भिन्‍न नहीं है। कवि में सहजानुभूति की शक्ति जन-साथारण की भपेक्षा 
" प्रधिक होती है। प्रतएव जन-साधारण जिन उलमभे हुए संवेदनों का भ्रनुभव भर करके रह जाता 


श्र काव्य-्धारा 


है, कवि उनकी सहजानुभूति कर उन्हें रूप दे सकता है। यही मौलिक कवि-कर्म है, भ्रौर इस्तीलिए 
एक प्राकृतिक श्रावश्यकता के रूप में कविता का उद्भव हुभ्रा । परन्तु प्रयोगवादी श्रपने मन की 
उलभी हुई संवेदनाओं को यथावत्‌ श्रर्थात्‌ उसी उलभे रूप में उपस्थित करने के लिए उलदे-सीधे 
प्रयत्न करता हुझ्ा अ्रभिव्यंजना के मूल सिद्धान्त का ही तिरस्कार करता है। वास्तव में उसके 
प्रयत्न की श्रनिवार्य श्रसफलता ही उसके सिद्धान्त की अ्रसंगति का श्रकाट्य प्रमाण है । 
साधारणीकरण की पुरानी प्रणालियों के रुद्ध हो जाने की बात भी काफी विचित्र है । 
प्रयोगवादी की सफाई है कि साधारणीकरण की पुरानी प्रणालियाँ श्राज के जीवन की श्रति- 
हाय उत्तेजना को वहन करने में भ्रसमर्थ है । नई प्रणालियों की उद्भावना अ्रभी नहीं हुई, इसलिए 
कवि श्रपने श्रर्थात्‌ व्यक्ति के भ्रनुभूत को सहृदय समाज का श्रनुभूत बनाने में श्रसमर्थ रहता है । 
परन्तु यह बात नहीं है। कवि नवीन प्रयोगों को धुन में साधारणीकरण के मूल सिद्धान्तों का ही 
निषेध रहता है। वास्तव में साधारणीकरण शैली का प्रयोग न होकर एक मनोवैज्ञातिक प्रक्रिया 
है जिसका मूल आधार है--मानव-सुलभ सह-श्रनुभूति । इसमें सनन्‍्देह नहीं कि श्राज का जीवन 
विगत जीवन की श्रपेक्षा कहीं श्रधिक उलभझा श्रौर पेचीदा हो गया है और सानव-मन की प्रवृत्तियाँ 
भी उसी शअ्रनुपात से निविड़ एवं जटिल हो गई हैं। फिर भी साधारणीकरण के सिद्धात्त में इससे 
कोई शअ्रन्तर नहीं श्राता क्योंकि कवि मन की निविड़ता के साथ सहृदय के मन की निबिड़ता भी तो 
उसी श्रनुपात से बढ़ गई है। जिन परिस्थितियों ने कवि के मन को प्रभावित किया है उन्होंने 
सहृदय के मन पर भी प्रभाव डाला है। श्रतएवं कबि और सहृदय के मानसिक धरातल में एक- 
सा परिवत्तंन होने के कारण साधारणीकरण की स्थिति वेसी ही रहती है; परन्तु वास्तविकता यह 
है कि कवि साधारणीकरण का प्रयत्न ही नहीं करता। वह विशेष को साधारण रुप में प्रस्तुत 
करने के वजाय विशेष रूप में ही प्रस्तुत करने का बेतुका प्रयत्न करता है। आखिर उसके श्रौर 
सहूदय के बीच मानसिक सम्पर्क स्थापित करने का माध्यम तो वही हो सकता है जो दोनों के लिए 
साधारण हो । परन्तु वह इस साधारण को पुराता समभकर नये माध्यम की खोज में न जाने 
क्या-क्या चमत्कार दिखाता है। लेकिन वास्तव में यह-सब कुछ नहीं है। यह कवि की सहजा- 
नुभूति की विफलता मात्र है। उसने उलभन को एक प्रयोगवादी सिद्धान्त के रूप में ऐसे भ्राग्रह 
के साथ स्वीकार कर लिया है कि वह उसमें एक प्रकार के गौरव का श्रनुभव करता है। एक तो 
उसकी संवेदनाएँ ही इतनी उलभी हुई हें कि उनकी सहजानुभूति श्रर्थात्‌ उन्हें विम्ब-रूप में प्रस्तुत 
करना श्रपेक्षाकृत कठिन है, दूसरे वह उलभम को ही संवेदनीय मान बेठा है। परिणाम यह होता 
है कि उसकी श्रभिव्यक्ति सर्वथा विफल रहती है। इसके श्रतिरिक्त श्रनेक स्थितियों में इस विफलता 
का कारण कवि में सहजानुभूति की श्रक्षमता भी होती है। कवि की श्रनुभूति में ही इतनी शक्ति नहीं 
होती कि वह संवेद्य को विम्बरूप में ग्रहण श्र प्रस्तुत कर सके । सहजानुभूति को क्रोचे ने कल्पना 
का गुर माना है। परन्तु यह कल्पना भी सर्वथा श्रनुभूति ही पर आ्राश्चित है। श्रतः सहजानुभूति के 
लिए शअनुभूति-क्षमता सर्वथा श्रपेक्षणीय है । जब तक श्रनुभूति में शक्ति नहीं है कवि के मन में 
संवेदनों का विम्ब बनना सम्भव नहीं है । प्रयोगवादी कवि बुद्धिव्यवसायी है, भ्रपनी अनुभूति पर 
उसे विश्वास नहीं है । परिणामतः वह सहजानुभूति में श्रसमर्थ रहता है, भ्रर्थात्‌ श्रपने संवेद्य को 
विम्ब रूप में न तो वह ग्रहएा कर सकता है श्ौर न प्रस्तुत ही कर सकता है और इसके बिना 
काव्य-रचना सम्भव नहीं है । ; 
झब रह जाता है भाषा का एकान्त वेयक्तिक प्रयोग, जिसके भ्रन्तर्गत शब्दों का भ्नग्गंल 


काव्य की रागात्मकता और बौद्धिक प्रयोग ५३ 


उपयोग, असाधारण प्रतीक-विधान प्रादि भ्राते हें । यह वास्तव में साधारणीकरणा-विरोधी प्रवृत्ति 
का ही स्थल रूप है भ्ौर उसी की भाँति प्रसंगत भी । भाषा एक साम्राजिक साधन है। उसकी 
सार्यकता ही यह है कि वह व्यक्ति के मन्‍्तब्य को समाज पर प्रकाशित कर सके । भ्रतएव उसका 
प्रयोग सामाजिक ही हो सकता है, वैयक्तिक नहीं । शैली की बेयक्तिकता दूसरी बात है। शैली में 
शाब्द-संयोजना, वाक्य-रचना, लक्षणा, व्यंजजा भ्रादि का उपयोग निशचय ही व्यक्तिगत होता है, 
परस्तु शब्द का कोई श्रनर्गल प्रर्थ देना, भ्रयवा शब्दों की भ्रस्त-व्यस्त संयोजनाश्रों द्वारा किसी सर्वया 
झ्रसस्वद्ध भ्र्य की प्रतीति करना, यह भ्रप्रचलित प्रतीकों द्वारा किसी भ्रर्यग्यक्त भ्रनुभव-ख़ण्ड को 
झ्रतूदित करना तो भाषा के मूल सिद्धान्त के ही प्रतिकूल है। साधारणतः तो पाठक आ्रापके श्रलि- 
प्राय को समभेगा नहीं, किन्तु यदि भ्रापकी टिप्परियों की सहायता से समझ भी जाय तो उसे 
गोरखघस्वे को खोलने का भ्रानन्‍्द मिल सकता है, काव्य का श्रानन्‍न्द नहीं मिल सकता । साधारण 
बुरूहता स्री रस-प्रतीति में बाघक होती है, लेकित जहाँ प्रयत्नपूर्वंक दुरुहता के सभी साधन एकत्र 
किए ग्रए हों, वहाँ रस श्रतोति कसी ? 

सारांश यह है कि जीवन की भाँति काव्य में भी नवीनता झौर प्रयोग का बड़ा महत्त्व है, 
परल्तु ग्रावश्यकता इस बात को है कि मूल्यों का सन्तुलन बना रहे । जीवन के मूल तत्त्वों पर दृष्टि 
केन्द्रित रखते हुए उन्‍्हों के पोषण श्रोर समृद्धि-विकास के निमित्त प्रयोग करना, उनको रूढ़ि भौर 
स्थविरता से बचाते के लिए नवीन गति-विधि का प्रन्वेषण करना सार्थक और स्तुत्य है। परन्तु 
यबि एल्ादुशत्व मात्र से वेर हो जाय ओर नवीनता की खोज श्रथवा नये प्रयोग साधन न रहकर 
साध्य बन जायें, उनको यदि जीवन के मल तत्त्वों से श्रधिक महत्त्व दिवा जाने लगे, तो वे भ्रपनी 
सार्थकता खो बेठते हे शोर प्रायः बाघक बन जाते हें । काव्य के विषय में भी ठीक यही बात है ॥ 
काव्य के मूलतत्व रस-प्रतीति पर दृष्टि केन्द्रित रखकर, काव्य को गतिरोध और रुूढ़ि-जाल से 
सुक्‍त करने के लिए नये प्रयोग स्तुत्य हैं; वे काव्य के साधक हें। परन्तु क्रम को उलट कर काव्य 
की पग्रात्मा का तिरस्कार करते हुए प्रयोगों को स्वतन्त्र महत्त्व देना, उन्हें ही साध्य मान लेना 
हलकी साहसिकता मात्र है काव्य-गत मूल्यों का भ्रनुचित तथा भ्रनावश्यक क्रम-विपर्यय है। 


रामधारोीसिह 'दिनकर' 


नई पीढ़ी 


हिन्दी-कविता में जो नवीनतम क्षितिज भलकने लगा है, उसे लेकर संप्रान्‍्त आ्रालोचकों में 
फाफी मतभेद है। किन्तु, में बड़े उत्साह में हेँ। छटी सदी में भामह ने यह प्रइन उठाया 
था कि कविता की श्ात्मा क्‍या है। कविता की श्रात्मा उन्होंने भ्रलंकार को माना। किन्तु, 
झ्ाग चलकर वामन को यह बात ठीक नहीं जेंची । कारण, अलंकार का रमणी के लिए जितना 
महत्त्व है, कविता के लिए उससे भ्रधिक नहीं हो सकता । श्रतएवं, वामन भामह की श्रपेक्षा फुछ 
भ्रधिक गहराई में गये श्रोर उन्होंने कहा, कविता की श्रात्मा रीति हो सकती है। रीति क्‍या है ? 
कबि बराबर अपने लिए एक ऐसी राह बनाता है, जो पहले नहीं थी; यह रीति है । संसार में मनुष्य 
रोज पैदा होते हैं, किन्तु, दो मनुष्य एक समान नहीं होते; यह रीति है। प्रत्येक कवि प्रत्येक दूसरे 
कवि से भिन्‍न होता है; यह रीति प्रमाण है। रीति बड़ी ही गहराई का भ्रनुसन्धान थी, किन्तु, खोज 
वहीं तक नहीं रुकी । भामह से वासन तक जो प्रगति हुई थी, उसका लाभ आानन्दवर्धन ने उठाया, 
झोर उन्होंने घोषणा की कि कविता को थश्रात्मा ध्वनि है। श्रर्यात्‌ कविता वह नहीं है, जो कहा 
जाता है, बल्कि वह जिसकी ओर संकेत किया जाता है। मेरा विचार है, सारे संसार की झ्ालो- 
चनाओश्रों को निचोड़ डालें; तब भी उससे भ्रधिक गहरी बात का पता नहीं चलेगा, जिसका पता 
ध्वनिकार को चला था। 

कुछ वसा ही प्रश्न हमारे समय में भी उठने लगा है, यद्यपि, इस बार यह समस्या आलो- 
चकों के श्रागे नहीं, कवियों के सामने है। नये कवि, व्याजान्तर से, इसी बात का प्रयोग कर रहे हैं 
कि कितने ऐसे उपकररा हैं, जिन्हें छोड़कर भी कविता कविता रह जायगी । सिद्ध है कि कविता 
केवल कोमल शब्दों के जोड़ में नहीं है; इसलिए, कोमलता की परम्परा टूट रही है। सिद्ध है कि 
कविता के विषय निर्धारित नहीं किये जा सकते; इसलिए, भ्रपरिचित, श्रप्रत्याशित झौर झनपेक्षित 
विषय कविता में भरते जा रहे हैं । रवि बाब्‌ ने कहा था कि यदि किसी को स्वस्थ, सुबिकच और 
सुनवीन पुष्पों के बदले घुन लगे हुए श्रन्धे-कान फूल ही पसन्द श्राते हों, तो उन से प्रेम करने का 
उसे पूरा अधिकार है। इस उक्त में जो व्यंग्य था, वह तो कपुर के समान उड़ गया; जो बाकी 
बचा, उसका उपयोग श्राज कवि के जन्म-सिद्ध श्रधिकार के रूप में किया जा रहा है। 

हिन्दी में जो कुछ हो रहा है, उसे इलियट श्रादि अंग्रेज्ञी कवियों का श्रन्धानुकरण नहीं कहना 
चाहिए। अनुकरण का काम दो-चार या दस श्रादमी कर सकते हें । पूरी-कौ-पूरी पीढ़ी श्रनुकरण 
के रोग से ग्रसित हो, ऐसा मानने का कोई ठोस श्राधार नहीं है । मेरा श्रनुमान है कि जिन झव- 
स्थाओ्रों ने इंग्लेण्ड में नये कवियों को उत्पन्न किया, उनसे समिलती-जुलती श्रवस्थाएँ श्रपने यहाँ के 
बुद्धिजीवियों को भी श्रनुभूत होने लगी हें। इसलिए, उनमें भ्रौंर यूरोपीय कबियों में थोड़ा-बहुत 


नई पीढ़ी ५५ 


साम्य दिखलाई दे रहा है। कोलाहल तो बड़े जोर का है श्रोर लगता भी एसा ही है कि लड़के 
झपने पुरखों के कलात्मक भ्रसबांबों को तोड़-फोड़ कर ही दम लेंगे । किन्तु, यह नवागम का भी रोर 
हो सकता है । संभव है, बाढ़ में बह कर बहुत-से ऐसे लोग भी भ्रा गये हों, जो कवि नहीं हैं । किन्तु 
भविष्य पर जिनके पंजों की छाप पड़ने वालो है, वे कवि-पुंगव भी इसी भुण्ड में छिपे हुए हैं । नई 
झालोचना का धर्म हैं कि वह उन्हें भीड़ से ऊपर लाये, उनके योग्य झ्रासन भर पीढ़े की व्यवस्था 
करे । 


विश्वम्भर 'सानव' 


कविता ओर आलोचक 


कविता किसी देश की संस्कृति का श्रनिवार्य अंग है। उसकी उपेक्षा करना उस देश की 
श्रात्मा की उपेक्षा करना है। ऐसी दशा में यह संभव ही नहीं है कि हमारे श्रालोचक, जिन्हें दूसरे 
शब्दों में संस्कृति के प्रहरी कहा जा सकता है, कविता की गति-विधि से उदासीन हो जायें । 

जेसे प्रत्येक व्यक्ति कवि नहीं हो सकता, बसे ही प्रत्येक प्राणी कवि को ठीक से समझ 
भी नहीं सकता । यही कारण है कि काव्य के वास्तविक मम को ग्रहण करने के लिए आलोचक की 
भ्रपेक्षा होती है । 

एक ही कृति की समीक्षा कई दृष्टिकोणों से हो सकती है । यह बहुत संभव है कि ये 
दृष्टिकोण विभिन्‍न श्रालोचकों द्वारा प्रस्तुत किए गए हों; श्रतः जहाँ तक कोई विशेष बात उठाने 
का प्रशन है, वहाँ ये सभी समीक्षाएँ महत्त्वपूर्ण मारी जानी चाहिए । ऐसी समीक्षाश्रों से यदि वे हेष 
के कारण नहीं लिखी गई तो हानि के स्थान पर लाभ ही होता है। हिन्दी में कई ऐसे काव्य-प्रंथ हैं, 
उदाहरण के लिए हम रामचरित मानस, कामायनी श्रोर दीपशिखा को ले सकते हें, जिनकी आलोचना 
बार-बार होनी च।हिए । ऊँचे किसी महापुरुष के व्यक्तित्व के सभी अंगों से किसी एक ही व्यक्ति 
को पूरी जानकारी नहीं होती, वेसे ही यह बहुत संभव है कि किसी महान्‌ कृति की शक्ति और 
सौन्दर्य का पूर्ण पारखी कोई एक श्रालोचक न हो । सर्वांगपूर्ण समीक्षा तो कोई बहुत ही समर्थ और 
अंतद्‌ बव्टि-सम्पन्न श्रालोचक ही कर सकता है। 

इसके झ्तिरिक्त युग-धर्मं के साथ ही काव्य-प्रंथों की श्रालोचना का रूप बदलता रहता है । 
महान ग्रंथों की विशेषता यह होती है कि वे सभी युगों में किती न किसी रूप में झपना प्रभाव 
बनाए रखते हें। उनमें शब्दों और शब्दों के श्र्थों से परे ध्वनित और व्यंजित होने वाला कुछ 
ऐसा भ्रनिवंचनीय सौन्दर्य निइ्चत रहता है जो झ्ालोचना की पूरी पकड़ में कभी ठीक से भ्रा ही 
नहीं सकता । श्रतः यह झ्ावश्यक है कि महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की श्रालोचना न केवल भिन्‍न-रुचि रखने 
वाले व्यक्तियों द्वारा हो, वरन थोड़े-थोड़े काल के पश्चात्‌ भी होती रहे जिससे पाठकों को यह पता 
चलता रहे कि श्राज भी उसमें कितना और कौन-प्ता अंश सारवान है । 

बीसवीं शताब्दी इस बात में विलक्षर भ्रवव्य मानी जा सकती है कि इसमें साहित्य की सभी 
विधाओं--कविता, उपन्यास, आलोचना, कहानी, नाठक, निबंध--का श्रभूतपूर्व विकास हुआ है । 
झ्रालोचना का विकास तो यहाँ तक हुआ कि कवियों तक को प्रकृति श्रालोचनात्मक हो गई और वे 
व्यवस्थित ढंग के श्रालोचकों ([270[025570:9  ८7३८४८७) की भाँति भ्रालोचनात्मक निर्णय देने 
लगे । यह प्रकृति काव्य के उचित मूल्यांकन में कहीं-कहीं बाधा बनकर खड़ी हो गई है । 

भ्रच्छा यह हो कि हमारे श्रालोचक की भ्रपनी कुछ मान्यताएँ हों, जो उसे और उसके पाठकों 


कविता ओर आलोचक श्ऊ 


को स्पष्ट रहें । ये मान्‍्यताएं परम्परागत झ्रालोचना के सिद्धान्तों से भी प्रहणा की जा सकतो हैं, कृति 
विद्योय पर भी झ्राघारित हो सकती हैं, श्रौर मोलिक चिंतन का परिणाम भी हो सकती हैं | तात्पय॑ 
. यह कि जीवन भ्रोर कला के प्रति भ्रपना कोई दृष्टिकोश न होने से एक स्वस्थ झौर संतुलित दृष्ठि- 
._ कोण का होना कहीं प्रविक भ्रच्छा है । इस दृष्टिकोण के प्रति श्रालोचक की झास्था होनी चाहिए 
. और अपनी बात को बलपूर्वक कहने का उसमें साहस होना चाहिए । झ्राज़ की कविता को डाँवाडोल 
स्थिति के बहुत-से कारणों में से एक कारण यह भी है कि भ्रालोचकों का भ्रपना कोई दृष्टिकोण 
नहीं है प्लौर पथ-निर्देश की क्षमता तो संभवतः झाज किसी में हे ही नहीं । 


विनयमोहन शर्मा 


कविता का सत्य ओर उसकी लयमयता 


यह सच है कि झ्लाज की कविता पाठक में प्रेषणीयता नहीं पेदा कर पाती। उसके मन में 
उद्देलन, भावनाओं में सिहरन और चिन्तन में विशिष्ट रूपाकृति नहीं दरसा पाती । इसीसे वह कह 
उठता है “कविता का युग बीत गया ।” तो क्‍या सचमुच कविता का युग श्र नहीं रहा ? क्‍या 
झ्ाज हमारा कवि भावना-शून्‍न्य हो गया ? क्‍या उसके मन में उसके सामाजिक जीवन से उद्भूत 
सुख-दुख की कोई हिलोर नहीं उठती ? क्‍या वह कभी प्रकृति के दृश्यों के साथ आ्लात्मसात नहीं 
होता ? कया उसमें अपने को अ्रभिव्यक्त करने को क्षमता क्षीण हो गई है ? श्रथवा पाठक की 
रसग्रहण -शीलता ही सो गई है ? वह भ्राज की कविता में क्‍या देखना चाहता है ? श्रादि प्रश्न हें 
जिन पर हमें विचार करने की श्रावश्यकता है। किसी भी साहित्य-प्रकार (विधा) का मूल्यांकन 
उसक्रे “रूप” पर भ्रवलस्बित है। और उसकी उत्कृष्टता की कसोटी उसकी ईमानदारी में निहित 
है । यदि “साहित्य” जीवन से उद्भूत नहीं है भ्रौर जीवन के लिए नहीं है तो उसका क्ष्या उपयोग 
है ? वह “ह॒विष्य” किस देवता के लिए है ? 

में कविता के मूल्यांकन में “भाव श्ननूठे चाहिए भाषा कसी भी हो” वाले सिद्धान्त को नहीं 
मानता । में 'भाव' के साथ उसकी अ्रभिव्यक्ति के प्रकार को भी ग्रावश्यक समभता हूँ, भाव भ्रौर 
शली के बीच की भेदक रेखा मुझे सान्‍्य नहीं है। भाव और शेली की एकरूपता में ही काव्य का 
सौन्दर्य निखरता है। यदि भाव-व्यंजक शब्दों की योजना नाद-माधुयं की दृष्टि से न को गई तो 
बिखरे हुए भाव-प्रतीक (शब्द) हमारे मन में कंसे ठहर सकेंगे ? कविता को पाठक के मन में 
संचरित करने के लिए हमें उसके रूप-विधान पर भी जोर देना होगा । श्राज कई तथाकथित प्रयोग- 
वादी रचनाओं की असफलता का एक कारण यह भी है कि उसमें रूप-विधान पर बिलकुल ध्यान 
नहीं दिया जाता । काव्य में जीवन का “सत्य जब लयमय भाषा के माध्यम से उपस्थित होता है 
तब वह हमारे संवेदनशील मन में बहुत समय तक गुंजरित होता रहता है । विद्यापति और मीरा 
के पदों को अमुद्रित भ्रवस्था में भी वर्षों तक कंसे जीवन प्राप्त होता रहा ? 'जगनिक' की “आल्हा' 
को किन उपकरणों ने प्राण-दान दिया ? यदि उनमें गेय रूप-विधान का भ्रभाव होता तो हम बहुत 
से जनप्रिय कवियों को कभी का विस्मृत कर चुके होते । 


शाल्तिप्रिय द्विवेदो 


छायावाद के बाद 


।« ./. अतंमान हिन्दी-कविता का सर्वोच्च विकास छायावाद में हुआ--भाव, भाषा श्रौर शेली 
को दृष्टि से छायावाद के बाद खड़ों बोलो को कविता का क्रमशः पतन होने लगा । “निराला, पंत 
महादेवी ने काव्य में जो झ्रात्म-निर्माणा दिया था साथना को उस ऊँचाई तक फिर कोई कवि नहीं 
उठ सका । “बच्चन' इत्यादि ने उदूं -शायरी के प्रभाव से भर “दिनकर' इत्यादि ने राष्ट्रीय-काव्य के 
प्रभाव से कला को व्यंजकता बनाए रखने का प्रयत्न किया | किन्तु हमारे जीवन की ही तरह जब 
हमारा साहित्य भी अपनी ही परम्परा शोर श्रपने हो देश की सीमाझ्रों में झ्रात्मस्थ नहीं रह सका 
तब श्रन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को तरह साहित्य में अन्तर्राष्ट्रीय विचारधारा का भी प्रभाव पड़ने लगा । 
बतंमान वातावरण में प्रगतिवाद अपेक्षाकृत भ्रधिक जीवन और साम।/जिक संवेदन बनकर साहित्य 
में झा गया । यद्यपि प्रगतिवाद के कारण काव्य के लालित्य में श्रीवृद्धि नहीं हो सकी और सच तो 
यह कि जब जीवन हो लालित्य-शून्य होता जा रहा हैं तब साहित्य में उसकी श्राशा कहाँ तक की 
जा सकती है । 

प्रगतिवाद ने साहित्य को काव्य से गद्य की ओर मोड़ दिया । इसके बाद प्रयोगवाद ने 
छायावाद को संरक्षता शोर प्रगतिबाद की वास्तविकता के संभिश्रण से साहित्य में नवीन काव्य- 
प्रयास प्रारम्भ किया । यहाँ तक तो अभ्रनेक मतभेदों के होते हुए भी रचना-शिल्प की दृष्टि से फिर 
भी एक साहित्य-साथना बनी हुईं थो; किन्तु इसके बाद मुक्तछन्द के रूप में कविता की जो दुर्दशा हो 
रही है वह श्रसहा भौर प्रक्षम्य है। 

हमारी झ्राशा उन नवांकुरित तरुण कवियों की ओर है जो श्रव भी काव्य को प्रकृति के 
साम्निध्य में रसात्मक बना हुए हैं । ऐसी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में कभी-कभी अपनी मनोरम 
भलक दे जाती हें । इस मरुस्थल की तरह रूखे-सूखे युग में ऐसी कविताओं से हृदय को श्रोसयिस 
की तरह सुख-शान्ति मिलती है । 
परमाणु-युग के कारण कविता ही नहों, सम्पूर्ण सृष्टि का भविध्य भ्रन्धकारमय हो गया 
है । मेंसे ग्रपनी नई पुस्तक-“दिगम्वर' (आपन्यासिक रेखांकन) के अंतिम परिच्छेद में यह प्रइन उप- 
स्थित किया है कि अणुबम कया चाँदनी का सुख-शान्तिमय साम्राज्य भी समाप्त कर देगा। 
परमाणु-युग के कारण यदि प्रकृति नहीं मिट जाती तो उसकी अजख्रता जीवन श्रौर 

कविता में चिरन्तन झ्मृत-प्रवाह बनकर बहती रहेगी । 

है एवमस्तु ! 


डा० रामकुमार वर्मा 


मेरा दृष्टिकोण 


कविता को जीवन की एक पवित्र शझ्ननुभूति मानता हूँ, इसीलिए कविता में हृदय की 
उन समस्त प्रेरणाओं का श्राकलन रहता है जो जीवन के नेतिक धरातल को अ्रधिक से श्रधिक 
ऊंचा उठा सकती हें । यह परिस्थिति किस भाँति हृदय में उपस्थित होती है यह तो में नहीं 
जानता किन्तु जेसे ही कविता लिखने बेठता हूँ वेसे ही समस्त भावनाएं ऐसे केन्द्रबिन्यु में सिमंट जाती 
है, जिसमें कण्ठ का स्वर गूंजता है, जीवन की स्वस्थ संवेददा की परिधि स्वयमेव निर्मित होती है 
झौर तब उसका लक्ष्य चाहे श्राध्यात्ममाद की ओर हो चाहे लोौकिक जीवन के पवित्र सोन्दर्य की 
झोर हो । सौन्दर्य की पवित्रता श्रन्ततः प्राध्यात्मवाद की श्लोर ले जाती है, ऐसा मेरा अ्रतुभव है । 
यही कारण है कि मेरी रचनाएँ जहाँ भावपक्ष में किसी पविन्नतम श्रनुभूति का बीजवपन करती हैं 
वहाँ कलापक्ष में वे स्वयंभेव ललित शब्दों की सृष्टि को । सें भी यह नहीं मानता कि भावपक्ष में 
मेरी रचनाएँ जीवन की अ्रचित्य गहराइयों का श्रवगाहुन करती हैं, पर यह में भली भाँति जानता 
हैँ कि जो बात भी मेरे हृदय से निकलना चाहती है वह स्पष्ट श्रौर पूरिमा की ज्योत्स्ता की भाँति 
निर्मल होती है। यह कोई श्रहंबाद नहीं है क्योंकि श्रालोचना के क्षेत्र में कुछ भ्रनुभव रखते के कारण 
में स्वयं अपती रचताश्रों को उनके निर्मित हो जाने के बाद झालोचना की तीखी कसोटी पर कस 
लिया करता हूँ । 

इसमें कोई सन्‍्देह नहीं कि जीवन के क्रम में घटित होने वाली घटनाओं से मेरा लगाव नहीं 
के बराजर है। इस दृष्टि से लोग मुझ्के पलायनवादी भी कह सकते हें किन्तु में यह अनुभव किया 
करता हूँ कि प्रतिदिन घढित होने वाली घटनाएँ किसी समाचार-पत्न की सामग्री बन सकती हैं, मेरी 
कविता की सामग्री नहीं । सम्भवतः इसका कारण यह हो कि में उस स्थूल में इतना विश्वास नहीं 
करता जितना सूक्ष्म में । यद्यपि स्थूल मेरे प्रतीकों का श्राधार भ्रवद्॒य बन जाता है। में कुछ ऐसा 
समभता हूँ कि जिस तरह एक सुवासित पुष्पमयी लता भूमि से उत्पन्न होती है श्नोर बिना भूमि के 
लता की उत्पत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु भूमि ही लता नहीं है । उसी प्रकार स्थल वस्तु-जगत से 
काव्य की सुवासित प्रेरण्ायें उत्पन्न होती हें किन्तु बे प्रेरणायें स्थल नहीं हें यद्यपि उन्हें स्थल का 
झाश्रय है। 

मेरा जीवन कुछ ऐसी स्थितियों से गुजरा है जिसमें घटनाएँ नहीं के बरबर रहो हें श्लौर 
यदि रही हैं तो उन्होंने मुझ पर विशेष प्रतिक्रिया उत्पन्त नहीं की । संभवतः जीवन के संधर्ष मेरे 
सामने नहीं झ्लाये; सम्पन्न घर में पोषित हुआ, एम. ए पास हुआ, तुरन्त नौकरी मिल गई इच्छा- 
नुसार कार्य करने का श्रवसर मिला, मित्रों से सहदयता प्राप्त की, जीवन में उत्साह और उमंग का 
में कुबेर बना रहा । देनिक समस्पाञ्रों से जुकने का अ्रवसर मुझे नहीं सिला झौर इसी करण यह 


मेरा दृष्टिकोश ६१ 


घटनाएं मेरे सामने चित्रपट के कोतृहल को भाँति श्रायीं झौर चली गयों । शेशव से ही मेन देखा कि 
मेरा परिवार भक्तिप्रवण है, उसमें सांस्कृतिक भ्राचार-विचार के लिए भ्रधिक सुविधा है, तुलसी 
झोर कबोर की भक्ति ने मेरे सत्र भौर प्रस्तःकरणा का निर्माण किया है। ऐसी ।स्थति में रहस्य- 
बाद के प्रति भ्रतुरक्ति होना मेरा स्वभाव-सिद्ध श्रधिकार-सा रहा है। उसमें किसी प्रकार के श्रायास 
के लिए स्थान ही नहीं था । परिणामस्वरूप काव्य-जीवन के कुछ समृद्ध होते हो मेरी रुचि निसर्गतः 
रहस्यवाद की झोर भ्राकृष्ट हुई भौर तब से श्रव तक जो रचनाएँ मेने लिखी हैं, जो कविताएं मेंने 
लिखो हैं उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन को प्रावश््यकता मेंने श्रनुभव नहीं की । हिन्दी-काव्य के 
बिकास में झनेक युग झाये ओर चले गये । प्रगतिवाद श्रौर प्रयोगवाद के भी भ्रनेक आक्रमण मुझ 
पर हुए, मेंने सबको सहानुभूति को दृष्टि से देखा । विविध काव्यगत दृष्टिकोसों ने मुझ्के लोकप्रियता 
का लालच भी दिया, किस्तु में श्रपनी भाव-भूमि पर स्थिर रहा शौर जो अनुभूति प्राण्पों में समा 
- गई थी बह न निफल सकी और न मेंते निकालने का प्रयास ही क्षिय्रा । यही कारण है कि भ्राज भी 
जब में कवित। लिखने बंठता हूँ तो श्रपनी परिस्थितियों को भूल जाता हूं और स्थल में निहित जो 
जीवन को रूप-राश्षि है; कश-करा में विखरी हुई पड़ी है उसकी रेखायें संवारने लगता हूँ । में अपनी 
चार कवितायें झ्रापके सामने रख रहा हूं । पहलो रचना है 'साबना के स्व॒र'। मेंने कबिता को साथना 
के रूप में हो समझा है श्नौर जीवन का भ्रनन्त सोन्दर्य जिसका संगीत प्राण में प्रनवरत गति से हो 
रहा है वह क्षरा-क्षण में मधुरतर होता जा रहा है। संयोग में सुख है लेकिन संयोग + चेण्टा में 
झारम्द है, क्‍योंकि इस चेज्टा में सुल्व की प्रत्येक किरण कश-करा में समाकर प्रगतिशील होती हुई 
दृष्टिगत होती है । संभवतः इसी चेब्टा का नाम विरह है और विरह जो मिलन का प्रयत्न है बह 
मिलत से प्रियतर है, इसमें कोई सन्देह नहीं । जीवन के भ्रनुभव में किसी क्षण में उत्पन्न हुई पहि- 
चाल प्राणों के लिए एक सुखद जीवन का निर्माण करती है, जो मिलन-बिन्जु विरह की रेखाओं के 
सिलने पर स्थित है वह कितनी सुलद स्मृतियों का कम्पन लिए हुए है! उसी में उमेंगती हुई उर्मियों 
को ध्वनि कानों तक पहुंच जाती है। प्रेम की यह्‌ चरम-सावना जिसमें प्रिय फी कथा जाग उठतो है 
जीवन को ऐसी दिशा में खींच ले जाती है, जिसमें प्रानन्द की भ्रनुभूतियाँ निवास करती हें । यह 
झनुभूतियाँ अनेक प्रकार के रूपक ग्रहण करतो हैं, थे चाहे शतदल के मधुर रंग हों, चाहे वेशिका 
के स्वर-सिन्धु हों, चाहे वीणा के यंंजते हुए तार हों, यह्‌ सब प्राण फी प्रभातो का ही स्वर ग्रहण 
करते हैं । 

दूसरी कविता “आात्म-परिचय' हें । अनेक वर्व पहिले मेंने “किरख-करणा' शीर्षक कविता लिखां 
थी जो सम्पूर्ण रूप मे आध्यात्मिक दृष्टिकोर से प्रेरित हुई थी जिसमें झ्रात्मा को परमात्मा रूवी 
दीपक का एक किरणा-कणा कहा गया था। उस कविता में चिन्तन-पक्ष प्रधान था। पिछले बर्षो' को 
मानसिक प्रगति इस दृष्टिकोण को प्रनुभूति के क्षेत्र तक तो भाई ऐसा ज्ञात होता है और उसी 
भावभूमि पर प्रस्तुत कविता का निर्माण हुआ । इस कविता में वही दृष्टि-बिन्छु रेखाओं का रूप 
लेकर एक चित्र के रूप में स्पष्ट हुआ ज्ञात होता है । प्रेम की परिपूर्णता में श्रात्मसमर्पएण को स्थिति 
है और जब क्षितिज-रेखा के हट जाने से दो संसार एक हो जाते हें तो दोनों में जो एक-रूपता होती 
है बही भ्रनेक-अनेक प्रतीकों से इस कविता में स्पष्ट हुई है। किन्तु कठिनाई यह है कि श्राग की 
उष्णता प्राप्त कर कोयेला भ्राग का रूप तो बन जाता है पर अझ्न्ततः वह कोयला ही तो रहता है जो 
क्षण-क्षण में भस्म होता रहता है । उसी भाँति यह जीवन प्रध्यात्म-किरणों से भ्रालोकित होते हुए 
भी अन्ततः जोवन ही तो है जो क्षण-क्षण में ऐन्द्रिकता के प्रभाव से मुक्त होना चाहता है। तभो 


६२ काव्य-धारा 


तो हृदय-बीणा का तार घटनाओं की चोट से टूट तो जाता है। किन्तु उसकी संगीत-लहरी गंजती 
रहती है; हृदय का पुष्प सूख तो जाता है परन्तु उसकी सुगन्धि दिशाझ्रों को परिव्याप्त किये रहती 
है; जीवन मृत्यु की गहराई में ड्ब तो जाता है; किन्तु उसकी प्रेरणायें मृत्यु पर भी विजय प्राप्त 
करती हैं । इस जीवन के क्षण बीतते चले जा रहे है, किन्तु उनके बीतने की शभ्रवधि जैसे-जेसे कम 
होती जाती है बेसे-देसे उसकी मादकता और भी बढ़ती है। यह जीवन किस ग्रन्थि से बंधा हुआ है 
यह भ्ज्ञात है तभी तो चाहते न चाहते हुए यह साँसे जाने किस संकेत से रात-दित चलती रहती हैं 
झौर जीवन की यह दीप्ति सो-बार कठिनाइयों के शलभों से ककभोर दी जाती है, किन्तु बुभती नहीं 
है, जलती चली जा रही । जीवन की यही प्रेरणा संसार को वेभव सम्पन्न करती है श्रौर इसीलिए 
: भ्रध्यात्म-क्षेत्र की निराशा जीते रहने का सबसे बड़ा भ्राशावाद है। 

तीसरी कविता भ्रसफलता की लकीरें हैँ । यह कविता श्रात्म-विश्लेषण की संवेदना लिए हुए 
है । जब जीवन गनन्‍्तव्य पर पहुँचने की भ्रनवरत चेष्ठा करता हुआ भी इन्द्रियों के ह्वार पर रुक जाता 
है और गत साधना पर दृष्टिपात करता है तो उसे चारों झ्रोर श्रपृर्णता ही श्रपुणंता दिखाई देती है । 
उस समय भविष्य के कोड़ में अ्रनंग की भाँति छिपा हुआ भाग्य जीवन का परिहास करता है और 
जीवन के शिवत्व पर अपने शक्तिशाली वाण का प्रयोग करता है। करुण-पथ पर चलता हुआ हृदय 
का रथ बार-बार विपत्तियों की खाइयों में धंस जाता है श्र विवेक का संचालन सूत्र ढीला पड़ 
जाता है। किन्तु न जाने प्रकृति ने जीवन में कितनी प्रेरणाएं भर दी हैं, यह छोटा-सा अंकुर 
भू-गर्भ के श्रन्धकार में कौन-सी जीवन की ज्योति छिपाये हुए है जो मिट्टी श्नौर पत्थरों से लड़ता 
हुआ अपने प्राणों की सुगन्बि छोटे से पुष्पों में बटोरकर पृथ्वी पर निकल आ्राता है श्रौर सूर्य को 
किरणों का भ्रभितन्‍्दन स्वीकार करता है। उसी प्रकार यह साँसें बारबार बाहर निकलती हैं, किन्तु 
झ्रन्‍्ततः उनकी जड़ कितनी गहरी है कि वे भ्रपनी शक्ति संसार में बिखराकर भी बारबार निकलने 
के लिये झातुर रहती हें प्लौर कभी शीतल ओर कभी ऊष्ण बतकर संसार में सुख-दुख का सन्देश 
बाँटती रहती हैं । इनकी शक्ति पर मुझे विश्वास है, इसीलिए यह भ्रसफलता की लकीरें आगे चल 
कर जिस चित्र का निर्माण करती हें वह चित्र जीवन के बेभव का है। मस्तिष्क के छोटे से कोष में 
स्मृतियों के अ्रथाह सागर लहराते हैं श्रौर जीवन की क्षीण किरण भविष्य की सम्पूर्ण कला बनना 
चाहती है। इसीलिए तो में जीवत को नहीं मृत्यु को क्षणभंगुर मानता हूँ; भौर जीवन एक शाइबत 
विधान है जो मृत्यु के पहिले भी है और बाद में भी। भले ही इस विस्तृत पथ में मेरी गति 
झचल-चरणा की भाँति एक क्षण भर को स्थिर रहे, किन्तु पेर श्रागे बढ़ाने के लिये भी तो चरण 
को स्थिर होना पड़ता है, इस स्थिरता में भी तो गति है और प्रगतिशील होने का अ्रमोध मस्त्र। 

चौथी कविता है 'जागरण-गीत' । में प्रकृति को श्राशावाद का सबसे बड़ा केन्द्र मानता हूँ । 
कीटस ने भी ओ्रो टु नाइटेंगेल' में कहा है--“दाऊ आस्ट नाट बाने फार डेय, ओरो इसार्टल बर्ड 
नो हंगरी जेनेरेशन्स, ट्रंड दी डाउन”। | 

उसी तरह प्रकृति का प्रत्येक पुष्प अमर है; व्यष्ठि-रूप से वह भले ही मुरकझा जाय; परल्तु 
समष्टि-रूप से वह श्रमर है, उसकी परम्परा श्रमर है। इसलिए यदि मनुष्य अ्मरत्व चाहता है तो 
वह प्रकृति के समानान्‍्तर बन जाय । यदि विज्ञान की दृष्टि से भी देखा जाय तो मनुष्य भी तो 
उसी गरिणत से प्रशासित है जो गणित प्रकृति अपने करोड़ में छिपाये हुए है। नाटक के बीज, बिस्दु, 
पताका, प्रकृति, कार्य की भाँति प्रकृति का प्रत्येक श्रवयव॒ सम्पूर्ण होता है और उसी भाँति मनुष्य: 
की इस प्रकृति के प्रत्येक करा में एक स्वर है; एक तरंग है; मनुष्य अपने अ्रहंवाद से अ्रनुशासित- 


मेरा दृष्टिकोण ६३ 


होकर इस प्रकृति से दूर होना चाहता है भ्रोर वह जेसे ही प्रकृति के नियमों से भ्रलग होता है बसे 
ही उसके विकास की गति रुक जाती है। पभ्रतः विकासोग्मुखी जीवन के लिए प्रकृति का स्वभाव- 
ग्रहण करना मानव के लिए भ्रनिवार्य है । जागरण-गोत में इसी प्रकृति के प्रतिबिम्व में मानव को 
साकार होने की झ्रावश्यकता है । इसलिए कि मनुष्य प्रकृति का सबसे सुन्दर चित्र है, न जाने कितने 
परिश्रम से प्रकृति ने मनुष्य का निर्माण किया होगा, कितने पुष्पों को सुगन्धि, सुषमा श्नौर जीवन- 
शक्ति को मिलाकर मनुष्य का निर्माण सम्भव हुप्रा होगा और मनुष्य इसका भ्रनुभव नहीं करता; 
इसी जागरण में मनुष्य प्रकृति का भ्रधिनायक है; मानवी सत्य सर्वोपरि है उसी में वह भ्रनन्‍्त 
शक्तियों का साधक बन सकता है झौर वह स्वयं पृथ्वी पर निर्माण का सूत्रपात कर सकता है । 
... औओरे मन में तो बहुत सी बातें हें, किन्तु बह कही नहीं जा सकतीं । कहना भी चाहूँ तो शायद 
नहीं कह सकूंगा । भाषा तो भावना की भ्रभिव्यक्ति के लिय बहुत झोछा साधन है। इसोलिए 
झलेक बार प्रनेक रूपकों का ग्राश्रय प्रहण करना पड़ता है और श्रनेक प्रतीक उस भावना को झभि- 
व्यक्ति में सहायता पहुँचाते हैं, किन्तु बह भावना श्रपूर्ण ही रहती है। यह में सदेव मानता हूं कि 
काव्य में प्रनेकानेक प्रयोग होने चाहिये, किन्तु सबका लक्ष्य यही हो कि जीवन में शिवत्व और 
सुरुचि की भ्रभिवृद्धि कविता के माध्यम से हो । जीवन की भ्रनुपम भ्रौर भ्रचिन्त्य सम्भावनाओं के 
लिये काव्य से बढ़कर दूसरा साधन नहीं है, किन्तु इसके प्रयोग के लिए कवि को लक्ष्य-सिद्ध एकलव्य 
होने को भ्रावश्यकता है । 


गोपालकृष्ण कोल 


नई पीढ़ी : नई कविता : दायित्व का प्रश्न 


नई उम्र के कवियों को नई पीढ़ी में मान लेना जितना सरल है उतना ही कठित भी है, 
क्योंकि साहित्य में कमसिन लेखकों की जमात को केवल उनकी कम उम्र की बजह से नई पीढ़ी 
नहीं कहा जा सकता । बुजुर्ग लेखक भी साहित्य की परम्परा में नई पीढ़ी के श्रगुश्ना बन सकते हैं 
शोर बने भी हैँ । न ही श्रतीत में थंदा होने से हुर लेखक क्लासिक हो जाता है और न ही वर्तमान 
में जन्म लेने से हर लेखक नया बन सकता है। लेखक की श्रपनी उम्न साहित्य की परम्परा में नई- 
पुरानी पीढ़ी के चलने या बदलने, जन्म लेने या समाप्त होने का प्रमाण नहीं है । साहित्य में 
पीढ़ियाँ छृतित्व की उम्र के हिसाब से बनती श्रोर मिठती है। लेखक की उम्र से ज्यादा उसके 
इतित्व की उम्र महत्त्वपूर्ण होती है। कृतित्व के अ्रनुसार जब साहित्य में एक परम्परा अ्यनी 
पर्याप्तता श्रसिद्ध कर देती है तब उसके स्थान पर दूसरी परम्परा ञ्रा खड़ी होती है। नई परम्परा 
के बीज पुरानी परम्परा की श्रपर्याप्तता में ही पनपते हैं । परम्पराओं के सूत्र इसी रूप में कहीं न 
कहीं आपस में जुड़ जाते हैं । साहित्य में परम्पराश्रों के श्रान्तरिक और बाह्य परिवर्तन नई-पीढ़ी 
को पैदा करते हैं । ये परिवर्तत केवल ऐतिहासिक परिस्थितियों के बदलने का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं 
होते; बल्कि जीवन ओर जगत के विविध संहिलष्ट सम्बन्धों की गतिशील पारस्परिक प्रतिक्रियाश्रों 
झौर गहरे प्रभावों के परिणाम-स्वरूप प्रतिफलित होते हैं । 

इसलिए नई उम्र के सभी कवि कविता में नई पीढ़ी की परम्परा में अपना स्थान नहीं 
बना पाते हैं क्योंकि केवल नई उम्र न तो नई चेतना का प्रमाण है श्लौर न ही कला और जीवन 
की जटिल परिस्थितियों की नई माँग को समझ पाने की शर्ते । हिन्दी में नई उम्र के अ्रनेक कवि 
कविता के रूढ़ रूप-विधान को शाश्वत मान कर विबेक-हीन और जीवन-बोध से शून्य भावुकता के 
सायाजाल से भ्रभी तक अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं । उनकी कोरी भाव॒कता उनकी कविता 
को 'बाक्स आफिस हिट' के श्राम बाजारू फिल्मों या फिल्‍मी गीतों की तरह सरल और सस्ते मनों- 
रंजन की वस्तु बना देती है। और बे इस प्रकार की लोकप्रियता को सफलता मान कर श्रपने 
कला-विकास की तमाम सम्भावनाओ्रों को कुंठित कर लेते हैं । कोरी भावुकता उस परिवर्तित जीवन 
सत्य को अनुभव झ्ौर अभिव्यक्त नहीं कर सकती, जिसकी श्रदम्य आवश्यकता ने कला की पिछली 
पोढ़ी की क्षमता को श्रपर्याप्त सिद्ध कर दिया है। गीत नामक रचनां में कुछ गिने-चुने रोमाञचक 
भावों में से किसी एक को कई अलंकार-चित्रों में उपस्थित करने का आरावृत्ति-परक ढंग नई उम्र 
के कवियों में सरलता से प्रचलित हो गया है। वे इस सीमित परिधि में ही चक्कर काटने में 
ही झ्पनी सार्थकता समभते हें । उनके मीतों का मीटर लाइट म्यूजिक की धुनों पर खड़ा होता है । 


04 >> 


नई पीढ़ी : नई कविता : दायिस्व का प्रश्न ? ६५ 


लाकि वे उसको फिसी-न-किसी तरन्नृम में गा सकें श्रोर यह सिद्ध कर सकें कि झतका गौत 
गेय है। लेकिन क्‍या भावुक तुकान्त पद्य “लाइट म्यूजिक की गेयता पाकर गीत-काब्य बन 
सकता है ? क्या प्रावृत्ति-परक ढंग एक गीत को एक कविता बनाने को क्षमता रखता है? क्या 
इन गीतों का संगीत पभ्रपने स्वर-संकेतों से भाव-संकेत भी पेदा करता है ? क्‍या ये गीत “निराला' के 
काव्य-संगीत की परम्परा के उत्तराधिकारी हैं ? इस बिषय में “निराला' के गीत बहुत महत्त्वपूर्ण 
हैं भ्ोर उनके लिए शिक्षाप्रद हें, जो भावुक तुकान्त पद्य के पझ्राव॒त्ति-परक प्रकार को गीत समझ 
बेठे हें । 

दूसरी झोर काव्य-संगीत विशेषतः संगीत को भ्रधिक महत्त्व देने वाले कवि हिन्दी-भाषा 
में हो संगीतात्मक क्षमता का प्रभाव मानकर बंगाली को ओर देखने लगे हें। हिन्दी का व्याकरण 
ही उन्हें संगीत-विरोधी लगता है भ्रौर इसलिए वे जनपदीय बोलियों झ्ौौर भ्रन्य प्रान्तीय भाषाओं 
को संगोत-परक विशेषताझों को लाने के लिए भ्रपनी भाषा को ही विक्ृत करने को तंयार हें । वे 
यह नहीं देखते कि क्‍या बात है कि समान-कारक चिन्ह होते हुए भी उदू-काब्य में संगीतात्मकता 
क्यों पैदा हुईं, जब कि उदूं भोर हिन्दी एक-ही खड़ो बोली का विकसित रूप हैं ? प्रत्येक भाषा 
का शाब्द-संगीत भ्रलग होता है; यह संगीत भाषा में व्यवहार-परम्परा के माध्यम से लोक-मानस के 
भावों को स्वर-प्रयंभयों सतत पड़ने वाली प्रतिछ॒वियों से पेदा होता रहता है, काव्य में भाषा-संगीत 
के इस निचोड़ को प्रतिष्ठित करके ही गोत-काव्य को नए जीवन-सत्य का वाहक बनाया जा सकता 
है । गीतकारों को गीत को कोरी भावुकता से मुक्त करने के लिए एक झोर शब्दों के स्वर-भ्र्यभय 
संगीत को भाषा के संगीत से प्रहणा करना होगा और दूसरी भ्रोर नए-जीवन-सत्य को मुखरित करने 
की उसको प्रपर्याप्तता को भी समझना पड़ेगा । 

इस तरह के गीतों को प्रपर्याप्तता का भाव म॒क्‍्त-छन्द के आग्रह का एक प्रबल कारण बन 
गया । मुक्‍्त-छन्‍्द का आधार भाव का वेग ही है। प्रजातन्त्र के मुक्तभाव ने वाल्ट ह्विटमेन को 
प्रोजस्वी तिर्भोक विचारों के लिए मुक्‍्त-छन्द के पथ पर डाला था। दूसरी ओर म॒कक्‍त-छनन्‍्द को 
अस्वस्थ मानसिकता के जटिल उदयारों की छाया में प्रतीकवादी और अ्तियथार्थवादी कवि-कला- 
कारों ने भ्रराजक रूप से विकसित करने का प्रयत्न किया । भविष्यवादी सायकोवस्की को मुक्‍्त- 
भावना की व्यंगोक्तियों को मुक्त-छन्‍्द के माध्यम से ही प्रभावशाली अ्रभिव्यक्ति मिली । बंगालो में 
रवोखनाय ने शोर हिन्दी में “निराला ने मुक्त-छन्‍्द को रचना की परम्परा को झागे बढ़ाया । “निराला' 
ने अपनी छुन्द-रचना के आधार वेदिक छुन्दों तक में खोज निकाले थे । निराला ने स्वर-संकेतों से 
मुक्‍्त-छल्द में आरोह-भ्रवरोह ओर प्रवाह पैदा करने का साहसिक सफल प्रयास किया । झ्राज हिन्दी 
में प्रनेक दूसरे नये कवि भी मुक्त-छन्द के प्रयोग से नये जीवन सत्यों को काव्य-रचना में मुखरित 
करने का प्रयास कर रहे हें । मुक्त-छन्‍्द-रचना से सबसे बड़ी बात यह हुई कि भाषा को संगीतात्मक 
विशेषता को नजदीक से समझा गया और गद्य को भी काव्य के अभ्रनुकुल बल्कि प्रभिव्यक्ति के 
लिए अधिक उपयोगी झोर कलात्मक बना दिया' गया। मुक्‍त-छनन्‍्द भ्रपनी भ्रराजकता को 
अवस्था को पार कर चुका है और शभ्रव वह स्वयं एक. सन्तुलित लय झौर संगठित 
प्रवाह के भ्रन्तर्गत विकसित हो रहा है श्र भ्राज मुक्त-छन्‍्द-रचना का भ्रर्य छन्दहीन रचना 
कदापि नहीं है; बल्कि नये छन्दों के निर्माण के लिए मुक्‍्त-छनन्‍्द ने कवियों का पथ प्रशस्त कर 
दिया है । इसके विपरीत, मुक्त होने के कारण मुक्त-छन्‍्द की सीमाप्नों को समझना कठिन 
भी है; भौर विशेषतः पुराने छन्‍्दों से इस छुन्द का लय-संतुलन ज्यादा जटिल है। परिणाम 


६६ काव्य-धारा 


यह है कि जो मये कवि इसे सरल समझ कर कोरा गद्य लिख देते हैं वे मुक्त-छन्‍्द को बदनाम 
करते हैं। अ्संबद्ध भाव-चित्रों को छोटे-बड़े व।क्यों के टुकड़ों में संकलित कर देने भात्र से मुक्त 
छन्‍्द नहीं बन जाता है। मुक्त-छनन्‍्द केवल एक प्रकार नहीं है। गहुरी भ्रनुभूति, सजग दृष्टिकोण 
झौर तीद्न ज्ञीवन-बोध जिस भावोद्गार के बेग को बोद्धिक संतुलन के साथ जो एफ मुक्त लघ-मय 
रूप प्रदान करते हें वह मुक्तव्छन्द का सहज रूप है। श्रभिव्यक्ति-प्रकार के भ्रराजकरूप को, जो 
मुवत-छन्द या किसी भी छन्द-विधान में प्रश्नय देते हैं, उन पर वृुरुहृता और. कृत्रिमता का श्रारोप 
लगाया जाना स्वाभाविक है। | 

इन प्रकार-भेदों से ऊपर प्रमुख समस्या श्राज के कवि के सामने यह है कि उसकी अनुभूति 
की सीमा में जीवन-जगत की जटिल परिस्थितियों का वह यथार्थ केंसे समाएं। जो उस्चकी 
कला-वाणी में ध्वनित होकर लोक-मानस को भनभनाने में सहज समर्थ हो ? वह फंसे भ्रसावारण 
झनुभूति को साधारण श्रर्थात प्रेषणीय कलात्मक बना सके ? विज्येषतः हिन्दी के नये कवियों के 
सामने यह एक चेतावनी-भरा प्रइन है। क्‍योंकि छायावादी कविता का युग समाप्त हो गया है, 
स्वयं छायावादी कवियों की शैली एक सीमा पर श्राकर श्रपना चमत्कार खो बेठी है। और यह 
भी सत्य है कि छायावादी कविता हिन्दी की श्रेष्ठ कविता रही है श्रोर श्राधुनिक हिन्दी-कविता के 
भ्रग्रदृत छायावादी ही हैं ; फिर भी यह स्पष्ट है कि छायावादी काव्य-शेली श्रब नया चमत्कार 
दिखाने में भ्रतमर्थ है । इस शेली की भाषा ने ही स्वयं उसको झ्ाग बढ़ने से भ्रब रोक दिया है 
झौर नये कवियों क्री भाषा एक तया रूप श्रत्तियार कर रही है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों, 
समास-पुर्ण पदों, श्रन्वय से समर में श्राने वाली वाक्यावलियों की श्रधिकता को उतना स्थान नहीं 
रह गया है जितना छायावादी कविता में था। स्वयं 'निराला' जेसे छायावादी कवि ने नये भावों 
की अभिव्यक्ति के लिए 'नये पते! को रचनाश्रों में छायावादी भाषा के मोह को तोड़ दिया है, 
इसी तरह पन्‍्त के. 'पल्लव' और 'ग्राम्या' की भाषा में अ्रन्तर है। 

छायावाद के इस ह्वास के बाद महत्त्वपूर्ण काव्य-रचना का इसरा नया रूप अभी हिन्दी में 
स्पष्ठ नहीं हो पाया है। प्रत्येक नया कवि, जो सजग और विवेकशील है भर साथ ही कला के 
सामाजिक दायित्व को महसूस करता है साधारणीकरण की समस्या से चिन्तित है। इस समस्या 
को सुलझाने के निमित वह विदेशी कवियों से परामर्श करने के लिए भी मानसिक साहित्य-यात्राएँ 
करता है झौर दूर के चमत्कारों से प्रभावित होकर हिन्दी में नया चमत्कार करना चाहता है । बह 
एज्रा पाउण्ड के पास जाता है श्र टी० सी० इलियट से सलाह माँगता है। कुछ कान में गुरु-मंत्र 
भी लेने पहुँच जाते हैँ । किन्तु बावजूद शभ्रपती कला-सिद्धियों के ये दूर देश के कवि हिन्दी कविता 
पर सीवा प्रभाव नहीं डालते हैं श्रौर जिस ढंग की कविता प्रथन महायुद्ध के बाद अशान्ति और 
शंका के विश्वासहीव भाव से इन कवियों ने लिखी थी बह पुरवर्ती शैलियों की कई विशेषताशों से 
श्रनुप्रारणित थी और उसकी दिलष्टबोधता भी गुण मानी गई। टी० सी० इलियट का “दी बेस्ट लेण्ड' 
सन्‌ १६२२ में युद्धोत्तर कविता के प्रतिनिधि रूप में प्रकाशित हुश्रा था। इलियट अपनी कविता में 
रईसों के तिहासत पर बेठकर इन्सानिवत को देखने का प्रयास करता है, वह वस्तृन्मुखी होकर भी 
अन्त में दान, दयनीयता और नियन्त्रण की वकालत करता है । विकृत छवि-चित्रों को नए प्रतीकों 
के माध्यम से उपस्थित करने में ही इन कवियों ने श्रपती विशेषता दिल्लाई और समाज में नए 
जीवन की सम्भावनाझों पर पर्दा डालने की एक प्रकार से कोशिश की है । वे भी एक प्रकार के _ 
भविष्य श्रौर नई सम्भावना की श्लोर संक्रेत करते हें; लेकिन उनका भ्रनुभान जीवन की ऐतिहासिक 


नई पीढ़ी : नई कविता : दायित्व का प्रश्न ? ६७ 


परिस्थितियों के व्यापक यवार्य पर प्राथारित न होकर भय और प्राशंका के झ्राधार पर खड़ा 
किया गया है । 
नई हिन्दी कविता के लिए इन दूर देश के कवियों के कृतित्व से कुछ सीखने को भले ही 
मिल जाय लेकित हिन्दी कविता का नेतृत्व उनका कतित्व कदापि नहीं कर सकता, श्रौर दूर दूर 
के कवियों के तद्देशीय प्रदोगों को हिन्दी कविता की परम्परा श्ौर परिस्थितियों में सुधार के नुस्खे 
को तरह नहीं इस्तेमाल किया जा सकता । क्योंकि हिन्दी कविता की नई पीढ़ी की परिस्थितियाँ, सम- 
स्पाएँ भ्रौर सम्भावनाएं सिन्‍्न हैं। श्राज भारतीय जीवन जिन ऐतिहासिक परिस्थितियों में से गुजर 
रहा है, बहुत कुछ समान होते दुए भी, उनकी वंसी ही प्रतिक्रिया यहाँ के जन-मानस और जीवन 
जगत पर नहाँ होती है जेसी पाइ्चात्य देशो में होती है । युद्ध, भ्ौर शान्ति, शोषण झोर भ्रत्याचार 
की प्रतिक्रिया पूर्व भौर पश्चिम में एक-सी नहों हो रही है, यह स्पष्ट है। इसलिए कला और संस्कृति के 
में भी जीवन-बोध, श्ौर विश्व-बोध फी सीमाएं भी बदल गई हैं। भारतीय जीवन में बावजद 
झाथिक शोषरणा-जन्य मानसिक पतन के एक विशेष प्रकार की नैतिक उदात्त मानवीय भावना गजती 
रहती है, जो साज्राज्यवाद, पूंजीवाद, झौर श्रव तमाम वादों का, जो मनुष्य के विकास की सम्भा- 
बताझ्रों को रुद्ध फरते हैँ, किसी न किसी रूप में विरोध करती है। इस उदात्त नतिक जीवन स्वर 
की चेतना केवल रुग्ण-समाज के मानस-चित्रों की विकृत प्राकृतियाँ खींचने में नहीं दिखाई दे सकती 
है । उसके लिए नए कवि को, झपने देश, भ्पनी परिस्थिति, भ्रपनी जमीन पर खड़ें होकर विद्व- 
जीवन के मर्म को समझना पड़ेगा-- यह रास्ता कृतिकार का रास्ता है श्र दूसरा रास्ता अ्रनुकृतिकार 
का रास्ता है । 
भ्ाज केवल “निज कवित्त केहि लाग न नीका' के आधार पर अ्रपने को नया कवि मानने 
के लिए दलबन्द साहित्यिक प्रयत्नों का जो सूत्रपात नई कविता के नाम पर हुआ है, उससे बचकर 
ही नई कविता अपने विकास की सम्भावना्रों के मार्ग पर झागे बढ़ सकती है। साधारण जीवन 
से भ्रसाधारण यथार्थ का चुनाव, उसको फिर नए सजीव सार्थक प्रतीकों के माध्यस से जन-मानस तक 
पहुँचाने के साधारणीकरण के कलात्मक प्रयास में ईमानदारी से लगकर ही नए कवि नई कबिता 
को नए युग-सत्य का सन्देशवाहक बना सकते हें । इसके विपरीत कविता को किन्हीं संकीर्ण सीमाश्रों 
में कंद करके रीतिकालीन प्रवृत्ति का नया संस्करण प्रस्तुत करना कविता में नयापन नहीं पैदा कर 
सकता है। हिन्दी कविता के नयेपन को सजाने संवारने, श्रौर सजीव बनाए रखने का उत्तरदायित्व 
उल सभी नए कवियों पर है, जो कला झोर जीवन के प्रति जागरूग दृष्टिकोण रखते हें श्रौर ईमा- 
नदारी से कला-साधना के पथ पर श्नग्नसर है, फिर चाहे बे मुक्त-छन्द में भ्रपने को प्रगट कर सके चाहें 
गीतों की तान में । लेकित इतना जरूर है कि जिन कैला-रूपों और काव्य-परम्पराप्रों की पर्याप्तता 
झ्राज असिद्ध हो गई है, उनसे भ्रागे ही हमको क़दम उठाना होगा, पीछे नहीं । 
झ्ागे कदम बढ़ाने का भ्रर्य यह नहीं है कि परम्परा के जित आझाधारों पर हिन्दी कविता 
का नया रूप नये कला-पयों का निर्माण कर रहा है, उन झ्राधारों की शिल्पकारियों श्रौर विशेषताओं 
को जात-बूझूकर फंशनपरस्ती में त्याज्य घोषित किया जाय; लेकिन साथ ही सम्प्रति को श्रदम्य 
.. झ्ावश्यकता और भविष्य की उदात्त सम्भावना को ययार्य रूप से भ्रभिव्यक्त करने में यदि विगत 
_. को कुछ विज्येषताएँ नए कला-संस्कार के पथ में रोड़ा बनकर प्राती हें तो स्वाभाविक है कि उन्हें 
.. छोड़ना ही पड़ेगा; बल्कि तोड़ना भी पड़ेगा । नई कविता का स्तर ऊंचा करने के लिए तथाकथित 


६८ काव्य-घारा 


उपेक्षा के बुर्जुआ संस्कार से ऊपर उठना होगा। नई कबिता लोक-मानस की तृप्ति तभों कर 
सकेगी जब कि बह प्रेषणीय भी हो श्रौर साथ ही कला के नव-विकास के साथ-साथ लोकरुचि का 
संस्कार करती चले । केवल लोक-मानस की क्षण्िक तृप्ति करने वाली कविता को सफल समभकर 
जनवादी बताना जन-जीवन के सांस्कृतिक विकास की सम्भावनाओरों को रुद्ध करना है श्रौर इस तरह 
सस्ती लोकप्रियता का मार्ग जन-विरोधी मार्ग है। इसमें शक नहीं कि लोक-मानस की तृप्ति के 
साथ-साथ कला का नया विकास करना और उसके श्रतुसार ही लोक-मानस के कला-प्रिय संस्कारों 
को उन्‍तत बनाते चलना जटिल श्रौर कठिन कार्य है; लेकिन नई कविता भर नई पीढ़ी के सामने 
सबसे बड़ा दायित्व यही है। इस दायित्व की गम्भीरता को ईमानदारी से भ्रनुभव करने पर स्पष्ट 
हो जाता है कि जो नये कवि श्रपनी कविता की कृत्रिमता और दुरूहता तथा जीवन-बिरोधा 
दाशंनिकता का औचित्य समय की परिस्थितियों में खोजते हें श्रोर कहते नहीं थकते कि परिस्थितियां 
का प्रतिबिम्ब ही उनके मानस पर ऐसा पड़ता है कि दुरूहता श्ौर कृतन्रिमता ही उतकी नई 
कविता के गुर हैं, तो वे स्वयं श्रपनो कला-गअ्रक्षमता और जन-विरोधी बुर्जुआ फंशनपरस्ती का नंगा 
रूप सामने रखकर अपनी उत्तरदायित्वहीनता के प्रति क्षमा की भीख-सी माँगते दिखाई देते हैं । यह 
एक दयनीय स्थिति है श्रौर इस स्थिति से मुक्त होने का एक ही मार्ग है कि ईमानदारी से वे अ्रपने 
दायित्व को भ्रनुभव करें । नई कविता के विकास ओर निश्चित रूप-निरूपरा की तमाम सम्भावनाएँ 
नई पीड़ी का अपने दापित्व के प्रति ईमानदार रहते पर निर्भर करतो हैं ? 


 - ऑििओं 


रहस्य-उद्घाटन 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत मन, यह भ्रसफल जन, यह संश्लथ तन, 
हिय में यह अम्बर-विहरण रण, यह टटे उड्डीयन-साधन ! 


क्र) 
पंख नोच पटका मानव को, किसी खिलाड़ी ने धरती पर, 
पर होती रहती हे उसके, अन्तर में पंखों की फर-फर, 
पृथिवी माता ने पहनाई उसे बेड़ियाँ आकर्षण की, 
और किसी ने सुलगा दी है हिय में चिनगी संघर्षण की, 
परवश है, पर चाह रहा है यह करना रहस्य-उद्घाटन, 
यह आकुल मन, यह अति लघुजन, पंखहीन यह, यह संश्कथ तन ! 


(२) 
निगड़-बद्ध मानव के युगपद, पाश-बद्ध मानव के युग भुज; 
और सतत, आक्रान्त किये हैं उसे एक अभिशाप-ताप-रुज, 
जिसे मेदिनी ने जकड़ा हें, तुच्छ समझता जिसे प्रभंजन-- 
और नियति ने डाल दिए हें जिसके रोम-रोम में बन्धन-- 
उसी द्विपद को नील गगन ने भेजा है उड्डीन-निमन्त्रण ! 
गूँज रही है उसके हिय में पंखों की सन-सन-सन-सन-सन !! 

(लक) 
मानव रहा न जाने कितने युग-युग लॉ सोया-सोया-सा; 
क्या हिसाब कितने युग से वह विचर रहा खोया-खोया-सा ? 
किन्तु नींद में भी तो उसने देखे उड़ने के ही सपने ! 
झौ' संतत विचरण में भी तो रहा खोजता डेने अपने !! 
नहीं पा सका हे श्रब तक भी अपने पंख और अपनापन, 
यहू रहस्य-उद्घाटदन-रत-मन, यह प्रसफल जन, यह संश्कथ तन ! 


5०9 


काव्य-धारा 


हक 
बया जाने कितनी लम्बी है उसकी यात्रा की पगडंडी ? 
क्या जाने कितना कर आया माग्गे-क्रण भ्रब तक यह दंडी ? 
नित देशाटन, सतत परिब्रजन, संतत चलन, दिग्भश्रमण क्षण-क्षण, 
सतत अतन्द्रित निमिष-गणन यह, यह दिककाल-संकलन क्षण-क्षण, 
यही रहा है मानव का क्रम, यही नियति का हैं रेखांकन ! 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, कर-कर भ्रमण हुआ संइलूथ तन! ! 


( ५ ) 
पीछे मुड़कर कौन निहारे कितनी दूर आ चुका मानव ? 
करता है स्वीकार गणित भी इस दिशि अपना पूर्ण पराभव ! 
भागे की भी कया गिनती हो जहाँ, सकुचते हें मनवन्तर ? 
जहाँ ब्रह्म-दिन भी छोटे हें, लघु हें द्युति-वर्षों के अन्तर !! 
इस महान दिक-कालाणंव में मानव करता सतत संतरण, 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यह असफल जन, यह संश्लथ तन! 


ही, 
मानव की भोली में संचित हें कितने ही कंकड़-पत्थर, 
जो कुछ मिला पन्‍्थ में, उसने वह सब उठा लिया है सत्वर, 
यह सब संचित बोभ युगों का टाँगे वह अपनी लकुटी पर, 
भुका भार से चला जा रहा, नाप-नाप पथ-लीक निरन्तर ! 
इतने पर भी गूंज रहे हें हिय में 'नेति-नेति' के ही स्वन !! 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, सुन-सुन होता क्षण-क्षण उन्मन! ! ! 


| के 
मानव ने विसुष्टि लीला लखपूछा निज से 'कासा ? को5हं ?? 
मानव अपने अन्तस्तल में निरख, कह उठा 'साहँ ! सोऊहं !! 
इस 'को5हं ? सो5हं' की भ्रब॒ तक रार मची है अन्‍न्तस्तल में, 
'नेति' और 'इति' जूक रही है मानव के इस हृदय-विकल में ! 
यह रण व्यस्त कर रहे उसके रोम-रोम, श्रोणित के कण-कण, 
है रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यद्यपि है संश्कथ मानव-तन; 
हे 
जगत-रूप हृदयंगम करने कहाँ-कहाँ दौड़ाई निज मति ! 
कितनी प्रखर साधना उसकी, श्रति प्रचंड विज्ञान-ज्ञान-रति !! 


काव्य-घारा 


एक-एक कर दूर हटाए प्रकृति-नतंकी के अन्तर-पट, 
किन्तु ग्रभो तक इतने पर भो मिटा न रंच यवनिका-संकट ! 
परदे में हो रही प्रकृति की नृत्य-चलित पाजन की भन-भन! ! 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, सुन-सुन होता क्षण-क्षण उन्मन! ! ! 
$:7$:) 

लोलामयी प्रकृति मातव से खेल रही है भ्राँख-मिचौनी, 
औ' मातव है, अपिहित लोचन, जड़गुण-बद्ध, स्तब्घ, भ्रति मौनी ! 
ऐसा खेल कि रहता ही है संतत दांव इसी मानव पर, 
मानव के शिर पर है मंडित जिज्ञासा अभिशाप, भयंकर । 


कहाँ जाय ? किस दिशि यह भाँके ? ढंढ़े कहाँ ? किसे यह क्षण-क्षण ? 


यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यह असफल जन, यह संश्लथ तन! 
( १० ) 
कभी कुहुक आई अम्बर से, ढूंढ़ों' यों बोले सब उड्गण, 
मानव ने उद्ग्रीवी होकर उधर उठाएं अभ्रपने लोचन, 
इतने में 'ढदूढ़ो ! दृढ़ो !' के आए स्वर पाताल अतल से, 
मानव ने घबड़ा कर मोड़े, अपने युग-दुग चकित अबल से, 
किन्तु उसी क्षण दिशि-दिशि गूंजा दूंढ़ों! ढंढ़ों! का यह गुंजन, 
किधर निहारे किसको ढूँढ़े, यह बौराया-सा जन उन्मन ? 
| कि, 
बाहर तो, 'इंढ़ो-दढ़ो' की सब दिशि यह गुंजार भरी हैं; 
पर, भीतर भी यही महाध्वनि मन्थन-शीछर अ्रपार भरी है; 
लखों चतुदिक वह पागलर-सा शभ्राकुल मानव डोल रहा हे, 
अपने युग-युग के यत्नों को निज दुग-जल में घोल रहा है; 
उसे दिखाई फड़ा सभी दिशि, अपने हिय का संतत कंपन, 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, अमित हुआ हे, हे संइलथ तन; 
( १२ ) 
यह गंभीर सृजनाणंव दुस्तर परम अगम फंनिछ चिर पंकिल ! 
लहराते जिसके अन्तर में नित्य सनातन प्रश्न तिमिंगिल ! ! 
“कुत आजाता इयं विसूष्टि: ?' .'क इह प्रवोचत ?' अ्रहो 'बेद कः ? 
“अस्थाध्यक्ष: परमे व्योमनि अंग, वेद यदिवान वेदसः ?”* 
अपना मुख फंछाए आए सम्मुख ये चिर प्रश्न पुरातन ! 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, है संडकूथ तन, है भ्रति उन्मन ! ! 


७र्‌ 


काव्य-धारा 


| १३) 
यों बन आई अभ्रतिथि; मनुज के हिय में यह विदेशिनी पीड़ा, 
यों मानव अपने को भूला, भूल गया वह अपनी ईड़ा ! 
चिदानन्द-मय अभ्रपनी सत्ता उसने अ्रपनें से बिसराई; 
प्रन्‍ों की उलभन में पड़कर अश्रपनी विषपदा और बढ़ाई; 
किन्तु श्रेंजा है मानव-दुग में ऊहा-पोह-व्यथा का अ्रंजन, 
झ्रत: रहस्योद्घाटन-रत-जन, है उत्सुक यद्यपि संइलथ तन; 


( १४ ) 
मानव की जिज्ञासा की है साक्षी स्वयं प्रकृति कल्याणी, 
युग-युग से हुंकारें करता चला आा रहा है यह प्राणी ! 
यह भीषण दिक्‍्काल-प्रहर उस ध्वनि-ध्यान से चिर, कंपित है !/ 
लख मानव के यत्न निरन्तन प्रखर प्रभाकर भी स्तंभित है !! 
देख-देख कर इस वामन को अ्रमित चकित हें नभ-तारक-गण, 
यह रहस्य-उद्घाटन रत-जन, चला जा रहा है संश्छथ तन; 


(१५ ) 
अम्बर काँपा अवनी काँपी, काँप उठे नभ के सब तारे, 
इस मानव की “न-इति न-इति' सुन, सभी लोक-लोकान्तर हारे, 
काल केपा, आकाश कप उठा, सुन-सुन इसकी “न-इति' हठीली, 
सबने देखा, है मानव की ग्रीवा उन्‍नत, यदि रूचीली । 
इतिहासों के पन्ने भी हें मानव का कर रहे संस्मरण, 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, चला जा रहा है संश्लथ तन; 


(१६ ) 
कोटि-कोटि ज्योतिवंषों तक फंला है विस्तार मनुज का, 
कहाँ-कहाँ तक पहुँच चुका है अ्रति तनु मन इस द्विपद द्वियुज का! 
विस्तुत है इसकी लीला, रलूघु विद्युन्मणि से ब्रह्मांडों तक; 
इसके महाकाव्य की गाथा पहुँची हैँ अ्रगणित कांडों तक ! 
किन्तु पता क्या कितने गहरे, और करेगा यह अ्रवगाहन ? 
यह रहस्य-उद्घाठन-रत-जन, यह अश्रति उन्मन, यह संश्लथ तन ! 
( १७ ) 
ग्रमित ज्ञान भंडार युगों के यत्नों से संचित कर पाया, 
यह मानव निज रिक्त कोष को नाना रत्नों से भर लाया, 


काव्य-घारा 


जहाँ सभी दिशि इस अ्रग-जग के स्फुरणों में था केवल संभ्रम 
जहाँ अंध व्यस्तता मात्र थी वहाँ लखा इसने कारण-क्रम! 
निरलंकृता प्रकृति को इसने पहनाये नियमों के कंकण 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन फिर भी फिरता हैँ नित उन्मन ! 
सी, 
किन्तु पैठ गहरे जो झांका तो नियमितता हुई तिरोहित, 
केवल देवायत्त भावना होने छूगी पुनः आरोहित; 
पशु स्फुरणकारी पदार्थ कुछ जग में मानव ने देखा है 
जिसे दीप्ति-सक्रिय तत्त्वों' की श्रेणी में उसने लेखा है 
होता रहता इन तत्त्वों के अणुओं का नित संघति-भेदन*, 
इसे निहार पूछ उठता हे; 'क्यों-क्यों इस जन का उन्‍्मन मन? 
(7१९ )| 
जिसे कराल कार मेटेगा अहो कोन-सा अणु विशेष वह ? 
क्‍यों संघति-मेदन होता है, क्‍यों होता है अणु अशेष वह ? 
इन प्रइनों का नहीं दे सका उत्तर यह मानव विज्ञानी 
यादिच्छक भ्रणु-भेदन लीला * अब तक नहीं किसी ने जानी 
कहो क्‍यों न अ्रकुलाये मानव देख-देख यह पटावरण घन ? 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, पंख-हीन यह, यह संश्छथ तन !! 
(२० ) 
मानव ने विद्युन्मणियों को देखा नयनों में अ्रचरज भर, 
मानो विश्व भरा गया सम्मुख अपना मूतं रूप ही तज कर; 
ज्योति-किरण तो थी तरंगमय, अब घनत्व भी हुआ तरंगी, 
मानों ऋण विद्युन्मणियों” में बना रही ब्रह्मांड अनंगी । 
लुप्त हो रहे हें क्या जग से मूतं-अमूर्त रूप के बन्धन ९ 
पूछ रहा हे यह आकुलछ-सा यह रहस्य-उद्धाटन-रत जन ! 


( २१ ) 
असन्‍्तोष है इस मानव को सारे जग के इस सपने से, 


झ्रौ' जग की क्या करे शिकायत, असन्तुष्ट हे वह अपने से । 


१--दीप्ति-सक्रिय तत््व--रेडियो एक्टिव सबस्टेन्स, जेसे रेडियम इत्यादि । 
२--भणु-संघति-भेवन---डिस्ट्न्टी प्रेशन भ्रॉफ एटम । 
३--प्रणु-भेदन लोला--स्पोस्टेनियस डिस्ह्न्टीग्रेशन । 
४--ऋणविद्युन्मरियां-- एलेक्ट्रोन्स विद्युत्करा जो पभ्रणुओं से भी सूक्ष्म है । 


७४ 


काव्य-धारा 


यह भ्राया है करने इतने ब्रह्मांडों का तत्त्व-निरीक्षण, 
किन्तु मिले हैं निपट अधूरे उसे इन्द्रियों के यह लक्षण। 
इतने क्षुद्र, भ्रसंगत इतने, ये विज्ञान-ज्ञान के साधन ! 
तब फिर क्यों न हृदय में खीभे यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन ? 
(९३२ ) 
श्रोत, चक्षूु, रसना, स्पशेन, मन, घछ्राण केवल यह मानव, 
सुलभा रहा उलभने जग की, खोज रहा है अचरज नव-नव, 
किन्तु साथ ही नई समस्या मानों उपजाता जाता है; 
एक प्रइन सुरूका कि दूसरा उसके संनिधान आ्राता है । 
साँक-सवेरे रहती ही है सम्मुख एक पहेली नूतन ! 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन उलभन में उलभा है प्रतिक्षण! ! 
| २३ 0) 
जाना है जगरूप मनुज ने, इन लघु इन्द्रिय-उपकरणों से; 
कार्य और कारण की लड़ियाँ उसने गथी हें स्मरणों से, 
पर, यथार्थता क्या हैं ? यह जो हैँ केवल इन्द्रिय-संवेदन ?? 
पूर्वोत्तर का घटना-क्रम ही, हैं क्या कारण-कार्य-विवेचन ? 
ये प्रश्नावलियाँ सदियों से करती हें मानव-हिय-मन्थन, 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, यह संश्लथ तन, यह नित उन्मन; 
$ बएए + 
ये इन्द्रियाँ कभी कया देंगी हमको यथार्थता का परिचय ? 
नयनों से देखा है जिसको, है क्‍या वही वास्तविक निश्चय ? 
प्रकृति विछोकी जब आँखों से, तब क्या देखी! केवल राई ! ! 
तब अवलोकी इक छल-छाया ! देखी बस केवल परछाँई !! 
दृश्य सत्य हे तो सपना भी है यथार्थ का पूर्ण प्रकेतन ? 
यों विचार कर रहा युगों से यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन । 
( २५ ) 
नयनों ने घनत्व देखा था, नयनों ने तारल्य निहारा, 
पर, मानव के गहन ज्ञान ने यह सब भेद मिटाया सारा, 
झब देखा कि जगत है केवल धन और ऋण विद्युत्कणिका-मय; 
झ्रौ' विद्युन्मणियाँ भी ऐसी जिनका कठिन वास्तविक परिचय; 
ऐसो मणियाँ, होता रहता जिनका प्छवन बिना ही कारण; 
तब फिर कारण-कार्ये तक॑ का जन-हिय से हो क्‍यों न निवारण? 


काव्य-घारा 


( २६ ) 
यों इन्द्रिय-गण की परिगणना, यों मन का घटना संश्लेण, 
हिय को जेंचे अधूरे ये सब, ये जग के सब रूप-विशेषण ! 
किन्तु क्या करे ? थक कर बेठे क्या यह मानव हिय-हारा-सा ? 
अपनी भौतिकता को कंसे करे क्रमित यह बेचारा-सा ? 
भूतग्रस्त है जो, वह कंसे भौतिकता का करे उत्क्रमण ? 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, सोच रहा है यों अपने मन; 
( २७ ) 
क्या हैं स्रोत ज्ञान का ? पूछा यों जब मानव ने अपने से, 
तो आई इक ध्वनि कि ज्ञान है केवल इन्द्रिय के कंपने से ! 
बोल उठा भोतिक विज्ञानी, हें इन्द्रियाँ ज्ञान की साधन, 
इनके बिना कहो कंसे हो मानव का यह ज्ञानाराधन, 
मानव ने अपने स्वरूप के सुने तक्कंमय ये सब प्रवचन, 
किन्तु तत्त्व-उद्घाटन-रत-जन, पा न सका सन्‍्तोष शान्ति-धन! 
( २८ ) 
क्या हैं वे इन्द्रियाँ कि जिनने दिया ज्ञान-भण्डार अतुल यह ! 
क्या हैं केवल साधन ही, यों बोला मानव झाकुल यह ! 
कहो, इन्द्रियों से ही केवल ज्ञान-नोदना कंसे जागी ? 
केवल यह उपकरण-समुच्चय कंसे बना ज्ञान-अनुरागी ? 
क्या विज्ञान-ज्ञान का होता हैँ केवल इन्द्रिय-संवेदन ? 
पूछ रहा है श्राज अथक-सा यह ॒रहस्य-उद्घाटन-रत-जन ! 
$+ दे... 
झादि-मनुज ने रूपट देखकर अग्नि बनाई सदन-लालिता ! 
वह भी कौन प्रेरणा जिसने कहा : करो तुम वन्हि-पालिता ? 
आदि-मनुज ने पशुगण देखे, उन्हें बनाया निज-अनुगामी ; 
वह कया थी प्रेरणा कि जिसने कहा : बनो तुम इनके स्वामी ? 
यह जो आदि प्रेरणा हिय में, हे यह भी क्‍या इन्द्रिय-स्पन्दन ? 
अयवा यह है ज्ञान अभौतिक ? पूछ रहा है यों जन-उन्मन ! 
0 
अपने को उपकरण-समुच्चय कंसे माने मानव-पश्राणी ? 
जब कि विचार और चिन्तन की उसने पाई अभ्रमर निशानी 


चर 


रद काव्य-बारा 


मनुज कर रहा है घोषित यों: भरे, नहीं हूँ भूत-संघ में ! 
में हूँ सांग उपकरण-संयुत, पर फिर भी हूँ नित-प्नंग में ! ! 
इसी नित्य प्राप्तव्य ध्येय की ओर जा रहा है यह रूघु जन, 
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, पंख-हीन यह, यह संइलूथ तन !! 


७७68 
सुमित्रानन्दन पन्‍्त 
नव अरुणोदय 

तुम कहते, उत्तर बेला यह, कभी न निज हित सांचा क्षण भर 

में संध्या का दीप जलाऊ ! क्यों प्रभाव, क्‍यों देन्य घृणा ज्वर 
तुम कहते, दिन ढलने को अरब, अ्रब क्या तारों के खँडहर में 

में प्राणों का अ्घ्य चढ़ाऊं ! नग्न व्यथा की गाथा गाऊँ ? 
मेरा पंथ नहीं, में कातर देख दिवाकर को अस्तोन्मुख 

ज्योति क्षितिज निज खोज बाहर, पंकज उर होता अंतमुख, 

रहा देखता भीतर, अ्रब क्या युग-संध्या, तम-सिंधु , छास-तट, 

तथ्यों का कटु तम लिपटाऊं ! स्वर्ण-तरी किस तीर छगाऊँ ? 
मेंने कब जाना निशि का मुख ? में प्रभात का रहा दूत नित, 

प्रथक्‌ न सुख से ही माना दुख, नव प्रकाश संदेशवाह स्मित, 
अंधकार की खाल ओोढ़ अरब नव विकास-पथ में मुड़ में अब 

कज्जल में सन प्राण तपाऊं ? क्यों न भोर बन फिर मुसकाऊं ? 


जग-जीवन में रे अस्तोदय, 

में मानसधर्मी, अक्षय वय 
आओ, तम के कूल पार में 

नव अरुणोदय तुम्हें दिख्लाऊ ? 


४ नं 32... 


काब्य-घारा ७ 
बाहर-भीतर 
यह छोटा सा घर का आँगन, डाली पर उड़ गाती कोयल, 
जहाँ राम की अभ्रदूभुत माया भर पड़ते झाशा के कोंपल, 
कभी धूप है तो फिर छाया,--- ज्ञात नहीं, कब क्‍या हो जाए, 


भाव-अभावों का जग उन्मन ! 
अपने ही सुख-दुख से निर्मित 
गृह-कलहों वादों से कंपित, 
क्षण आ्राशा ने राश्य प्रतिफलित 
चित्त-वृत्तियों का लघु दपंण ! 
यहाँ उदय होकर दिन ढलता, 
जन्म-मरण सँग जीवन -पलता, 
तुतलाता, घुटनों बल चलता, . 
. खेल-कूद, भर हास कल रुदन! 
सूरज चाँद,--दूब पर हिमजल, 
तितली, फूल, गज, रँग, परिमल, 
चिड़ियों की उड़ती-परछाई, 
आते जाते विधि पाहुन बन ! 


/ 


सेंग-संग फिरते प्रछय झौ' सृजन ! 


जीवन का चंचल यथार्थ छल, 
भरता रीता होता अंचल, 

मधु पतझकर खिलते कुम्हलाते, 
भोर-साँक बिलमाते कुछ क्षण ! 


इस आँगन के पार राजपथ, 

चलता महत्‌ जगत जीवन-रथ, 
दिशि-दिशि के कलरव कोलाहल 

उपजाते नित नव संवेदन ! 
दूर, मंजरित खुले क्षितिज पर 

नील पंख फैलाए अंबर 
उड़ता उड़ता उड़ता जाता, 

बिठा पीठ पर मानव का मन ! 


भू को अंधकार का है भय, 


शिखरों पर हँसता अरुणोदय, 
युग-स्वप्नों की चाप सुनहली 
. भरती उर में गोपन स्पंदन ! 
््छ 
रामधारीसिंह दिनकर 
चाँद ओर कवि 
रात यों कहने छूगा मुझसे गगन का चाँद, जानता है तू कि में कितना पुराना हूँ ? 


आदमी भी क्‍या ग्रनोखा जीव होता है ! 
ह उलभनें अपनी बनाकर आप ही फंसता, 
. और फिर बेचैन हो जगता न सोता है । 


में चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; 
और लाखों बार तुमसे पागलों की भी 
चाँदनी में बेठ स्वप्नों पर सही करते । 


उप काव्य-धारा 


आदमी का स्वप्न ? हे वह बुलबुला जलका, में न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, 


झ्राज बनता और कल फिर फूट जाता है; 
किन्तु तो भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो ! 
बलबुलों से खेलता कविता बनाता है ! 
में न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, 
चाँद ! फिर से देख, मुभको जानता है तू ? 
स्वप्न मेरे बुलबुले हें? है यही पानी ? 
आग को भी क्‍या नहीं पहचानता है तू ? 


भाग में उसको गला लोहा बनाती हूँ; 
भ्औौर उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, 
इस तरह, दीवार फौलादी उठाती हूँ। 
मन्‌ नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने जिसकी 
कल्पना की जीभ में भी धार होती हैं; 
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल, 
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है । 


स्व के सम्राट को जाकर खबर कर दे, 
“रोज ही आकाश बढ़ते जा रहे हैं ये; 
रोकिये, जेसे बने, इन स्वप्नवालों को, 


है 


स्वगें की ही ओर बढ़ते श्रा रहे हैं ये ।” 


दर्पण 


जा रही देवता से मिलने ? 
तो इतनी कृपा किये जाओ। 
अपनी फूलों की डाली में 
दपंण यह एक लिये जाओ। 
आरती, फूल, फल से प्रप्तन्न 
जेसे हों, पहले कर लेना; 
जब हाल धरित्री का. पूछें, 
सम्मुख दर्पण यह धर देना । 
बिम्बित है इसमें पुरुष पुरातन 
के मानस का घोर भंँवर; 
है नाच रही पृथ्वी इसमें, 
हें नाव रहा इसमें अम्बर । 
यह स्वयं दिखायेगा उनको 
छाया मिट्टी की चाहों की, 
अ्म्बर की घोर विकलछता की, 
धरती के झ्राकुल दाहों की । 


ढहती मीनारों की छाया, 
गिरती दीवारों की छाया, 
बेमौत हवा के भोंके में 
मरती भंकारों की छाया । 
छाया छाया - ब्रह्माणी की 
जो गीतों का शव ढोती है, 
भुज में वीणा की लाश लिये 
आतप से बचकर सोती है । 


फाँकी उस भीत पवन की जो 
तूफानों से है डरा हुआ; 
उस जीर्ण खमंडल की जिसमें 
ग्रातंक-रोर है भरा हुआ। 
हिलती वसुन्धरा की राँकी, 
बूभती परम्परा की भाँकी; 
अपने में सिमटी हुई, पलित 
विद्या अनुवेरा की भाँकी । 


काव्य-धारा 


भाँकी उस नई परिधि की जो छिलके उठते जा रहे, नया 
है दीख रही कुछ थोड़ी-सी; प्रंकुर मुख दिखलाने को है; 
क्षितिजों के पास पड़ी पतली, यह जीर्ण तनोवा सिमट रहा, 
चमचम सोने की डोरी-सी । ग्राकाश नया झाने को है । 
क्‍ ७ 
उदयशंकर भट्ट 
चला चल पड़ा 


चला, चल पड़ा साँस के पंख बाँघे, 
थका भी रुका भी, न पर हार मानी । 
हृदय में उमंगें तरंगित नदी-सी, 
प्रबल कामना-ज्वार भर बह रहीं थीं, 
नयनहीन गति झ चरणहीन आशा, 


दिवस की किरण से कथा कह रही थी । 


नये स्वप्न अंकुरा रहे थे हृदय में, 
नये गीत हर ताल पर चल रहे थे, 
नये भारवाही चरण पथ बनाते, 
क्षणों की सजग साँस में पल रहे थे, 
दिशाएँ हृदयहीन ग्राकाश चंचल, 
दिवस मूक गतिमान्‌ में चछ रहा था, 


तिमिर से घिरा पंथ जग का मरण बंध, 


तन प्राण को घेर कर छुल रहा था, 

चरण भी थके, पंथ निश्वास बोभिल, 
हिमालय भड़े चल रही पर कहानी, 
, चला, चल पड़ा साँस के पंख बाँघे, 
.. थका भी रुका भी, न पर हार मानी । 
.. मिला रूप ढलता गगन गवं-सा गत, 

._ छुलकती सुरा चाँदनी में नहाया, 

| प्रणय कोर गीला किये वासना की 

._ अबुर प्यास ने तुप्ति का दम्भ पाया, 
._ भटकता रहा पंथ में भ्रन्त तक में 


नधुव्र ही मिला, लक्ष्य ही हाथ आया, 
मचलता रहा उग्र यौवन उफन कर, 
प्रवधिहीन हर प्यास ने आ जलाया, 
जला में मगर कामना जल न पाई, 
निशा ने तिमिर स्वप्न में ला सेंजोये, 
विवश कोर में नैन के ज्ञान भीगे, 
अचल प्राण डूबे सभी स्वप्न खोयें, 
सभी दृष्ट्रि-पथ में पड़े रोकते पर, 
रुके ये नहीं प्राण मेरे भिमानी, 
चला, चल पड़ा साँस के पंख बाँघे, 
थका भी रुका भी, न पर हार मानी । 


बहुत-कुछ सुना औ' सहा भी बहुत-कुछ, 
बहुत-कुछ कहा अनकहा भी अ्रभी है, 
मिला जो नहीं अन्त है प्राप्ति का वह, 
बहुत-कुछ भ्रदेखा अचाहा भ्रभी है, 
उदधि हे भतल चाह का, बाहु निबंल, 
तलातल कहीं भी किनारा नहीं है, 

न है लक्ष्य वह जो जिसे लक्ष्य माना, 
सहारा मिला, वह सहारा नहीं है, 
उमड़ती घुमड़ती घटा घिर रही है, 
पवन से मचल चांदनी में बिहँसता, 
बिखर जायगा फूल जी भर खिला जो, 
वही क्षण सही है जहाँ दे सका में, 


छह 


छ० काव्य-धारा 


किसी मूक को एक क्षण मुक्त वाणी । 
चला, चल पड़ा साँस के पंख बाँधे, 
थका भी रुका भी, न पर हार मानी । 
दिवस चल रहा है, निशा चल रही है, 
उमगती उमगती उषा चल रही है, 
घटा घेर पाती नहीं काल-जीवन, 
नियति की निरन्तर कशा चल रही है 
सभी स्वप्न पूरे न होते किसी के, 

यही भेद है स्वप्न में जागरण में, 


धका भी रुका भी, न पर हार मानी। 


घिसटते चरण कल्पना दोड़ती है, 
यही भेद हे चाह में आचरण में, 
सृजन भर, मरण के तटों में गसी-सी, 
झ्रतल प्राण जीवन-नदी बह रही हैं, 
बनाई स्वयं दुःख की ग्रंथियों में, 
विवश चेतना वेदना सह रही हैं, 
प्रजय काल-पथ पर विजय के चरण 
में चलू गा मिले सिद्धि मेरी अजानी । 
चला, चल पड़ा साँस के पंख बाँधे, 


शिव : विवेक 


स्वर्ग गा की रजत धार 
तारक समय उत्थित, 
मथित व्यग्र, 
हीरक सी मंजुलू, 
कण कण वंजुल, 
लुलित लद्र से- 
कल कल कल कल 
बरसी, 
सरसी प्लावित, 
अ्स्थिर अ्रस्थिर जलकण भरे, 
भरे आशाएँ, ह 
धौत भाल पर, नग विदज्ञाल पर, 
हिमनग पर गिर 
बही, 
रही झा, भंक मयंकित, 
सित माला-सी, 
द्युतिबाला-सी । 
रवि की किरणों से विभ्राजित, 


क्षीर नीर ले चली धरा की और 
काटती कोर तर्टो के 
घोरशोर से 
कंपित गति 
झयति नियति की- 
एक टेक-सी, 
नव जीवन ले, 
नव स्वप्लों की, 
नव विभवों की मंजरियों पर 
कूल काटती, 
पन्‍्थ छाटती, 
हर हर हर हर- 
हरती खड़े अड़े तरु वल्कल, 
पल पल पल पल- 
चली, बनाती भरी उतरती 
मूधर पर पन्‍्था की अनुगति; 
चली इधर फिर, पु 
चली उधर फिर, 


काव्य-घारा 


भूपर आई, मेदानों में, खलिहानों में, मनमन्धन से 


रुकी-फुकी, फिर उठी, वही फिर, नवस्वरूप ले 
नव स्वर घघंर, प्राणरूप ले 
और साथ ले असम वितम से- उदधिफेन-सम 
निर्मम जड़तर, अनघड़ तिरछे- उभर उभर ऊपर 
ऊँचे नीचे- उठ आया 
शिला-खण्ड ले, हृदय हृदय करता अभिषेक- 
बज्य्र-दण्ड ले, । समुज्वल जीवन धन में, 
अपने भीतर लाई; एक मार्गंद्रष्टा स्रष्टा इस जग का, 
जो टकराते जल प्रवाहसे, जन-जन के पथ का निर्माता 
तट से, तलसे, महानाश से नर का त्राता, 
अतल वितल से, श्रेय और विश्रेय प्रेम के- 
ऊँची-नीची राह-राह से, मानव के अतिश्रेय ध्येय के, 
बहते बहते काल पारकर उज्वल पावन जीवन में, 
बहते आये और बन गए गोल- झनमोल गोल, 
भव्य अनमोल, नव शिव सा सुन्दर, 
नये शिव छविकर सुन्दर । छविभर स्वर अतिरेक 
» >< >< प्राण की मेख, 
और इधर मानव-मन-गंगा समुज्ज्वल स्वयंविवेक । 
उठ उठ घषंण से, >< >< >< 
काम क्रोध के, लोभ मोह के, दोनों ही से हुआ विश्व-कल्याण, 
क्रिया-विक्रया चिन्तन-तट से, एक मन्दिर में बेठा भव के आकर, 
मानस द्वन्द्व धार मषंण से, और दूसरा मन-मन्दिर में, 
चलित मथित स्वर्ग प्रसव करता मानव में 
विगलित भीतर-बाहर सभी विश्व में 
मतिम्रम से स्वर्ग और अपवर्ग । 
ऋ्रमविक्रम से 


दर 


काज्यन्धारा 


भगवतीचरण वर्मा 


अजोने हैं ! 


चहल-पहल की इस नगरी में, 
हम तो निपट बिराने हें-- 
हम इतने भज्ञानी निज को 
हम ही निपट अजाने हें। 
इसीलिए हम तुमसे कहते 
दोस्त हमारा नाम न पूछो, 
हम तो रमते-राम सदा के 
दोस्त हमारा गाम न पूछो ! 
एक यन्त्र-सा जो अदृश्य के 
हाथों से संचालित होता-- 
कुछ ऐसा अस्तित्व हमारा 
दोस्त हमारा काम न पूछो ! 
यहाँ सफलता या असफलता--- 
ये तो सिर्फ बहाने हें, 
केवल इतना सत्य कि, 
निज को हम ही स्वयं अजाने हैं ! 


(२) 
पैरों में कम्पन है, 
मस्तक पर शत-शत शंकाएं हें; 
अ्न्धकार श्राँखों में, 
उर में चुभती हुई व्यथाएं हैं ! 
झपनी इन निबंलताश्रों का 
हम कहते हें--हमें ज्ञान है, 
इसीलिए हम ढूंढ़ रहे हें- 
जो शाहवत है, जो महान है ! 
जितने देखे मिटने वाले-- 
जितने देखे मरने वाले-- 


जीवन झ्रौ' निर्माण लिए जो 
प्रेम अकेला शक्तिवान्‌ है ! 
बुरा न मानो जनम-जनम से, 
हम तो प्रेम-दिवाने हें, 
इसी लिए हम तुमसे कहते, 
हम तो निपट बिराने हैं ! 
(३) 

एक जलन-सी है साँसों में, 
एक पुलक है प्राणों में, 
हमें नहीं कुछ भेद दीखता, 
कलियों में--पाषाणों में ! 
कोमलता का प्रश्न सदा से 
“इन आँखों में कितना जल हैं ?” 
झ्रौ' कठोरता पूछ रही है... 
“मन में बोलो कितना बल है ?” 
हमें दूसरों से क्या मतलब ? 
अपने से उत्तर पाना है, 
उलभे-उलभे केवल हम हैं 

यह दुनिया तो सहज सरल है ! 


पाप-पुण्य, यश-श्रपयश, सुख-दुख- 


सब जाने-पहचाने हैं। 
एक श्रकेले हम ही जग में, 


्‌ 


गपने लिए शअजाने हैं ! 


ढं 
नहीं किसी से 28 कटुता, 
नहीं किसी पर क्रोध हमें, 
नत-मस्तक श्रीहत कर देता, 
अपना ही भप्रवरोध हमें ! 


दांस्‍्त हमारी तरह विद्व के 
सब प्राणी हें खोए-खोए, 
अरे हँसे कब अपने मन से 
अपने मन से कब वे रोए ? 
निरुद्देश्य-ले, लक्षयहीन-से 
सब अभाव में भटक रहे हें, 


हम ममता लेकर आए हें, 
ममता देने आए हें, 
ममता बालों के बोलो, 
कब अपने और पराए हैं ? 
इसीलिए हम तुमसे कहते 
दोस्त ब्यर्थ का नाम-गाम हैं, 
हम फकीर युग-युग के हमको 
बन्धन से कया यहाँ काम हूं ? 


डा० रामकुमार वर्मा 


कान्य-बारा 


(५) 


करुणा दया माँगते हैं वे 
अपनी-अपनी कथा सँजोए ! 
देख चुके हम गिरते-लुटते, 
कितने महरू-ख जाने है, 
और इसी से हम कह उठते, 
हम तो निपट बिराने हूं ! 


कंसा संचय ? खाली हाथों 
आना और चले जाना है, 
धन-वे भव हो तुम्हें मुबारक 
अपना दाना दोस्त राम हूं ! 
भले हमें तुम मूरख समभो 
हम तो बड़े सयाने हें, 
इस अज्ञान भरी दुनिया में, 
हम भी बड़े अजाने हें! 


साधना के स्वर 


इस मधुर संगीत में 


स्वर-लिपि विरह के गान को हे । 


एक. अनजानी कहानी 
रसमयी पहिचान की हें। 


तार की भनकार में, 


शतदल मधुर स्मृति के खिले हें । 


उमेंगती सी ऊर्भियों में, 
प्राण दो बह कर मिले हैं । 
इस मिलन को तुम न कहना, 
यह कथा अवसान की हें । 
एक अनजानी कहानी, 
रसमयो पहिचान की हें। 


वंशिका के थून्‍्य रल्‍्प्रों, 


मध्य स्वर के सिन्धु संचित । 
उस तरह यह शून्य सा, 
अस्तित्व है अनुराग रंजित । 
कर्म में मेरी कुशलता, 
सहज स्वर-संघान की है। 
एक अनजानी कहानी, 
रसमयी पहिचान की हैं। 


राग प्रतिध्वनि में लुटा, 
अवशेष बस केवल व्यथा हैं । 
एक मूच्छित मूछेना में, 
जग उठी प्रिय की कथा हूँ । 
यह कथा संताप के, 
स्वर में कही वरदान की है । 


घे 


हा ०॥ 


एक अनजानी. कहानी, 
रसमयी पहिचान की हें। 


जब कि यह संगीत है तो, 


काव्य-धारा 


मेरी खिची हे भाग्य-रेखा। 
क्योंकि छनन्‍्दों की प्रभा, 
केवल प्रभाती प्राण की है। 


व्यय हें संसार-लेखा । एक अनजानी कहानी, 
गंजते से तार सी, रसमयी पहिचान की है । 
आत्म-परिचय 


प्रिय ! तुम्हारे किस सजोले, 
स्वप्न का आकार हूँ में। 
जो तुम्हारे नेत्र में नत, 
हैँ वही श्ूंगार हूँ में। 
एक ही थी दृष्टि जिसमें, 
सृष्टि. मेरी मुस्कराई । 
थी वही मुस्कान जिसमें, 
हंसी जाकर लौट आई। 
थी तुम्हारी गति कि जो, 
दुख में सदा सुख बन समाई । 
भाग्य-रेखा. क्षितिज-रेखा, 
बन प्रभा से जगमगाई । 
टूटकर भी नित्य बजता हूँ, 
तुम्हाशया तार हूँ में। 
प्रिय ! तुम्हारे किस सजीले, 
स्वप्न का आकार हूँ में । 
कौन-सा वह क्षण दिया, 
जो प्राण में अनुराग बाँधे। 
कौन-सा वह बल दिया, 
अनुराग में भी आग बाँधे। 


दृष्टब्य है । 


> 
कौन-सा साहस दिया जो, 
भूमि के सब भाग बाँवे। 
भूमि-भागों के मुकूट पर, 
मुस्क्राता त्याग. बाँधे। 
सूखकर भी जो हृदय पर, 
खिल रहा हूँ हार हूँ में। 
प्रिय ! तुम्हारे किस सजीछे, 
स्वप्न का आकार हूँ में। 


हुत-सी बातें हुई अब, 
रात ढलती जा रही हैं।. 
कौन-सा संक्रेत हैं जो, 
साँस चलती जा रही है। 
अवधि जितनी कम बनी, 
उतनी मचलती जा रही है । 
दीप्ति बुभने की नहीं, 
वह और जलती जा रही है । 
मृत्यु को जीवन बनाने का 
अ्मिट अधिकार हूँ में। 
प्रिय ! तुम्हारे किस सजोले 
स्वप्त का आकार हूँ में। 


वर्मा जी की इन कविताश्नों के विषय में पृष्ठ ६० प्र उनका लेख 'सेरा दृष्टिकोण ै 


काव्य-घारा 


असफलता की लकीर 


इस जग का सारा नज्ञॉन, 
तुम्हारा पद-रज कण भी बन न सका। 
मेरे जीवन -काो अन्‍्तराल, 
दर्दान का क्षण भी बन न सका। 


कितने. दिन आए गए, 
आज उनकी समाधि पर अन्धकार । 
कितने सुख-दुख के फूल, 
घल के अतिथि बन चुके बार-बार । 


जीवन के कनन्‍धों पर रखकर, 
दुृहरी साँसों का शून्य भार। 
में आज यहाँ तक आया हूं, 


करने भविष्य का नव सिंगार। 
पर मेरे स्वर का सरस राग, 
प्रणणी का प्रण भी बनन सका। 
इस जग का सारा ज्ञान, 
तुम्हारा पद-रज कण भी बन न सका। 


इन उथली स्मृतियों में मेरे, 


सस्‍्वप्नों के सागर लहराते। 
जो चित्र बड़े निखरे से थे, 
वे धूमिक से पड़ते जाते। 


में सोच रहा हू अभ्रमर उषा के, 
रंग इन्हें यदि रेंग पाते। 
तो ये मेरे जीवन-नभ में, 
नक्षत्रों के स्‍स्वर॒ से गाते । 
पर वहू भविष्य का चन्द्र, 
आज की क्षीण किरण भी बन क्षका । 


मेरे जीवन का अ्न्‍न्तराल, 
दर्शन का क्षण भी बनन सका। 


में अपने ब्रत पर अभ्रडिग, 
किन्तु मुझको मन पर विश्वास नहीं । 
जो पहले था उच्छवास आज, 
वह उर में हे उच्छवास नहीं। 
मेरी साँस कहने को मेरी, 
हें पर मेरे पास नहीं । 
नभ विस्तृत है पर किसी हृदय का, 
कभी बना अधिवास नहीं, 
मेरा जीवन इन चरणों में प्रिय ! 
अमर मरण भी बन न सका। 
इस जग का सारा ज्ञान, 
तुम्हारा पद-रज कण भी बन सका। 
हाँ, मृत्यु यहाँ. क्षण-भंग्र है, 
जोवन है नित श्ञाश्वत विधान। 
है जागृति दोनों ओर बीच में, 
स्वप्न जुड़ गया है महान्‌ । 
मेरे सुख-दुख के शशि-रवि हैं, 
जो गति का ही गा रहे गान। 
इन सबको में क्या जानूंगा, 
जब अपने को पाया न जान । 
पथ विस्तृत है, सम्मुख मेरे, 
में अचछ चरण भी बनन सका। 
मेरे जीवन का अन्‍्तरारू, 
दर्शन का क्षण भी बन न सका। 


जागरण-गीत 


प्रकृति के प्रतिबिम्ब में, 
मानव ! अरे, साकार बन। 
सत्य का स्पन्दन हुआ, 


पहले हृदय में प्राण जागे। 
खिल उठी तेरी अ्रुणिमा, 
रवि-उदय के बहुत आगे! 


दिवस के संगीत का गूंजा, 


दया तू सार जब 
प्रकृति के प्रतिबिम्ब में, 
मानव ! अरे, साकार बन। 
ये  दियायें हें - नहीं, 
तेरे स्थे संकेत गहरे। 
भुक गया आकाश तक, 
उत्थान के तू दाब्द कह रे ! 
विदव*पिण्डों को उठाने, 
के लिये संसार बन । 


प्रकति के प्रतिबिम्ब्ब में, 
मानव ! अरे, साकार बन 


दृष्टि तेरी दूर तक, इतनी 
कि सब-कुछ कह गई हे। 
क्षितिज-रेखा प्रइन रेखा 
बन अभी तक रह गई हूं । 
भू-कण्णों को जोड़कर तू, 
सृजन का अधिकार बन। 


केदारनाथ सिश्र 'प्रभात' 


काव्य-धारा 


तीन पग से 


प्रकृति के प्रतिबिम्ब में, 


- मानव ! अरे, साकार बन । 


सूक्षो से भी सूक्ष्म बन्धन, 
बाँध सकता हँ न गति को । 
फूल के कोमल दलों सा, 
बाँध ले अ्रपनी नियति को। 
भाग्यरेखा में उभर कर, 
तू नया अवतार बन। 
प्रकृति के प्रतिबिम्ब्र में, 
मानव ! अरे, साकार बन। 
ग्राज मेरी ध्वनि बनी है, 
पीठिका तेरे चरण की। 
देखकर जिसको विजय भी, 
कर रही इच्छा वरण की। 
तीन छोकों, 
का अ्रखिल विस्तार बन। 
प्रकृति के प्रतिबिम्ब में, 
मानव ! अरे, साकार बन । 


में ओर मेरी खृष्टि 


तुम सुधामयी, तुम तृषामयी, में अमृत-पुत्र 


पर तुम्हीं चेतना हो मेरी ! 


ऊषा की पहली अ्ररुण .रह्िम 


स्वणिम प्रकाश की प्रथम किरन 


थी फेल चुकी भर रन्प्र-रन्ध्र में छन्‍्दमयी का मृदु शिजन 


पर, सूनी-सूनी राह-डगर 


सूता-सूना कण-कण का श्रन्तराल 


कोई न कहीं भी चरण-चिन्ह 


सूना-सूना विस्तार, काछ । 


काव्य-घारा 


मेरे अन्तर का पुरष सनातन मौत-मौन 
में भी चुप था--तुमने सहसा 
साँसों की नीरव हलचल को भकभोर दिया 
फिर चरणों की गति, दिशा-ज्ञान, सन्धान बनी 
में बोल उठा--“अयि, तुम्हीं प्रेरणा हो मेरी ।” 
३९ ] 

कल्पना किसी की रुकी-रुकी 

तुम निवेदिता-सी भुकी-भुकी 

में चला गगन का दीप जला 

में चला सुजन का दीप जला 

संसार-पुष्प अधखिला-खुला 

सर्जता स्वयं आरती बनी, तुम अगरु-धूम 

मेरे प्राणों का पुर्ष सनातन भूम-मूमकर 

छगा खोलने वाणी का बन्धन अधोर 

तुम खड़ी लिये श्रद्धा का निर्मल अध्य॑-नीर 

मेंने तत्कषण पहचान लिया--पभ्रयि, तुम्हों वेदना हो मेरी ! 


शक: । 
जिस ओर दृष्टि मेरी जाती 
तुम वहीं व्याप्त थीं सपनों के चन्द्रिका-पात्र में निरनिमेष 
तुम वहीं व्याप्त थीं 
मेरे परिचय की पुकार बनकर अ्शेष 
वह नीला-नीला महाशून्य (-- 
पुतली की नौका मेने जब खोली भप्रधीर 
देखा पतवार सेंभाले जो 
छवि बठी थी--तुम वही पीर 
करुणा की गीली साड़ी में 
पूजा से पावन मुदु शरीर 
मेरी पलकों का पुरुष सनातन बार-बार जाकर समीप 
कुछ कहता था, मानों 'छो' से कुछ कहता हो प्रज्वलित दोप 
मेंने तब भ्रनुभव यही किया-- 
ग्रयि, तुम्हीं भावना हो मेरी ! 


काज्य-धारा 


( ४ ) 
जल में पृथ्वी यह नील-कमल की श्यामलिमा 
तुम जिसकी नित्य-नई गरिमा 
तुम हार-जीत के आदि-काव्य की पृष्ठ-भूभि 
जिस पर उतरा में अखिल व्याप्ति में 
भरने को जीवन-प्रवाह 
भरने को शाहवत प्राण-दाह ! 
ग्रस्तित्व न केवल भअ्रश्नु-धार ही 
वह महाज्वाल 
जो घ॒म रही हे इसी भाँति 
जिसको लेकर में घूम रहा हूँ इसी भाँति 
तुम इसी चक्र की प्रखर ज्योति । 
मेरी साँसों का पुरुष सनातन कहता है 
जिसको वाणी से, प्राणों से 
जिसकी आँखों से प्रभापूर्ण 
में जान गया--तुम वही सान्त्वना हो मेरी ! 


( ५ ) 

में जनम-जनम की कथा लिख रहा हूं अशेष 
साँसों में प्रतिपल प्रति निरमेष 
पर शेष अंश कुछ रह जाते प्रत्येक बार 
युग-कर पसार 
जिनको चुन लेती तपस्विनी कोई अ्रजान । 
फिर नये भोर के आने पर 
घन-प्रछय-तिमिर मिट जाने पर 
उन अलिखित अंशों को लेकर 
रचती भविष्य का नव विहान 

मेरी वाणी का पुरुष सनातन साक्षी है 
तुम वही प्रार्थना हो मेरी ! 

लुम क्षुधामयी, तुम तृषामयो--में अ्रमृत-पुत्र 
पर तुम्हीं चेतना हो मेरी ! 


कावज्य-धारा घ्६ 


जनम-जनम का उत्सत्र 


साँसों के श्रॉँगन में जिस दिन 

नव-वधू-सरीखी उतरी थी। 

हिय की यह नन्‍हीं-सी धड़कन 

त्योहार वही मेरा पहला ! 
(२) 

पछकों के मंदिर में मेंने 

पुतली का दीप जलाया जब । 


मेरा 
(३) 
बाँहें पसार कर छाया ने 
माँगीं जब कलियाँ अनाघ्रात । 
झोप्तों में मालिक बन उतरी 
जीवन की छवि तब शुशभ्र गात 
अम्बर की पछके भुकी हुई 


श्रृंगार वही पहला । 


है देव ! तुम्हारी रूप-किरन में धरतो को- शय्या सजी हुई 
(लो ने स्नेह मिलाया जब मेरे आलिगन में बेसुध, 
नम-पथ को सतरंगी रेखा, मेरी मनुहारमयी दुलहन 
बरसी कण-कण शीतछ चन्दन । अभिसार वही मेरा पहला ! 
&09 
अंचल 
नारी 
पृथ्वी की रंगस्थली-सी ओ स्वयंवरा ! इससे अधिक कोई और कहे क्या--युवती 
मानव जगतीका प्रकाश जीवनकी स्रोत तुम -हो तुम 
विश्व के प्रथम प्रात को तुम हिमकणिका निशचल सागर की आत्मा-सी शान्‍्त हो । 
सूखी नहीं मानवता के रूख पर जो अभी युग-युग के अतुथ्त प्रेमकी इच्छा चाँदनी-सी 


रात की श्रम अजित मीठी नींद-सी मधुर 
नभचुम्बी एक महा ज्योति की अमर तेज 
चुम्बन-सी अधरोंके प्रान्तर की नव शिखा । 
आग और सोने के पहाड़ों बीच 
बहती पावंत्य सरिता की रक्‍तधारा-सी 
बेगुनाह 
किरणों के बाण लिये शारदोय ऊषा सी 
-निष्कलंक 
मृत्यु भय ग्रस्त चिन्तित स्नायुओं में 
शुभत्र जल स्रोत-सी जीवन का सुख तुम 
जड़ती बालू-सी मृगतृष्णा में तुम एक 
-ओसिस-सी, 


अधरों में छिटकी 

रति की स्थिर दीघ एकान्त छाया-सी 
छवि के सपनों की रम्य शयनशिला 
शान्‍्त मधुवन की नि:शेष सित कामना 
सुन्दर सजीली सौम्य 

बेतस निकु ज-सी सजल बल खाती हो । 
इन्द्रधनुषों के पथ में चल आती हो 
तृण-तुण में तुहिन बिन्दु-सी सुअंकिता 
गर्वोन्‍्नत यौवन किरीटनी ! 
चपला--शत-शत बादलों की प्रेयसी 
वारुणी से सिक्‍त अंगों की ये बल्लरियाँ 
जैसे हों तुम्हारे अभिनन्दन की लड़ियाँ 


६० काव्य-धारा 


रूपसिन्धु की निवासिनी तुम चिर उवंशी 

ग्रो जगत रंगिनी ! 

झो पुलक पंखिनी ! 

जीवन वसंत के विभव की पिक सारिका, 

प्रेमियोंकी सिद्धि और रिद्धि की सफल कला 

तुम प्रतिनिशि में बनती हो नव बध्‌ 

नित-नित नूतन हो । 

प्रतिदिन सार्थक होती सीमन्‍्त की सिन्दूर- 
रेख, 


छटा और प्रकृति मनोज की हो सहचरी 

तीसरी तुम । 

लक्ष्य वेध करती हो मन हरकर, 

सद्य उगते नवरू चन्दन की बाड़ी-सी । 

युग का पथ निस्सम्बल फिर से बनेगा 
दीप्त, 


पा तुम्हारा पंथ दान 
ओरी अभिमानिनी । 


ग्राज फिर निकली--रजनी के कवि की 
साधना कूटी से तुम 


मसृण सघन वन के अधियारे से--रम्य 
उस तलहटी से । 


झ्ौर आँखें फाड़ देख। जीवन का यह नरक 

देखो यह अ्रनय, अनादर औ” अ्रविश्वास । 

सुनों यह हाहाकार 

नवयुग के करवट लेने का यह निनाद, 

शोलों से करो सत्कार--क्रान्ति के इस 
महामंगलमय युग का । 

उगलो तुम ज्वालामुखी 

हम हों--हो तुम और जीवन का संग्राम 

रात को बनी थीं तुम गीली और रँगीली, 

दिन में बनो श्रखंड युद्ध की करालिका, 

दिन में पुकारकर ललकार कहो, 

मुक्ति चाहती हें हम 

धन के असम और अनियमित वितरण से 

मानव द्वारा मानव के नारकीय शोषण से 

दुःख गरीबी और बढ़ती बेकारी से 

युगों से बंधे, सड़ते विषमता के दाह से 

इन्द्रियों के बिकृत विकारमय निग्रह से । 

होगी नवयुग की अवतारणा धरापर तब । 


अमर आलोक 


बुझ जाते हैं दीप, कभी आ्रालोक नहीं मरता हे। 


क्यों न बुभे वह दीप रात-भर का जो स्नेह सजाये ? 
नश्वर हे वह दीप स्नेह के बल पर जो लहराये 
कब तक गूंथ सकेगा वह उज्ज्वल निमिषों की माला, 
जिसे पराई ममता के बल ने दे दिया उजाला । 
बँधती है कब लोक विभा की बाती के बन्धन में, 
झग्नि-शिखा कब बँधकर रहती अंगारों के तन में ? 
दीपक बढ़ते हँ--प्रकाश केवल फंला करता हे। 
बुभ जाते हें दीप, कभी श्रालोक नहीं मरता है। 


5 की आय की .[ दा पी अब दमन मनी 


काव्य-धारा ६१ 


स्नेह-हीन होकर भी भ्रनमिल भ्रनचाहा मन दहता 
तृष्णा चुगती है चिनगारी प्राण-पपीहा सहता, 
यह अविराम जलन, ज्वाला की सेज ब्रिछी हो जंसे, 
ऐसी प्यास उमड़ती मन में युग-युग बुझे न जंसे; 
हैं अविनश्वर यह प्रकाश यह मुग्ध चाँदनी मन की, 
प्रथम विरह से जलती आई दीप-शिखा जीवन की । 
स्नेह नहीं--इसमें अभाव की सुधि का जल भरता है । 

बुभ जाते हें दीप, कभी आलोक नहीं मरता हूं । 


नभ के तारों की समाधि पर अन्धकार छा जाता, 
परम्परा हे अमर ज्योति की रोज सबेरा आता, 
भरा हुआ है नभ की छाती में कितना होमानल, 
आहुति देतो है गोरव की रोज घरा को जल-जल । 
भू का ही जय-गीत दान में रोज उसे दे जाता, 
भू का सृजन यज्ञ पलता है किरणों की जय गाता। 
यह उल्लास उदय का रजनी की जड़ता हरता हैं । 
बुर जाते हें दीप, कमी आलोक नहीं मरता हे । 


ज्ज्ब्ल््ब्ंब्_्न्ल्लंछं ं>चन्ओओ: की हा. 


" 66 
गिरिजाकमार माथुर 
मूरतें 

नींद नहीं झाती है दुनिया जल जाती हैं 
दुखती यह छाती हूं गिरकर जो विलय हुआ 
माथे पर तेर रहीं वह भी क्‍या अपना था 
निराकार . मूरतें जो झाने वाला हैं 
जीवन जो हो न सका अब तक वह सपना था 
बे सारी सूरतें खेल रहा भीतर का 
आत्मा की भूमि पर मर्म छिपा पाती है 
एक विश्व उठता हैं मुट्ठी में बन्द किए 
ढहता है एक विश्व अनुभव की थाती हें 
एक नया रुकता है मन की कृठाली में 
सुख की निशब्द एक धातु कठिन गलती है 
उँगली छू जाती है ठुक पिट निहाई पर 
थकती है ललक कभी मूर्ति नई बनती है । 


ध्र्‌ काव्य-घारा 


गीत 


छाया मत छुना, मन ! 

होगा दुख दूना, मन ! 
जीवन में हें सुरंग सुधियाँ सुहावनी 
छबियों की चित्र-गन्ध फैली मनभावनी 
तन-सुगन्ध शेष रही बीत गई यामिनी 
कुतल के फूलों की याद बनी चाँदनी 

भूल सी एक छुवन 

बनता हर जीवित क्षण 

छाया मत छुना, मन ! 

होगा दुख दूना, मन ! 
यश हूँ, न वेभव है, मान है, न सरमाया 
जितना ही दोड़ा तू उतना ही भरमाया 
प्रभुता का दरण-बिम्ब केवल मृगतृष्णा हैं 
हर चंदिरा में छिपी एक रात कृष्णा है 

जो हूँ यथार्थ कठिन 

उसका तू कर पूजन ! 

छाया मत छता, मन ! 

होगा दूख दूना, मन ! 
द्विविधाहत साहस है दिखता है पंथ नहीं 
देह सुखी हो पर मन के दुख का अन्त नहीं 
दुख हे न चाँद खिला शरद रात आझाने पर 
क्या हुआ जो खिला फूल रस वसंत जाने पर ? 

जो न मिला भूल उसे 

कर तू भविष्य वरण ! 

छाया मत छुना, मन ! 

होगा दुख दूना, मन ! 


| 
। 
य 


काव्य-घारा ६३ 


सावन की रात 
नीली बिजली मेघों वाली इन्द्र-धरा के नयन, अधर, भुज 
भींगुर की गुंजार वक्ष मिलन का मास 
धुंघमरा साँवर सूनापन बहुत दिनों के बाद मिले 
हवा लहरियोंदार आलिगन का उल्लास 


घन घुमड़न भुज-बन्धन के उन्‍्माद सी बूदें पड़तीं फिर-फिर अंकित प्यार सी 
बढ़ती आ्राती रात, तुम्हारी याद सी आँखे मुदती सुख भीगे भ्रैँधियार सी 


रात रसीली बूदों वाली भूले हम आनन्द, रंग 
जैसे देह रसाल जीवन रस का विश्वास 
यहाँ महक उठतो मेंहदी की तन में तेज धूप वर्षा की 
वहाँ हाथ हें लाल मन में साँक उदास 


विद्युत दीपन कंगन की चमकार सी उम्र सछोनी ठिठके सुमन विकास सी 
अघर छुवन की सिहरन मन्द फुहार सी मेघ दबे उजयाले के आभास सी 


घन मतवाले काजल काले तन, मन वाणी की सीमाएँ 
जैसे लम्बे वाल बंधन हत संसार 

सोंधी घरा गन्ध सी जिनकी किन्तु भाव बल से ही होता 
सुधि करती बेहाल जीवन का विस्तार 


मिलन रात जो तन पर करते छाँह सी इसीलिए हे रूप रंग की प्यास भी 
धरा कंठ जब इन्द्र डालता बाँह सी इसीलिए हूँ जीवन में विश्वास भी । 


हंसकुमार तिवारी 
अनकही बात 
कहनी थी सो रही अनकही बात । 
क्‍ इतनी बड़ी पड़ी यह दुनिया, इतना बड़ा अ्रकास, 
इतनी खुली बयार खेंलती, इतना खिला प्रकाश, 
जीवन के अंकुर पर दो-दो साँसों को अ्रकूलाये, 
पनप रहे पी-पी माटी की उबली हुई उसाँस। 
दन्द्रयी इस करुण-मधुर सुषमा ने मुझे पुकारा 
किरण बिछाते गयें प्रात, ओसों में रोती रात। 
कहनी थी सो रही अनकही बात। 


६्छ 


काव्य-धारा 


सरस नेह से सावन-फागुन से श्यामल श्रमराई 
विरह-मिलन से पीड़ित-पुलकित कूज रही तरुणाई 
किरणें बिछीं, खिची आयी चाँदनी चाँद से छिटकी 
उभक भाँकने लगा स्वर्ग उस शोभा में परिछाई' 
अतुल रूप के व्यथाबिद्ध प्राणों ने मुझे पुकारा 
घुलते गये दीप, खिलते आये सिमटे जलजात। 
कहनी थी, सो रही भ्रनकही बात । 
बँंधे-बंघेसे मिले चरण दो गगन सुगामी मन को 
जाग्रत ज्वालामुखी हृदय में, ऊपर सजल नयन दो 
चला आग-पानी में जलता-बुभता जीवन शभ्रागे 
लगा छाँह-सा पीछे-पीछे अकरुण चला मरण, लो 
इस अ्सहाय विवशता ने जीवन की मुझे पुकारा 
अधरों पर भ्ररणिमा उदय की, आँखों में बरसात । 
कहनी थी, सो रही भ्रनकही बात । 


थिर हो गयीं थिरक आँखों में श्राशा अगिन अधूरी 


- पार न कर पायीं सपनों के नीछकमरू की दूरी 


कुछ निश्वासों में बिखरे उभरे उल्लास हृदय के 
खिची एक मुस्कान मौन कह गयी कहानी पूरी 
भाषा हीन निराशा ने उस चुपके मुझे पुकारा 
काँप रह गये होंठ, नयन के भरभर भरे प्रपात । 
कहनी थी, सो रही अ्रनकही बात । 
माँग रहे थे अभ्रनगिन उजड़े प्राण प्रेरणा श्राशा 
कोटि-कोटि अ्रवरुद्ध कंठ आवाहन की नव भाषा 
रेखा-रंग अरूप माँगते, गीत अ्गीत रहे जो 
माँग रहा है जीवन अपनी श्राज नयी परिभाषा 
अनदेखे श्रनजान अबोले ने फिर मुभे पुकारा 
तिरने लंगे खुली आँखों के सपनों में अज्ञात । 
कहनी थी, सो रही भ्रनकही बात । 
उस समाधि पर नयी जोत की शिक्षा एक जो जागी 
तूफानों से उलम-सुलक कर नयो जुगोये जागी 
तम के काजल-काले होठों खींच कनक की रेखा 
नयी पौद के नये प्रात को रही जाग श्रनुरागी 


. 5 3. आर ? अशज शक सच, 


काव्य-धारा ६2 


उदय अचल की अनुरंजित आभा ने मुझे पुकारा 


कोंपल मुस्कायी, आँसू-से टपके पीले पात 
कहनी थी, सो रही अ्रनकही बात । 
७छ 
: जानकीबल्लभ शास्त्री 


अन्विति 


चंचल चित, नित भाव नए भर ! 
मरण एकरसता; जीवन में-- 
नव अनुभाव, विभाव नए भर ! 
सागर की अगाधता अपनी, 
अपना गिरि का तुंग शुग भी, 
कुंजर जहाँ कमल-कुल-माथी 
मधु का साथी वहाँ भूग भी, 
भले-बुरे के भाव बंधे जो, 
उनमें मुक्त प्रभाव नए भर ! 
चंचल चित नित भाव नये भर !! 
घिसा-घिसा-सा जो कि पुराना, 
अनुपयोग से जो निरथ॑-सा; 
जिसका नाम-रूप अनजाना, 
जिसे जानना ग्रभी व्यर्थ-सा, 
उस अतीत - भावी - संगम -हित, 
वत्तमान में चाव नये भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 
इस विष का रस अमृत-सरीखा, 
और अ्रमुत वह विष-सा तीखा; 
चंदा की भाई मभुलसाती, 
आझातप ने तप करना सीखा ! 
सम के विषम, विसंवादी स्वर-- 
सहने शील-स्वभाव नए भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 
ग्रद्भ-सज्भ आध्यात्मिक सुख का 
प्राप्त-प्रसड्भ)॒ वाह्य.अ्भिव्यंजन, 


कभी काय से मन, मन से आत्मा 
--तक द्रवित प्रेम का गोपन, 
निर्गण-सगुण - तर्क -दावानल-- 
धधक बूुमे, सुलगाव नए भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 
मिलन विरह से, धूप छाँह से; 
सुख दुख से औ' उषा निशा से, 
क्षीर नीर से, प्रेम पीर से, 
हिला-मिला आकाश दिशा से, 
रत्न ढूंढ़ते बालू मिलती, 
तेज तिमिर-बिलगाव नए भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 
काँटे निकलें खिले फूल से, 
शल फूछ के लिए हिडोला, 
पग-पग॒ पर तलवे सहला हँस, 
>मंग में सुमन, मगन रह चोला ! 
उपल उपल चल सिन्धु समुत्सुक, 
गान उफान, बहाव नए भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 
सीमातीत बँधा सीमा में, 
इसीलिए संघर्ष मुक्ति का, 
अनामुक्त मुक्तादके जिसके, 
मूल्य बढ़ेगा क्‍यों न शुक्ति का ? 
नीड़ बना कर बसे मुक्त खग 
में नव चहक, विराव नए भर ! 
चंचल चित, नित भाव नए भर !! 


६५९ काव्य-धारा 


दो रुबाइयाँ 


ञ्ासमाँ सर पर उठाए चल रहे, राज़ मालूम हुआ ञ्राज बदनसीबी का, 
पैर जब जमते ज़्ञमीं पर हैं नहीं !  फाक़ाकश शायरी शौक़ उफ़ ! रक़ीबी का ! 
ग्रासरा क्यों हो हमारा ग़ेर को ? सोख ले स्याह आफताब अ्राखिरी क़तरा, 
मुस्तकिल खुद हम हमीं पर हें नहीं ! _ जायक़ेदार खून होता है ग़रीबी का ! 


त्रिलोचन 
पुराण-कथा 
बरम्ब्र॒हि' कानों में भ्रमृतमयी ध्वनि आई, 
आत्मा तक पहुँची। समाधि की जड़ता टूटी 
लोचन ताका किये। बकार तक नहीं फूटी । 
परमात्मा प्रगटे थे। फाँस गले में पाई 
बालक श्रुव ने । जो भाषा बोली, जो गाई, 
काम न आई। किधर सिधाई ? स्मृति से छूटी । 
कौन लूटेरा था, जिसने यह निधि भी लूटी ? 
प्रभु के अधरों पर प्रोत्साहन की स्मिति छाई । 


लोचन ताका किये। हृदय का संचित पावन 
जल ढल चला । पुतलियों में छवि सजल बस गई । 
यह मूकता देखकर अच्युत ने लगा दिया 
पाञ्चजन्य स्थिर अ्रधरों से। वाणी से सावन 
सहित मास सब खुले, भक्ति की गाँठ कस गई 
भीग-भीगकर । आत्म-व्यंजना को जगा दिया। 


विजेता मानव 
ऊँचे से ऊंचे चढ़ जाने की अभिलाषा 
पर्वत से पर्वत पर तुम्हें रही भटकाती। 
टेढ़ी मेढ़ी राह नवीना-सी मटकाती 
तुमको आमंत्रित करती थी। मन की भाषा 
शिला-शिला में मूरतिमान थी । फोषित श्राशा 


3. आंखे भेज 4.0 | 3, 


काव्य-घारा &६७* 


तुम्हें सगे माथा तक ले जाती, खटकाती 
मन में नये-तये खटके, दिन-दिन अटकाती 
रही पर्ंतारोहण में । पदादु परिभाषा 
बने तुम्हारे जीवन की। में केवल बढ़ते 
चरण देखता हूँ । शेरपा तेनजिझ्‌ , उस दिन 
साथ हिलारी के तुमने रक्खे पग गित-ग्रिन 
उस सर्वोच्च शिखर पर, जिसके ऊपर चढ़ते 
कितने ग़ले-पचे । मानवता की जय पढ़ते 
तुम दोनों ध्वज-से पहुँचे, चछ-चलकर पल-छिन । 


आधुनिक अभिमन्यु 


टूटा पहिया ई धन अच्छा बत सकता है 
जिससे जगन्‍नाथजी का प्रसाद पक जाये, 
पंक्ति-पंक्ति में भक्तों का समूह छक जाये। 
चक्रव्यूह का युद्ध आज यदि ठन सकता हैं, 
तो अभिमन्यु आज जन-बल से तन सकता है । 
विपुल अपरपोषी मेघाडम्बर ढक जाये 
उसका तेज असम्भव हे । चाहे बक जाये 
कुछ भी । उसके रक्त से न' रज सन सकता हूं । 


व्यूह-विधाता स्वयं बव्यूह में फेंस जायेंगे; 
उनका रचा कुहासा, पाकर समय, कट चला ।£ 
. गड़ढा नव जींवन-प्रवाह से स्वयं पट चला, 
ग्रब मनुष्य अपने-अपने पथ से आयेंगे 
एक लक्ष्य पर; सबके सुख में सुख पायेंगे 
गैेसों का आतदू मेघ के तुल्य छट चला। 
७्छ | 


. भारतभूषण श्रग्नवाल 
कफ़न का कवच 


हिल 8 
सोचो तो, जीवन भर सरलरू यदि होता, यह प्यार-प्रीत की उथली तनिक तल॑या 


कुछ और मधुर, कुछ भर जरा सा सुन्दर, होती यदि विस्तुत और भ्रगम रस-सागर, 


ध्प कांव्य-धारा 


संघ्षों की सीढ़ी चढ़ने से पहले 
यदि सुख का मीठा फल खुद ही ञ्रा टपके, 
यदि खेत पड़े का बीज स्वयं पक जाता 
बिन-सहे कोप ये हिम-वर्षा-आ्रातप के, 
यदि सपने होते सत्य बिना जमे ही, 


(२ 


है धन्य सत्य की श्र स्वप्न की खाई 
जो अपने साहस को बन गई चुनोती, 
पथ के ये काँटे धन्य कि जिनसे भाई ! 
हमको लगते हें हेय महल कलधौती । 
झपने तन की गाढ़ी मिहनत की प्रतिनिधि 
यह फ़सल हमें है इसीलिए तो प्यारी, 
फल सदा दूर ही रहता, इसीलिए तो 


यदि पथ होता श्रासान बिना काँटों का, 
यदि मन में होते नहीं भेद के खाने, 
यदि सुख होता सम्पूर्ण बिना बाँटों का, 
तो कितना खलता हमें मरण धरती पर । 


हम जीवन तो जींते पर तरस-तरस कर । 


| 
॥। 


हर मंजिल पर होती जयकार हमारी । 
सुख छिपे सात परदों में, हम खोजेंगे, 
हम मसल-मसल काँटों को, फूछ खिलाते, 
हम मरण-शील हें, इसीलिए तो देखो 
हम कदम-कदम पर शभ्रमरों को शरमाते । 
हम कफ़न लपेटे चलते सदा; सही है, 
इसलिए कि बस, जीवन का कवच यही है । 


गीत 


तोड़ो मौन की चट्टान 
फोड़ो अभ्रह का व्यवधान 
झाकुल प्रान के रस-गान 
भीतर ही नजायें मर ! 


नेमिचन्द्र जेन 


बोलो, जोर से बोलो 
व्यथा की ग्रन्थियाँ खोलो 
सेंजोलो मन कि फूटठें 
कण्ठ से फिर गीत के निर्भर ! 


बिखरी कड़ियाँ 


अपने अ्रन्तर का खालीपन तेरे सुधि-सौरभ से भर लू, 


कफ 


एकाकी मन पर तेरी छवि धीमे-धीमे श्रंकित कर लू । 
एक सहज ममता की छाया में में अपने प्राण बिछा दूँ, 
तेरे ही श्राकर्षण में भ्रपना उद्धत अभिमान सुला दूँ । 
यह एकान्त श्रभेद भ्रघेरेसा मन पर घिरता आता. है, 
जी का सब विश्वास अचानक ही मानो गिरता जाता है । 
घोर विवशता के मरु में ये भटक पड़े हें प्राण अ्रकेले; 
म्राज नहीं कोई जो मेरे मन की यह दुबंलता भेले । 
शान्‍्त हो गयी है चुप होकर, मन की जो आ्राहत पुकार थी; 
मनन्‍्द हो गयी बुकती जी की ज्वाला वह, जो दुनिवार थी। 


काव्य-घारा ६& 


एक रिक्त बस--पश्राणों के इस तरु पर आ छाया है हिम-सा; 
सुधि का दीप दूर एकाकी होता जाता है मद्धिम-सा । 
मेरे अन्तर का रहस्य मुभको ही आकर कौन बताये ? 
कौन बिखरते-से प्राणों में जीवत का जादू भर जाये ? 
मेरे पथ-दर्शक, खोलू' कंसे ये उलभी गाँठें मन की ? 
बोलो, कंसे जोड़े, बिखरी कड़ियाँ इस खुलते बन्धन की ! 


सुनोगे ? 


सुनो, 
चीड़ के सनसनाते हुए पेड़, 


मेरी कहानी सुनोगे ? 
यहाँ तुम खड़े हो 

गगन में तने, 

सिर उठाये हुए गवं से, 

गंहराइयाँ झाँकने से अतल की, 

उधर सामने चोटियाँ हें, 

शिखर, 

जो बरफ से घिरे हें, 

जो बादलों का हृदय चीर खुलते 
कली से 

प्रछूते, अचुम्बित-- 

शिखर जो अ्रडिग हें, अ्रगम हें, महत हें, 
मनुज के अमिट स्वप्न-से, 

लालसा-से; 

शिखर ये तुम्हारे सखा हें युगों के, 
पहली सुबह की किरन 

मुस्कराकर, 

सदा छेड़ जाती इन्हें भी, तुम्हें भी'  * 
भ्रो चीड़ के सनसनाते हुए पेड़ 

मेरी कहानी सुनोगे ? 

कहूँ में ? 

तुम्हें भी विकल जिन्दगी की कथा सब 


सुना दूँ ?-- 

कि में लाँघना चाहता था अगम को 
तड़प थी कि 

बौनें करों को बढ़ाकर पकड़ लूं 

ग्रभी चाँद-सूरज, 

कि में चाहता था सभी कुछ, 

बहुत से बड़े स्वप्न थे 

उस हृदय में, 

नहीं थी, नहीं, शक्ति ही बस नहीं थी 
उठे बाहुओं में, 

तड़प थी बहुत किन्तु क्षमता नहीं थी-- 
इसी से गरुड़ के सभी पंख 

टुटे हुए हें, 

विगत स्नेह की स्तिग्ध हरियालियाँ 
आज 

भुलसी हुई हें, 

खंडिता मूत्तियाँ हें '* ' 

रो चीड़ के पेड़, 

में हूँ मसस्थल, 

मेदान जलता हुआ-सा 

पड़ा जो शिखर के चरण से बहुत दूर, 
जलता, सुलगता' '.' * । 

अभी रात भी सामने घाटियों में 
अकेली पड़ी 


१७० 


गिन रही तारिकाएँ, 


काव्य-धारा 


सागर गरजता किसी बेकली का तुम्हारे 


चुप-चुप भ्रेधेरा बिछा है हृदय में-- 
उतरती हुई मौन पगडंडियों पर । इसीसे अभी चाहता था सुनाना 

तुम्हीं बस, तुम्हें में-- 

किसी याद में जग रहे हो सनोगे ? 

मुखर हो | ग्रो सनसनाते हुए चीड़ के पेड़ ! 

मरुभूमि की भी कहानी सुनोगे ? 
नागार्जुन 
निराला के प्रति 


है दधीचि, तुमसे घबराते हें मांधाता 
नहीं पूछते तुमको भारत भाग्य विधाता 
मुदित देवगण, किन्तु तुम्हारा तप जारी है 
जनजीवन आलोडित अ्रद्भुत लाचारी है 
वह चाटुकार-दछ से घिरा इन्द्र आज मुसका रहा 
तुम जला किये हो रात-दिन, लाभ किन्तु उसका रहा। 
>८ >८ >८ 
लोग दुखी हूँ, अन्न-वस्त्र का हैँ न ठिकाना 
लाल किले से टकराता है नया तराना 
नये हिन्द का नया ढंग है, नीति निराली 
मृट्टी भर लोगों के चेहरों पर है लाली 
हे नीलकंठ, चुपचाप तुम युग की पीड़ा पी रहे 
बस नई सृष्टि की लालसा लिये कथंचित्‌ जी रहे । 
८ ; 2९ 2८ 
हे कविकुलगुरु, हे महिमामय, हे सन्यासी 
तुम्हें समझता हे साधारण भारतवासी 
राज्यपाल या राष्ट्प्रमुख क्या समझें तुमको 
कुचल रहीं जिनकी संगीनें कुसुम-कुसुम को 
सुख मय, कृतज्ञ, समदृष्टि वह जनयुग जल्दी झा रहा 
इस मिट्टी का कण-कण सुनो, गीत तुम्हारे गा रहा ॥ 


४-3 की 2 


काव्य-धारा 


तालाब की मछलियाँ 


पोषित-पालित चिर संरक्षित 

छोटी-बड़ी मछलियों की अभ्रब मची हुई है लूट 
परिधि गयी है टूट 

वन्या के प्लावन से सहसा पुष्करिणी की ' 
रोहू, ब्वारी, भाकुर, सौरा 

भुनचट्टी अरु नेनी 

एक-एक से बढ़कर सुन्दर 

स्वादु और स्पृहणीय'“* 

उठा लीजिये 

अ्जी, आपको कोन चाहिये 

उठा लीजिये वही कि जिस पर मन चलता हो 
कौन भला टोकेगा ! 

कौन भला रोकेगा ! 

कोशी की घारा ने आकर तोड़ दिया हैँ भिडा 
नहीं रहा पहले अधिपतियों का पोखर पर 
नाममात्र भी स्वत्व 

बहुत दिनों के बाद मिली है 

आज छूट इस बंधे हुए पानी को 

स्फूरति नहीं है 

वेग नहीं हैं 

दिश्या नहीं है, दृष्टि नहीं है 

युग-युग की ये अन्त:पुरिका चटुल शफरियाँ 
भूल गयी हें स्वाभाविक गति 

प्रखर स्रोत में आसानी से कंसे पहुँच सकेंगी ? 
तो क्‍या यह उद्वेल परिप्लावन इनका यों 
सत्यानाश करेगा ? 

तो क्‍या बंधी भोड़ वाली पोखर हो 

थी इनके उपयुक्त ? 

* * * भले वहाँ थीं 

निगल-निगलकर पोटा-थूक-खखार 


१०१ 


१०२ 


काव्य-धारा 


करती थीं स्नानार्थी छोगों का भारी उपकार 
समय-समय पर अंडे देतीं जिनसे होते छवरे लाख-हजार 
इनके द्वारा | 
झौर भी कई 

गुह्य-प्रकट मल होते थे निःशेष 

निश्चित जल-कर से कई गुनी 

अ्रधिक रकम ही 

पाते थे पट्टीदार 

““भले वहाँ थीं 

क्रम न अनिश्चित था जीवन का 

सब प्रबन्ध था संरक्षण का 

आ्रायु नियत थी, क्षेत्र नियत था 

नियमित थे आहार-विहार 

सपने में भी वहाँ नहीं था आकस्मिक चिन्ता का नाम 
छोटी-सी सुन्दर दुनिया थी, टहलबूल झरना था काम 
भले वहीं थी ! 

मुझे पता है 

खाकर मछली-भात 

धो-धोकर म्‌ ह-हाथ 

लेकर के मुख शुद्धि * 

सपारी-लौंग.अड़ाँची सौंफ 

हो करके निश्चिन्त 

तख्तपोश पर बंठ 

करुणाविगलित अ्रभी आप तो यही सोचते होंगे 

क्योंकि. भ्रापके दादा के परदादा ने खुदवायी थी पोखर 


उसी बाघ में 

जो कि आज तक चला आ रहा 

लाखिराज ब्रह्मोत्तर 

(पटना या मुशिदाबाद के 

किस नवाब की अ्नृकम्पा थी, कौन बताये) 


१ सदान 


काव्य-घारा 


तांत्रिक पूवंज की वह महिमा 

भले बेचकर आप खा गये 

किन्तु नहीं अ्विदित है पोखर की मछली का स्वाद 
रह-रह आती होगी याद 

तभी तो पाठक जी महराज 

स्वयं तत्पर थे आज 

सरकी उधर लगा रक्‍्खी थी 

सहत हाथ में लिये हुए थे 

बीच-बीच में हापी छप-छपकर उठती थी 
सगुन बना था । 

खूब लगी थी हाथ मछलियाँ' * * 

लाल-लाल मुंह वाले रोह, भाकुर, ब्वारी नेनी 
निका बनाकर 


कुट्टी-कुट्टी करके 
हल्दी-दही-नमक मिभड़ाकर 


द सुच्चा कड़, तेल में तलने बैठी जब वह सहृत्प्रसृता 
चार-चार लहठीवाली अट्टारहसाला 

मुदुवेनी मुगनेनी 

पांडुश्यामा मधुर-तुतीया 

पाठक जी की 


प्राणों से भी प्यारी 
प्रपनी ही पत्नी; 
तब आयी आवाज--- 
कड़कड़ कड़ाक कड़ घुस्स 
होल के करओ मे को 
जा रहे मछली के खंडों से बारम्बार 
तलते-तलते 
रोक छोलनी हो करके ध्यानस्थ 
लगी देखने शशिवदना वह दृश्य 
फिर-फिर सुनने लगी वही आवाज ** 


रोह का ललमुद्ा मूंड क्या बोल रहा था ? 


१. मिश्रत करके । २. खालिस, विशुद्ध । ३. लाल मुंह वाला मुंह 


१०३ 


१०४ 


काव्य-धारा 


रजत-पिच्छिला भुनचट्टी की पेटी से क्‍या श्राती थी श्रावाज ? 
धूसर भाकुर की वह मांसल कनपट्टी 

पड़ पड़ पड़ पड़ फट फट फट फरफट 

किस रहस्य की खोल रही थी गाँठ ? 
--यह सब सचमुच ही अ्रगम्य था 

तभी समझ में आया 

बहुत किया जब ख्याल 

दो टूटे दाँतों वाले इन भद्र श्रधेड़ महानुभाव 
(चतुरा पाठक) की 

मधुर तुतीया भार्या 

प्राणों से भी प्यारी 

वह कुलीन मैथिल की कन्या 

फिर फिर सुनने लगी वही आवाज ' *“ 
“हम भी मछली, तुम भी मछली 

दोनों ही उपभोग वस्तु हैं 

ज्ञाता$स्वाद सुधीजन, सजनी हम दोनों को 
अ्रमुपम बतलाते हें-- 

वनिता5धर पल्लँव में किया 

जम्बीरी रस-सिक्‍तमत्स्यखंडों में 

कहीं नहीं अन्यत्र 

इन्हीं में 

मिलती आयी है श्रमृत द्रव की भ्रशेष परितृष्ति 
उन छोगों को; 

इसीलिये तो हम तुम दोनों 

युग-युग से पाती आयी हैं 

विपुल प्रशंसा । 

रसिकों की गोष्ठी में बहुश:; 

इसीलिये तो 

हमें इन्होंने कद कर लिया तालाबों में 
इसीलिये तो 

तुम्हें इन्होंने कद कर लिया 


काव्य-धारा 


सात सात देवढ़ियों वाली हवेलियों में 
सुविधा ओ सामथ्यं मुताबिक 

अपनी अपनी रुचि के ही अनुसार वे सभी 
रसना रति के लेलिहान उस अग्निकु ड में 
भून भूनकर हमें खा गये 

और 

ग्रभी तक खाये जाते 

चहबच्चों में, तालाबों में 

बंदी का यह निरवधि जीवन 

बहिन, हमारे आत्मबोध पर 

कोलतार से लगा चुका हे पोची 

किन्तु आज तो 

कोशी की धारा ने आकर तोड़ दिया हे बाँध 
आज आ गयीं, सखि, हम बाहर 

एक एक कर 

उथल पुथल है जन जीवन में 

सभो ओर उत्क्रांति हो रही 

टट रहे हैं 

अन्त:पुर के ढाँचे 

आज या कि कल 

तुम भी तो निकलोगी बाहर 

हवेलियों से देवड़ियों से 

फिर जनपद के खंडनरक ये मिट जायेंगे 
शब्दकोष को छोड़ कहीं भी 

नहीं 'असूयंम्पश्या' का अस्तित्व रहेगा 
ओऔरतदारी' रह न जायगी 

“घन्य हमारा मरण आज सखि, 

धन्य हमारी हत्या 

मिला मू्‌क्ति का स्वाद 

भूल गयीं हम पिछली बातें रहा न कुछ भी याद 
बहुत दिनों पर पायी हमने घूट 


मचने दो यदि मची हुई है हत्या >बल- 8 अप 
वन्या के प्छावन से सहसा पुष्करिणी की गयी है टूट । 


१०५ 


१५०५६ क्राब्य-घारा 


प्रभाकर माचवे 


एक सानेट 


प्राण नहीं हें मेरे सन चौवन के कंलेंडर से सोमित 
प्राण नहीं मेरे दिल्‍ली की शरणार्थी-बस्ती में कीलित 
देश-काल से परे कल्पना कमल उठा कीचड़ से बढ़ ही 
वह कीचड़ के बिना नहीं है, किन्तु नहीं है वह कीचड़ ही 
ईसा नहीं लक़ड़हारा या कृष्ण नहीं है श्रहौर केवल 
वह कया है जो इन सबसे छनकर मेरी साँसों को दे बल ? 
में इतिहास-प्रवाह-पतित तिनका ही नहीं ! मित्र, में चिन्मय ! 
में इन लहरों का भ्रारोही, में अंकुर हूँ, में हूँ मण्मय ! 
यह घरती कहलाती इसीलिए हूँ धरा, दुढ़ा या वसुधा 
यह हैँ रसा, श्रहल्या; यह तो बड़ो भ्रपारा, सब सुख-सूविधा- 
दे देगी यह, पर न कभी माँगेगी मुभसे कुछ बढले में 
यह मानव से प्यार करेगी चाहे वह बदले नित खेमे ! 
में क्या केवल यह क्षण हूँ ? या वाहक युग-युग की परंपरा का? 
सबको समतल करने वाले ! क्‍या मुझ पर डाछोगे डाका ? 


गीत द 
यह हवा है बुरी कौन बेरागिया ? कौन से राग थे ? 
तिक्‍त हे माधुरी”: चक्र के बिन धुरी ! 
'दुक्ख' से ह॑ सनी यह खुशी _ कृष्ठमय सुन्दरी '* द 
कामयाबी बनी खुदकशी क्या हुप्ना? क्‍यों हुआ? वह कहाँ हिमगिरी? 
यह शहद की छूरी ! पुंब्चली है सती, शिव करें नटगिरी ._ 
उजड़ी-सी पुरी !“** बाढ़ बनकर बहा पासबाँ, संतरी"“ 
प्राण के ढंद्व से छंद यों जागते यह हवा है बुरी ! द 
के | 
गजानन माधव मुक्तिबोध थे 
मेरा जवाब 
कहने दो उन्हें सफल जीवन बिताने में 


जो ये कहते है-- .. हुए अ्रसमर्थ तुम ! 


कान्य-बारा १०७ 
तरक्की के गोल-गोछ उन्नति के बारे में 
घुमावदार चक्‍करदार, तुम्हारी ही जहरीली 
ऊपर बढ़ते हुए, जोने पर चढ़ने की उपेक्षा के कारण । निरर्थक तुम, व्यर्थ 
चढ़ते ही जाने की तुम !! 
$ २) 
गिरी हुई भीतों के भुके हुए भाड़ों में 
दूठे हुए फूटे हुए बेठे हुए घुष्घुओं व 
मटियाले खेंडहर के चिमगादड़ों के हित 
सूने में फंली हे मानों यह जंगल के सियारों और 
पूनों की चाँदनी घनी-घनी छायाओं-छिपे हुए 
आँगन के पुराने-धुराने एक पेड़ पर । भूतों और प्रेतों तथा 
अजीब-सी होती है पिशाचों ओर बेतालों के छिए हो-- 
चारों ओर मनुष्य के लिए नहीं-- 
वीरान-बवीरान फंली यह सफलता की, भद्रता की 
महक वीरानी की कीर्ति श्री रेशम की पूनों की चाँदनी । 
पूनों की चाँदनी की धूली की धुन्च में। मुझको डर छगता हे 
बसे ही लगता हे-- कहीं में भी तो सफलता के चन्द्र की छाया में 


वैसे ही जगता है-- 

“उन्नति” के क्षेत्रों में 

“ब्रतिष्ठा ' के क्षेत्रों में 

मानव की छाती की, आत्मा की,प्राणों की 
प्लोंधी गन्ध कहीं नहीं, कहीं नहीं 

कहीं नहीं । 

पूनों की चाँदनी यह सही नहीं, सही नहीं । 
केवल मनुष्य-हीन 

वीरान क्षेत्रों में 

निज्जत प्रसारों पर 

सिफ़ एक आँख से 

“सफलता '' की आँख से 

दुनिया को निहारती फंली हूं 


. पूनों की चाँदनी। 


सूखे हुए कूँश्रों पर 


घुष्घू या सियार या भूत न कहीं बन जाऊं ! 

उनको डर छगता है, 

झ्ाशंका होती हे । 

कि हम भी जब हुए भूत 

घुष्घू या सियार बने 

तो भ्रभी तक यही व्यक्ति 

जिन्दा क्‍यों ? 

उसकी वह विक्षोभी 

सम्पीड़ित आत्मा फिर 

जीवित क्‍यों रहती है ? 

मरकर जब भूत बने 

पिशाच जब बन जाये 

उसकी वह आत्मा तो, 

नाचेंगे साथ-साथ सूखे हुए पथरीले 
भरनों के तीरों पर 


१०८ 


सफलता के चन्द्र की छाया में भ्रधीर हो । 
इसीलिए, 
इसीलिए, 
उनका और मेरा यह विरोध 
चिरन्तन है, नित्य हे, सनातन है । 
उनकी उस तथाकथित 
जीवन-सफलता के 
खपरेलों-छेदों से 
खिड़की की दरारों से 
ग्राती जब किरनें हैं 
तो सज्जन वे, वे लोग 
ग्रचम्भित होकर, उन दरारों को छेदों को 
बन्द कर देते हें 
इसलिए कि वे किरनें 
उनके ही लेखे झ्राज 
कम्यूनिज़्म हें' 'गुण्डागर्दी है विरोध हे 
जिसमें छिपी है कहीं 
मेरी बदमाशी भी । 


(०) 
में पुकार कर कहता हँ-- 
सुनो, सुनने वालो ! 
पशुग्रों के राज्य में जो बियाबान जंगल है 
उसमें खड़ा हे घोर 
स्वार्थे का प्रभीमकाय 
बरगद एक विकराल । 
उसके विद्र प शत 
शाला व्यहों-बृहत्‌ 
पत्तों के घनीभूत जाले हें, जाले हें । 
तले में अ्रैधेरा हैं, अंधेरा हैं घनघोर । 
व॒क्ष के तने से चिपट 
बेठा है, खड़ा हैं कोई 
मरी हुई आत्मा का 


काव्य-धारा 


पिशाच एक जब रदंस्त-- 

वह तो रखवाला है 

घुष्घू के, सियारों के, क॒त्तों के स्वार्थों का । 
झौर उस जंगल में 

बरगद के महाभीम 

भयानक्र शरीर पर 

सफलता की भद्रता की, 
श्रेय-प्रेय-सत्यं-शिवं-संस्क्रति की 
खिलखिलाती पूनों की चाँदनी 
खिली हुई फंली है !! 

अ्रगर कहीं सचमुच तुम 

पहुँच ही वहाँ गये 

तो घुघ्घू बन जा्रोगे 

सियार बन जाओगे; 

आदमी कभी भी फिर 


कहीं भी न मिलेगा तुम्हें 
पशुओं के राज्य में... 
जो पूनों की चाँदनो हूं 
नहीं वह तुम्हारे लिए, नहीं वह हमारे 
लिए । 
5 


तुम्हारे पास, हमारे पास 

सिर्फ एक चीज हे-- _ 

ईमान का डण्डा है, 

बुद्धि का बल्‍लम है, श्रभय की गेती है, 
हृदय की तगारी हे--तसला है । 
नये-नये बनाने के लिए 

भवन आत्मा के 

मनुष्य के, 

हृदय की तगारी में ढोते हें हमीं लोग _ 
जिन्दगी की गीली और ५ 
महकती हुई मिट्टी को । 


'िििंीीिओचछ डंडे <ू ७ थ 


जीवन के मैदानों, 
लक्ष्यों के शिखरों पर 
नये किले बनाने में 
व्यस्त हैं हमीं लोग । 
हमारा समाज यह जुटा ही रहता है । 
पहाड़ी चट्टानों को 
चढ़ान पर चढ़ाते हुए 
हजारों भुजाग्रों से 
ढकेलते हुए कि जब 
पूरा शारीरिक जोर 
फुफ्फुस की पूरो साँस 
छाती का पूरा दम 
लगाने के लक्षण-रूप 
चेहरे हमारे जब 
बिगड़-से जांते हें-- 
सूरज देख लेता है 
दिश्ञाओं के कानों में कहता हे-- 
दुर्गों के शिखरों से 
हमारे कन्धों पर चढ़ 
खड़े होने वाले ये 
दूरबीन लगाकर नहीं देखेंगे- 
कि मंगल में क्या-क्या है !! 
चन्द्रछोक: छाया को माप कर 
वहाँ के पहाड़ों को ऊँचाई नहीं नापेंगे; 
वरन्‌ स्वयं ही वे 
विचरण करेंगे इन नये-नये लोकों में 
देश-काल--प्रकृति-सृष्टि-जेता ये । 
इसलिए, अगर ये लोग 
सड़क-छाप जीवन की घूल-धूप 
मामूली रूप-रंग 
लिए हुए होने से 
तथाकथित “सफलता के 


कान्य-धारा १०६ 


खच्चरों व टट्टुओं के द्वारा यदि 

निरर्थक व महत्वहीन 

करार दिये जाते हों 

तो कहने दो उन्हें जो ये कहते हें ! 
(६) 

सामाजिक महत्व की 

गिलोरियाँ खाते हुए, 

ग्रसत्य की कुर्सी पर 

आ्ाराम से बंठे हुए, 

मनुष्य की त्वचाओं का पहने हुए ओवर- 


कोट, 
बन्दरों व रीछों के सामने 
नई-नई अदाओं से नाचकर 
प्रगतिशील जीवन के विचारों को गिरवी- 
-रख 


भुठाई की तालियाँ देने से, लेने से 
सफलता के ताले ये खुलते हें, 
बशततें कि इच्छा हो 

सफलता की, 

महत्वाकांक्षा हो 

अपने भी बरामदे 

में थोड़ा-सा फर्नीचर, 
विछायती चमकदार 

रखने को इच्छा हो 

तो थोड़ी सी सचाई में 
बहुत-सी भुठाई घोल 
सांस्कृतिक अदा से, अ्रन्दाज से 
अगर बात कर सको-- 

भले ही दिमाग़ में 

खयालों के मरे हुए च्‌हे ही 
क्‍यों न हों प्लेग के, 

लेकिन अगर कर सको 


११० 


ऐसी जमी हुई जबान-दराजी और 
सचाई का अंग-भंग 

करते हुए भूठ का 

बारीक सूत कात सको 

तो गतिरोध और कण्ठरोध 
मार्ग-रोध कभी भी न होगा फिर 
कटवा चुके हें हम पूछ-सिर 

तो तुम यों 

हमसे दूर बाहर क्‍यों जाते हो ? 

रे | 

जवाब यह मेरा है, । 
जाकर उन्हें कह दो कि सफलता के जंग- 


-खाये 
तालों और कुंजियों 
की दुकान है कबाड़ी की । 
इतनी कहाँ फुरसत हमें-- 
रक्त नहीं मिलता है 
कि दुकान पर जा सकें । 
झरहंकार समभो या 


सुपीरियारिटी 
काम्प्लेक्स अथवा कुछ ऐसा ही 
चाहो तो मान लो 


लेकिन यह सच है कि 
जीवन की तथाकथित 
सफलता को पाने की 


एक मित्र के प्रति 


तुम्हारा पत्र आया; या 
अंधेरे द्वार में से फाँककर कोई 
भलक अपनी, ललक अपनी 
कृपा-मय भाव-द्युति अपनी 
सहज दिखला गया मानों 
हितेषी एक !! 


काव्य-धारा 


हमको फुरसत नहीं 

खाली नहीं हम लोग 

बहुत बिजी हें हम 

जाकर उन्हें कह दे कोई 

पहुँचादे यह जवाब 

प्रौर भ्रगर फिर भी वे 

करते हों हुज्जत तो 

कह दो कि हमारा थूक 

जिसमें हें श्राजकल 

की रब्त-ज़ब्त तौर-तरीकों के प्रति 
जहरीली घृणा का विष, 

जरा-सा तुम खा लो तो 

दवा का एक डोज समभ-- 
तुम्हारे दिमाग़ के 

रोगाणु मर जायेंगे 

व शरीर में, मस्तिष्क में, 

जदर्देस्त संवेदन-उत्तेजन 

इतना कुछ हो लेगा 

कि अश्रकुलाते हुए ही तुम 

अँधेरे के खीमे को त्यागकर | 
उजाले के स्वर्णिम मंदानों में | 
भागते आशोगे; ६ ह 
जाकर उन्हें कहदे कोई । 
पहुँचा दे यह जवाब । 


हमारे अन्धका राच्छनन जीवन में विचरताहै 
मनोहर सोम्य्‌ तेजोमय मनीषी एक !! 
तुम्हारा पत्र आया या कि तुम आये 
हमारे श्याम घर की छत 

हुई निःसीम नीले व्योम-सी उन्नत 

कि उसका साँवला एकान्त 


काव्य-चारा 


था यों प्रतिफलित पल भर, 

हमारी चार-दीवारी 

क्षितिज से मिल गई चलकर ! 

हुआ सम्पू्त मेरे प्राण का अभिमत ! 
उठा लेंगे सुनीलाकाश 

मेरे स्कन्ध होते जा रहे व्यापक 
कि वे हिम-हेम-श लाभास 

कि मेरा वृक्ष-- 

जन-श्रातृत्व संवाहक 

तुम्हारे मात्र होने से हमारे पास !! 
तुम्हारे मात्र होने से 

सभी सम्बन्ध हटकर दूर 

केवछ एक पृथ्वीपुत्र का नाता 

व उस एकान्‍्त नाते में 


१११ 


खुली उन्मुक्त धरती के महाविस्तार पर 
फंली 


सुजन-कल्याण की उन्मादिनी पूनों-- 

मधुर छावण्यमय मातों 

तुम्हीं हो चन्द्र का विश्वास-को मल बिम्ब। 

तुमको देख-- 

कोई (झादिवासी मूल कवि-सा एक ) 

सहसा नाच उठता हैं 

गहन संवेदना के तार 

तन में भतभनाते हैं, 

व पलकों में खुशी के सौम्य आँसू काँप 
जाते हें 

मदोद्धत नृत्य की संवेदनाओं में ! ! 

यहाँ घर में छिए यह पत्र 

अ्रतिशय शान्‍्त, अति-गम्भी र 


गहन विश्वास पूरम्पूर । न 
दओ को देख करंडे पांत कि ये हूं सभ्य ! झ्रो चुपचाप बंठा हूँ 
लगता है-- तुम दिन-स्वप्न में सन्देश की उपलब्धि के 
खुलो स्वाघीन पृथ्वी का. झ्राश्चयं ! 
श्रमिक में नागरिक स्वाधीन क्यों में देखता हूँ सामने तुमको 
व जन-अ्रातृत्व के सहज आनन्द में तल्लीन, अनातुर मौन रहकर पान करता हूँ 
गिरियों को हटाता हूँ तुम्हारे स्नेहमय व्यक्तित्व का सौन्दर्य !! 
व नदियों के मुहाने फेर देता हूँ । तुम्हारा पत्र जीवन-दान देता है, 
(है पृथ्वी अभी तक बन्दिनी हमारे रात-दिन के अ्नवरत संघर्ष 
पर कल रहेगी क्‍यों ?) में उत्साह-न्‌तन प्राण देता हूं !! 
6७9 

शमशेरबहादुर सिंह 

ग़ज़ल 


में आपसे कहने को हीं था, फिर आया खयाल एकाएक-- 
कुछ बातें समझना दिल की होती हें मुहाल एकाएक । 
साहिल पे वो छहरों का शोर-लहरों में वो कुछ दूर की गूंज ! 
-+कल आपके पहलू में जो था, होता हे निढाल एकाएक । 


११२ काँव्य-धारा 


जंब चाँदनी-सी शाम के बाद उन बादलों में घुल गई थी, 
क्यों आया मुझे याद अपना वह माहे-जमार एकाएक ! 
सीने में क़यामत की हक, आ्राँखों में कयामत की शाम, 
दो हिज्म् की उम्रें हो गई दो दिन का विसारू एकाएक ! 
फुँकता है यूंही मेरा जिगर, दिल यों सुलगता है मेरा; 
तलछट की भ्रभी रहने दे, सब आग न ढाल एकाएक ! 
हाँ मेरे ही दिल की उम्मीद, तू है मगर ऐसी उम्मीद, 
फल जाय तो सारा संसार हो जाय निहाल एकाएक ! 
एक उम्र की सरगर्दानी लाए वो घड़ी भी, 'शमशेर', 
बन जाय जवाब आपसे झाप आ्राँखों का सवाल एकाएक ! 


रेडियो पर बाख़ का संगीत सुनकर 
( में योरपीय संगीत नहीं समकता--पर बह संगीत न जाने कितना . . 
करुण मुर्भे लगा । उस रात के सन्‍नाटे में लगा ज॑ंसे किसी अरबी रोमानी इति- 
हास का एक पृष्ठ खुल गया है । वियोग का दीघ॑ क्षण है। श्रावेश . . सिसकियाँ 
आहें . एक दबी-सी चीख . .बीच-बीच में अ्रसह्य मौन, आआाँसुओं भरा । 


मालूम नहीं, कहाँ तक उस संगीत की शैली, या कम से कम उसके मर्म 


का कुछ भी आभास में अपने शब्दों में दे सका हँगा। ) 


म एक तक़दीर सी । 
सुनूंगा तेरी श्रावाज़ ( पर्दों में--जल के--शान्त 
पेरती बर्फ की सतहों में रोशन भिलमिल भमिलमिल 
तीर सी कमल-दल ) 
दबनम की रातों में 5 हे 
232 32% गर्म रात की हँसी है 
गर्म तेरे गले में 
दमशीर सी । सीने में 
तेरी आवाज बहुत काली सुमेयी पलकों में 
ख़ाबों में घूमती-भूमती साँसों में, लहरीली अ्रलकों में . . 
आहों की एक तस्वीर सी आई तू--श्रो किसकी ! 
सुनूंगा : मेरी-तेरी हैँ वह फिर मुस्कराई तू... ! 
खोई हुई ( नींद में--खामोश--वस्ल . . . ) 
रोई हुई >< कट 


काव्य-घारा 


११३ 


शुरू है झ्राखिरी पीर ! भ्रो शीरीं ! श्रो लेछा ! ओ हीर ! 
सलाम ! जा 
मेरे दर्द से हमकलाम जा 
“>जा, अब सो ! ्ं ६ 
की बेखबर में 
तू मेरी बेबस बाहों प्र सर रखकर, बेखबर आधी-सी रात 
भोह, बेखबर सपने हैं 
नरो! 
जो कुछ है बाखबर है एक, बस, उसकी जात ! 
खो! झ्रामीन ! 
खो! आमीन ! 
खो! आाम्ीन ! 


तीन शेर 


तेरी निगाह में जो एक नाम है आलम बदल रहा हे--बढ़ा जा रहा है तेजी से : 
अजब खुमार के झ्ालम का नाम हैं आ्रालम अवाम वक्‍त की रो है, अ्रवाम है श्रारूम 


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न तेग्रे-नतेज, न अबरू का बल, मगर शमशेर 
हमारी खाक के जरों का नाम है ग्रालम | 
्क्ष 
सुमित्राकुमारी सिनहा 


माप सकोगे गीत हमारे ? 
प्रश्मु बूंद से लेकर डूबे जिनमें सातों सागर खारे। 
खेतों में बरसे कंचन से दीपित जिनका तन सुन्दर है, 
खलिहानों की खनकन से प्राणों का मधु-संगीत मुखर हे, 
प्रकृति-नटी की करतल-ध्वत्रि से नाच उठे जिनकी नीरवता, 
नभ को आँखों से बातें करती हो जिन्नकी दुग-श्यामलता, 
बलि के त्योहारों पर मंगल मना रही जिनकी तरुणाई, 
इन गीतों की ग्रति के पथ पर ही तो युग की लाली छाई, 


११४ 


काव्य-वबारा 


झ्न्तरीप से हिम-प्रंचक तक जिनकी सीमा पाँव पसारे ! 
माप सकोगे गीत हमारे ? 
प्रेम फूल सा जिनके इंगित पर ही शूलों का अ्रनुगामी,. 
अभिशापों पर हँस म्‌ृख गाते ये ही वरदानों के स्वामी, 
मोती की प्याली से चू कर, पत्थर की छाती पर खेंलें, 
वही गीत जीवित रहते, जो सदियों के परिवर्तन भेलें, 
छोड़ समय का तट गीतों की ये लहरें आगे बढ़तीं, 
हुंकारों के स्वर भर इनकी प्ररूया लक्ष्य-क्षितिज पर चढ़तीं 
युग-तृणीर इन्हीं तीरों से बरसा देती हें अंगारे। 
माप सकोगे गीत हमारे । 
गीत 

पार लगता एक तिनका भी ब्रगम मँमधार से। 

ज्योति की किरनें अँबेरे में छिपाये मुंह खड़ीं 

आज कटुता-पंथ पर चल मधुरता थक गिर पड़ी, 
पर, नहीं होती पराजित, गति कभी भी हार से । 

रात सेही प्रात जनमें, और मिट्टी से कमल, 

देह में बन्दी रहे ज्यों, प्राण साँसों में मचल, 
खेलता रहता सुधाकर, त्यों जलूधि के. ज्वार से ! 

कालिमा पीता सदा है, दीप का आलोक तन, 

फूल-सौरभ से बसाता, हे सदा मिट्टी पवन, 
पर न कटता हूँ सुमन-सौरभ, कभी तलवार से । 

शान्ति की दे थपकियाँ, दो आज कुंठा को सुला, 

दाह के संघर्ष छिव भर, स्वप्न-छवि में दो भुला, 
गूँथ लो श्र ढ्वत को, श्रद्वत के अभिसार से ! 


ठाकुरप्रसाद सिंह 


ऊम्सस के बन्धन 
दुप्त बिजलियों की बाहों में बाँह डाल यदि में चल पाता 
में नवयुग की हलचल का बाहक बन जाता यदि जा पाता ! 
शीशे के उस ओर गगन पर 
नाच रही चंचला मनोहर ॥ 


काव्य-धारा श्श्श्‌ 


चीख रहे अंधड़ के भोंके 
धूल भरे बच्चों से आकर। 
में चुफ हूँ, इस विद्रोही मत को फिर भी में रोक न पाता । . 
ऊमस से भर गया यहाँ 
ऊपर पंखे मथ रहे निरन्तर 
भीतर मन के मन्‍्थन की 
गति क्षण-क्षण बढ़ती जाती हरहर 
पत्थर सी पीड़ा से दबकर मन कागज-सा कब उड़ पाता ! 
एक छहर बूदों की पुलकित 
पवन भर गया एक हहर सा 
आखिर कब का तड़प रहा तूफान 
खिड़कियों पर आ बरसा 
खिड़की खोलो कहा किन्तु में मन के बन्धन खोल न पाता । 
दुप्त बिजलियों को बाहों में बाँह डा यदि में चछ पाता । 


लेखनी चलती 
अपने अन्धकार में ठिठुरी अक्सर आँखें मुद जाती हें, 
उँगली के घेरे में सिमटो राह लुप्त ही रहती 
आपनी छाया बिछा सामने लेखनी चलती 
निज प्रकाश को पीती भ्रन्धकार की क़ैद भोगती 
लेखनी चलती मेरी एक लेखनी चलती 
जब प्रकाश पीछे रहता है तीक्ष्ण प्रभा से आँख मिलाती 
छाया आगे जाती जीत रही हे व्यूह अन्ध का 
जिसने मुंह मोड़ा प्रकाश से यह प्रयोग की घरती 
. अन्धकार का साथी लेखनी चलती! 
&09 
शम्भूनाथ सिंह 
सड़क, पगडंडी ओर बेलगाड़ी 


राजपथ सोया, हटा कंकरीट-चेतना उठी फन फैंलछाकर टेढ़ामेढ़ा। पहला 
अवचेतन मिट्टी का खुला, उतरा गयी राही पथ-भूला उस पर दीखा चलता 
पगडंडी ऊपर भुजंगिनी सी; उन्‍्मना पद से कुमारी का विपद-मद दलता 
आदि भूमि क्वारी अनछई विपदामयी नाथता भुजंगिनी को | पारवं-वन दहला; 


११६ काब्य-धारा 


पद-चिन्ह-गन्ध सूंघ “मानव हे गुनते 
आये अन्य खोजी, किन्तु वे न अरब भटके । 
आया एक दिन राज-रथ, राजा अटके; 
हुक्म हुआ, “पथ हो प्रशस्त', यह सुनते 


यह ओर 


खिड़की का द्वार खोल चूमो ग्राकाश ! 
बाँहों मे भरो बन्धु किरणें, वातास ! 
दूरागत नीली गहराई की गूँज 
कमरे में भरो कि बहरेपन की प्यास 
ब्रुभे; आँख मल देखो नीचे का स्वगें--- 
धूप की परी सी वह तर रही घास ! 
अपने ही छवि-सागर बीच अनाद्वन्त 
डूब' रही धरती ।' * " 

पर यह कसा हास-- 


टेढ़ापन सीधा हुआ, सम हुई धरती 
राजपथ बना, रथ चला '*' किन्तु सहसा 
टूटा स्वप्न; चेतना का कंकरीट विहेँसा; 
ग्राती वह बैलगाड़ी चरंमर करती ! 
वह 
लोलूप सा ? यह कंसी कातर चीत्कार ? 
चीर-हरण का कोई करता अश्रभ्यास ! 
एक शब्दवाण, एक नयन-अग्निवाण 
वातायन से छूटे और अट्टहास । 
थरथर हो व्योम थमक उठे किरण-यांन; 
हो नव अ्रभियान । ' *** 

यहाँ ञ्रा मेरे पास 
देखो वह धरती का खुला हुआ केश, 
देखो वह नग्न वेश; वह लम्पट रास । 


डाक 


डाक सुनो प्रात का ! 
न समय रहा रात का 
न समय रहा बात का 

न समय रहा ! 
सिन्धुफेन से सपने विलीन हुए 
पालहीन नाव ज्यों दिशाहारा मने 
डूबा लहरों में, 
ज्योतिक्षीण हुए दीप अन्धकार के 
चेतन किरण-रथ चला धेघेर-- 
नभ में मन्‌जात का ! 
डाक सुनो प्रात का ! 


दीखता अनागत के यान का 
अरुणध्वज, 
लहरों के पीछे से फाँकता 
जिसका मस्तूल; 

महाप्राण का 


शब्द मुखर स्वागत के हित तट पर । 
परिवतेन ग्राँकता 

लहरों पर विजय-चिह्न 

पद के श्राघात का । 

डाक सुनो प्रात का ! 


रात का प्रकाश-स्तम्भ 
आँख मूद कर सोया 

दिन की उज्वल छाया में; 

तट से सिर धुन कर टकराता ज्वार, 
स्वर्ण किरणों में रंजित होकर खोया 
प्राची का नभ । 

पर अपने ही रंग लहराता 

अग्निगर्भ शंस्य 

भेलकर भोंका 

उद्धत निशि-वात का । 

डाक सुनो प्रात का ! 


निधि) की की 0 . भजन दी की जक की . 


नोरज 


आँधियारा जिससे शरमाये, 
उजियारा जिसको ललचाये, 
ऐसा दे दो दर्दे मुझे तुम ! 
मेरा गीत दिया बत जाये ! 
इतने छलको अश्रु, थके हर 
राहगोर के चरण धो सक्‌', 
इतना निर्धन करो कि हर 
दरवाजे पर सर्वस्व खो सक्‌, 
ऐसी पीर भरी प्राणों में 


नींद न आये जनम-जनम तक 
इतनी सुध-बृध हरो कि 


काव्य-घारा 


गीत 


साँवरियाँ खुद वाँसुरिया बन जाये । 


ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये। 


घटे न जब अंधियार, करे तब 
जलकर मेरी चिता उजेला, 
पहिला शव मेरा हो जब 
निकले मिटनेवालों का मेला, 


पहले मेरा कफ़न पताका-- 
बन फहरें जब क्रान्ति पुकारे, 
पहले मेरा प्यार उठे जब 
असमय मुत्यु त्रियां बंन जाये । 
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये ॥ 


मुरका पाये फसछ न कोई 
ऐसी खाद बने इस तन की, 
किसी न घर दीपक बुर पाये 
ऐसी जलन जले इस मन की, 


भूखी सोये रात न कोई 
प्यासी जागे सुबह न कोई 
स्वर बरसे सावन आ जाये 
रक्‍त गिरे गेहूं उग आये ! 
ऐसा दे दो दर्दे मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये। 
उनकी लाठी बने लेखिनी 
जो डगमगा रहे राहों पर, 
हृदय बने उनका सिंहासन 
देश उठायें जो बाँहों पर, 
श्रम के चरण चूम आई 
वह धूल करे मस्तक पर टीका, 
काव्य बने वह कर्म कल्पना- 
से जो पूर्व क्रिया बन जाये। 
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये। 


बहे पसीना जहाँ वहाँ 
हरियाने लगे नई हरियाली, 
गीत जहाँ गा आय वहाँ 
छा जाये सूरज की उजियाली, 
हँसदे मेरा प्यार जहाँ, 
मुस्कादे मेरी मानव-ममता, 
चन्दन हर मिट्टी हो जाये 
नन्‍्दन हर बगिया बन जाये। 
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये। 
मुझे शाप छग जाय, न दोड़ें, 
जो असहाय पुकारों पर में, 


११७ 


श्श्८ 


आँखें ही बुझ जायें, बेबसी 

देख पभ्रगर बहारों पर में 
टूटे मेरी कलम न यदि यह 
जुल्मों की तलवार मोड़ दे, 


तुभसे लगन लगाई, 
उमर भर नींद न आाई। 
साँस साँस बन गई सुमिरनी, 


काव्य-धारा 


मेरा गाना पाप, श्रगर मेरे- 
होते मानव मर जाये। 
ऐसा दे दो दर्द मुझे तुम 
मेरा गीत दिया बन जाये। 


भजन 


पलक भिगोई, अ्रकूक सँवारी, 
पर चाँदची न छाई, 


भ्रमावव ऐसी आझाई ! 
साथी छोड़े, संगी छोड़े, 
जनम-जनम के बन्धन तोड़े, 
बदनामी से रिश्ते जोड़े 

तब तुम तक आ पाई, 

न कर श्रब॒ तो निठुराई ! 


मृगछाला सब की सब धरिणी, 
क्या गंगा, कंसो वेतरणी-- 
कुछ भी खबर न पाई 
दहाई बनी इकाई ! 
दर्द बिछोना, देह अटठारी, 
रोम-रोम आरती उतारी, 


रुबाई 
रात इधर ढलती तो दिन उधर निकलता है दीप और! पतंगे में फर्क सिफ इतना है... 
कोई यहाँ रुकता तो कोई वहाँ चलता है, एक जलके बुभता है, एक बुभके जलता है। 


छछ. 
बीरेन्द्र सिश्र 
गीत 
खड़ा उम्र की देहरी पर में सोचता-- 
एक फूल तेरी वेणी में गथकर 


जीवन में कब ला पाया मधुमास में 
फिर भी चलता ही जाऊंगा निशिदिन बारह मास में। हि 
सदा रहा तुभको बिलखाता हँसते हुए जहान में ५ 
तुके खींच ले गया दूर तक में आँधी-तूफान में गर द 
जितनी सिन्दूरी साधे थीं धरती से आकाश तक 
एक-एक कर सब कुम्हलाई, धूल हुई वीरान में 


काव्य-घारा 


झाज स्वयम्‌ में अपने से ही पूछता-- 
एक पीर अगणित पीरों में पूछकर 
कितना तुभकों दे पाया उल्लास में; 
फिर भों चलता ही जाऊँगा निशि-दिन बारह मास में । 
कभी सोचता था कि करूँगा होड़ गगन के चाँद से 
बाँधूंगा मलछयानिक्कत तेरी साँसों के उनन्‍्माद से 
रेशम के परिधानों में दुल्हन नाचेगी भूमकर 
में युग-युग तक प्यार करूँगा नई नवेली साध से । 
और आझाज में आँख फाड़कर देखता-- 
पास पड़ा अमृत का प्याला छोड़कर 


विष पीने का हक अभ्यास में; 
फिर भी चलता ही जाऊंगा निशि-दिन बारह मास में । 


प्राणों से प्यारे अरमानों पर मेंने वारा तुझे 
तुमे प्यार कर भी रचना की दुनियाँ में हारा तुमे 
फिर भी जीत मिली हे जो, तेरे आगे कुछ भी नहीं 
गीत और तू दोनों मेरे--और न कुछ प्यारा मुझे 
में खुशियों का राज-विहासन छोड़ता-- 
एक गीत अगणित गीतों में जोड़कर 
भोगे जाता हूं आर्थिक बनवास में; 
फिर भी चलता ही जाऊंगा निश्चि-दिन बारह मास में । 
साध रँंगी गेरू से तूनें चला भुलसते पंथ पर 
गाँव, नगर नदिया, पर्बत के समारम्भ पर, अन्त पर 
दरस-परस केवल पीड़ा का नहीं मिला सुख का तुमे 
बेरिनि हुई दिवाली-होली खिलते हुए वसंत पर 
माँख भरे बादर नभ में हें डोलतां-- 
एक बूंद तेरें आँसू की चूमकर 
सावन से कब रेंग पाया आकाश में; 
फिर भी चलता ही जाऊंगा निशि-दिन बारह मास में । 
सारी बरबांदी के पीछे भव्य सृजन की प्यास है 
मिट्टी राख हुई तो क्‍या अ्रब भी जीवित विश्वास है 
तेरे स्वर में दृष्टि, दृष्टि में गीत, रूप में माघुरी 
झौर चलाचल, आने वाढा करू स्मारक इतिहास है 


११६ 


१२० काव्य-धारा 


जीवन नदी-किनारे सूरा चीखता-- 
एक बार तेरी धड़कन पर - भूमकर 
जीवित कर दूंगा शमशानी लाश में ; 
ऐसे चलता ही जाऊंगा निशि-दिन बारह मास में; 

खड़ा उम्र की दहरी पर में सोचता-- 

एक फूल तेरी बेणी में गूंथ कर 

जीवन में ले आऊंगा मधुमास में । 

फिर तो चलता ही जाऊंगा निशिनदिन बारहमाम में । 


गीत 
रो-रोकर सिन्दूर ढृंढ़ती मधुऋतु मेरे द्वार पर 
बाग सजे क्‍या, दीप जले क्या, और मरनें त्योहार क्या ? 


६5 रह 


सागर-दुग में नीर भरे वह व्योम है, यह धूल है 
शबनम से बोभिल-बोभिल हर पात है, हर फूल है 
घुटती-घुटती साँसों-गसा रुक-झककर चलता हैँ पवन 
धरती घूम रही लपटों में, करती सपनों का हवन 
शरद निशाएँ गगन-सीखचों में युग-बुग से बन्द हें 
हेमन्तों की गति-विधियों पर वासन्ती प्रतिबन्ध हैं 
मन का उत्सव बलि देता धड़कन के हाहाकार पर 
गीत छिड़े क्‍या, प्रीति हँसे क्या, रूप करे सिंगार क्‍या ? 


८) 


उचटा-उचटा-सा है मनवा, धीमा-धीमा राग है 
मद्धिम-मद्धिम गति जीवन की, फिर भी मन में झ्राग है 
मेरी उजली दोपहरी पर फिर सन्ध्या की छाँह है 
सोच रहा जग मुझको मावस की कितनी परवाह है 
में नकों की वट पूजा पर स्वर्गों का वरदान हूँ 
भझाँकी सजी दूर मन्दिर में, बिन-देखे हैरान हूँ 
स्वप्न नहीं, आँसू प्रहरी हें जब दुग वन्दनवार पर 
दर्शन कठिन महाजन को, मुझ हरिजन का परिवार क्‍या ? 


डरे 
कभी-कभी मेरे सिरहाने आ जाती हे चाँदनी 
नींद भरे गुमसुम सपनों को मिल जाती हे रागिनी 


काव्य-बारा १२१ 


सोचा करता हूँ दुनियाँ में सुख का नहीं अभाव हैं 

कहीं धूप का पलड़ा भारी, कहीं भयानक छाँव है 

लेकिन अलग न हो सकता में, खुद अपनी आ्रावाज से 

वंचित करना बहुत कठिन हे मुझे सिर्फ अन्दाज से 
क्योंकि बहुत से हृदय भरोसा करते मेरे प्यार पर 
उनका दरद-भुलाकर मेरे जीने में है सार क्‍या ? 

मिट्टी का रेशा-रेशा असहाय है, निरुपाय है 

गिट्टी तोड़े जाता रोजी-रोटी का समुदाय है 

कुंजी लिये तिजोरी की अन्याय देश में घुमता 

कत्छ किये सच्चाई का ऐय्याश भूठ हे भूमता 

सोना-चाँदी मखमल रेशम-सा बिकता ईमान है 

धूल उड़ रही राहों में, भटका-भटका इन्सान है 
अनगिन कल में आस लगाए खुले चोर बाजार पर 
मुभको सपनों की छाया में रहने का अधिकार क्या ? 


हक) 
मरुथल समभ न पाता हे, मेरी मधुमासी प्यास को 
समय घसीटे लिये जा रहा मेरी जीवित लाश को 
में बहार की करूँ कल्पना कंसे उस संसार में 
जो अब तक मानव की किस्मत बाँधे है तलवार में 
जहाँ मध्ययुग लौट रहा है सिद्धान्तों की आड़ में 
नया-नया ईंधन पड़ता है सुलगे हुए पहाड़ में 
मिट्टी की सुधियाँ साधे हें ज्वालाओरों के ज्वार पर 
तट पर बेठा बह जाने दूँ में उनको मभधार क्‍या ? 


99 
वोरेन्द्रकुमार जेन 
यादों की नीली पहाड़ियों पर 
समय के विखरते बादलों के पार शाखान्तरालों मे किकमिलाती 
यादों की नीली पहाड़ियों पर प्यार की बनप्सई भीलें : 
सर्जना के नित नये भाड़ : उनके तटों में छहलूहाती 


उनमें सरसराती चिर नवीना चेतना की सपनों के कास की रेशमी वनाली : 
शीतल अंगूरी हवाएँ ! किसके अचीन्‍्हें मासूम परस-दुलार 


शरर 


के खरगोश उसमें रिलमिला जाते ! 
अनामा घास के फ़ीरोजी फूलों में 
किस अनामिका के मन को 
आकुल दुपहरिया की एकाकिनीं उमंगें ! 
>< 
सरदी के इस नीलमी सवेरे 
पूर्वांचल का डाकिया 
पहली किरन की रिबिन में बँधी 
किसकी कुंकुमी पाती 
डाल गया मेरी खिड़की पर ! 
कि पड़ौस की सब्जी की बाड़ी में 
गिलकी के पीले फूलों पर; 
अपने भोंपड़ों के बाहर खड़ी 
केश-जड़ा बाँधती साँवली गठीली 
कमाठिनों की पीली-काली चोलियों पर, 
आकाश की अनन्तता को पीते 
नारियल के न्‌कीले पत्रों पर-- 
खुल उठे उस पाती के अक्षर ? 
ल्‍ हर 
लगा कि कोई खबर श्राई है _ 
उस पाती में मानव के आगामी मनवन्तर 
की । 
अनदेखे लोकों के नीलाभ क्षितिज 
: बन गये हें उस पाती की पंक्तियाँ । 
उन क्षितिजों पर कभी 
सूर्य-लोक का हिरण्य-गर्भ पुरुष 
उदय होता-सा दीख जाता है 
हिमालय की चूड़ा पर डग भरता हुआ । 
चन्द्र-लोक के अ्रमृत-सरोवरों में नहाती 
अवसना यूरोपियन बालाएँ भरूक जाती 
हें । 
शुक्र-लोक की नीलमी छतों पर 


काव्य-धारा 


बीणा औ' पियानों की सुरावलियों पर 

अपूर्व कविता कला, गान की 

भलमलाती मेहफिलें उतर ग्राती हैं। 

हिन्देशियन कुमारिकाओं के संग 

नृत्य-गान लीन हैं, शुक्र-छोक के 

आझ्ाकाशी आँखों वाले मन-मोहन युवा । 

कि मंगल-लोक की गुलाबी मानिक- 

रेलिंग पर 

कौन चमेली-सी गोरी चीना किशोरी 

कर रही हे इन्तजार-- 

दूर ते चिरन्तन प्रणय-मिलन के 

गीत गाते श्रा रहे मंगल-कुमार का ! 

कि श्रनन्तों पर मशाल लिये जा रहे 

रूसी युवा-युवति-युगल 

खींच रहे समूचे खगोल को 

अपनी हथेली पर ! द 

मानव के चिर दिन के कल्पित स्वर्गो' को | 

साकार कर रहे वे मत्यों की इस पृथ्वी द 
पर । 

कि दफन हो रहे अ्रमरीकी उदजन बम 

प्रशान्त महासागर में : 

कि शोषण का प्रेत सर पछाड़ कर 

दम तोड़ रहा लिकन महान की समाधि 


पर । 
हॉवर्ड फास्ट की वाणी के जलते अक्षरों 
पर 


उदय हो रहा नवीन अमरीका : 
इमसेन, थोरो श्रौ' वॉल्ट ह्विटमेन का 

अमरीका, 
महषि आाइन्स्टीन का अमरीका ! 
अपनी अ्रणु-शक्ति की प्रयोग-शालूा में 
मानव के लिये सुख-ऐश्वर्य की 


काव्य-घारा १२३ 


नई अलकापुरियाँ ढालता-सा अ्रमरीका ! 
९ 
एक बरस हो गया तुम से बिछूड़े, 
सोचा था, खो गई तुम भ्रतीत की 
किसी तिमिरान्ध गुफा के भीतर । 
पर आज क्‍या देखता हूं अचानक 
कि मुस्करा उठी हो तुम 
अन्धकार की साँकलों को तोड़ कर 
उदयाचल के शिखरों पर : 
और फेंकी है तुमने यह 
लवेण्डर-गुलाबी पाती 
प्रथम किरण की रिबिन से बाँध कर 
मेरी खिड़की पर ! 
बिखर पड़े हें उसके भ्रक्षर 
केशर-कुंकुमी धूप के चुम्बन बन कर 
मेरे आसपास के आकाश वातास पर 
जन-जन के तन-मन घर-बार पर; 
मानव के नये मनवन्तर की 
ज्योतिर्मय भलके लेकर । 
>< 


समय के बिखरते बादलों के पार 
यादों की नीली पहाड़ियों पर, 

देख रहा हूँ मे तुम्हारे-हमारे 

चिर युवा स्वप्न की ऊगती उषा : 
कि जब ऐसे ही एक दिन, 

हिने के इत्र में घुलते सरदी के सवेरे 
तुम हम मिले थे प्रथम बार : 

में आया था अतिथि बन कर 
अचानक तुम्हारे द्वार ! 

एक साँवली, लीना, सरला बाला 
खड़ी रह गई थी देहलीज में ठिठक कर, 
प्रइन-पूछती-सी झ्ाँखों से बेखबर । 


कुछ ही बोलों में हम बन गये थे उस 
दिन 
एक-दूसरे की आत्मा के आरपार दर्पण । 
ग्राँखों ही आँखों में 
हमने कह दिया था एक-दूसरे से : 
कि “तुमको ही खोज रही थी में भ्रब 
तक चिर दिनसे !' 
कि “तुमको ही खोज रहा था में भ्रब 
तक चिर दिन से ।' 
मिल कर हमने चुनौती दी थी 
मानवी प्रणय से योगियों की निविकल्प 
समाधियों को ! 
मिल कर बुने थे हमने सपने उस 
दुनिया के, 
जहाँ भगवान का योग, 
मरण-विनाश-संघषं-ग्रस्त मानव की 
भंगुर धरती पर 
उतर आयेगा अमृत का भोग बन कर | 
जब मेरे चिरन्तन दर्द की आहें 
“खंजर की हंवाएँ बन कर' 
बींघ गई थीं तुम्हारा कोमल कूँवरा 
अन्तर । 
हमारे मिलन की उस परम उत्सव- 
बेला में 
आ पहुँचा था स्वर्ण-मृग बन कर, 
तुम्हारा मन मोहने को 
धन का मारीच मायावी बाजीगर | 
हरण कर ले गया था वह बलात्‌ 
यूग के कवि की वल्लभा को 
अपनी सोने की साँकलों से बाँध कर | 
तुम्हारी सरला चितवन पर 
जड़ दिये थे उसने अपनी हवेली की 


१२४ काव्य-धारा 


भूठी सुरक्षा के पत्थर । 
अपनी प्रतिष्ठा के स्वर्ण-कुम्भ में 
बन्दी कर लिया था उसने तुम्हारी आत्मा 
के सत्य को । 
कि जब तुम्हारे सपनों के फूलों की नाव 
छिन्न-भिन्‍न हो गई थी 
किसी के “बेक-वैलेंस' की चट्टान से टक- 
राकर । 
कि तुम, भ मेरी आत्मा की सौरभ, 
जिसने उस मिलन के अन्तिम दिन 
कोयल से ठहुकते उस मीठे उन्मन तीसरे 
पहर, 
ढाल दिया था अपना विपुल केशभार से 
छाया 
विह्नल मुखड़ा मेरे चरणों पर, 
झौर फिर भेल लिया था 
सर मेरा अ्रपनी गोदी पर । 
वही तुम आत्मा की चिर काम्या, 
कवि के सपनों की साकर वल्लभा, 
उस दिन छीड़ गई अपने प्यारे कवि को 
अकस्मात 
यूग के खूनी चोराहे पर, 
और एक बार भी तुमने नहीं देखा 
था मुड़ कर । 
कि जब तुम्हारे-हमारे सपनों के पारि- 
जातों को रौंदती 
तुम्हारी बारात बड़े ठाठ-बाट से 
विदा हो गई थी बेण्ड-बाजों के साथ 
धरती-आकाश को हिलाती-केपाती हुई 
उस मध्य-रात्रि के पहर में ! 
दूर जाते जुलूस की उन विलय होती 
गैस-बत्तियों 


आ्ौर बाजों की डूबती ध्वनियों के साथ 
उस दिन कवि की चेतना खो गई थी 
जाने किस रौरव-यंत्रणा के अ्रतलान्त 
पातालों में । 
सोच लिया था तब यही भाग्य कवि का, 
स्वप्न-दृष्टा का, प्यार का, गीत का। 


पर रूुँच नहीं सकीं मेरी रक्‍्त-वाहिनियाँ 


ग्रसत्य, अन्याय, निराशा, पराजय, 
विफलता की उन दम घोटती फाँसियों में 
खा-खाकर पछाड़े 'बेंक-बलेंस' के 
उन 'आराइस-बर्गो' से- 
मेरा एक-एक रकक्‍ताणु हो उठा वह्विमान 
कि अ्रपनी ही भस्म की डरी मे से 
उठा में बन कर अमर “अनल-पंछी नव 
जीवन का 
और छा लिया मेंने सकल सत्ता का 
आसमान । 
गूज उठीं चुनौतियाँ मेरे ज्वालामय पंखों 
कि मेरी चेतना के स्फुलिंगों से, 
कि मेरी शआ्रात्मा के सा्वेलौकिक दर्द में से 
उतरेगी ऐसी एक दुनिया भ्रखण्ड प्यार 
की, 
कि जिसमें धन नहीं होगा विधाता 
मानव-भाग्य का । 
कि जिसमें मानव की आत्मा होगी 
शास्ता-नियन्ता इस अखिल भूत-सत्ता 
की । 
कि जिसमें कवि की वल्लभा का 
अपहरण नहीं कर सकेगा 
अ्त्याचारी, घमण्डी धन का देवता ! 


2९ 
कि लो, मेरे पंखों की लप्टों से फट पड़ा 


काव्य-धारा श्रश 


तुम्हें मूछित कर देने बाला, किसकी कु कुमी पाती डाल गया है मेरी 
स्वर्ण-माया का आसुरी मोहान्धकार । खिड़की पर ? 
कि लो, देखता हूँ पूर्वांचल की चूड़ा पर कि तुम्हारे बिह्नल केश छाये 


चला आ रहा है सूर्य-रथ तुम्हारा मुखड़े के समर्पण में से, 

जाज्वल्यमान, कि तुम्हारी गोद में डूबे 
अपनी अनन्त प्रभा के मण्डल से मेरे अश्रु-भीने तपते अंगारों-से ४३०३ 
सकल लछोक को परिव्याप्त करता हुआ। 4 ञ् हक 
कि समय के बिखरते बादलों के पार है लक लत अ 2 मनवन्तर : 
यादों 2 फैड ' हम हक मकर इस चिट्ठी में आई हैं उसी की खबर । 
हि कदाजा जरगछा उठी है! कि आज जब मिलने जा रहे हूँ धरती 

| र अम्बर, 
कि सरदी के इस नीलमी सवेरे तब कौन शक्ति हे दुनिया की 
पूर्वांचक का डाकिया कि जो तुमको-हमको रख सकेगी 
पहली किरन की रिबिन में बँघी बिछुड़ा कर 
॥ च्छ्प्ह 
रमानाथ श्रवस्थोी 
गीत 
दिल डूब गया हे जिसका मेरे दिल में, 


आवाज उसी की ही होगी, पहचानो ! 
जिसके जीवन की रात मुझे चन्द्रमा बनाती हैं, 
जिसके सोने के लिए रात आकाश सजाती है । 
वह' मुझे शूल के साथ, फूल-सा जीने को सममाता, 
में उसी रूप के राग स्वरों में बाँध-बाँधकर गाता । 

मेरी आँखों में जिसके अश्रु चमकते, 

में उसी रूप का ताज मुझे पहचानो ! 
जिसके चरणों की धूछ राह पर फूल बिछाती है, 
जिसके प्राणों की प्यास मुझे बरसात बनाती हे । 
मैं उसे बाहु में बाँध काल से प्यार माँगता हूँ, 
में उसे जीतकर झआाज उसी से [हार माँगता हूँ। 

में जिसका हूँ वह दूर नहीं -मुभसे, 

तक़दीर उसी की है मेरी पहचानों ! 


१२६ 
जो हँस-हँसकर मेरे 


काव्य-धारा 


दुरदिन अपने सीने में भरता है, 


जो मुझे हृदय में लेकर भ्रपनी मंजिल तय करता है। 
में उसे बुलाता लिख-लिख पाती सुधियों के पंखों पर, 
में चलता उसे उठाकर अ्रपनी कविता के कंधों पर । 


जिसका यौवन काँटों को सेज समभता, 
में उसी जवानी का जवाब, पहचानो ! 


कक: के 


धरती जले बरसे न घन, 
सुलगे चिता भुलसे न तन । 
बिजली गिरे काँपे न तम, 
आ, जिन्दगी में हों न ग़म । 
ऐसा कभी होगा नहीं, 
ऐसा कहीं होता नहीं । 
(8, 
हर नींद हो सपनों भरी, 
ड्बे न यौवन की तरी। 
हरदम जिये हर आदमी, 
उसमें न हो कोई कमी । 
ऐसा कभी होगा नहीं, 
ऐसा कहीं होता नहीं । 


जाने 


गो जाने वाले बादल ! 


असम्भव ! 
ऐसा कहीं होता नहीं 
ऐसा कभी होगा नहीं । 
कह 
सूरज सुबह श्राये नहीं, 
झ्ौ' शाम को जाये नहीं। 
तट को न दे चुम्बन लहर, 
ओ्रौ' मृत्यु को मिल जाय स्वर । 
ऐसा कभी होगा नहीं, 
ऐसा कहीं होता नहीं । 
| ४) 
दुख के बिना जीवन कटे, 
सुख से किसी का मन हटे । 
पर्वत गिरे टूटे न कन, 
झौ' प्यार बिन जो जाय मन । 
ऐसा कभी होगा नहीं, 
ऐसा कहीं होता नहीं । 


वाले बादल के प्रति 


छोड़ इसे देना मत चल ! 


मत जाओञ्ो, बरसाञ्नरो जल !! गो जाने वाले बादल ! 


दुनियाँ भ्रब भी प्यासी हें, 
चारों ओर उदासी हे। 
फूलों का सुन्दर मुखड़ा, 
लगता हैं उतरा-उतरा- 
तड़प रहा प्यासा मरुथल, 


मत जाओ बरसाओ जल !! 
तुमको रात बुलाती हे, 
प्यासे स्वप्न दिखाती है । 
सूरज आग बरसता है, 
जग का आँगन जलता है । 


काव्य-धारा १२७ 


मानव है दुख से घायल, झ्रो जाने वाले बादल, 
दो इसको थोड़ा सम्बल । मत जाझ्ो बरसाओ जल । 
७8 
नरेश मेहता 


[ यहाँ भ्रपनी एक कृति 'सप्तमी' प्रधान शेली में दे रहा हूं । 'सप्तमी' संस्कृत में, बंगला 
में तो है ही किन्तु बोलियों में भी है। विशेष रूप से 'मालवो' में इसकी प्रचुरता है। हिन्दी विश्ले- 
घणात्मक एवं वियोगान्त भाषा बनी । उसका स्वर-संगीत श्रनेक प्रभावों से नष्ट होकर व्यंजन-संगीत 
के रूप में ग्राया । ये कोई विशेषताएं हों ऐसा में नहीं मानता विशेषकर काव्य एवं संगीत की दृष्टि 
से । प्रपने “बसस्तागमन' को इस दृष्टि से पाठकों के सामने रख रहा हूं । स्वर-नाद ही संगीत की 
श्रात्मा होती है । यह प्रथम प्रयोग है; हो सकता है निखरा न हो किन्तु संगीत स्पष्ट हुआ है । ] 


बसनन्‍्तागमन 
दखिन दार उघाड़ी बसन्‍्त आायो !! एईखन बगरि जावे; 
हमाके पत्र नग्न कियो, धरा ऊपरे अन्न, 
पुरान पाता भड़ि गियो, मने गान, तने रंग 
सेरी बाटे जीर्ण जीवन, सब गोपी आँखें रास रस सपना, 
बुहारी लिये जावे पवन । टेसूबन टुशालों देखो सखि ! 
नतून खातिर मार्ग देवो, आये रसवन्त आयो !! 
झो हमार मोह पुरातन ! गृह दार खेत पलछकन बुहारो, 
गोपुरे शंख डाके सुनो सखि ! सेरीजन ग्रामजन, जनजन गुहारो । 
ऋतु श्रीमंत झ्रायो ! ! फागुन राजा आयो राजरथे गगने, 
पीपल पाता, काँदो तुमि ना, वल्कल लेई, देवे परिधान अपने, 
शितालो मन ! काँदो तुमि ना, पाताक मुकुट बाँधि गाछे-गाछे, 
प्रभु अँचल में से, सखि ! कन्‍्त आयो !! 
प्रार्थना 
वहन करो, वहन करो, वहन करो पीड़ा !! 
गो मन ! वहन करो पीड़ा !! सृष्टि प्रिया पीड़ा हे कल्पवृक्ष, 
यह अंकुर है उस विशाल वेदना को, दान समभ, 
तुम में थी जन्मजात शीश भुका स्वीकारो 
आत्मज है, झो मन ! करपात्री स्वीकारो, 
स्नेह करो मधुकरि स्वीकारो !! 


अंचल से ढेक कर रक्षण दो !! वहन करो, वहन करो पीड़ा !! 


श्य्द 
चिरंजीत 


काव्य-घधारा 


कलम कुदाली 
इस कलम-कुदाली से गोड़ में खेत श्रनुवंर जोवन के । 


की, 
इन खेतों में नभ ने शत शत अमृत-धारायें बरसाई , 
जीवन-प्रद वरद प्रभातों ने संजीवनियाँ हें बिखराई , 
और स्वगिक आशीर्वादों-सी षड़्‌ ऋतुएँ पुनः पुनः भाई , 
पर ये न कभी भी हरे हुए, पर ये न स्वर्ण से खरे हुए, 
धरती के मंगल आँगन में अस्तित्व बाँम-सा धरे हुए, 
भाड़ों भंखाड़ों विषबेलों पाषाणों से ये भरे हुए, 
पर लह पसीना एक किये में स्वप्न देखता नन्दन के । 
इस कलम-कुदाली से गोड़ः में खेत भ्रनुवर जीवन के ॥ 


(२) 
सारा दिन कड़ी मशक्कत कर में श्रान्त लौटता सान्ध्य समय, 
मन मन के पाँव न उठ पाते, प्रति अंग शिथिल औ' पीडामय, 
दोजख की आग उदर में जल हा, बचा-खुचा बल करती क्षय, 
यों जीवित श्र शापित शव-सा में गलि-बाजारों में चलता, 
अपनी नजरों में गिरा हुआ, अपने को आप स्वयं छलता, 
चम-चम करते धन-वेभव से चुंधियाई आँखों को मलता, 
में फर्क ढूँढता अपने में औ-' उनमें जो स्वामी धन के । 
इस कलम-कुदाली से गोडः में खेत अनुवेर जीवन के ॥ 


(३) 
याँ-वहाँ जलूसों जल्सों में में 'शांति, शांति' का स्वर सुनता, 
दीनों के दुख से दुखी जहाँ धनपति नेता सिर को धुनता, 
बहुरूप स्वांग ये शोषक के में चल पड़ता मन में गुनता 
मुझ जसों के कंकालों पर निर्मित प्रासादों को लखता, 
मधु पायल की भंनकारों को चुन-चुन रीते उर में रखता, 
प्यालों में ढलकतो हाला को में भूठ-मूठ मन में चखता, 
जब घर आता तो रो पड़ते अ रमान क्षुधित तन के मन के । 
इस कलम-कुदाली से गोड़ में खेत अनुवेर जीवन के ॥ 


काव्य-धारा १२६ 


(४) 
प्रातः: से निश्ि तक खेतों में धम-धमक कुदाली चलती यह, 
दोपहर समय जब घाम प्रखर हो जातो ज्वाला-सी दु:सह, 
तब सुखद कल्पता सुर-सरि में में अनजाने ही जाता बह, 
ऊसर के प्रेत बगूले ये धरते आकृतियाँ महमिल'" की, 
हल रेखायें शिकनें बनतीं बारीक रेशमी अंचल की, 
झ्ौ' लोह कुदाली की धम-धम बन जाती छम-छम पायल की, 
--यह स्वप्न-ज्वार पल में हटती, उठते प्रस्तर-तट चेतन के । 
इस कलूम-कुदाली से गोड में खेत अनुवंर जीवन के ॥ 


(५) 
नैराशय निशा काजल-काली, में आशा दीप जलाये हूँ, 
यह शिशिर कभी तो बीतेगा, मधु ऋतु की आस लगाये हूं, 
जब हरी-भरी खेती होगी, उर में वह चित्र सजाये हूँ, 
खेतों में सोना बरसेगा, यह श्रम मेरा फल छायेगा, 
घर-बाहर सब भर जायेगा, खुशहाली का युग आयेगा, 
ना दीन कहीं, ना धनी कहीं, यह भेद-भाव मिट जायेगा, 
यह कलम लदी पुलकावलि से गायेगी बाँसुरिया बन के । 
इस कलम-कुदाली से गोड़ें, में खेत अनुवंर जीवन के ॥ 


(६) 
बाहों में बल हो तो निश्चय गिरि भी आगे से हट जाता, 


संकल्प सुदृढ़ हो तो निश्चय धरती पर स्वर्ग उतर आता, 
विश्वास अटल हो तो निश्चय पत्थर भी ईश्वर हो जाता, 
बस, आत्म-शक्ति, विश्वास और संकल्प अटल का ले संबल, 
निज हाड-माँस की खाद डाल, निज रक्‍त-स्वेद से सींच सजल, 
जीवन के बंजर खेतों को में बनां रहा उवंर-श्यामल, 
दिन दूर नहीं, जब देख इन्हें छलचेंगे स्वामी नन्‍्दन के । 
इस कलम-कुदाली से गोड़ें, में खेत अनुवंर जीवन के ॥। 


१--ऊंट के ऊपर क॒त्ती जाने वाली पालकी-सी, जिसमें बंठकर 
रेग्स्तानी प्रदेशों की स्त्रियाँ यात्रा करतो हें । 


१३० 'काव्य-धारा 
वम्भूनाथ 'होष' 
स्वाइयात 
प्राणों मे नई चेतना भर जाते हें ! 
नयनों में नये रूप निखर जाते हैं ! 
पृथ्वी का सहज सत्य करे जब विश्राम; 


आ्राकाश में कुछ स्वप्त बिखर जाते हैं! 


न न ने 
मानव को प्रकृति रूप में स्रष्टठा पाया; 


अनुराग ने सौन्दर्य का सरगम गाया! 
पृथ्वी की सजगता की खिली जब मुसकान; 
दिव्‌ लोक से आलोक उतर कर आया ! 
रे पा चुः 
केन्द्रित हैं किसी रूप सें संसार का ध्यान ! 
अनुराग सरोवर में नयन श्री अम्लान ! 
खो जाता है मन शून्य में यों अपने श्राप-- 
ज्यों बाँसुरी की दूर से आती हुई तान ! 


+॑ नर श्र 
हेमन्त-तरल चाँदनी मधुवन भूले ! 


अनुराग के क्षण, श्रन्तः चेतन भूले ! 
यों भूलती हे साध सलज दर्शत पा: 
ज्यों नृत्य-रता कामिनी का तन भूले; 
$ रु अर 
मानस में ललित भावना लुक-लुक जाए ! 
ग्रभिव्यक्ति के क्षण कामना रुक-रुक जाए ! 
बौराये हुये श्राम की डाली पर ज्यों; 
फागुन की तरल चाँदनी भुक-भुक जाए ! 


गज़ल 
प्राण समान हुई जाती है, शाश्वत गान हुई जाती है ! 
एक मधु र-सी टीस हृदय का जीवन-यान हुई जाती है ! 
नभ में तारा, दृग में आँसू, जो धरती पर थी हिम कणिका, 
वही बूंद दुदिन में जाने क्‍यों तूफान हुई जाती है! 


काव्य-धारा १३१ 


- मुदु भावों की अवहेला पर फूट पड़े थे करुणा-सोते; 
वह सुधि रूपसि के अधरों की मृदु मुसकान हुई जाती है ! 
रूप-सिन्धु में लीन हृदय की शाश्वत सृजन-कला तो देखो; 
वह अम॒त्तं-सी भाव प्रेरणा अभ्रव छविमान हुई जाती है। 
दुग में स्वप्न, हृदय में जिसने मीठी-सी अभ्रभिलाषा भर दी; 
वह छवि छवियों के भुरमुट में अन्तर्धान हुई जाती है! 
मेरे सूनेपग के सपनों, कौन करे श्वृंगार तुम्हारा; 
रेगिस्तानी नदी राह में रेगिस्तान हुई जाती हैं! 
मन के सुमन चढ़ा कर जिसका दुकूजल से अभिषेक किया था, 
मेरी साधों की वह प्रतिमा फिर पाषाण हुई जाती है ! 
लाज भरी सोन्दयं-मूत्ति के आत्म-ज्ञान ने ली अँगड़ाई; 
राई सी भ्रभिलाषा बढ़कर मेरु महान हुई जाती हैं! 
कुहरे भरे क्षणों में गायक कोन सुनेगा मर्म व्यथाएं; 
पाकर नभ का भेद रात भी स्वर्ण-विहान हुई जाती है । 

७्छ 


चुनोती 
हे उन्हें मेरो चुनोती ! 
जो कि मेरे रक्त से श्वृंगार करना चाहते हें । 
वेदना शर्मा रही हैँ देखकर मुस्क्रान मेरी 
मोम बनती जा रही है सुन रसीली तान मेरी 
चाँद मेरा मीत है रवि से नहीं भयभीत हूँ में- 
वे सुनें ललकार मेरी ! 
जो कि मेरी वक्ष पर अंगार धरना चाहते हैं । 
जो कि मेरे रक्‍त से श्वृंगार करना चाहते हे ॥ 
में जिया उनचास पवतनों में प्रढय का गीत बनकर 
घन घटाप्रों में रहा हूँ बिजलियों की जीत बनकर 
आँधियों के श्याम कुन्तल प्यार से मेंने सँवारे 
वे सुनें जयघोष मेरा ! 
व्यर्थ ही जो रक्त की नवधार वरना चाहते । 
जो कि मेरे रक्‍त से श्यृंगार करना चाहते हें ।। 


देवराज दिनेश 


१३२ 


काव्य-धारा 


रक्त मेरा पी बुभाना चाहते जो प्यास भ्रपनी 
एक मेरी बात मानें छोड़ दें अभिलाष अपनी 
मित्र के हित पुष्प हूँ तो शत्रु के हित सर्प हूँ में 
व सुनें फुंकार मेरी । 
जो क्रि मेरे सामने बेकार मरना चाहते हें । 
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते हैं ॥ 
में उपश्रों में हँसा हूँ, में निशाओओरों में रहा हूँ 
कल के सँग-सेँंग चला हूँ प्रबल लहरों में बहा हूँ 
हार से परिचय पुराना जीत नव-दुल्हिन बनी है 
वे सुनें सन्देश मेरा ! 
जो कि मेरे प्यार का अधिकार हरना चाहते हें । 
जो कि मेरे रक्त से श्यृंगार करना चाहते हें ॥ 
प्रगति मेरी संगिनी बन साथ मेरे रह रही है 
कल्पना अपने हृदय की बात मुझ से कह रही है 
में किसी से क्‍यों डर जब साथ हे मेरे जवानी 
घोच लें अपना भला वे ! 
जो प्रगति के पंथ की दीवार बनाना चाहते हें । 
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते हें ॥ 
भावना के श्ान्त सागर में अनेकों ज्वार आए 
ये अनेकों ज्वार मेरी नाव को कब रोक पाए 
साधना की नाव मेरी भ्रनवरत चलती रहेगी 
परख लें वे दक्ति अपनी ! ह 
जो कि मेरी राह में मँफधार बनना चाहते हें । 
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते हें ॥ 
में जिऊँगा क्योंकि जीने की प्रबलतम चाह मेरी 
साफ करती जा रही हें आपदाएँ राह मेरी 
प्यार से तूफान मेरे साथ चलते मुस्कराते 
वे सुनें हुँकार मेरी ! 
जो हठीले मृत्यु से श्रभिसार करना चाहते हें । 
जो कि मेरे रक्त श्रृगार करना चाहते हें ॥ 


काव्य-घारा 


गीत 


रात भश्राधी जा चुकी हे दूर हें सपने 
और पंथी गा रहा हैं गीत जीवन का 
वेदनामय स्वर बताता हाल तन-मन का 
थक चुकी है राह पर राही थके कंसे 
ढूंढने हे झ्राज दुनिया में उसे अपने । 
रात आधी जा चुकी है, दूर हें सपने । 


लोचनों में है सघन उन्‍्माद सा छाया 
चिर पुराना स्वप्न बरबस याद हो झ्राया 


स्वप्न भी था, जागरण भी था, निशा भी थी 


जिन्दगी में थे अनेकों मीत बन्धु बने 
रात आधी जा चुकी हैं, दूर हैं सपने । 


चाँदनी रातें कभी अह्लाद लाई थीं 
जिंदगी में तरल तम उन्माद लाई थीं 
भावनामय गीत गाये थे सितारों ने 
प्रकृति प्रांगण में बहे थे सुरभि के भरने 
रात आधी जा चुकी हे, दूर हें सपने । 


स्निग्ध शशधर मीत जीवन का कहाता था 
भर सुधा के चषक मस्ती से पिलाता था 
किन्तु अब साथी नहीं हे साथ जीवन 
लग गया है यह सुखद हिमवान भी तपने । 
रात आधी जाचुकी है, दूर हें सपने । 


दूर की मंजिल कभी तो पास आयेगी 
प्रिय रुपहले स्वप्न अपने साथ लायेगी 
यह मुदुलू आशा पथिक को दे रही जीवन 
देख बढ़ते चरण, चुभते शूछ आज घने । 


_ रात आधी जा चुकी है, दूर हें सपने । 


विष बुझे यह शूल ही बन फूल जायेंगे 
ओर मधु के घूँट पंथी को पिलायेंगे 


१३३ 


१३४ * काव्य-धारा 


स्वयं काली रात मादक प्रात लायेगी 
ग्रौर पंथी गा उठेगा गीत स्नेह सने । 
रात आधी जा चुकी हे, दूर हें सपने ।। 


सुखद मंजिल दे पथिक को वस्तु मन-चाही 
हँस कहेगी फिर नई मंजिल बना राही 
है वही जीवन निरन्तर गति रहे जिसमें 
जिदगी भर प्रिय तुम्हें नव पंथ हे चुनने । 
रात आधी जा चुकी हैं, दूर हें सपने ॥ 


6& 
गोपालकृष्ण कोल 
श्रणार्थी ! 
इन्सानों की भीड़ में श्रचंभित, अवाक्‌, भीड़ में श्रकेला ! 
इन्सानियत खो गई है कोई ? 
जैसे मेले में जो- 


कोई अबोध शिक्षु 


खो गया खिलौनों श्रौ' तमाशों की 
खोज में 


अंगुली पकड़कर चलने वाले स्नेह के 
हाथों से दूर 

बिछ ड़कर प्यार की गोद से 

आँखों के श्रासमान से टूटे तारे की तरह 

सिसक रहा मेले में- 


आदम के बेटों से 


हर आँख नहीं करुणा से गीलो होती 

हर बूँद नहीं सीपी में बनती मोती 

हर धरती पर फूल नहीं खिलते हैं 
कितना ही शबनम रहे रात भर रोती | 
क्या जाने कब से गलता रहा हिमानी, 
पर हर पत्थर कब गलरूकर बनता पानी ? 
हर प्यास नहीं बुझती केवल अमृत से 
विष भी पीकर खुश रहती यहाँ जवानी । 


इस खोए, सिसकते हुए 

प्यार के भूखे बालक को 

उसके घर तक पहुँच दे ? 

टूटे हुए तारे को सूने आसमान में 
फिर से बसादे ? 

आज- 

इन्सानियत श्वरणार्थी हे ! 


हर साँक़ नहीं उगता हे चाँद गगन में, 
हर सुबह जागरण जगा न पाती मन में ? 
हर बदली कब सूरज का घूंघट बनती 
हर घटा नहीं रुक पाती मुक्त पवन में । 


हर पग की छाया राह नहीं बन पाती 
हर नई राह कब है मंजिल तक जाती ? 
यों तो हर राही कदम बढ़ाता है पर 

हर एक कदम को मंजिल सिर न भुकाती । 


काव्य-घारा 


१३५ 


इस तरह व्यक्ति की सत्ता अलग-अलग है तुम व्यक्ति-निष्ठ तुम अपने स्वयं पुजारी ! 


हर एक प्राण में अपना अरहं सजग है 
अस्तित्व अ्रहं की छाया है, यह माना 
पर एक पैर से चलता कब यह जग है ? 
तुम एक ब्‌द को सागर माना करते 
तुम एक फूल को उपवन जाना करते 
तुम समझा करते एक लहर को सरिता 
तुम एक साँस को जीवन माना करते ! 
यह है अनेक को भूल, एक का पूजन, 
जग की पीड़ा से बचने का अवगुण्ठन 
यों शुतुरमुर्ग भी गरदन छिपा रेत में 
करता रहता है आत्म-तत्त्व का चिंतन ! 


तुम को समष्टि से छगता है भय भारी, 
जब दुनिया में श्राग रकगा करती तब-- 
तुम हाथ सेकने की करते तैयारी ! 

तुम तकं-पुष्ट, तुम सूनेपन का चिन्तन ! 
तुम एक नहीं सहते अनेक का बन्धन ! ! 
जो बुझा न पाता प्यास किसी धरती की 
तुम ऐसे बिन-बदली के सूने सावन ! 
बिन दो के होता प्यार नहीं धरती पर 
यह दुनिया आदम के बेटों का हे घर 
यह धरती कितनी ही ऊँची-नीची हो 

पर है इस पर सबका भ्रधिकार बराबर । 


७989 
रामावतार त्यागी 
गीत 
दीप के समीप अंधकार घूमता 
आरतो सँभालकर उतारना ! 
साँक़ ने विहंग को सितार दिया है चाँद को कुरूप ने खरौंच लियां है 


व्योम को स्वयंबरी भिंगार दिया हैं 
सूघने समीर छूगा फूछ-फूल को 
नींद को शरीर ने पुकार लिया है 
स्वर्ण के विमान सदाचार धूमता 
तुम मुझे सँमभालकर पुकारना ! 


प्यार को विनाश ने विराम दिया है 
बुद्ध ने जवान पाँव थाम दिया है 
लूट लिया फूल को बहार ने कहीं 
बंद को प्रवाह ने गुलाम किया है 
शब्द का महान ग्रन्थकार घूमता, 
गीत को सँभालकर उचारना। 


मुत्यु ने सुहागविन्दु पौँंछ दिया है 
जन्म के कपोल पर मशान का कलंक 
भीति ने विकास को दवोच लिया है 
भ्रान्ति का निशंक कलाकार घूमता, 
वक्‍त को सँभालकर गुजारना | 


जिन्दगी कगार पर खड़ी कतार म 
पंथ के निशान खो गये गुबार में 
ढोलकी उदास, नुत्य भी निराश है 
व्यक्ति दबा राजनीति के तुषार में 
वारुणी पियें हुए सुधार घूमता, 
द्वारा से सेभमालकर निहारना। 


१३६ 


गीत 


रोओगे अ्र्थी पर इतनी देर तो, 
कौन जनम का स्वागत करने जायेगा ? 


फूलों के सूखे, निर्जीव शरीर पर 
शोक सुबह तक बेठे अगर मनाश्रोगे ? 
तो खिलती कलियाँ खुशियाँ जब माँगेंगी 
तुम उनको क्या कह करके समभाओरोगे ? 
सोझोगे जो सिर को धरे मजार पर, 
तो जीवन का उत्सव कौन मनायेगा ? 
होगा चढ़ना क॑से उच्च पहाड़ पर 
जो अ्रपनी ऊँचाई से घबराओगे ? 
सबके दुश्मन से कंसे लड़ पाश्रोगे ? 
जो अपनी परछाई से भय खाओरोगे ? 
मानोगे तारों का इतना हुक्म तो, 
कौन सुबह का घर-घर गीत सुनायेगा ? 


गीत 


काथ्य-धारा 


मान कहा मेधा का कितनी देर तक 
बात हृदय की यों ठुकराई जायेगी ? 
शब्दों के जादू से कितने वर्ष तक 
मानवता की लाश छिपाई जायेगी ? 
होओगे निष्फलता देख उदास जो, 
कौन समय से जाकर आँख मिलायेगा ? 


जो पगडंडी की उँगली को थामकर 
है चलना तो कंसे राह बनाश्रोगे ? 
कोस रहे जो नभ को उनसे पूछना-- 
अपनी लूघुता को किस रोज मिटाओ्रोंगे ? 
जोहोगे हर वक्‍त मलय की बाट को, 
तो बबेर आँधी को कौन चिढ़ायेगा ? 


कहो जागरण से जरा साँस ले ले 
अभी स्वप्न मेरा 


लकीरें बनी हें न तस्वीर पूरी 
अभी ध्यान है साधना है अधूरी 
अ्रभी कल्पना का हुआ है उदय ही 
रहा साथ मेरे ञ्रभी तक मलय हीं 
* मुझे देवता मत पुरस्कार देना 
अभी यत्न मेरा अधूरा-अधूरा। 


ग्रभी तारकों पर उदासी न छाई 
दिये ने न माँगी अभी तक बिदाई 
अभी चाँद का रथ हुआ है रवाना 
कली को न आया अभी मुस्कराना 
प्रभाती न गाझ्नो, सुबह मत बुलाग्रो 
ग्रभी प्रश्न मेरा अधूरा-प्रधूरा । 


अधूरा-अधूरा । 

अभी झाग हे, आरती कत्र बनी है 
ग्रभी भावना भारती कब बनी है 
मुखर प्रार्थना मौन अचंन नहीं है 
निवेदत अभी तक समर्पण नहीं हैं 
अभी से कसौटी न मुभको चढ़ाग्रो 
खरा स्वर्ण मेरा अधूरा-अधूरा | 


किरण फूल के कुन्तलों को खिलाए 
पवन डाल के पायलों को हिलाए 
अ्रमर जब चमन में म्ुरलिया बजाए 
कभी जब तुम्हारी मुझे याद आए 
तभी द्वार आकर तभी लौट जाना. 
हृदय भग्न मेरा अ्रध्रा-अधूरा। 


काव्य-धारा १३७ 


प्रथागनारायण त्रिपाठी 


तप्त कुण्ड 

हिम-मण्डित शिख रों के आस-पास 

जहाँ डोलता है क्रुद्ध हिम-वतास 

जहाँ हर धारा हिम-शीतल है 

जहाँ रुंघ जाता है श्वास-श्वास 

वहीं कहीं, किसी ठाँव, किसी मोड़ 

पत्थर की छाती को फोड़-फोड़ 

सहसा उमड़ता है तप्त कुण्ड 

हिम का प्रत्यूत्तर, प्रसन्न होड़ । 
तुम--जो हिम शीतल हो, उज्ज्वल हो, तुष्ट हो 
तुम--जो गर्वीली निज हिमता में पुष्ठ हो 
तुम में भी निःशंसय फूटेगा तप्त कुण्ड 
चाहे उसे हँस भेलो, चाहे व्यर्य रुष्ठ हो 
उस विस्फोट से तुम्हारा यह हिम शरीर 
यह॒ गगनोन्मुख धरा का शुभ्र पिण्ड-नीर 
पिघलछेगा । फूटेंगी जछू-धारायें अनंत 
नयन चीर, श्रम-सीकर बन रन्ध्र-रन्ध्र चीर । 


चार म॒ुक्तक 
खिलोना 
कहती सुबह : किरन-गूड़िया लो, बड़ी नरम है, प्यार करो; 
कहत दिवस : करम-पुतरी लो, गिरो नहीं, काँधा थामो; 
कहती साँक़ : खिलोना मोमी ले छो शान्ति, थकन भूलो; 
कहती रात : नखत लो, चन्द्रा लो, ये सपने लो, खेलों; 
में एँठा हूँ : क्यों न दे गईं मुझे खिलौना तुम कोई ? 
पहस्वा 
कभी सुता था : शलभ दीप-छो छते ही जल जाता है; 
कभी सुना था : रात-रात भर रटता पपिहा 'पीव कहाँ ?' 
कभी सुना था : मीन नीर बिन तड़प-तड़प मर जाता हैं, 
सच हो शायद : पर न भूूठ यह इस क्षण, जब तुम पास नहीं, 
लगता है, पहरुवा प्राण का कहीं दूर जा सोया है। 


१श्८ 


काव्य-धारा 


मुस्कान 
जड़ें काट दो और विहग से कहो : खब निश्चिन्त जियो ! 
पंख तोड़ दो और विहग से कहो : गगन में भूमो तो ! 
रंग पोंछड दो और चित्र से कहो : दिखाञ्नरो तो भाँकी ! 
तार तोड़ दो और बीन से कहो : भरवी छेड़ो तो ! 
सुधि है ? तुमने कहा था न ?--यह लछो, में भी मुस्काता हूँ ! 

ब्याह 
कहते हैं : चन्दा-क्रमोदेनी मिलें व्याह तब होता हे, 
कहते हें : सूरज-सरोजनी मिलें व्याह तब होता है, 
कहते हें : कत्तिका-रोहणीं मिलें ब्याह तब होता है, 
होता होगा ; ब्याह गगन से गिरता होगा; खबर नहीं, 
हम तो आग लगाकर घर में तुम्हें खोजने जाते हैं । 

७&& 


जगदीश बाजपेई 


शिखरों : एक संबोध ! 


शिखर, जो बादलों से बात करते थे; 
शिखर, जो दामिनी को अंक भरते थे; 
शिखर, जो चन्द्रिका-चुम्बित रहे प्रति-पल 
शिखर जो हिम-प्रभंजन से न डरते थे । 
वही विद्रोह कर भू से हुए कंपित; 
विजित हो घाटियों से आझ्राज चिर-शंकित; 
सफलता, शक्ति जिनके चूमती थी पग- 
विफलता सहचरी; वे श्राज भू-लुंठित । 


शिखर तब तक शिख र यदि घाटियाँ मानें; 
शिखर ऊँचे अभ्रगर सरि, गते सम्मानें; 
चुनौती दे चुका युग आज श्वृंगों; को 
बचेगी छाज यदि युग-धर्म पहिचानें ॥ 


दिवस बीते कि जब सम्मान होता था; 
शिखर का भार सारा विश्व ढोता था; 
धरा के पुत्र-जनपद, ग्राम जगते थे 
शिख र, पर, चाँदनी की सेज सोता था । 


मगर अ्रब काल बदला, भावना बदली; 
गया मधुमास, बिखरी भ्रान्ति की बदली; 
मुदित है पर्णिका, प्रासाद श्रातंकित; 
सजग करती सभी को क्रान्ति की बदली । 
श्रहं को त्याग अ्रणु से मित्रता कर छो; 
गगन को भूल जग को अंक में भर लो; 
इसी में हित निहित शिखरों तुम्हारा है; 
भुको, भुक कर धरा की बन्दना कर लो ! 


काव्य-धारा १३६ 
इस समय कल में तुम्हारे पास था 
हे पु 


साधना तब थी तिरोहित साध्य में; 
भक्ति मूक विलीन थी आराध्य में; 
बिन्दु का अस्तित्व तब था सिंधु में; 
पंख में बन्दी विशद आकाश था। 


इस समय कल, . , 
हा (३) 
कामना में तृप्ति खुद साकार थी; आज कितनी दूर शशि से चाँदनो; 
याचना में पूर्ति की मनुहार थी; आज कितनी दूर घन से दामिनी; 
शन्‍्यता मानो मुखर थी राग में जग गया रंगीन सपना देखते 
एक तिनके में बंधा मधुमास था! वह विगत उल्लास भी उच्छवास था । 
इस समय कल . , , इस समय कल , . . 
&्क्ष 
केदारनाथ सिंह 
शरद आशी:ः 


उस पार मक्का के पके हुए खेत हें । 
और इस पार मेरा गाँव, 
न जाने क्‍यों मेरी आँखों में शरद तेर रहा है-- 
भोर के उजास भरे बादलों की तरह, 
न जाने वे पगडण्डियाँ श्रब॒ कहाँ होंगी--- 
जो मुझे आज भी उस छोर पर बेसाख्ता हाँक देती हैं 
न जानें इस साल उन पर वे घासें उगी होंगी कि नहीं 
जिनकी नन्‍्ही-नन्‍्हीं पत्तियाँ-- 
आ्राज भी मूझे दूर पर हिलते हुए हाथ की तरह बुलाती हैं, 
न जाने उन किवाड़ों पर अरब कौन-सी थाप पड़ती होगी 
जो रास्ते की ह९ आहट पर पहले चीख-चीख उठते थे, 

* नजानें उन भरोखों से अब कौन-सी हवा टकराती होगी 
जिनसे मेरी फसलों की शाम अक्सर उलभ जाती थी, 
न जानें उन तलेयों से कौन-सा गीत उठता होगा; 


१४० 


काव्य-घारा 


जहाँ झ्राज भी में-- 

तरसलों पर भुके हुए कुहरे की तरह काँप रहा हूँ ! 

उस पार मक्का के पके हुए खेत हैं, 

और इस पार मेरा गाँव, 

न जाने क्‍यों एक हाथ याद ग्राता है-- 

जो हर साँक उस घाट की टूटी सीढ़ियों पर एक दिया-- 

धर जाता था--शरद उस हाथ को तुलसी की नई पत्तियाँ भेंट करे । 
उंगलियाँ याद आती हें-- 

जो गुड़ियों की टोपियों में परियों की मासूम कहानियाँ-- 

बुन देती थीं--दारद उन उंगलियों को नई दूब की ताज़गी दे ! 


नाखून याद झाते हँ-- 
जो अपने स्पशे से रूमाल के बरीक धागों में-- 
किरन की धीमी गुनगुनाहट आँक देते थे--- 
दरद उन नाखूनों को वकुल की नई पँखड़ियों से रंग दे, 
एक भाल याद ग्राता है-- 
जिस पर जाड़ों की ढलती हुई धूप बरबस ठहर जाती थी 
दरद उस भाल पर नये भोर की बेंदी लगा दे, 
आँखें याद आती हें-- 
जिनमें में समुन्दर की बेमाप ग़हराइयाँ बनकर खो गया था-- 
शरद उन आँखों को आदिम पूणिमाञ्रों की तरह चमका दे, 
बाल याद झाते हें-- 
जिनमें सर्द कछारों से आने वाली हवायें विश्राम करती थीं-- 
शरद उन बालों को चाँदनी के हल्के फोंको से सिहरा दे, 
एक नाम याद आता हँ-- 
जो झ्राज भी मेरी सिहरनों में हल्की गरमाहट की तरह-- 
बसा हुआ हँ-- । 
शरद उस नाम को एक वेदिक ऋचा की तरह-- 

गेंगा के कूलों पर बिखरा दे, 
उस पार पक्का के पके हुए खेत हें 
ओर इस पार मेरा गाँव, 
और इस पार मेरा गाँव, 
न जाने क्‍्यों-- 


काव्य-धारा १४१ 


मेरी रगों में शरद डूबता जा रहा है, 
डूबता जा रहा हे, 
जैसे फैले कछारों में नई मिट्टी की गमक डूबती है-- 
धीरे, धीरे, 
6७8 
सर्वेदवरदयाल सक्सेना 
सुबह से शाम तक में 
सुबह हुई-- 
धरती के सुनहरे चिकने फर्श पर 
हरी मटर का गोल बड़ा दाना लुढ़कने लगा; 
और उसके पीछे पीछे, भूरे पंख फड़फड़ाता, 
गौरेये का एक बच्चा, 
- अपनी नन्‍्हीं सी सुखे चोंच खोलकर, 
उसे बार-बार पकड़ने का असफल प्रयास करता फुदकने लगा । 
साँक हुई--- 
दूर, आकाश के पीले रेगिस्तानी टीलों पर, 
भूखे शिथिक्त ऊंट, 
सुर्ख क्षतिज की ओर ऊपर सर उठाए, 
पीठ पर चारा छादे, 
किसी ओभकल पड़ाव की ओर थके माँदे, 
काले प्रइन चिन्हों से रेंगने लगे । 
सुबह से शाम तक में-- 
निज का प्रयत्न परवश्यता में बदल गया, 
पेंट इतना बढ़ गया 
कि उसको ही चिन्ता में 
सामने का चारा पीठ पर छादना पड़ा, 
आप इसे प्रगति कहें ! 
मेरे लिए 
स्वावलस्बी गौरेय्ये का बच्चा ऊंट हो गया । 


१४२ काव्य-धारा 
मार्कण्डेय 
रोड़े 
यह पथ के रोड़े हैं अ्रब तक ये बाज न आये । 
इनको बातें बहुत बड़ी हें, इन की साँसें तोड़ न देना, 
ऊपर से चिकने पर, इन्हें राह पर छोड़ न देना, 
इनकी छाती बहुत कड़ी है । यह पत्थर के टुकड़े, 
कितनों को मंजिल से रोका, इन पर टाँकी मारो ! 
कभी नहीं पछताये, खून पसीना आँसू देकर, 
फिर भी अ्रपनी झादत से, इन्हें सवारों ! 
अकाश का प्यासा 
हर खिलने वाला फूल हर प्रेमी की आस, 
हर चुभने वाला शूरू हर कंदी की साँस 
प्यार है । बाघा हूँ । 
हर घुटने वाली साँस, हर बन्धन की शआ राग, 
हर मिटने वाली प्यास हर भानव की माँग 
हार हैं । पूजा है । 
हर हँसता आदम-जात, हर बातों की तोल, 
हर गिरता पीछा पात हर सौदे का मोल 
ग्राशा है । कृपा हैं । 
हर उठती नभ की धूल, हर श्रम का दुर्वासा, 
हर ढहता सरिता कूल हर प्रकाश का प्यासा 
क्रान्ति हे । मित्र है । 
आदमी 


बनता आदमी कुछ और 
होता आदमी कुछ और 


पत्थर में समाये प्राण, 
प्राणों में बसे पाषाण । 
कोई पूजता है प्राण, 
कोई पूजता पाषाण । 


बनकर आदमी हेवान, 
कहता हूं बना इन्सान । 
कोई भीतरी हैवान, 
कोई बाहरी हेवान । 


कोई समभता कुछ और, 


बनता आदमी कुछ और, 
कोई मानता कुछ और । 


होता आदमी कुछऔर । 


काव्य-धारा 


धरती पर जगा इन्सान, सासों में बसी छलछकार, 
पर क्या हें नहीं बीरान पर बेजान को क्या हार। 
कोई ढूंढ़ता इन्सान, कोई दे रहा ललकार, 
कोई ढूंढ़ता बीरान | कोई खा रहा हैं हार 
जगता आदमी कुछ और । जिन्दा आदमी कुछ और, 
सोता आदमी कुछ और । मुर्दा आदमी कुछ और । 
5 
मुकुटबिहारी सरोज 
गीत 


दुनियाँ का दुख दर्दे समभने वाले हर इन्सान को 
नए स्वरों में आमंत्रित करना होगा भगवान को । 


5, 
सदियों के यौवन से, पूजन में ऐसो गलतो हुई 
मानवता की ज्योति बुझा डाली बिल्कुल जलती हुई 
इस गलती को भाग्य समभने वाछे हर इन्सान को 
नई तरह से अनुभव करना होगा अ्रब अरमान को | 


कि) 
सोने का रनिवास, पसीने के दीपों से जल गया 
किसी देव का पुण्य, किसी पापी पत्थर को मिल गया 
इस पत्थर को देव समझने वाले हर इन्सान को 
नई तरह से परिभाषित करना होगा शमशान को । 


जी । 
रोहिताश्व शैव्या खरीदकर, लोहा-चाँदी बन गया 
घास-फूस के लिए पवन पतभर में आँधी बन गया 
इस लोहे को सभ्य समभने वाले, हर इन्सान को 
नई तरह से दुृहराना होगा, धरती के गान को । 


१४३ 


१४७ काब्य-धारा 


कमलाकान्त पाठक 


जीवन के शोर में 


प्राण-पिकी का का कलरव डूबा श्रब जीवन के शोर में । 
हिय के हँसते आँसू सूखे इन नयनों की कोर में । 
मानव ने जब आँखें खोलीं मन के स्थिर विस्तार में 
उसे पराया कहीं न दीखा भूमा की रस-धार में 
धरती ग्पनी, नभ भी भ्रपना, जग जगता था प्यार में 
हवा रोशनी-पानी समरस रहे चढ़ाव-उतार में 
सात समुद्रोंवाली पृथ्वी तुलती स्नेह-निहोर में । 
मानव ने जब आँखें मूदीं मन के अस्थिर देश 
बादल छाये काले-काले मतलब के आ-बेश 
अपना गया पराया आया, व्यथा-कथा के इलेष 
प्यास कंठ में, पानी नभ में प्यार पला विद्वेष में 
हिममयी गई हो मानवता मन की मुंदी मरोर में । 
मानव की जब अ्राँखें चमकीं बौद्धिक चरम विकास में 
नव-नव छनन्‍्द बने करनी के कथनी के मधुमास में 
बल-वेभव के गढ़ पर ऊगे कला-कलश अ्रवकाश में 
दुनिया सिमटी, मन भी सिकुड़ा, बँधा भ्रहम के पाश में 
दूर हटा मानव से मानव, भरा हृदय भकभोर में 
मानव की श्रब आँखें ऋपकीं टेढ़ी-मेढ़ी चाल में- द 
विश्व-प्रेम के मधु सपनों को रखकर भाल विशाल में | 
खिल यंत्रों में फिल तन्त्रों में, दलित दलों के ख्याल में 
तड़प तड़ित-सा-दमका-खोया, जल व्यवसायिक ज्वाल में व 
इन्द्रमयी श्राकृतियाँ झपटीं युग की नई हिलोर में, 
बदले मनोवृत्ति के कपड़े भय के भठके भोर में। 
प्राण-पिकी का कलरव डूबा भश्रब जीवन के झोर में । 


447 वीं: 26 


. ६. +?! कल मी आम शी मन शक के कक. 


काव्य-धारा श्ष्श्‌ 


शान्ति सिहल 
गीत 


अंतर की अपूर्ण साधों को चिर अपूर्णता का वर देकर 
क्‍या तुमने कुछ भूल न की है ? 
रोते देखा मेंने अंबर, फटती देखी भू की छाती, 
केवल एक व्यथा मानव की, जग की आँखों से कतराती, 
तुम्हीं बताग्रो ग्बल व्यथा को चिर लज्जा का भार सौंपकर 
क्या तुमने कुछ भूल न की है ? 
लज्जा-नत ये नयन कि जिनमें बिषम वेदना नहीं समाती । 
जीवन की परिभाषा जिनमें शतशत रूप लिए अकूलाती । 
भू, नभ की संपूर्ण कथा को केवल करुणा का स्वर देकर 
क्या तुमने कुछ भूल न की है ? 
अंतर का उल्लास बदल जाता है फ़ीकी मुस्कानों में, 
तिनके से विश्वास बिखर कर रह जाते हें तूफानों में, 
अमित पथिक से मन-पक्षी को सीमा-हीन मार्ग में तज कर 
क्या तुमने कुछ भूल न की है ! 
कहने को तो स्वयं रहा है मानव अपना भाग्य विधाता ! 
किन्तु साथ ही भावी के भी साथ रहा है इसका नाता ! 
शाइवत प्यास सौंप प्राणों को जीवन को खारा सागर कर 
क्या तुमने कुछ भूल न की है ? 
छ9 


ननन्‍्द चतुर्वेदी 
पृथ्वी ओर बादल 


खिल रही हे धूप वर्षा के गगन में 

और बादन माँगते अ्रन्तिम विदा हैं । 
तरु-शिख र पर ञ्राज विस्तुत वाष्प के कुछ कण 
सजल हैं 

बह रही पूरब दिशा से पवन चंचल 

और, 

पर्वत का शिखर आद्रवित नयन से 


१४६ काव्य-धारा 


साँफ को घेरे हुए 

रंगीन मेघों का 

सरल, सभार नत--सा मौन देखे जा रहा है । 
आज कुछ बेहोश सा स्वर घूमता है चातकी का 
और, वे सतरंग सुर-धन्‌ की 

विलक्षण भंगिमायें 

एक सूनी सी उदासी में सिमटकर 

दूर जाने कौन स्वप्नावृत गगन की 

नीलिमा में मिल रही है । 

गाज बादल माँगते अंतिम विदा हैं; 

और पृथ्वी की सजल दुख-भार से पलकें भुकी हैं । 
आ्राज अ्धरों पर किसी का गीत मधुमय गूँजरित है । 
दूर पर्वत पार उड़ता जा रहा हैं मेघ का दल 

श्रौर धरती ड्बती ही जा रही है 

एक ऐसे ञ्रर्थ के अस्तित्व में 

जो कि कल ही मेघ ने उसको दिया है । 

उवेरा है भूमि सुख-दुख सब सहेगी 

किन्तु इस क्षण एक अनजाना विवश निरुपाय 

जेसे दर्द छाये जा रहा है 

और बादल माँगते अंतिम विदा हैं । 


8७ 
राजेश्वरप्रसाद नारायण सिंह 


गीत 


नव.युग का निर्माण करो है ! 
रूढ़ि-निशा-तम दिशि-दिशि छाया, 


नव तूली से नभ रंग जाझ्रा, 
नव रवि-शशि-आ्राह्वान करो हे, 


गहन अंध-विश्वास बिछाया, 
पथ भूले जन, ध्येय भुलाया, 
स्वणिम दिव्य विहान करो हे, 
नव युग का निर्माण करो है ! 
जगे प्राण, नव गीत जगाओ्रो, 
जन-जन में नव-प्रीत जगाओ्रो, 


नव यूग का निर्माण करो है ! 
नव पराग, नव-रस सरसाओ, 
नव सर में सरसिज विकसाओरो, 
कुन्ज-कुन्ज में भ्रमर जगाओ्रो, 
गुज्ज-गुज्ज में प्राण भरो हे, 
नव युग का निर्माण करो है ! 


मृण-मुण में नव-शक्ति जगाओ, 
तुण-तृण में नव बल बिखराओ, 
सुप्त बीज को सजग बनाओ, 
प्रकृति-नटी में तान भरो हे, 
लव युग का निर्माण करो हे ! 


काव्य-धारा 


भू-मंडल को एक करो हे, 
विश्व-प्रेम-अभिषेक करो हे, 
मन मानव का नेक करो हे, 
उच्चादशोंद्गान करो है, 
नव-युग का निर्माण करो हे ! 


असमर्थ 


खेल न खेल और तू ऐसे, 

सखे !झ्ाज तक रहा खेलता 
संग तेरे में जंसे-तंसे ! तू निर्भय, में काँप रहा हूँ 
तू समर्थ है निपुण खिलाड़ी, देख, हार के भय से, 
में असमर्थ, अ्रतीव अनाड़ी, खेल न खेल और तू ऐसे ! 
तेरे इस क्रीड़ा-कौतुक में अब तू मुझे छोड़ दे प्यारे, 
संग-साथ दू कंसे ? विदा माँगता पाणि-पसारे, 
खेल न खेल और तू ऐसे ! दृष्टा ही बन कर देख में 
तू असीम-में सीमाओं में तेरे खेल, अ्रभय-से, 
बंधा रात-दिन भव-मभावों में, खेल न खेल और तू ऐसे ! 

8७6 


देवेन्द्र सत्यार्थी वर्षगॉड 
एक मुलाकात की वषगाँठ 
केक का टुकड़ा नहीं थी वह, न कूजे से भरी मिस्री-डली, 
न मधु का घूंट थी, कटोरी दूध से मुह-मुंहभरी, 
न थी वह सन्‍्तरे की फाँक रस के जोर से छलकी हुई, 
एक औरत--हूर सी, मासूम सी, 
आज मड़-मुड़ याद आ रही । 
सिनिमा-घर के सामने पहली हमारी मुलाकात, 
यों लगा कि फिल्म के पदें से उठकर झा गई 
होर वारिस शाह की । 
आँख सीपियों मे कोई ढरकता इकरार, 
झ्रोंठ पातों में खिली फरियाद की कली, 
मीलों लम्बे समय को कतरन कोई सुहासिनी, 
या गगन-रेखा को छूती मुक्त पंखिनी घुघुती, 


१४५ 


काव्य-धारा 


उभरती ज्यों शहर के आकाश पर 

लाल सुर्खी श्राज के अखबार की । 

रेडियो से आ रही वागेश्वरी, 

घन्टी पहलीं पहले-पहले फोन की 

दूर से आई हुई 

चिर कँवारे की तरफ से 

चिर कँवारी के लिए । 

मधुकोष तरु फुनगी पै दूर-बहुत दूर, 
गमले की खिली नरगिस-पास, बहुत पास, 
किसी शाहामार की सैर की हो तरसती । 
है मुझे विश्वास कि श्ररत का प्यार 

इस तरह नहीं कि ज्यों रावी की धार 

बह रही, आती नहीं मुड़कर कभी । 

हैं मुझे विश्वास औरत की नजर 

इस तरह नहीं कि ज्यों जही कोई 
मुस्करा के मीच ले पलकें तुरत ही । 

है मुझे विश्वास कि औरत की याद 

इस तरह नहीं कि जेसे रेडियो-तरंग 

एक बार घूमकर लौटती नहीं ! 

हें मुझे विश्वास औरत की कोई मुस्कान 
होती नहीं कभी ईथर में विलीयमान । 

है मुझे विश्वास छाया चाँद-रात की 

बार बार याद में बँची सी लोटती 

चूमने ओ' गले लगने की नशीली साध में 
धूल से भरी को बार बार ढूढ़ती । 

हैं मुझे विश्वास : मुलाकात वह भ्रमर 

है मुझे विश्वास : इसीलिए तो उद्विग्न हूँ । 
दूर, बहुत दूर, दो देशों का फासला ! 

दूर, बहुत दूर, दो धर्मो' का फासला ! 


दूर अपनी घर गृहस्थी में फँसी वह परेशान ! 


याद आ रही अ्र।ज, 


उस हर की, उस परी की, याद आ रही हैं आज ! 


उसी मुलाकात की है वर्ष-गाँठ आज ! 


नलिन 


काव्य-धारा 


बीत गये दिन 


नव प्रवाल-सी शाम छुककती नीरूम-घाटी की प्याली से । 
गिरा--वह गिरा अरुण पका नभ की डाली से । 
भिलमिल रेशम-सा कोन स्रोत भरमाता-सा, 
ठोकर खाता टकराता-सा, 

कुछ गांता-सा अस्फुट सरगम । 

टालें टलठमल-- 

तम की छाती पर खिंचती शब्द-लकीर विरल । 
घाटो के थाम किनारे सन्ध्या-सुरा पी रहा प्यासा तम । 
नम-शोभी हेम-सुमन-पिंगल,' 

लो, सहसा पर्व॑त-हिम-कंधों से गया फिसल । 
तरल भोग-सा गया पिघल गल, 

स्वप्न-सजीला, आह आज भी दिवस गया ढल । 
आह झाज भी खाली आँचल, 

केवल दो साँसों की माया-- 

यह अभिलाषी “आज बन गया पछताता “कल । 
रूप की अमिटि निरंकुश प्यास, 

आज भी सो जायेगी रो-रो विफल उदात । 
आह क्‍या तुम न मिलोगी--प्राण ? 

चपल जजेर जीवन की--आस- 

बाँध रख सकते केवल तव कोमल भूजपाश । 
चरण क्षत, साहस-गत मन-प्राण, 
कुयुम-कोमल-केशर बन जायें-- 

तुम्हारा चरण-परस पाकर तीखे पाषाण । 

सामने मंजिल अगम असीम, पंथ अनजान । 
कहीं तुम इस घाटी के पार, 

प्रिये करती होगी संगोत-सुगंधि विहार । 
सुमन-मद पूनम गदगद पुलकित कुञ्ज-कुटो र, 
किरण कम्पित प्रतिहार समीर । 

गूंथती पारिजात के हार- 


१४६ 


१५ 


काव्य-धारा 


तुम्हारी पंखुरियों-सी अंगुलियाँ सुकुमार । 
सरल मन को निश्चल विश्वास, 
कहीं भूधर की पिछली श्रो र-- 
तुम्हारा स्वर्ण-रजत भ्रालोक भ्रधीर निवास । 
चरण कर इम घाटी को पार, 
विकल बाहें श्रालिगन हेतु पसार, 
प्राण, तुम चपल वासना-सी उद्गाम श्रधीर, 
पगों में गीत, साँस में छन्द 
चली आआओ्ोगी सहसा विस्मय-सी भ्रनजान । 
बुदुर-बिल्लो-पाइन भुरमुट को चीर | 
झ्राज भी बीत गया दिन, 
उमड़ा आता अंधकार का ज्वार, 
निगल जायेगा पल में मुझे दानवाकार । 
शीक्ष आ मुझे बचा लो प्राण, 
क्षिप्र कस लो अपनी मृदु बाहों में सुकमार ! 
चली आश्नो, कर इस घाटी को पार ! 

809 


रामकृष्ण श्रीवास्तव 


कलम के टुकड़े 


हे कवि गुरु वाल्मीकि तुम जहाँ कहीं भी हो, 
लो कलम कि इसमें ग्रपनी करुण कथा भर दो ! 
इस धरती पर आज भी क्रौंचचध होता है-- 
लो हृदय कि इप्तमें अपनी मर्म-व्यथा भर दो ! 
हे कवियों के कवि कालिदास हो जहाँ कहीं- 
फिर कलम पकड़ ना श्राकर हमें सिखा जाओ, 
नभ के दुग से फिर छलक - उठो है मेघदूत- 
फिर किसी विरहणी का संदेश सुना जाओ्ो ! 
संगीत काव्य के युगसुष्टा हे सूरदास, 
लो कलम कि इसमें मंत्रमुग्ध संगीत भरो ! 
माँ की मिसरी ममता, बालक का माखन मन, 
ह भंवरगीतवाली राधा की प्रीत भरो ! 


4-४ ४७८, >> आंच... 


काव्य-घारा 


है मीरा मा ! तुम अपनी चरण घूलि दे दो, 
यह कलम -हमारी नाच उठे जिसको छुकर 
हँसते-हेंसते विष का प्याला पीने वाले- 
वे भजन तुम्हारे भ्रबतक जिन्दा हें भूपर ! 


हें तुलसी धर्म प्राण कविता के कल्पवृक्ष 
शरणागत है यह कलम कि इसमें भक्ति भरो, 
हम जीत सकें सोने के मुग की माया को 
लो कलम कि इसमें रामबाण की शक्ति भरो! 


दो ट्क बात के धनी अरे फक्‍कड़ कबीर 
लो कलम कि इस पर रंग चढ़ा दो मस्ती का! 
जो भटक रहे हैं मन्दिर-मस्जिद में उनको 
रास्ता दिखा दो इंसानों- की बस्ती का ! 


हैं कहाँ कलम के धनी आज इस दुनिया में 
जिसको देखो वह कलम बेचता फिरता हे, 
जब कलम गुलामी की सूली पर चढ़ती हे- 
आजादी की आँखों से छोह गिरता हे ! 
यह कलम नहीं, इज्जत हे बड़े बुजुर्गों की 
इसकी रक्षा करना कतेंव्य हमारा है- 
यह कलम नहीं, वाणी है भारत माता की 
इसका हर टुकड़ा हमे प्राणसे प्यारा है ! 
जो लिखा आज तक कलम तोड़नेवालों ने 
वह पढ़ते-पढ़ते हमने कलम ऊठाई हें, 
तू बनी टूट जानें को मत रुकना-भुकना 
ऐ कलम लिखे जा तुभकों रामदुहाई हे ! 
ऐ सोनेवाछो, जाग उठो अब देर न हो 
जिन्दा रहने के लिए हमें मरना होगा, 
मर नहीं गये हम जिन्दा हैं इस दुनिया में 
हमको अपना अस्तित्व सिद्ध करना होगा! 
जीने को वेसे जीती हें मक्खियाँ यहाँ 
कल्पना जिन्दगीकी यह अशिव-असुन्दर हे, 


१५१ 


१५२ 


काव्य-धारा 


हम जिन्दा हें यह सच है लेकिन दुनिया में 
बेमतलब की जिन्दगी मौत से बदतर है ! 


जीना है हम सबको, मुझको भी, तुमको भी 
तो आग्नमो जिलकर इंसानों की तरह जियें- 
दुनिया के सिर पर मौत अगर मंडराती हो 
तब भी न मरें हम बलिदानों की तारह जियें ! 


है कवियों के राजा रवीन्द्र हो जहाँ कहीं, 
लो कलम कि इसमें चिर यौवन की प्यास भरो ! 
हम जीत सकें मृत्यु को तुम्हारी तरह यहाँ 
स्वणिम प्रकाश से आत्मा का श्राकाश भरो ! 


हिन्दी-गंगा के भागीरथ हे भा रतेन्‍न्दु, 
हम बेज़बान हें हमें बोलना सिखला दो- 
जो अंग्रेजी के अंध भकक्‍त हो गये उन्हें, 
है कहाँ मातृभाषा का मन्दिर दिखला दो ! 


हे श्रद्धा के सुत॒ मानव कवि जयशंकर जी 
लो कलम इसे अपने श्रांस से नहला दो, 
मिल जाय बुद्धिको हृदय, हृदय को बुद्धि मिले 
श्रद्धा माता को घायल मनु तक पहुँचा दो ! 


नरकाव्य प्रणेता अ्रपराजेय निराला जी 
तुम जिन्दा महाकाव्य हो इसमें क्या शक हे, 
आशीर्वाद दो हमें श्रभय के छन्दों का 
यह कलम तुम्हारे चरणों में नतमस्तक है! 

जो कलम सरीखे टूट गये पर भुके नहीं 

उनके आगे यह दुनिया शीश भुकाती हे, 

जो कलरूम किसी कीमत पर बेची नहीं गई 

वह तो मशाल की तरह उठाई जाती हैं ! | ह 


यह कलम वही जिसने गीता के इलोक लिखे, | 
द्रोपदी सती की जिसने छलाज बचाई है- 
वह भटक रही है आज अंधेरी गछियों में 
जो दुनिया को रास्ता दिखाती आई है! 


+ ६... न २ और  पशिमिय 


काव्य-धारा १५३ 


राजेन्द्र यादव 
घिर आईं रे बदरिया सावन की 


पुलका मेरा हृदय, सावनी-बदली भुक आई हे ! 
तप-तप कर धरती की पग्राशा सिन्धु खींच कर छाई 
मेरे मत का कालिदास फंला पंखों को नाचा 
मुग्ध चातकी-सा यौवन का वेभव देख रहा हूँ 
सुनसान बौर पर भला डाले कजली भुक भाई है ! 
मन की धरती पर बू द बूंद फिरकी-सी नाच रही है 
बिजली की छुरियों से चीरे कौन हिया देता है 
खुली आ्ाँख-सी खिड़की पर लहराती चिक बौछारी 
पुरबइया में सिहर याद कुछ पिछली भुक झ्ाई है । 
सुरमई चीर पर इन्द्रधनुष की गोट उठा हौले से- 
किरनों की स्वर्णिम उँगली से, 
टुक भलक दिखा चन्दा की 
साँसें कानों में गमक रहीं, 
फेली अलछकों की नागन 
कन्धे पर धर चिबुक, 
कौन यह पगली भुक झ्राई हे ? 


एक चरण 


ञ्राज तेरी गोद में यह रात शायद बीत जाए ! 
देख लथपथ-सा शिथिल इलथ- 
शीत जल से काँपता तन । 
गा रहा हूँ ठेलता भीषण- 
प्रलय संघर्ष के क्षण । 
भाँक ले इस कक्ष से केसा-- 
प्रभंजन घोर वर्षा। 


इस अँधेरे में लगा था-- 
एक पल को भार जीवन । 


यह विकट अभिमान मेरा 
भय बना भकमोरता है ! 


दे सरस वरदान यह भय कण्ठ में बन गीत जाए । 


१५४ काव्य-धारा 


पृथुल मांसल गोद में सिर 
भर यह्‌॒ संसार सुन्दर। 
प्रणय का वात्सल्य मुद्रित- 
खिल रहा सस्मित कलाधर । 
थपकियाँ देकर सुलादे 
सच सुमुखि में थक गया हूँ ! 
हैं तुके आश्वस्त करता 
में चला बन मूक पत्थर ! 
तप्त चुम्बन एक केवल 
भुक इधर कर अधर अपने 
श्रान्त पत्थर का हृदय पिघले कि बन नवनीत जाए । 
कल उठा देना मुभे तुम 
जब दिवस का द्वास जागे ! 
पंथ है, चलना मुभे- 
क्या तुम चलोगी त्रास-त्यागे ! 
खेर छोड़ो बात कल कीं 
सो रहा विश्वास भरकर 
स्नेह की इस अरुण लो में 
नव उषा का हास जागे ! 
स्वर्ण सपनों में विहँसती 


आज की वह नींद लेकर । 
कल चुनौती है नियति को, हार लाए, जीत लाए ! 
७छ89 
रामानन्द 'दोषी' 
गीत 


झ्राज बीच मँफधार खड़ा में सोच रहा हँ--वह भी सच 
था, यह भी सच है । 

एक रोज मेरे श्राँगन में पर फंलाए 

सपनों के कलहंस कहीं से तिरते झाए 

मेंने अंतर का सब नेह उंड़ेला उन पर 

लेकिन जब छना चाहा वे हाथ न आए 


|. ४४ स् 


काव्य-धारा श्श्श 


मेरी पीड़ा ने मेरा भ्रंतर मथ डाला 

और मिला चलने को पथ ये काँटोंवाला 
पाँवों की काँटों से छेकिन प्रीत हुई जब 
मेरी बाधा ही मेरा पथ-गीत हुई जब 


तब फिर म्‌ कको छलते आये स्वप्न सहज सुकुमार 
खड़ा में सोच रहा हूँ-वह भी सच था, यह भी सच है । 


शायद तुमको याद न होगी बीते कल की 
थी मेरीं हर साँस टेर चातक घायल की 
तवधा भक्ति-भरी मेरे प्राणों की गागर 
शत-शत धाराओं में इन चरणों पर ढलकी 


लेकिन तुमने एक बार भी अपने कर से 
मेरी श्रद्धा के प्रसून के गा न परसे 
आखिर मेंने सारा विष पी अपनें मन में 
सोच लिया-यह भी होना था इस जीवन में 


वही मगर तुम आज खोजते झाए मेरा द्वार 
खड़ा में सोच रहा हूँ-वह भी सच था, यह भी सच है । 


नौका ने उत्ताल तरंगों से घबराकर 
लाख-लाख तट से विनती की हा-हा खाकर 
लेकिन तट ने बार-बार उसको ठुकराया 
कोटि-कोटि ब्यंग्यों की भाषा में मुस॒काकर 


जब कोई बे-प्रास-सहारा हो जाता हैं 
संघर्षों से लड़ना भी आ हीं जाता है 
लहरों ने आखिर नौका को गोद उठाया 
भँवरों ने स्वागत में मंगल-गान सुनाया 
और मिलन अलिंगन झातुर है हर कूल-किनार 
खड़ा में सोच रहा हँ-वह भी सच था, यह भी सच हें । 
इस पथ के हर राही का विश्वास अलग है 
सब का अपना प्याला अपनी प्यास अछग है 
जीवन के चौराहे खंडहर पर मिलते हें 
पतभर सबका एक महज़ मधुमास भ्नलग हे 


१५६ काव्य-धारा 


यों तो इस अम्बर से अविरल मधु भरता है 
लेकिन प्याला किसी किसी का ही भरता है 
मेरा पूर्ण चषक पतभारों ने उलटाया 
आखिर मेंने अपनी तृष्णा को समभाया 


ग्राज मगर मधु-भीगे-भीगे हो ग्राए पतभार 

खड़ा में सोच रहा हँ-वह भी सच था, यह भी सच है । 
कलियों का अपने ही दिल पर राज न होता 
केवल भूत-भविष्यत्‌ होता, आज न होता 
सच कहता हूँ बहुत ठोकरें खाती दुनिया 
अगर प्यार का रूप कहीं मुहताज न होता 


उसी प्यार को लेकिन गंंजलिका में कसकर 
उस दिन रूप हंसा था भोलेपन से डसकर 
दबी-दबी श्राहों की तब जुड़ आई लड़ियां 
छन्द-सूत्र में पिरीं, बनीं गीतों की कड़ियाँ 


रूप उन्हीं गीतों का बनकर आया पहरेदार 
खड़ा में सोच रहा हँ-वह भी सच था, यह भी सच हे 4 


छ्छे 
रामदरश सिश्र 
मोसम बदला हे 
मौसम बदला है टूट रही शीशे सी । 
लगता है मौसम बदला हे किरणों के हलके से गरम-गरम होने में 


तभी तो घरों की दीवारों के भीतर से. कुहरों का मादक तम 
बाहर कढ़ने को पग बार-बार हो रहे जिसकी छाया में 


तभी तो डरे प्राणों के सहमे गीत पगडंडी खेतों की 

बन्द श्रोठों के दरवाजे अपने ही पथिकों की श्राँखों में धरमाई थी 
तोड़-तोड़ देने को अँगड़ाई ले रहे । फटता है श्रजगर से दिन की । 

मौसम बदला हे | खिलती हिलती साँसों से 

श्रोलों की ठंडी चट्टानें मरघट का सन्नाटा छाती मे बाँध 

जिनके नीचे जमी थीं बदछी की जो 


धरती के फूलों को हँसी दबी सोई थी काली-काली छायाएँ 


काव्य-जारा 


काँप-काँप भरती है टूटे पक्षी-पर सी 
हफ्तों के बाद 

सड़क इतनी आाबाद हुई है 

हँस-हँस के हवा गले मिलती है 
खुली साँक के दिल की धड़कन पर 
बजते हैं पाँव । 

मुक्त आँखों में 

तैरतीं बिजलियों की धाराएँ 
हँस-हँस के हवा गले मिलती हे 
दुग-दुग से मिलते हें 

मन-मन से मिलते हें 

मन के सारे दुराव 

आँखों के भेद-भाव 

को हँसनी हवा गुदगुदा करके 

मुक्त खिलखिलाहट में लोटपोट कर देती 


१४५७ 


कोमल गंधों के दल के दल हैं फूटते । 
महकते गुलाबों की हँसी 

भील कमलों का 

पूनम के सागर के ज्वार 

उठन लहरों की 

पाँवों की ध्वनि की बारात ले 
बिजलियों की आँखों की छाया में 
सड़क बढ़ी जा रही 

किनारे पर गंगा के । 

मौसम बदला है 

गंगा के तट पर गजी फिर से 
राँफ औ' मृदंग संग 

चंडिदास की कविता 

भनन भनन राधा के नूपुर 


वंशी मुखरित नटवर की-- 
भर भर भर गंगा के उर-उर में गजी 
पेड़ फाड़ते मन की सिकुड़न को नावों से उठती 
जजेर प्रत्ते तन की ऐंठन से टूटते विरह फगुवा की अल्हड़ तानें 
डालों की भीतर से मौसम बदला है । 
प्राणों के स्वर जंसे 

फ्ड 
राजीव सक्सेना 
मुक्ति-गीत 
श्रो मुक्ति ! 


में हें कि आलिगन-आतुर बाँहे फेलाये हुए, 
तेरे ही पीछे बावले बेशाख-समीरण-सा, 


घूम रहा हूँ जाने किस पल से, 


समय की सीम। कुछ याद नहीं । 

मेरा एक डग आह सदियाँ कहा जाता हे, 

मेरा हर अगला क़दम--तथे युग का प्रवेश हे, 

मेरी पेशानी के पसीने की बूदों में कितने चाँद और सूरज 


१५८ 


काव्य-धारा 


खण्ड-खण्ड होकर घुल मिल गये रज-कण में; 

हाँ, मेरी भोंहों के ऊपर काली घटाएँ भी छायीं, 

जिनकी गूंज आज इतिहास कहलाती है, 

हाँ, मेरी साँसों में उलभ कभी गीतों की कड़ियाँ फनभना 
उठीं-- 

ओर हृदय का राग गल महाकाबव्यों में ढल गया, 

गुफाओं से निकल मेने ही गगनचुम्बी इमारतें उठायीं हें, 

देखो ना, मंजिल के हर मील पर, ये सारे चरण-चिह्न 

मेरी ही यात्रा की गाथा आज गा रहे ! 

झ्ो मुक्ति ! 

हर एक पग एक कड़ी टूटी है 

पर अगले ही चरण नये बंधन ने पंथ रोक डाला हें, 

झनवरत संघर्ष जीवन की गति मेरी ! 

अर, 

हाँ, एक दिन वह भी था 

द्विपद जन्तु के रूप में 'में' ने जब जन्म लिया ! 

में था उन्मुक्त, किन्तु, 

यह भोला-सा श्रासमान ऊपर गिरा पड़ता था, 

यह सुकूमारि धरती मुह बायें निगलने को थी, 

पानी की नादान लहरों में दिल डूबा-सा जांता था, 

पेड़ों के मासूम पत्तों में जाने किसकी भूखी निगाहें छिपी थीं, 

फूलों की लहकती महक साँसों में संपोलों सी सरकती थी, 

चारों ओर से ये सरला प्रकृति महाकाल-सी खड़ी थी; 

तभी मेंने सामाजिक बन्धन अंगीकार किए 

और प्रकृति-भय से विमुक्त हुआ ! 

मेरी सामाजिकता एक बन्धन हैं, 

मुवित भी ! 
१) 

प्रकृति के विरुद्ध युद्ध करने के हेतु-- 

मेंने सामाजिक बन्धन का अस्त्र लिया, 

पर संगठित मनृष्यता की शक्ति हैँ इतनी कि 

कुछ लोग प्रकृति से रक्षा का भार-साले, दूसरे मनुष्यों को 


काव्य-घारा 


स्वार्थ-जालमें फंसाने लगे ! 

में हुँ कि आँखों के सामने देखा है, 

सरे बाजार आदमी-आादमी को बेचता था, 

बेलों की जगह पर खेतों में इन्सान जोता जाता था, 
और उधर क़बीलों के सरदार मूछों पर ताव दिया करते थे ! 
हाँ, मुझ से पूछो कि किस तरह, 

आधे गुलाम, कृश कृषकों के सीनों पर, 

हीरों के भारी सिंहासन चमचमाते थे, 

और जहाँ ऐंठे हुए बेठे सामंत और सम्राट, 

नंगी तलवारों के साये में, 

आध्यात्मिक शान्ति का उपदेश दिया करते थे, 

उनकी जिह्ना पर ईश्वर के वचन थे ! 

झ्राओ, में बताऊँगा कि किस तरह 

गोरे पूंजीपति दुनिया को मंडी समभते थे, 

और हर चीज भाव-ताव से चलाते थे, 

काली जातियों को 'सभ्य' करने के लिए बे काले सा म्राज्योंका 
बोफा' सँभाले थे, 

दुनिया में शान्ति की स्थापना का लक्ष्य ले, वे दोनों 
पक्षों को युद्ध के अस्त्र बेचा करते थे, 

जनता के खून-खराबे से वे “नि्लिप्त' थे ! 

ओ्ो मेरी मुक्ति ! 

झा देख, मेरे सीने पर कितने ही घाव हें, 

यहाँ क़बीलों के तीर दर्द बनकर समा गये, 

यहाँ चंगेज़ों औ' तैमूर के तेग़ों की धार कुन्द हुई, 

यहाँ चक्रवर्तियों के घोड़े, मनुष्यता को रौंदते चले गये, 
यहाँ डायरों की गोलियों में कलियाँ भी भुन गयीं, 

यहाँ अमलनेरों में मनुष्य के खून से होलियाँ खेली गयीं, 
मेरे सीने से खून की बूंदें भी वहुत गिरी, और सभी जगह 
झमर शहादत के स्मारक उठ खड़े हुए, 

मगर में आगे बढ़ता ही गया, कहीं रुका नहीं, 

जुल्मों के दुर्ग बालू के ढेरों से ढह गये । 


१५६ 


१६० काव्य-धारा 


कक, 
ओ्ो मेरी मुक्ति ! 
ग्राज तो और भी महान विश्वास के पंख लगा 
मेरे पेर उठते हें--बढ़ते हैं, 
इतिहास के अनुभव से गुजर कर मेंने देख समभ लिया, 
आगे समता के उपवन हें, 
हवा के भोंके श्राज उधर से सुगंध के संदेश लिए श्रा रहे, 
ग्राज सभी मार्ग उसी श्रोर बढ़े जाते हें, 
में हूँ कि इप्तीलिए आ्राज भी आलिंगन-प्रातुर बाँहे फैलाये हुए, 
तेरे ही पीछे बावले वेशाख-समी रण-सा घूम रहा ! 


छ 
भवानीप्रसाद सिश्र ह 
छाँह चाहिए ! 
तुमने केसे समझ लिया था । निरंतर चलते चलते, 
में पीछे हें; मुभको, तुमको भी; 
एकबार मुड़कर क्यों देखा ? पथ पर तुम रुक जाओ्रो, 
तुमने कंसे समभ लिया था दूरी कम हो ! 
एक बार से अधिक देखना या कि धूम कर ऐक बार फिर देखो 
नहीं जरूरी ! जलते पथ पर छाँह चाहिए, 
सदा खींचती मुझे रहेगी- चितवन-पवन चाहिये, 
वह चितवन वह रेखा ? तेरा बाँह चाहिए ! 
कितने दिन हो गये 
७छछे 
झॉंकारनाथ श्रीवास्तव 
पहाड़ी यात्रा 


आगे बढ़ना ऊपर चढ़ना समानार्थ है ऊपर से बर्फीलि भोंके आते हें 
पीछे फिरना, तीचे गिरना एक बात हैं; हम सहम ठिठक कर रह जाते हैं 


यह पहाड़ है कभी-कभी कुछ कह जाते हैं 
यहाँ अर्थ ही आगे बढ़ने का ऊपर चढ़नाहै । पर ज्यादातर सह जाते हैं 
हम इस पर चढ़ते जाते हैं, भोंके खाकर सहमे ठिठके रह जाते हैं 


हम इसके ऊपर प्रतिपल चढ़ते जाते हें. रह जाते हें-- 


काव्य-घारा १६१ 


इसीलिए तो बार-बार आगे बढ़ते हें 
इस दुर्गंम के गौरव का मर्दन करते है । 
पद-चिह्नों में भ्रपने बीते पल संचित हें 
हम थकते हैं तो छाया में रुक जाते हैं 


उस भूले को ले आते हैं । 

सब कुछ लेकर 

यानी मंजिल को यह अपना सब कुछ 
देकर 

(उस मंजिल को सब कुछ देकर 

जो इस अपनी धरती का सर्वोच्च शिखर 

हे 

जिसके ऊपर जो है, वह केवल ऊपर है ) 

हम भारी भरकम बो मा ढोते 

आगे बढ़ते जाते हैं 

हम ऊपर चढ़ते जाते हैं । 

पदचिद्नों में अपने बीते पछ संचित हैं 

हम न कभी उनसे बंचित हैं 

वे हममें जीवित हें, हम उनमें जीवित हें 

हम जीवित हें, 

हुआ अभी तक जो, 

उससे मिलकर जीवित हैं । 

पीछे रह जाने के, 

नीचे रह जाने के, 

भाव अगर गाते हैं 


तो हम एक एक भोंके को 

सोन्‍सौ भोंके मान-मान कर सह लेते हैं 

मामूली अनुभव को भी उद्गार बनाकर 

कह देते हैं सपनों में भी रह लेते हें । 

वे आगामी पल वे जो हम में जीवित हैं 

ये हम जो उनमें जीवित हैं, 

हम जोवित हैं, 

हुआ अनहुआ जो, उससे मिलकर 
जीवित हैं । 

अंकित और अनंकित पदचिद्ठों में अपने 

ये पयधूल भरे श्रमछीन चरण निश्चित 

हें । 

हम आगे बढ़ते जाएंगे 

हम ऊँचे चढ़ते जाएँगे 

पिछड़े रह जाने के भाव कभी आएएँगे 

तो हम सपने देखेंगे, 

उद्गार करेंगे, जोरों से गाएँगे 

दुर्दंभ पिछड़ेपन को हर कोशिश से पार 


करेंगे । 
कितु कभी हम थक जाएंगे 
तो थोड़ा सा रुक भी लेंगे 
सुस्ताएँगे । 
छायावासी किन्‍्हीं सुरक्षित पदचिह्नों को 


ओर अधिक गहरा कर लेंगे 

किसी किसी पछ और अधिक रह लेंगे 
लोट तनिक रह लेंगे 

क्योंकि हमें आगे बढ़ना हें, 

हमें बहुत सहना है 

हमको बहुत बहुत रहना है । 


१६२ 
सुरेश अ्रवस्थी 


प्रगणित दुख भेड़े 
भाव-प्रजनन के कष्ट सहे, 
दब्द का जन्म हुआ,-- 
एक शब्द--'पीड़ा' का। 
जग का, भाषा का व्यवहार : 
एक शब्द का 

एक अर्थ से परिणय हुग्ना । 


काव्य-धारण 


अभिव्यक्ति 


दुख की कथा नव्वर है ?) 

दब्द की विशाल बाहें 

घरे हें भावों के क्षितिज-छोर 

शब्द के कगार कूल 

बाँधें हें श्रन्तर का भाव-स्रोत । 

(तब क्‍या मेरा दुख भूठा है... 
दुख की अभिव्यक्ति निरी श्रोछी है, 


(वह दुख जो मेंने पाया अशवत है ? ) 
क्या वह व्यर्थ हुआ ? ) ग् «आकर. 2 
शब्द चिर है, ब्रह्म है; भाव और शब्द के बीच खड़ी 
मेरे भाव उसी से प्रादृभ त दूख की अभिव्यक्ति की कामना _ 
उसी में समाहित हैं । श्वेत प्रस्तर मूर्तिसी 
(तब क्‍या मेरा दुख कुछ न हु्ना जैसे किसी पुरालेख की साक्षी हो । 
छछ 
रमाकान्त श्रीवास्तव 
वषोन्त के बादल 

ग्लानि पश्चात्ताप से भर- मगर बिकती । 

जा रहे वर्षान्त के बादल । अनेकों भाव की माटी, 

वहाँ बरसे अनेकों किस्म की माटी, 


जहाँ तन के बहुत उजले 

मगर मन के बहुत काले । 

वहाँ बरसे 

जहाँ सीमेन्ट के आँगन, 

जहाँ सीमेन्ट की छतोें 

जहाँ सीमेन्ट की गलियाँ, 

जहाँ सीमेन्ट की ज़ड़ता, 

दिलों की नर्म सतहों पर जमी बेठी । 
वहाँ बरसे 

जहाँ माटी नहीं मिलती 


तालाब की माटी, 
नापदान की माटी, 
उजड़ते गाँव की माटी, ल्‍ 
(उजड़ता इसलिए कि वह बनेगा शहर की ह 
कं बस्ती, 
नई बस्ती ) ह 
वहाँ बरसे 

जहाँ बरसात के रंगीन मौसम 
वासना की प्यास बढ़ती है । 
नहीं बरसे वहाँ पर यह 


काव्य-धारा 


१६३ 


जहाँ पर माटियाँ अंदर छिपाए बीज बेठीथीं नहीं बरसे वहाँ पर यह 
जहाँ पर बंदियाँ माथे लगाने के लिए 


कि जितने बूद यह बरसे 


नए अँखुए निकल उतने छीटे-बड़े परिवार खेतिहर राह तकते थे । 
करें श्रृंज्ार धरती का, ओर अब वह गलतियों पर सोचते-से 
करे श्ूूंज़ार खेतों का । बूंदियों के प्रति 
नहीं बरसे वहाँ पर यह ग्रसीमित दुःख से मरते हुए-से 
जहाँ पर ग्राम की हर डाल से ग्लानि पश्चात्ताप से भर 
कजली मुखर होकर जा रहे वर्षान्त के बादल 
चतुदिक गूँजने को बहुत ही बेताब बेठी थी 
&6७& 

सुरेन्द्र तिवारी 

इन दिनों पर 


यह घायल कर जाने के दिन ! 
हँस-हँसकर मर जाने के दिन ! ! 
जिसको दर्शन समभा हारा 
वह बतला गया अचानक ही 
मुसका कर टूटां जो तारा 
यह बनकर मिट जाने के दिन ! 


यह मिटकर मुस्काने के दिन !! 


सुन रहा पुरवाई का गीत 
गा रही जो €घधीमे-धीमे 
तुम्हारी तस्नाई का गीत 
यह गीत नये गाने के दिन ! 
यह तुमको अपनाने के दिन !! 
मुस्काती कलियों से पूछो 
जल चुके हजारों फूल जहाँ 


उन उजड़ी गलियों से पूछो 
यह खिलकर भर जाने के दिन ! 
यह भर कर खिल जाने के दिन !! 
कितने सुन्दर तुम, जाना तब 
उस रोज अचानक कहकर कुछ 
शरमा कर मुस्काये तुम जब 
यह हरदम मुस्काने के दिन ! 
कुछ कहकर शरमाने के दिन !! 


जब से तुम हो मुझको सपना 
दुनियाँ भर में ढूंढ़ा मेंने 
कोई न मिला मुकभको अपना 
खुद ही में खो जाने के दिन ! 
शायद पथ भरमाने के दिन !! 


१६४ 
मधुर शास्त्रों 


काव्यन्धारा 


गीत 


जिन्दगी के ही लिए तो गीत गांता हूँ, इंस 
लिए यह जिन्दगी मधुमास है ।. . . 
मोत का संक्रेत किस क्षण में नहीं होता, 
दुःख का सन्देह किस मन में नहीं होता ? 
जानकर भी दुःख मेरे पंथ में झ्राए, 
मुस्कुराए प्राण पर जीवन नहीं रोता । 
मुस्क्रराहट के लिए ही गीत गाता हूँ, इस 
लिए मेरे अ्रधर पर हास है ।. . . 

मौत से लड़कर यहाँ जीता रहा हूं में, 
जःनकर भी तो जहर पीता रहा हूँ में । 


मीत मेरा ही कलेजा चीरता आया, 
किन्तु बारम्बार हो सीता रहा हूँ में । 
मीत के ही तो लिए में गीत गाता हुँ, इस 
लिए वह मीत मेरे पास है। .. 

छीन काया चाँद से ऊषा सुराही को। 
गऔ पिलादी है विकम्पित श्राज राही को। 
रख लिया हें सर हथेली पर यहाँ जिसने, 
रोक सकता कौन उस लड़ते सिपाही को ? 
उस सिपाही के लिए ही गीत गाता हूँ, इस 
लिए ही चल रही यह साँस है ।. . . 


तुम उसे स्वर दो |! 


अर्थ को तो शब्द मेंने दे दिया, तुम उसे स्वर दो ! 
ले हृदय की प्यास जीवन की व्यथा 
ह लिखी मेने चमन की यह कथा,,.. 
बाद यूग के यह बता पाया तुन्हें-- 
फूल को तो रूप मेंने दे दिया, तुम सुरभि भर दो ! 
अश्रु से मेरी कहानी धुल गई, 
गाँठ जो भी थी तड़प से खल गई, 
रात ही श्रब॒ तक लुभा पाई मुभे-- 
स्वप्न को तो सत्य मेंने दे दिया, तुम श्रमर कर दो ! 
मुसकराहट से मिली यह साँस है, 
हो रहा मेरे नयन में रास हैं, 
तृप्ति से परिचय हुआ अब तक नहीं-- 
प्यास को तो प्राण मेंने दे दिया, तुम अधर घर दो-- 


हास्य-ब्यंग्य 


[ ब्राघुनिक कविता में हास्य और व्यंग्य श्रपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व बना रहे हें । इस काब्य- 
प्रकार के रूप-निर्माण में भ्रपने-अपने स्तर झ्ौर अपने-अपने ढंग से हरिशंकर शर्मा, बेढब बनारसी, 
गोपालप्रसाद व्यास, बेघड़क बनारसी, वंशीघर शुक्ल, रमई काका और केशवचन्द्र वर्मा श्रादि ने 
योग दिया है । हास्य-व्यंग्य को प्रस्तुत कविताओं में व्यासजी का व्यंग्य उनके भ्रपने दृष्टिकोण का 
परिचायक है। ] 


गोपालप्रसाद व्यास 


छेड़ करता हैँ में... 
8959, 


गलत न समझो, में कवि हूँ प्रयोग-शील, 

खादी में रेशम की गाँठ जोड़ता हूँ में । 
कल्पना कड़ी से कड़ी, उपमा-सँड़ी से सड़ी, 

मिल ज़्राय पड़ी, उसे नहीं छोड़ता हूँ में ॥ 
स्वर को सिकोड़ता, मरोड़ता हूँ मीटर को, 

बचना जी, रचना की गति मोड़ता हूँ में । 
करने को क्रिया-कर्म कविता अभागिन्नी का, 

पेन तोड़ता में, दवात फोड़ता हूँ में ॥ 


6८ / 

श्रोता हजार हों कि गिनती के चार हों, 

परन्तु में सदेव तार-सप्तक में गाता हूँ । 
साँस खीच, आँख मीच, जो भी लिख देता उसे, 

खुदा की कसम, नई कविता बताता हूं ॥। 
ज्ञेय को बनाता अज्ञेय, सत्‌ू-चित को शून्य, 

देखते चलो में आग पानी में लगाता हूं । 
अली की कली की बात बहुत दिनों चली, 

अ्रमाँ, हिन्दी में देखो छिपकली भी चलाता हूँ ॥ 


१६६ काव्य-धारा 


(३) 
[के अक्‍्ल से आँकिये हाफ़--हूँ में, 
जरा शक्ल से जाँचिये साफ़ हूँ में । 
भरा भीतर गृदड़ ही है निरा, 
चढ़ा ऊपर साफ़ गिलाफ़ हूँ में ॥ 
अपने मन में बड़ा आप हू में, 
अपने पुरुखों के खिलाफ़ हूँ में । 
मुझे भेजिए जू में बिलम्ब न कीजिये, 
आ्रादमी क्‍या हूँ, जिराफ़ हूँ में ॥ 
(जो 
बच्चे शरमाते, बात बकनी बताते जिसे, 
वही वही करतब श्रधेड़ करता हू में । 
बिना बीज, जल भूमि, पेड़ करता हूँ, और- 
फूंक मार बकरी को भेड़ करता हू में ॥ 
बिना व्यंग्य श्रर्थ की उधेड़ करता हूँ, और-- 
बिना अर्थ शब्दों की रेड़े करता हूँ में । 
पिटने का खतरा उठाकर भी कामरेड, 
काँगड़े की छोरियों से छेड़ करता हूँ में ॥ 
&छे 


नागार्जन 
बड़ा साहब 

छोटे-छोटे बाल छेंटे हैं, चिकनी-मोटी गर्दन 
सिर पर हेट, सिगार का धुआँ छुट रहा हे छन-छन 

बूट-पेंट मानिला शर्टे से ढका हुआ सारा तन. 
उतरे हें देवता स्वर्ग से धरती पर भ्रफसर बन ! 
गांधी-नेहरू से गुंजित हे मन-मन्दिर का भ्ाँगन 
यही चलाते पटना-दिल्‍ली का हकूमती इंजन । 
पहले के आई-सी-एस ठहरे, हो आए हें लन्दन 
पहली को पाते हें साहब तीन हजारी बेतन । 
मुन्सिफ बना दमाद, भतीजे ने पाया प्रोमोशन 
बेटे ने पकड़ा दामोदर बंली-कार्पोरेशन 


न 9 जा ॥ इक बा बा 


सी आलोक > कक अली यु लए. और व जज कक टिका“. मम की आदमी, किस ली अल कर... न सकी समिरर, कशकीरी *न 


$ न लक + 


काव्य-धारा १६७ 


डेरे पर भो फ़ोन लगी है, घंटी बजती टन-टन 
स्टेट्समेन गीता है, रामायण इंडियन नेशन । 
एस-डी-ओ थे व्यालिस में, गोली चलवाई दन-दन 
प्रब तो करते रहते निश-दिन नेताझ्ों का कीतंन । 
कुछ इनमें साहित्यिक भी हे, लिखते हें अ्रभिनंदन 
प्रजा और राजा दोनों के दिल का करते रंजन । 
चापलूस करते गंगा की मिट्टी से दँत-मंजन 
बदल गया है भीतर-भीतर नित्त नेम का बन्धन । 
मुँह पर मलते हें लॉयल्टी का ही ये गुलरोगन 
जैसा मालिक, वैसी सर्विस कंसा बढ़िया स्‍लोगन । 
छोटे छोटे बाल छेंटे हें चिकनी-मोटी गर्दन 
उतरे हें देवता स्वगं से धरती पर अफसर बन ! 


७93 
केशवचन्द्र वर्मा 
प्रेम-काव्य 
उस रात सिनेमा से आकर महाकाव्य की एक भूमिका के स्वर में 
कुछ भावुक हो, धोरे से उनको गोहराया 
जैसे अपने को समझ लिया उस प्रेम- “रहने भी दो पान-सान यह 
कथा के 'हीरों सा! आओ, बंठो ! 
में उन्‍्मन-सा यह देखो दूधिया चाँदनी 
खोया-खोया आज बिखेरी है धरती पर 
पलकें भारी शुद्ध वनस्पति घी सी जिसमें रंग न अब 
रह-रह करता धुक-धुक-सा तक मिल पाया है; 
रजाई में लेट 'चीप' उपन्यास पढ़ने की- देख-देख तुमको हंसती है. . .' 
हाजत कहते-कहते, मेरा गला अचानक ही भर 
यानी सब लक्षण वही जो कि होते हें आया ! 
सिद्ध प्रेमी जन के ! प्रेम-काव्य था ! 
'में बेठा पर वे तो बस काठ सरीखी बंठीं 
(बैठा क्या दुनेंग पड़ी मेरी काया !) उन पर नहीं तनिक भी 
में भरमाया-सा शरमाया जादू छाया !! 


कुछ अलसाई सी करवट ले 


तब मेंने नम्बर दो मन्तर मारा- 


श्ष््‌८ काव्य-धारा 


'तुम कितना अ्रच्छा गाती हो ! 

हर सुबह शाम 

हरमुनियाँ ले तुम छत पर घूघट निकाल 
कुछ गाना सा जब गाती हो 

तब पास-पड़ोस मुहल्ले वाले 

ग्पनी छत से 

कंसी-कंसी नजरोंसे तुमको देखा करते हैं! 
(यहाँ मेंने एक गर्भ निश्वास भी छोड़ी ! ) 
बहुत 'पापुलर' हो तुम प्यारी 

तुम पर वारी | 

में बलिहारी . . .।' 

उनके होठ खुले 

में जीत गया तब ! 

मेने सोचा 

आखिर को में भी तो कवि हू 
कवि-स्वगिक कल्पनाकार ! 

जब चाहूँ तो जिसका तेसा मूड बता दूं! 
पर वे केवल इतता बोलीं-- 


गोपालकृष्ण कौल 


आप नहीं लाए वह कपड़ा धोने वाला 
साबुन ! 
फिर इस पर 
कोई भलमानुस क्‍या कह पाता ? 
में जेसे सचमुच खिसिया कर 
आसमान में लगा देखने 
अग्रब कि भेंप वाली जमुहाई 
मुभको आने लगी बराबर! 
करवट लेकर 
लेट गया । 
3९ 2८ 
लगा 
सामने की इल्मारी पर रक्खी 
ये पंत निराला 
शेली, कीट्स 
ये देव बिहारी सभी भूठ हें ! 
केवल सच है 
वही हमारी कपड़ा धोने वाली टिकिया ! 


केंचीकट गोंदपुत्र 


[6$:) 


बाजार में हिन्दी के बिगड़े सपूृत अरब 
हाथ की सफाई औ' तमाशा दिखाते हें । 
केंची है इनकी माँ, गोंद इनके पिता जी, 
दूसरों की काट कर अपने चिपकाते हैं। 
६ ३४३ 
काटते जरूर हें दरजी नहीं है किन्तु, 
दफ्तरी नहीं, छेकिन काम चिपकाने का । 
लेखकों की भीड़ में श्रेय सिर्फ इनको हें, 
प्रतिभा के बिना ही कमाल दिखलाने का । 


(३) 
छुते नहीं कलम, सम्हाल कर रखते हैं, 
कागज का धवल मुख काला बनाते नहीं । 
छपते हैं इतना, .टाइप घिसे जाते हैं, 
लेखनी को लेकिन बिलकुल घिसाते नहीं । 
( ऐ 
लेते हें कम दाम, देते हे मक्खत साथ, 
होड़ में होता बुरा हाल दूसरों का है, 
आ्रांडर पर करते हें माल सपलाई यह, 
लेब्िल इनका किन्तु माल दूसरों का है। 


आर ६6-54 ँिषेआ 


मियां लि जल बंरंछेंड॑ंन0 ७ २ आज. 


हि शमी है 


नी... शैली यह ली सकी न | की" 


काव्य-धारा १६६ 


(५) (६) 
दृष्टिकोण इनका है, छपने पर एक बार, किन्तु ग्रोंदपुत्र को क्रोध लेखकों पर है, 
जो कुछ निरथथक है सार्थक बन जाता है, उनकी रचना का वे लोहा मानते नहीं । 
झ' छापेखाने से रद्दी की दुकान तक, अण्डा रोज देने वाली मुर्गी का हाय, 
जो कुछ छपता हैं जरूर बिक जाता है। लेखक-निरामिष कुछ महत्व जानते नहीं । 


सर्दी आई हे ! 


सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 


लम्बी शैतानी अँतड़ी-सी 

रात मारवाड़ी पगड़ी-सी, 

लम्बी नेता के भाषण-सी, 
बंबइया बरसात कि सर्दी आाई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 

भंकृत काया, बजे बतीसी, 

जीभ जाप करती है 'सी सी' 

अरे, ठंड के कोर्तत से तो- 
हरि-कीतन भी मात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 

रात रुपहली तारों वाली, 

चन्द्रमुखी मुग्धा मतवाली, 

रूप प्रकृति का छलखते छतपर- 


लगा नमुनिया हाथ कि सर्दी आई हं ! 


सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 

घर में कोट न गर्म रजाई, 

नहीं कोयला, हीटर भाई, 

आग उगलनें वाला कवि भी- 
काँप रहा ज्यों पात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 


प्रगतिशील यदि कवि हम होते, 
नमें-गर्म बिस्तर पर सोते, 
लगते, ओढ़ दुशाला करते- 
फुटपाथों की बात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सदीं झ्राई है । 
सोच रहा कवि हालावादी, 
मिले कहीं से बोतल आधी, 
आ्राज न कवि-सम्मेलन कोई, 
वर्ना बनती बात कि सर्दी आई हे ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 
सोच रहा कवि छायावादी, 
बड़ी भूल की, करी न शादी, 
समभ रहा, सपने में घर का- 
पक जायेगा भात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी झ्राई है ! 
सर्दी में, प्रेमी कवि कहते, 
विरही जन ही रक्षित रहते, 
सर्दी में भी विरह ज्वाल से- 
भुन जाता हे गात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी झ्राई है ! 


१७० काव्य-घारा 


ग्रे, न हम प्रेमी दीवाने, 

लिखे पड़ें हें गीत पुराने, 

इन्हें जला कर चाय बनायें- 
और सेंक लें हाथ कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि आाई है ! 


विनोद शर्मा 


सावधान, सर्दी के कारण, 
क्रद्ध क्षुब्ध हे आालोचक-मन, 
देखें, किस कवि लेखक पर- 
होता सर्पिल घात कि सर्दी आई है ! 
सुरसा-सी यह रात कि सर्दी आई है ! 


नये सूत्र : एक व्यंग्य 


ग्राज की ये जिन्दगी, 

धोखा दिखावा 

और छलना के सिवा कुछ भी नहीं । 

भूठ बोलो ! 

छिपा रहने दो हृदय का सत्य, 

भूल से भी उसे मत खोलो ! 

और बदि तुम कह ॒गए कुछ सत्य तो 
फिर तुम असभ्य, 

समाज से श्रनभिज्ञ 

ग्रनसोशल कहाओोगे । 

हो भले तुम, 

किन्तु, सारी जिन्दगी भूखे मरोगे, 

जूतियाँ चटखा्रोगे। 

है श्रभी काफी समय- 

यदिं चेत जाओो ! 

क्या सही है इसे छोड़ो ! 

जिस तरह भी बने 

अपने पर मुलरम्मे को चढ़ाग्रो ! 

ये समय की माँग हैं 


ये नाइनटी परसेन्‍्ट लोगों के दिमाग़ों का 
निचोड़ । 
बहुत भावुकता सचाई से लिया है काम 


अब तक किन्तु उसमें क्या कमाया नाम ? 
फिर वो भावना-युग को पुरानी बात थी 
जिसकी कहानी मात्र हो तुम । 


क्यों अकेले व्यर्थ तुम यू ही बजाते- 
पीपणी ये भावना की बेसुरी ? 

फेंक दो ! 

ये आज के इन्सान को डिस्टब करती है, 
नहीं क्‍या जानते तुम, 

आदमी अपने प्रगति के मार्ग पर- 
कितनी तरक्की कर गया ! 

वो नया है, अतिनया ! 


उसका पुराना सभी कुछ तो मर गया। 
अ >६ ६. 
आदमी औरत कि औरत अ्रादमी हैं । 


भूठ सच है, बुरा अच्छा है, 

कि हिसा प्यार से बेहतर कहीं बेहतर । 

हृदय की बात कहना मूखेंता हे । 

रहें भ्रम में लोग, 

मत दो भेद अपना ! 

छलो जितना छल सको संसार को !! 

तोड़ दो तुम जहाँ पाझ्नो प्यार के आधार 

को !!! 

सूत्र हें ये नये मानव की विकासोन्मुख 
अनोखी बुद्धि के 

बुद्धिवादी नरो ! 


इन पर अमल करने का अभी ब्रत लो ! 
कि ये भी आरठं है । 

प्रेक्टिल बननें सुधरने का-- 

ग्रनठा चार्ट है । 


जनवाणी 


[हिन्दो-क्षेत्र को जनपदीय बोलियों में कबिता के नए रूप का विकास हो रहा है। हम 
चाहते थे कि इन सभो बोलियों की वर्तमान कविता के प्रतिनिधि नमूने यहां देते; लेकित श्रवधी, 
राजस्थानी झोर पंजाबी को कुछ कविताएँ ही दे पा रहे हें । श्रगले भाग में मूल्यांकन-सहित 
जनपदोय बोलियों को भ्रधिक कविताएं प्रस्तुत की जाएंगी ।] 


अवधी 
रमई. काका 
गाँव के धरती 
गाँव छोंडि के चल्यो नगर का, 
धरती तुमका टेरि रही है । 


बिसरि न जायो भुइयाँ देवी, जहिके धूरि अंग लपिटायों , 
खेलि कदि क॑ कुलकि कुलकि के, जहि की गोदी मोद बढ़ायो । 
पुरिखन के ई ख्यात न बिसरयो, अन्नदेव के दीरघ दाया, 
जिनका रकतु नसन माँ व्यापा, रिनियाँ जिनके कंचन काया । 
जिनके मुधुरे फल खायो है, बेठि सीतली छाहेँ जड़ायो , 
ब्यार आँब अंबरूद ग्ैबिलिया, कश्था जमुनीं बिसरि न जायो। 
अँगवा के निबिया तुम तन, उचकि उचकि कं हेरि रही हे । 

धरती तुमका टेरि रही है । 


बिसरयो ना बजरज्रबली का, भेरव बाबा सितला मइया , 
जिनके मान मानता कीन्‍्हें, तुम जनम्यों है कवर कन्ह॒इया। 
बिसरयो ना चउरी सत्तिन के, जो पति पूजति बनि के गउरा , 
जहाँ पंचपरमेसुर बइठें बिसरि न जायो गांधी चउरा। 
तुलसी गाछ न बिसरयो, जहिंकी लिह्यो आरती दूनों बेरिया , 
बिसरि न जायो कुवाँ मिठउवा, जहिकी घूम्यो सात भँवरिया । 
गाव जग्य का कुण्डु न भूल्यो, जहि पर प्रीति घनेरि रही हे । 

धरती तुमका टेरि रही हे । 


श्जर्‌ 


तुम वाट छहँगरी भाँड़िन के, बिसरयो ना नाचु पुछारी का , 
लहे लहे धान की म्याड़न पर, सारस की जोड़ी नन्‍्यारी का । 
लपलपे घाम हनना कदति, भुपभुपे बिरिछ पंछी कुलकनि , 
गहगहे ताल क॑ कर्वेश खिलनि, भुम्फन-भुम्फन भवँरा गुँजनि। 
महमही गमक माँ बउरन की, कुहकुही कोयलिया के बोली , 
चुच॒ुहात सहत के छत्तन पर, भनभनी ममाखिन के टोली । 
दमकनी गुजुनुवाँ नदी तोर नित साँक आरती फेरि रही है । 

 घरतो तुमका टेरि रही है । 


राजस्थानी 
रेवबतदान कल्पित 


बिरखा बीनणी 


लूम भूम मदमाती मन. बिलमाती 
सौ बल खाती गीत प्रीतरा गाती 
हँसती आ्रावे बिरखा बीनणी . , 

चौमासे में चँवरी चढ़ने सांबण पूगी सासरे 
भरे भादव ढली जवांनी श्राधी रहगी आसरे 
मन रो भेद लुकाती नेणां आँसूड़ा ढलकातों 

रिमभिम आवे बिरखा बीनणी . . . 
ठुमक ठुमक पग धरती, नखरो करती, 
हिवड़ो हरती, बींद पगलिया भरती 

छमछम आवे बिरखा बीनणी . 
तीतर बरणी चूंदड़ी ने काजलिया री कोर 
प्रेम डोर में बँधती आवबे रूपाली गणगोर 
भूठी प्रीति जताती भीण घ्‌घट में शरमातो 

ठगती आवे बिरखा बीनणी . 
घिर घिर धूमर रमती रुकती थमती 
बीज चमकती भब भब पलका करतीं 

भंवती झाव बिरखा बीनणी . . . 


काव्य-धारा 


झ्रा परदेसण पाँवणी जी पुल देखे नीं बेला 

अलो जा रे आँगणा में करे मना रा मेला 

मिरमिर गीत सुणाती भोले मनड़े ने भरमाती 
छलती आवे बिरखा बीनणी, ., 


लूब झूब मदमाती, मन बिलमाती 


गीत प्रीतरा गाती हँसती आवे बिरखा बीनणी । 


राजस्थानी 
गजानन वर्मा 
बाजरे की रोटी 
बाजरे की रोटी पोई, 
फोफलिया को साग जी। 


जीमण बेठी गोर्ड्री जद 
बोलण लाग्यो काग जी। 


भुक-भुक भोला खाब॑ म्हारो 
खेत खड़यो हरियालो जी 


बाजर की रोटी पोई, 
बाजरे की रोटी | 

पुरवाई लहरावे खेतां में- 
अभ्रब॒ पकी जुंवार जी । 


आता ल्याज्यो दांतिया, थे- 
करके तीखी धार जी । 
बाजरे की रोटी पोई, 


उन्यालै क॑ तावड़े में-- बाजरै की रोटी । 
तनड़ो पड़ग्यो कालो जी । स्लो बुहर॒यो भाड़यो ढोला, 
बाजर की रोटी पोई, व े हर 
बाजरे की रोटी । हैं कद को तैयार जी 
डक म्हारो हिवड़ो रोवे, बेगा पाछा बावड़ो तो- 
जाणो प्रणजाण जी अन-धन भराँ भंडार जी । 

खड़ी ४ 34300 के बाजरे की रोटी पोई, 
ऊंटाँ कसो पलाण जी । बाजरे की रोटी । 

* टिडो नामक फल जिसकी सब्जी बनती है। " घृप । 

* शौरी (स्त्री) । + ऊंट की काठो । 

3 कौवा ] रद हँसिया | 

* लहरना । * खलिहान । 


५ गर्मो को ऋतु। १» लौटाना । 


१७३ 


१७४ 
पंजाबी : श्रनुवाद 
करतार सिंह दुग्गल 


काव्य-घारा 


दो कविताएँ 


कभी तुम बहुत दूर लूगती हो, 

बरस चके बादलों के पीछे 

जेसे एकाकी तारा, 

या दूर छितिज पर 

सुस्ता रही कोई तितली । 

कभी तुम बहुत पास लगती हो 

दुख की किसी तह में 

बेठी हुई, छिपी हुई 

दिल की धड़कन हो जैसे 

कोई गुप्त कंपन । 

और वासना के भूखे मेरे आलिगन 

ढूंढ़ते रहते हें तुझे 

भुजाओों की पहुँच के बीच 

कदमों की दूरी में 

मेरे वासना के भूखे आलिगन । 
(६ 

कोका कोला जंसा हुस्न 

बुका-बुका-सा लाल-लाल-सा 

चिउगम जैसी मुहब्बत 

फीको-फीकी-सी मीठी-मीठी-सी 

लोशनों डाइयों की मदद से 


धुला-धुला-सा रँगा रैँगा-सा निखरा- 
निखरा- 

तेरे केशों का लच्छा-लच्छा ५ 

हर लच्छे का बाल-बाल । है 

तेरे नयनों पर सोये पड़े रँगीनी चश्मे... 

नीचे आँखें जान-जान कर 

लाखों जाल बुन चुकी हें । 

तेरे आकार पर कोई और आकार _ 

दरजियों द्वारा कल्पित । 

तेरे उरोजों पर कोई और उरोज 

किसी कामना के प्रतीक 

फिर सिगरेटों के धुरयें में 

तुम श्रपना आपा छिपा लो, 

फिर छोटे बड़े जाम में 

तुम अपनी मुस्कान डालती रहो ! 

बार-बार तुम अपने होठ सिकोड़ो !__ 

बार-बार तुम अपनी रूप-शिखा को ढूंढ़ो! _ 

कल हुस्न को तुम्हारी तलाश थी-.. 

श्राज तुम हुस्त की तलाश में भटक रही 


हि 
हो है । 
क 
+ 
| 
्‌ 


आधु निक उदू -कविता 


भ्राजकल जब किसी से उद्ूं को श्राधुनिक कविता का जिक्र होता है तो झ्रनेक विचित्र बातें 
सुनने में झ्ाती हैं । कुछ लोग उद्ू की झ्ाज़ाद नज्म (मुक्त छन्‍्द) प्लोर मुश्नर्रा नक््म (अ्रतुकान्त 
कविता) को उद को नई कविता कहते हें। कुछ लोग मुक्त-छनन्‍्द के साथ किसानों, मज़दूरों या 
नारी-जीवन की विषय-वस्तु का संबंध जोड़ते हें, भोर इसे नई कविता समभते हैं, मानो उनको 
दृष्टि में नई कविता का झ्राधार जीवन का राजनीतिक, झ्रारथिक या सेक्स-सम्बन्धी पहलू हो भ्रमुख 
माना जा सकता है। एक दल ऐसा भी है जो यह समझता है कि एक विशेष सीमित ढंग के राज- 
नौंतिक दृष्टिकोण को कविता में प्रस्तुत करना ही नई कविता है। लेकिन यह सब सतही बाते हैं । 
बुनियादी तौर पर नई कविता प्रत्येक उस भ्रच्छी कविता को कहा जा सकता है, जिसमें तात्कालिक 
झीर प्रान्दोलन-परक प्रभावों से हटकर किसी बात को श्रनुभव करने, सोचने और श्रभिव्यक्त करने 
का नया ढंग मिलता हो । अगर कोई कवि पुराने ढंग की रुढ़ियों के बन्धनों से अलग रह कर किसी 
अनुभूति, भाव या विचार को प्रंभिव्यक्ति में अ्रपनी विशिष्टता को प्रकट करता है, तो वह नया 
कवि और उसको कविता नई कविता है, और जिस युग में यह विशेषता सामान्य रूप से विद्यमान 
हो, वह निस्सन्देह कविता का नया युग कहलाया जा सकता है । 

यों तो अत्येक युग अपने समय के लिए नया युग और भावी युग के लिए पुराना युग होता 
है । उदाहरण के लिए भ्राज से सो साल पहले का युग झ्राज से सो साल पहले के लोगों के लिए 
नया युग था। लेकिन हमारे लिए वह पुराना हो चुका है। बिल्कुल उसी तरह, जिस तरह हमारा 
युग हमारे लिए नया है, लेकिन झाज से सो साल बाद झ्ाने वाले लोगों के लिए पुराना कहलायेगा। 
श्रौर जहाँ तक उदद कविता का सम्बन्ध है, यह सही है कि उसके विभिन्‍न युग एक-दूसरे के साथ 
इस तरह संबंधित हें कि किसी जगह पर रेखा खींच कर पुराने युग से ग्राधुनिक युग को भ्रलग 
करना कठिन ही नहों, प्रसंभव भी है। और यह॒विकास-क्रम इक़बाल के इस शोर को चरितार्य 
करता है; 

ज़माना एक, हयात एक, कायनात भी एक, 
दलीले-कमनज़री, किस्सा-ए-कृदीमो-जदीद । 

संगर इसके बावजूद हमारी कविता के मार्ग में एक ऐसा पड़ाव भी श्राता है, जहाँ शेर- 
सुखन का क्राफिला एक नया मोड़ लेता हुआ दिखाई देता है, भ्ौर वह पड़ाव है, हमारे देश को 
एक बहुत बड़ी सामाजिक, झाथिक और सांस्कृतिक क्रान्ति । जब तक किसी देश का जीवन सामा- 
जिक-सांस्कृतिक क्रान्ति में से नहीं गुज़रता, तब तक उस देश के साहित्य में ऐसे दृष्टिकोण स्थान 


१७६ काव्य-धारा 


नहीं पा सकते, जो नई चेतना के प्रकाश से जगमगा रहे हों । लोगों के जीवन में छोटे-बड़े उलठ- 
फेर तो हुआ ही करते हैं, सल्तनतें बना-बिगड़ा करती हैं, लेकिन श्राथिक भ्रौर सांस्कृतिक श्राधारों 
में परिवर्तत के बिना कोई विशेष सामाजिक परिवतंन परिलक्षित नहीं होता । हकूमत का केवल 
एक परिवार या वंश से दूसरे परिवार या वंश के हाथों में चला जाना साहित्य श्रोर ललित कलाश्ों 
पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल सकता । लेकिन जब देश एक नयी सामाजिक और श्रारथिक कान्ति 
में से गुज़्रता है तो कान्ति देश के साहित्य और ललित कलाओों पर एक ऐसा प्रभाव छोड़ती है, 
जिससे नये जीवन झोर नयी सामाजिक चेतना के सोते फूटते हें । 

उन्‍्नीसवीं सदी के शुरू में, देश में एक सामाजिक ढाँचा खत्म हो रहा था, श्रौर दूसरा बन 
रहा था। यह समय दो सम्यताश्रों का एक विचित्र संगम था, जो एक-दूसरे का विरोध भी कर रही 
थों। पुराने विचारों की दुनिया नये विचारों की दुनिया से टकरा भी रही थी, श्रौर दोनों एक-दूसरे 
से प्रभावित भी हो रही थीं। देश के इस मिले-जुले सामाजिक और बोद्धिक वातावरण में मानो 
उस क्रान्ति को नींव पड़ गयी थी, जो बाद में १८५७ की श्राज़्ादी की लड़ाई के रूप में सामने 
झाई । १८५७ का स्वाधीनता संग्राम श्रपने समय की परिस्थितियों से भ्रसम्बद्ध, क्षणिक और साम- 
पयिक घटना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक, झ्राथिक श्रोर सांस्कृतिक श्रगति-धारा का स्वाभाविक 
परिणाम था, जो उन्तीसवों सदी के श्रारंभ में ही भारत की भूमि पर वह्‌ निकली थी। सन्‌ १८५७ 
की कान्ति, जिसकी जड़े श्रतीत में गहरी जा चुकी थों, हमारे देश के इतिहास में एक ऐसी ही सामा- 
जिक ओर झ्राथिक कान्ति थी, जिसने उद्ब -कबिता में पहली बार सामाजिक-बोध को जन्म दिया । 
देश ने जब इस क्रान्तिकारी वातावरण में प्रवेश किया उस समय उद्गू -कविता को श्रपत्ती रोशनी 
बिखेरते हुए कोई पांच सौ बर्ष बीत चुके थे। लेकिन इस दोर्घ भ्रवधि में कविता के क्षेत्र में कोई 
ऐसे नये विचारों की लहर नहीं दिखाई देती जिसकी बजह से किसी नये साम्राजिक या सांस्कृतिक 
जीवन का निर्माण्ण होता । सबसे पहला शायर, जिसने कविता में चिन्तन भशौर विचार को स्थान 
दिया, और जिसके चिन्तन में पुराने वातावरण का निर्माण करने की श्राकाँक्षा रह-रह कर करवट लेती 
नज़र भ्राती है, वह ग़ालिब है। यह सही है कि ग्रालिब की कविता में उस वर्ग-चेतना का रूप स्पष्ट 
नहीं होता, जिसे श्राज हम बड़ी श्रासानी से श्रपनी कविता का भ्रंग बना सकते हें। लेकिन ग्रालिब 
की क्ृतियों में उसके विचारों और प्रवृत्तियों के भ्रध्ययन से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि उसके 
विचार कविता में और साथ ही साथ जीवन में एक नये लक्ष्य की खोज में तत्पर थे। 

१८५७ की आज़ादी की लड़ाई इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना है, जो ग़ालिब 
के ज्ञीवन-काल में ही घटित हुई थी। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से ग्रालिब को कबिता पर इस इतनी बड़ी 
कान्ति की कोई छाया नहीं दिखाई पड़ती । श्रब इससे यह परिणास निकालना ठीक नहीं कि वह 
इस परिवर्तन से सन्तुष्ट थे, बल्कि इससे तो हम केवल इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हें कि राजनीति 
के बारे में ग्रालिब भ्रपना कोई स्पष्ट भ्रभिमत नहीं रखते थे” श्रौर उनके सामने कोई नया सामा- 
जिक वातावरण नहीं था | जहाँ तक सामाजिक वातावरण से असनन्‍्तोष का सम्बन्ध है, बह ग़ालिब 
को कविता में तीन्रता से कलक रहा है । और इस राजनीतिक चेतना के प्रस्फुटन का ही परिणाम 
है कि इस उत्कट बेचेनी ने विभिन्‍न श्रवस्थाओं में श्रतीत की 'मरसिया ख्वानी' (शोक-कविताएँ) का 
रूप भ्रपनाया । यह पूरी गज़ल--- 

जूल्मतकदे में मेरे शबे-गम का जोश हे, 
इक शमा है दलीले-सहर, सो खमोश हे / 


आधुनिक उद्‌ -कविता १७३ 


ने मफक़्दए-विसाल, न नज्जारए-जमाल, 
मुद्त हुई कि आशतीए चश्मो-गोश हे! 
ए ताजा वारदाने-बिसाते-हवाए--दिल, 
जिनहार अगर तुम्हें हक्‍से--नायो-नोश है ! 
देखो मुके जो दीदए-श्बरत निगाह हो, 
मेरी सुनों जो ग्रोशे--नतप्तीहृत न योश है ! 
साकी ब-जल्वा दुश्मने-ईमानो-आगही, 
मृतरिब ब-नगृमा रहजने-तमकीनो-होश हे ! 
या शब को देखते थे कि हर ग्रोशए-त्रिसात, 
दामाने-बागृबानो-कफ्रे-गुलफ्रोश हे ! 
लुत्फे-सरामेसाकी-ओं . जोके-सदाए-चंग, 
यह जन्‍नते-निगाह, वो फिरदोसे-गोश है! 
या सुबहदम जो देखिए आकर, तो बज़्म में, 
ने कह सरूर-व-सोज, न जोशो-खरोश है ! 
दागे फिराके-सोहबते-शब॒ की जली हुई, 
इक शमा रह गई है, सो वो भी खमोश हे ! 
इस मानसिक उद्वेलल की एक रोशन मिसाल है। इस प्रकार के उदाहरण ग्रालिब को 
कविता में पर्याप्त सात्रा में मिलते हें । जहाँ तक भविष्य की कल्पना का सम्बन्ध है, ग़ालिब ने 
असीस निराशापूर्ण राजनीतिक वातावरण में एक भ्रस्पष्ट, किन्तु उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत 
किया है ! यदि कला की बारीकियों के साय-साथ ग़ालिब ऐतिहासिक, सामाजिक और बर्ग-चेतना 
की दौलत से भी मालामाल होते तो अ्रतीत की “मरसियालह्वानी' में उन्हें कभी संतोष न 
मिलता, झोर 
लाजिम नहीं कि खिज् की हम पेरवी करें, 
माना कि इक ब॒जुगे हमें हमसफूर मिले ! 
कह कर ही सन्‍्तुष्ट न हो जाते, बल्कि हमें एक्‌ निश्चित लक्ष्य का पता देते । किन्तु स्पष्ट 
लक्ष्य का पता न देने के बावजूद ग़ालिब को यह बेचेनी उद्दं -साहित्य की इतनी बड़ी पूजी है कि 
अगर यह बेचेनी साहित्य के रक्‍त में प्रविष्ट न कर जाती तो हाली इससे झ्ागे की मंज्षिल तक 
हमारी रहनुमाई न कर सकते | 
हाली ने भ्रपनी रचनाओ्रों से वातावरण को इस सीमा तक प्रभावित किया कि उनका चिन्तन 
झ्राज के कवियों के लिए भी उसी तरह मार्ग-दीप का काम दे रहा है, जेसा कि वह उनके ज्ञमाने के 
लोगों के लिए दे रहा था । 
हाली अपने प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दृष्टिकोश के बावजूद भारत के जीवन, नेतिक-मूल्यों, 
समाज-व्यवस्था, ग्राथिक शौर राजनीतिक दशा के सर्वोत्कृष्ट व्याल्याकार और चितेरे हें । और 
आ्रापने “मुकहमा-ए-श्षे रो-शायरी' में व्याल्यात और भ्रालोचना को एक-दूसरे में समोकर एक ऐसी 
पुस्तक रची है कि समय झ्रौर काल का परिवर्तन शायद ही इस पर कुछ प्रभाव डाल सके । मनुष्य 
का बौद्धिक-विकास कितनी ही ऊँचाई तक क्यों न पहुँच जाये, हाली पढ़नेवाले का हमेशा साथ देंगे, 
झौर कुछ परिस्थितियों में मार्ग-प्रदर्शन भर नेतत्व भी करते रहेंगे। सांसारिक स्वार्थ, नस्ल व रंग 


श्ज्फ काव्य-धारा 


झौर समय-काल के बन्धनों से मुक्त होकर किसी ऐसी कृति की रचना कर लेना श्रत्यन्त कठिन काम 
है कि हर युग के श्रालोचक उस कृति पर फिर-फिर नये सिरे से शोध करते रहें श्रौर हर काल के 
विद्यार्थी उससे लाभान्वित होते रहें । 
हाली ने बुद्धि-तत्व के माध्यम से कविता श्रौर समाज का सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश की । 
काव्यालोचना की बुनियाद सबसे पहले हाली ने भौतिक परिस्थितियों पर रखी और बताया कि 
शायरी भौतिक परिस्थितियों के भ्रनुसार भ्रपना रूप-रंग बदलती है। हाली ने केवल आलोचना के 
द्वारा ही नहीं, बल्कि भ्रपनी कविता के द्वारा भी उद्दू -काव्य के सम्मुख नये सार्ग खोले । 'मुसहस ए- 
हाली' कई दृष्टियों से उदद का पहला काव्य-ग्रन्थ है जिसे हम आधुनिक साहित्य का एक पथ-दीप 
ठहरा सकते हैं । सामन्‍्ती युग के पतन का चित्र हाली ने इस सफलता के साथ अंकित किया है कि 
यह कविता हमारे साहित्य का श्रनश्वर अंग बन गई है । यद्यपि इस कविता में केवल मुसलमानों को 
संबोधित किया गया है, लेकिन वास्तंविकता यह है कि इसमें एक ऐसे सहुृदय श्र दर्बंभंद हिन्दु- 
सतानी शायर की शआ्ात्मा फ़रियाद कर रही है, जो देश की दशा पर तड़प रहा है । उस ज़माने में 
जब गालिब को क्लिष्ट कविता वातावरण पर छायी हुई थी, यह कारनामा कुछ कम तो नहीं कि 
फ़ारसी शोर अरबी का सहारा लिए बग्गेर हाली ने विशुद्ध उद्द भाषा में यह काव्य प्रस्तुत करके यह 
बात व्यावहारिक रूप में बतायी कि उट में कितनी विकास-संभावनाएं हैं। 
किन्तु हाली के इस कारनामे का प्रभाव प्रथम महायुद्ध से पहले की उद्द -कविता पर भ्रधिक 
गहरा नहीं पड़ा था । पहले महायुद्ध ने समय की गति बहुत तीत्र कर दी और फ़ासलों को बहुत कम 
कर दिया । हमारे देशवासी नये-नये खतरों श्रौर उम्मीदों से इस तरह परिचित हुए कि सवियों को 
सुप्त भावनाएं और भ्रनुभूतियाँ सहसा जाग्रत हो गई । भारत और शेष विश्व की समस्याएँ लगभग 
एक हो गई । कविता इन परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकती थी ? इक़बाल को, 
जिन्होंने महायुद्ध से पहले पश्चिमी जातियों को इन शब्दों में सम्बोधित किया था, 
कि दयारे-मगूरिब के रहने वालो, ख्‌ दा की बस्ती दुका नहीं हें, 
खरा जिसे तुम समम रहे हो, बो अब जुरे-कम अयार होगा। 
तुम्हारी तहजीब अपने खंजर ले एक दिन ख़ुदकशी करेगी; 
जो शझाखतरे नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा। 
विश्व की परिस्थियियों ने भ्रपनी कविता में ऐसे विषय प्रस्तुत करने पर विवश किया जिनसे 
उदूं कबिता उस समय तक श्रपरिचित थी । पूंजी व उद्योग का संघर्ष इक़बाल की कविता का 
विशिष्ट अंग बन गया और इक़बाल ने यह कहकर--- 
ख्वाब से बेदार होता हे जरा महकूम अगर- 
फिर घुला देती है उतको हुक्मरों की साहिरी; 
ऐ कि तुककों खा गया सरमायादारे हीलागर 
शाखे-आह पर रही सदियों तलक तेरी बरात, 
दोस्त दोलत आफूरी को मिज़्द यू मिल्लती रही 
अहले-सरवत जैसे देते हैं गरीबों को जकात ! 
नस्ल, कोमीयत, कलीसा, सल्तनत, तहजीब, गे 
ख़्वाजगी ने खब चुन-चुन कर बनाये मस्करात / 
७ 
मक्र की चालों से बाजी ले गया सरमायादार 


आधुनिक उद्‌ -कविता १७६ 


इनन्‍्तहा-ए-सादगी से खा गया मजदूर मात ! 
उठ कि अब बज़्मे जहाँ का और ही अन्दाज़ हे 
मशरिको-मगरिब में तेरे दौर का आगाज है। 
उद्ू शायरी में एक बिल्कुल ही नया भ्रध्याय जोड़ा । शौर कुछ मुहृत बाद १६३४ में जब 
ध्वाले-जबरील' प्रकाशित हुई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा-- 
उ्ठो, मेरी दुनिया के गरीबों को जया दो, 
खुके-उमरा के दरो-दीगार॒हिला दो; 
जिस खेत से दहकाँ को मयस्सर न हो रोजी, 
उस खेत के हर खोशए-गंदुम को जला दो । 
सुल्तानी-ए जम्हूर का आता हे जमाना 
जो नक्शे कुह्दन तुमको नजर आये मिटा दो /! 
पहले महायुद्ध के बाद हमारे देश में फिर एक इन्क़लाब भ्राया । यह इन्क्रलाब बिचारों का 
इन्क़लाब था । हमारे स्वतन्त्रता-प्रान्दोलन को धारा क्षणा-प्रतिक्षण फंलती और गहरी होती गयी । 
इस झवसर पर ब्रजनारायण चकबस्त, ज़फ्रग्ली खाँ, दुर्गासहाय 'सहूर' और तिलोकचन्द 'महरूम' 
को कविता में हिन्दुस्तान की आशाएँ, उमंगे और संकल्प भ्राकर सिमट गये। भ्रकबर इलाहाबादी 
की व्यंभ्यात्मक कविता ने बहु काम किया जो ज्ञायद कोई गंभीर कविता के द्वारा न कर पाता । 
इस विद्रोह के युग ने विशुद्ध रोमानी (स्वच्छन्दतावादी) कवि जोश मलीहाबादी को इन्क्रलाब का 
प्रमुख कवि वना दिया, और “जोझ' ने हिन्दुस्तान के राजनीतिक जीवन की इस ईमानदारी, जोश 
झौर गहराई के साथ प्रभिव्यवित की कि हिन्दुस्तान का स्वाधीनता-भ्रानयोलन झौर “जोश' की 
कविता एक ही भावना के दो नाम हो गये । “जोझ्ञ' ने सीधे अंग्रेजी शासन और साम्राजी दमन 
शक्ति से टक्कर ली ओर “शिकस्तेजिन्दां का ख्वाब, “बफ़ादाराने श्रजुली का पयाम शहंशाहे-हिन्दु- 
स्तान के नाम', 'जइने ताजपोशी', “नवाए-इन्क़लाब', “बग्रावत', श्रौर “ईस्ट इण्डिया कम्पनी के 
फ्रज्षिदों के नाम को तरह को नजझमों को एक फोज मेंदान में उतारी । ये कविताएँ युद्धभूमि में 
बड़ी जिगरदारी से लड़ीं और राजनीतिक क्षेत्र के ग्रतिरिक्त साहित्यिक-क्षेत्र में इन कविताओं का 
कारनामा यह है कि उद्ू में श्रोजपूर्ण और राष्ट्रीय संघर्ष की व्यंजना करनी वाली कविता को बुनि- 
याद पड़ी । 
१६२४ के लगभग भारत को दशा एक बंदीगृह से कम्न नहीं थी । “जोश' की नज्म “शिकस्ते 
सिन्दां का ख्वाब में हमें उस काल की जनता के हृदय की धड़कनें स्पष्ट सुनायी दे रहों हें ; 
क्‍या हिन्द का जिन्दां कॉप रहा है, गज रही हैं तकबीरें, 
उकताए हैं शायद कुछ कूृंदी भर तोड़ रहे हैं जंजी रें, 
दीवारों के नीचे आ-आकर यों जमा हुए हैं जिन्दानी, 
: सीनों में तलातुम बिजली का आँखों में कलकती शमशीरें, 
भूखों की नजर में बिजली है, तोपों के दह्वने ठंडे हैं, 
तकदीर के लब को जुम्बिश हे दम तोड़ रही हैं तदबीरें, 
आंखों में गदा की सुर्खीँ हे, बेनूर हे चेहरा सुल्तां का, 
तत्तरीब ने परचम खोले हैं, सजदे में पड़ी हैं तामीरें / 
क्या उनको खबर थी जेरोजबर रखते थे जो रूड्ढे मिज्ञत को, 


१८५ काव्य-धारा 


उबलेंगे जमीं से मारे सियह, बरसेंगी फ्लक से शमशीरें ! 
क्या उनको खबर थी सीनों से जो खुन चुराया करते थे, 
इक रोज इसी खामोशी से टपकेंगी दहकती तकरीरें ! 
संभलो कि वह जिन्दां गू'ज उठा,कपटो कि वह कुंदी छूट गये, 
उड्ले कि वह बेठीं दीवारें, दोड़ो कि वह टूटी जंजीरें / 
दूसरे महायुद्ध के दौरान में 'शायरे इन्क़लाब' का स्वर यह रंग ले चुका था : 
सांस क्या उखड़ी कि हक के नाम पर मरने लगे, 
नौए-इन्सां की हवा त्वाही का दम भरने लगे! 
जुल्म भूले रागिनी इन्साफु की गाने लगे, 
लग गईं है आग क्‍या पर में कि चिल्लाने लगे! 
मरिजमों के वास्ते जेबा नहीं यह शोरो-शेन, 
कल यजीदो शिम्र थे, ओर आज बनते हो हुस्तेन / 
खेर ऐ सोदागरो, अब हे तो बस इस बात में, 
वक़्त के फरमान के आगे झुका दो गरदनें / 
इक कहानी वक्त लिक्खेगा नये मजमून की! 
जिसकी सुर्खा' को जरूरत हे तुम्हारे खून की ! 
वक्‍त का फरमान अपना रुख बदल सक्रता नहीं, 
मोत टल सकती है, अब फ्रमान टल सकता नहीं ! 
(ईस्ट इण्डिया कम्पनी के फ्रज़न्दों के नाम) 
नज्म (वर्णनात्मक कविता) तो खेर नज्म है, इस युग में ग़लल ने भ्रपनी मादकता, सधु- 
प्रियता और मस्ती के बावजूद सामाजिक और राजनीतिक वेदना को अपने दिल में जगह दी ! 
सौन्दर्य के कवि फ्रिराक गोरखपुरी ने-- 


मेरे कलाम में ऐ राग-रंग के आशिक, 

तेरी हँसी न सही दर्दे कायनात तो है / 
कह कर गऱाज़्ल की विस्तृत संभावनाश्रों को प्रकट किया, और झ्रपनी ग़जल में क्लासिकी गांभीय 
अक्ष ण्य रखते हुए एक नया स्वर प्रदान किया । ग़जल के श्रलावा झ्रापने रूबाई के चेहरे को भी 
निखारा और उस युग में जब कि रूबाई उदय कविता से लगभग ख़त्म हो चली थी, आपने 
कविता के इस रूप-प्रकार में नया जीवन, देने का सफल प्रयास किया । हिन्दी के सुन्दर शब्दों को 
उदय कविता में समोना श्रापका एक बड़ा कारनामा है, जिसके कारण उद्य कविता में एक नया 
सोन्दर्य जागा । 

इन्ही दिनों देश में बंगाल का भयानक श्रकाल श्राया। इसकी विध्वंस लीला को देखकर 

जिगर और अ्रख्तर शीरानी जंसे श्रापने में सस्त श्लौर मगन रहने वाले शायर भी अपनों कविता की 
धारा मोड़ने पर मजबूर हो गये । “'जिगर' की ग़जल ने उस समय--- 

बंगाल की में शामोसहर देख रहा हूँ | 
का रूप धारण किया और फ़ेज़, साहिर लुधियानवी और वामिक जोनपुरी ने नई भावनाओं की 
इभिव्यक्ति के लिए नज्म को चुना । 


आधुनिक उदू-कविता १८१ 


को हसीन खेत फ़टा पढ़ता था जोबन जिनका, 
किस लिए उनमें फूकृत भूख उगा करती हे ? 
(फंज प्रहमद “फंज') 
मिलें इसी लिए रेशम के ढेर बुनती हें, 
कि दुरूतराने क्‍तन तार तार को तस्सें ! 
चमन को इस लिए माली ने ख्‌' से सींचा था, 
कि उसकी अपनी निगाहें बहार को तरसें ! 
(साहिर लुधियानवी ) 
नदी, नाले, गली डगर पर, लाशों के अम्बार, 
जान की ऐसी महंगी शे पर, उलठ गया ब्यौपार ! 
मुद्दी भर चावल से बढ़कर सस्ता है यह माल, 
रे साथी सस्ता हे यह माल ! 
भूखा हे बंगाल रे साथी भूखा हे बंगाल ! 
पुरखों ने घरबार लुटाए छोड़ के सब का साथ, 
माएँ रो! बिलख बिलख कर बच्चे भये अनाथ ! 
सदा सुहागिन ब्रिधवा बाजे, खोले सर के बाल, 
रे साथी खोले सर के बाल! 
भूखा है बंगाल रे साथी, भूखा है बंगाल ! 
इस हृदय-द्रावक घटना के कुछ बाद ही दूसरा महायुद्ध समाप्त हुआ भौर भारत के क्षितिज 
पर आज़ादी का सूरज उदय हुआ । देश में सबंत्र श्राशा और पुलक की एक लहर दोड़ गई, लेकिन 
करोड़ों इन्सानों की फ़रियादों के तूफान में यह लहर दब के रह गई । विदेशी शासन की समाप्ति ने 
हमारे देश में ऐसा भयानक और दर्दनाक भ्रध्याय खोल दिया जिसकी याद सहज ही भुलाई नहीं जा 
सकेगी । घोर विषम परिस्थितियों का एक भ्रजब दोर था: 
बाजे बजे तो शोरे फुर्गां दूर तक गया, 
कश्ती मिल्री तो खेर से दरिया पिचक गया ! 
शबनम गिरी दिले समनो-सर्व पक गया, 
बूदें पढ़ी तो और भी गुलशन घधक गया ! 
अपना गला खूरोशें तरन्नुम से फ़त गया, तलवार से बचा तो रगे-गुल से कट गया ! 
दौलत मिली तो और भी नादार हो गए, 
प्रेहत हुई नसीब तो बीमार हो गए। 
उतरा जो बार ओर गरांबार ह्ढो गए, 
आजाद यू हुए कि गिरफ्तार हो गए / 
पिप्रला जो आसमां तो ज॒र्मी संगः हो गई, पे यू' फ़टी कि सुबह्े-चमन दंग हो गई ! 
( जोश मलीहाबादी ) 
ये दाग. दाग उजाला, ने शत गजीदा सहर, 
वो इन्‍्तजार था जिसका ये वह सहर तो नहीं ! 
(फैज भ्रहमद फंज) 


श्पर काव्य-घारा 


कोन आजाद हुआ, 
किसके माथे से स्याही छूटी। 
मेरे सीने में अभी दे है महकूमों का, 
मादरे हिन्द के चेहरे में उदासी हे वही । 
खंजर आजाद हैं सीनों में उतरने के लिए, 
मौत आजाद हे लाशों पे गुजरने के लिए | 
चोर बाजारों में बदशक्‍ल चुड़ेलों की तरंह, 
कीमतें खाली दुकानों में खड़ी रहती हैं । 
हर खरीदार की जेबों को कतरने के लिए ॥ 

( श्रली सरदार जाफ़री ) 


लेकिन इन समस्त परिस्थितियों के बावजूद उद -कवि भविष्य से निराश नहों हुआ । वह 
जानता है कि हिन्दुस्तान का प्राचीन इतिहास एक महान और उज्ज्वस भविष्य का दर्पण है। हिन्दु- 
स्तान सदा से शान्ति श्ौर संस्कृति का घर रहा है, और वह समय दूर नहीं जब एकबार फिर इस 
देश का वातावरण ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, संस्क्ृति श्ौर शान्तिमय जीवन की किरणों से जगमगा 
उठेगा । इसलिए “मज़जा' ने बहुत सोच-समझऋ कर ठीक समय पर निर्देश किया: 


है पाक अबे गू लागी से आसमाने वतन, 
ये काम कर गये आखिर बलाकशाने क्तन | 
अभी तो खेर से दहचन्द होगी शानेक्तन, 
अभी तो और भी महकेगा बोस्तानेकतन, ह 
कि यह बहार प्रयामी-ए-सद बहारां है। 

ये इन्कलाव का मज़दा हे, इन्कलाब नहीं, 

ये आफूृताब का परतो हे, आफूताब नहीं । 

वह॒ जिसकी ताबो तवानाई का जवाब नहीं, 

अभी वो सई-ए-जनू'खेज कामयाब नहीं, 

ये इन्तहा नहीं आयाजे कारे मरदां है। 

गोपाल मित्तल ने इन्क़लाब का यू मूल्यांकन किया : 

ये जो इक नूर की हल्की सी किरन फूटी है, 

कोन कहता हे इसे सुबह्े दरख्शां ऐ दोस्त | 

मुकको एहसास है बाकी शबेतार अभी, 

लेकिन ऐ दोस्त मुझे रक्स तो कर लेने दे / 

कम से कम नूर ने उल्टी तो हे इकबार नकाब, 

एक लमहे को तो टूटा हे तिलिस्मे शबे तार | 

इससे साबित हुआ सुबह भी हो सकती है, 

सुबहे काजिब भी तो है असल में दीवाचा-ए-सुबह । 

सुबहे काजिब भी तो हे सुबहे-दरख्शां की नवेद, पु 
एक ऐलान की हंगामे विदा-ए शब हे। 


आधुनिक उदृ्‌ -कविता श्प३े 


काफ़िला नूरं सहर का है बहुत ही न दीक, 
जल्द होने को है ख्‌ रशीदे दरर्ूशां की नमूद । 
स्वतंत्रता भ्रपने साथ एक भौर विषय भी लायी, भ्रोर वह है देश के बंटवारे का विषय । 
में समझता हूँ कि यह विषय उद्गूं -कबिता के रणों में जितनी गहराई तक गया है उतना शायद ही 
इसने नये हिन्दुस्तान को किसों श्रौर भाषा की कविता को प्रभावित किया हो । इस विषय ने उद्दू 
कविता को संपूर्णतः करुणा झ्ौर बेदना से भर दिया है। भ्ौर उद्टू -कविता की यह कितनी बड़ी सफ- 
लता है कि बंटवारे की दुर्घटना में श्राग शोर खून की बाढ़ को पार कर प्राने वाले कवियों के स्वर 
घुणा झौर विद्वेष की कदुता से संकीर्ण झोर साम्प्रदायिक नहीं बने । जहाँ तक उद्गू-कबिता के 
इस प्रसंग का सम्बन्ध है, यह भ्रभी तक लगातार लिखा जा रहा है, शोर पाँच बरस को मुद्दत 
गुजर जाने के बावजूद न कवियों की भ्राँख के प्रांसू सूखे हें, न क़लम की स्याही ! इस प्रसंग में एक 
नज्म को कुछ पंक्तियां देखिए : 
हमने यह माना तेरे अपने सत्व्‌ नवर कम नहीं, 
अपने जाने से तेरी बज्मे सख़ुन बरहम नहीं । 
हम भी तेरे ही नवासंजे चमन थे ऐ क्तन, 
अन्दलीबे-नगमए-हुब्नेवतन थे ऐ. क्‍तन । 
तेरी आजादी के सदके में हमें हिजरत मिली, 
जज़्वए-जोके-वर्फ़ां की हमकों यह कीमत मिली | 
अलगिदा ऐ अजें-पाकिस्ताँ हमेशा! के लिए, 
याद रखेंगे तेरे एहसाँ हमेशा के लिए | 
जाए-सामाने-मईशत दागे-हसरत ले चले, 
सब्जए-बेगाना थे हम तेरें गुलशन से चले । 
तृ फले-फूले रहे तुकपर करम अल्लाह का 
दूर दामन से तेरे शोला हमारी आह का | 
तू हुआ दुश्मन हमारा, हम तेरे दुश्मन न थे, 
तू हुआ क्यों हमसे बदज॒न, तुक से हम बदजुन न थे। 
अब भी हैं आबाद तुर में अपने प्यारे सेकड़ों 
जानने-पहचानने वाले हमारे सेकड़ों 
जो मुसलमां थे मगर कहते न थे काफिरि इसमें 
अपनी मजलित में बिठाते थे जो आंखों पर हमें 
आह ऐसे मुखलिसों से भी जुदा होना पढ़ा, 
वह वफ़ापरवर थे हमको बेवफा होना पढ़ा। 
दाग हें उनकी जुदाई के दिले-गमनाक में, 
बादे-मुर्दन भी रहेंगे जो हमारी ख़ाक में। 
हम बुरा चाहें तेरा, मुमक्रिन नहीं, मुमकिन नहीं । 
तेरे हकृ में बद-दुआ मुमकिन नहीं, मुमकिन नहीं ॥ 
यह दुआ मांगा करेंगे हम ख़ुदाए-पाक से, 
जोहरे-इन्सानियत चमकाए तेरे खाक से ! 


श्प्छ काव्य-धारा 


नारवादारी का काटा तेरे गुलशन में न हो, 
आओ तअस्पुब की नजासत तेरे दामन में न हो ! 
खेर से तुकको मुहब्बत, ओर शर से आर हो, 
ताकि पाकिस्तान कहलाने का तू हकृदार हो | 
(तिलोकचन्द 'महरूस' ) 
देश का विभाजन होते ही बह समातस की शाम आई, जब्र हिन्दुस्तान की राजधानी में 
मानवता के सबसे बड़े संरक्षक को मौत के घाट उतार दिया गया । चालीस करोड़ इन्सानों के पथ- 
प्रद्शक की ह॒त्या ने इस तथ्य को स्पष्ट कर दिया कि हिन्दुस्तान को साम्प्रदायिकता और संकुचित 
धाभिकता से बड़ा ख़तरा है। 'जोश', “मजाज़ञ” “जोश' मल्सियानी, “वामिक़', 'मुल्ला', 'महरूस', 
“रबिश', 'अ्र्श! मल्सियानी, गोपाल मित्तल, 'क़तील' शफ्राई, 'सुहेल' और श्रन्य कवियोंने इस विषय 
को लेकर रचना की, और केवल गाँधी जी का मातम ही नहीं किया; बल्कि गांधीजी के आदर्श को 
भी पेश किया और अ्रसत्य की शक्तियों से संघर्ष करने का संकल्प भी पेदा किया । 
हमें क्या हो गया था हाय, यह क्या ठान ली हमने 
खुल्दूसो-आश्ती के देवता की जान ली हमने 
जो दौलत लुट चुकी श्रब लौटकर वापिस न आएगी 
हजारों साल रोकर भी उसे दुनिया ब॒ प्राएगी 
ये अच्छी कोम है जो कोम के सर्दार को मारे 
ये अच्छा धर्म हे जो धर्म के अवतार को मारे 
नियाहे-अहले-आलम में मलामत का हृदफ्‌ हम हें 
हमीं ने कृत्ल बापू को किया है नाखलफ हम हें 
हमीं हें मसलके-मोहसिनशनासी छोड़ने वाले / 
किनारे पर पहुँचते ही सफीना तोड़ने वाले ! 
( 'अर्ं' सलसियात्ती ) 
इस समस्त संधर्ष-काल में श्यृंगार भी उदू कविता में निरंतर मुखरित होता रहा। “जोश' 
“जजबी' और जा निसार अख्तर की रोमानी शायरी और जिगर, फ़िराक़ और अ्रदम की ग़ज़लें इसके 
ज्वलंत उदाहरण हैं। विषय और श्रभिव्यक्तिके क्षेत्रमें व्यापकताके साथन्साथ रूप-सम्बन्धी प्रयोग भी 
जारी हैँ। मुक्त छन्‍्द और अतुकान्त कविता भी बराबर विकास कर रही है। यद्यपि इस प्रकार की 
कविताओं की श्रब वह भरमार तो नहीं है जो १६४३५ से १६४० तक रही, लेकिन इतना कहा जा 
सकता है कि उद्ड में श्रब इस प्रकार की कबिता के क़दम जम चुके हैं, और सरदार जाफ़री, अ्रख्त- 
रुलईमान, मीराजी, मुनीबुरंहमान, नन मीस राशिद, बलराज कोमल और तसदृदुक़ हुसेन की नज्मों में 
यह स्पष्ट हो चुका है कि इस प्रकार की कविता में जीबित रहने की क्षमता है । प्रतीक झौर संकेत- 
बहुल कविता, जिसका आरम्भ मौराजी और उनके साथियों ने किया था, समय का श्राधात न सह 
सकी और कुछ ही वर्षों में उसकी परम्परा खत्म हो गई । इस रुग्ण-मानस की कविता को आधुनिक 
युग के उन तक़ाज़्ों ने ख़त्म किया, जो प्राणवान अनुभूतियों को अपने दिल में लिए श्रागे बढ़ रहे 
थे, और इन्हीं प्राणवन्त अ्रनुभूतियों से उठ “कविता को परिपूर्ण रखना चाहते थे, ओर जिनकी यह 
श्राकांक्षा थी कि प्रतीक और संकेत के परदे में पश्चश्नष्ट प्रवृत्तियाँ पनप न सकें । इन तक़ाज़ों ने उद्दू- 
कविता को जीवनकी उन बास्तविकताओ्रों से संबद्ध किया जो दिन के प्रकाश के समान हमारे सामने 


कांग्य-धारा श्पु्‌ 


हैं । यही कारण है कि हमारी वर्तमान कविता में हमारे सामाजिक जीवन का संर्वागपूर्ण चित्र दिखाई 
देता है । इसमें राजनीतिक चेतना की ऋलकियां हूँ, प्राथिक परिस्थितियों के चिह्न हैं, बदलते हुए 
सांस्कृतिक स्तर की करवटें हें। सौंदर्य और प्रेम को कपोल-कल्पनाएं नहीं; बल्कि उतके सजीव झोर 
यथार्थ चित्र हें । शोधात्मक चेतना रचनात्मक भावना के साय-साथ चलती है भ्लौर कवि की कल्पना 
प्रासमान को बुलन्दियों में खो जाने की बजाय, ज़मीन के विस्तार नापने, जानने भ्रोर प्रणु-प्रणु की 
गहुराइयों को खोज लगाने में संलग्न है। अंत में, भ्राघुनिक उर्दू कबिता के कुछ ग्रौर प्रतिनिधि नमूने 
: मौचे देकर हम इस निबंध को सम्ताप्त करते हें :-- 


जोश मलोहाबादी 
र्वाइयात 
है 
ऐं पिछले पहर क्यों हे यह जुल्मत घर में 
इकतरफ़ा ग्रनूदगी है बामो-दर में 
शायद कोई नातमाम ख्वाबे-सहरी 
बेतरह उलभ के रह गया है सर में । 
8 8, 
डूबें कि उभर जायें न पूछो हमसे 
ठहरें कि गुजर जायें न पूछो हमसे 
ग्रालामे-हथात उठाएं और जिन्दा रहें 
या चेन से मर जायें न पूछो हमसे ! 
हक] 
साहिल, शबनम, नसीम, मैदान, तयूर 
ये रंग, ये झूटपुटा, ये खुनकी, ये सरूर 
ये रक्से-हयात और दरिया के उधर 
टूटी हुई क़ब्रों पे सितारों का ये न्र। 
मी, 
ये मौत, ये जिन्दगी, ये पीरी, ये शबाब, 
इबरत के ये खेमें, ये तमन्ना ये हुबाब 
किसको समकाऊं और समभूं किससे 
ताबीर भो एक ख्वाब हे, ख्वाब तो ख्वाब ! 


१८६ 


काव्य-बधारा 


जिगर मुरादाबादी 


ग़ज़ल 


फ़िक्रे जमील ख्वाबे परीशाँ हैं श्राजकल 
शायर नहीं हें वह जो ग़जलू-ख्वाँ हे आजकल । 
इन्सानियत कि जिससे इबारत है जिन्दगी 
इन्साँ के साए से भी गुरेजाँ हे भ्राजकल | 
दिल की जराहतों से खिले हें चमन-चमन 
ओझऔऔर उसका नाम फ़ल्ले-बहाराँ है श्राजजल । 
जम्हरियत का नाम है जम्हरियत कहाँ 
फिस्ताइयत, हक़ीक़ते-उरियाँ है आजकल । 
कंसा खुलूस किसकी मोहब्बत कहाँ का दर्दे 
खुद जिन्दगी मताए. गरेजाँ है आाजकलू। 
जो था जुबान पर वह हवा बनके उड़ गया 
जो दिल में था हक़ीक़ते-उरियाँ है आजकल । 
काँटे किसी के हक़ में किसी को गुलो-समर 
क्या खूब .एहतमामे-गुलिस्ताँ है आजकल । 
है जरसूमेकायनात जो हिन्दू है इन दिनों 
है दाग्रे-जिन्दगी जो मुसलमाँ हें आजकल 
कहते हें जिसको सूरते-आजादिए-वतन 
दर-प्रसख एक पेकरे बेजाँ है. आजकल । 
कुछ रहबराने ख़ास जो मुखलिस हैं वाक़ई 
इनका चिराग़ भी तहे दामाँ है आजकल । 
इससे तो खुदक़शी ही ग़नीमत है ऐ जिगर 
जो मसलहत के पेशए मर्श है श्राजकल । 


काव्य-धारा १८७ 
फिराक़ गोरखपुरो 
पाँच रुबाइयां 
के 9. 
इक नुक्तए तस्वीर तो तस्वीर नहीं 
इक हल्क़ए ज़ंजीर तो जंजीर नहीं 
तक़दीर तो क़ौमों की हुआ करती हे 
इक शख्स की किस्मत कोई तक़दीर नहों । 
(२) 
हर ज़रें से इक दरसे-नुमूं लेता हूँ 
लबरेज कई जामो-सुब्‌ लेता हूँ 
ऐ जानेबहार तुक पे पड़ती हे जब झ्राँख 
संगीत की सरहदों को छू लेता हूं । 
ह ३.३) 
हर साज़ से होती नहीं यह धुन पैदा 
होता हैँ किस्मतों से यह गुन पैदा 
गहवारए तहजीब में सदियों पलूकर 
होता हैँ हयात में तवाजुन पेंदा 
(४ ) 
सहरा में जमाँ मकाँ की खो जाती हैं 
सदियों बेदार रह के सो जाती हैं 
अक्सर सोचा किया हूँ खल्वत में फ़िराक़ 
तहजीबें क्‍यों गुरूब हो जाती हैं । 
अं. 
शायर के तसब्वुरात हैं कितने हसीं 
एक आलमे रंगो-नूर रक्‍सां हे कहीं 
जैसे दमे सुबह लहलहाती किरनें 
जब चूम रही हों वो हिमालय की जबीं 


हा 


श्ष्ष काव्य-चारा 
फ़ज़ अहमद फ़ंज़ 
तोक व दार का मोसम 


रविश रविश है वही इन्तजार का मौसम 
नहीं है कोई भी मौसम बहार का मौसम 
यही जन्‌ का यही तौक़ व दार का मौसम 
यही हे जब्र यही अख्तियार का मौसम 
जहाँ है दिल पे ग़मे रोजगार का मौसम 
है आजमाइशे हुस्ने निमार का मौसम 
यह दिल के दारा दिखते थे यू भी पर कम कम 
कुछ अबके और हे हिज्याने यार का मौसम 
क़फ़स है बस में व लेकिन तुम्हारे बस में नहीं 
चमन में आतिशे गूल के निखार का मौसम 
सबा की मस्तखरामी तहे कमन्द नहीं 
झसीरे दाम नहीं हे बहार का मौसम 
बला से हमने न देखा तो और देखेंगे 
फ़रोगे गुलशन व सौते हजार का मौसम 


& ७ 
इसरारुल हक़ मजाज़ 


आज 


कारफ़र्मा फिर मेरा ज़ोके ग़जलख्वानी हैं झ्राज 

हर नफ़स का साज गर्म जोला अफशानी है ग्राज 
फिर निगाहे शौक की गर्मी हैँ और रूये निगार 

फिर आलूदा इक काफिर की पेशानी हुँ श्राज 
फिर इधर लब पर क़सीदे हें लबो रुख़सार के . 

फिर इधर चेहरे पे ताबानी सी ताबानी हैँ आज 
हुस्न इस दर्जा निशाते हुस्न में डूबा हुआ 

अंखड़ियाँ बेखद शमीमे जुल्फे दीवानी हें आज 
लरजिशे लब में शराबो शेर का तूफान है 

जुबिशे मजगां में अफ़्सू ने गजलख्वानी है आज 


काव्य-धारा श्८६ 


वह नफ़स की जमजमा संजी नजर की गुफ्तग 

सीनये मासूभ में इकतर्फ़ा तुगयानी है आज 
यां बई आलम ग़रूरे सूफ़ियत भी नहीं 

वां जुलेखाई ब अभ्जमे चाक दामानी है भ्राज 
वां इशारे में बहक जाना ही एने होश है 

होश में रहना यक्रीनन सख्त नादानी है आज 
वह लबों से अंगबीं पोने की सरकश आरज 

किस क़द्र आजाद उन जुल्फों की जिन्दानी है आज 
कशमकछ सी कद्ममकश हे हर मजाक़े आशिकी 

कमराँ सी कमराँ हर सई इमकानी हे आज 
हुस्न के चेहरे प हे नरे सदाक़त की दमक 

इश्क के सर पर कुलछाहे फ़र्खे इनसानी हें आज 
शौक से मौक़ाशिनासी की तवकक्‍क़ों भी ग़ाछत 

मेंने उनकी शक्ल भी मुश्किल से पहचानी है भ्राज ।। 


9 
साहिर लुधियानवी 


आहंग इन्क्रलाब 
मेरे जहाँ में समन्‍्जार ढूंढ़ने वाले 
यहाँ बहार नहीं आतकज्ञीं-बगोले हें। 
धुनक के रंग नहीं सुरमई फिजाओं में 
उफक से तात्ा उफक फॉँसियों के भूले हें । 
फिर एक मंजिले खूंबार की तरफ हे रवाँ 
वह रहनुमाँ, जो कई बार राह भूले हें । 
बुलन्द दावए जम्हरियत के पढें में 
फरोग मजलिस-ओ-जिन्दाँ हें ताजियाने में 
बनामे अ्रम्न हें जंगों-जदल के मन्सूबे 
ये शो रे-अदलत तफावत के कारखाने हैं 
दिलों पे खौफ के पहरे लबों पे कुफ्ले-सकत 
सरों पे गर्म शलाखों के शामयाने हें 
मगर मिटें हैं कहीं जब्र और तशद्दू द से 
£ _*- बह फिलसफे कि जिला दे गए दिमागों को 


१६० काव्य-घारा 


कोई सियाह-सितम पेशा-चोर कर न सकी 
बशर की जागी हुई रूह के अभागों को । 
क़दम-क़दम पे लह नज्य दे रही है हयात 
सियाहियों से उलभते हुए चिराग्रों को । 
रवाँ है क़ाफ़िलाएँ इतिक़ाए-इन्सानी 
निजाम-आतिशो-आ्राहन का दिल हिलाए हुए । 
बग़ावतों के दहल बज रहे हैं चार तरफ़ 
निकल रहे हैं जवाँ मशलें जलाए हुए । 
तमाम अजें-जहाँ. खौलता समन्दर हूं 
तमाम कोह-बियाबाँ हें तिछमिलाए हुए। 
मेरी सदा को दबाना तो खेर मुमकिन है 
मगर हयात की ललकार कौन रोकेगा ? 
हसीने आतिशों-आहन बहुत बुलन्द सही 
बदलते वख््त की रफ़्तार कोन रोकेगा ? 
नए खयाल की परवाज रोकने वालो 
नए अवाम की तलवार कौन रोकेगा ? 
पनाह लेता है जिन मजलिसों की तेरा निजांम 
वहीं से सुबह के लश्कर निकलने वाले हें । 
उभर रहे हैं फिजाझ्ों में अहमरी परचम 
किनारे मशरिक और मगरिब के मिलनेवाले हें। 
हजारों ब्रक़॑ गिरें, लाख आँधियाँ उट्द 
वह फूल खिलके रहेंगे जो खिलने वाले हें । 


जगन्नाथ आज्ञाद' 
ग़ज़ल 

जो दिल का राज बे आराहग्रों फ़ुग्गाँ कहना ही पड़ता है 

तो फिर अपने क़फस को अशियाँ कहना ही पड़ता है 
तुझे ऐ तायरे इशाखे नशेमन क्या ख़बर इसकी 

कभी संयाद को भी बागबाँ कहना ही पड़ता है 
यह दुनिया है यहाँ हर काम चलता है सलीक़े से . 

यहाँ पत्थर को भी छाले गराँ कहना ही पड़ता है 


काव्य-घारा 


बफ़ैज़े मसलहत ऐसा भी होता है जमाने में 

के रहजन को अमीरे कारवाँ कहना ही पड़ता हैं 
मुरब्वत की ककक्‍्म तेरी खुशी के वास्ते अक्सर 

सरावे दरत को आाबे रबाँ कहना ही पढ़ता है 
जबानों पर दिलों की बात जब हम ला नहीं सकते 

जफ़ा क्‍यों फिर वफा की दास्ताँ कहना हीं पड़ता है 
न पूछो क्‍या गुजरती है दिले खुद्दार पर भ्रक्सर 

किसी बेमहर को जब महरबाँ कहना ही पड़ता है 


१६१ 


विजय चोहान 


आधुनिक अंग्रेजी कविता 
भारतीय पाठक उन्नीसवों शताब्दी की अंग्र जी कविता के, जिसमें बड़ सवर्थ, शले, कीट्स, 
बायरन, टेनीसन, और ब्राउनिंग जैसे महाकवि हुए, प्रशंसक रहे हैं। प्रशंसक ही नहों, प्राधुनिक हिन्दी 
कविता, या कहें भ्राधुनिक भारतीय कविता पर अंग्रेजी कविता के इस रोमांटिक युग का गहरा 
प्रभाव पड़ा है, श्रोर रवीन्द्रनाथ ठाकुर से लेकर हिन्दी के प्रसाद, पंत श्र निराला तक ने इस 
कविता से प्रेरणा लेकर श्रपने काव्य का रूप-संस्कार किया है। राष्ट्रीय जागृति और मुक्ति-प्राम्दोलन 
के जिस वातावरण में प्राधुनिक भारतोय कविता का विकास हुआ, उसकी उदात्त भावनाओ्रों की 
अनुरूपता हमारे कवियों को अंग्रेजी की रोमान्टिक कविता में मिली। लेकिन श्राधुनिक अंग्रेजी 
कविता ने युद्धोत्तर युरोप के जिस सामाजिक वातावरण में जन्म लिया है उससे हमारे देश की परि- 
स्थितियाँ एक बड़ो सीमा तक विपरीत हें। इस कारण भप्राधुनिक अंग्रेजी कविता भारतीय पाठकों 
को विचित्र-सी लगती है। 
लेकित पाइ्चात्य पाठकों के लिए भी वह विचित्र ही रही है, क्योंकि चोसर से लेकर रोमा- 
न्टिक युग तक की काव्य-परम्परा से झ्रामुल विच्छेद करके आ्राधुनिक अंग्रेजी कविता ने एक नई 
राह पकड़ी है। केवल जान डन, वेवस्टर और सत्तरह॒वीं शताब्दी के श्रन्य श्रध्यात्मवादी कवियों को 
ही टी. एस. ईलियट तथा श्रन्य कबियों ने श्रपनी प्रेरणा का स्रोत माना है, श्रन्यथा समूचो अंग्र जी 
कविता को “बचकाना” 'ऐन्द्रिक' या 'भावुकतापूर्ण' कह कर लांक्षित किया है, यहाँ तक कि मिल्टन 
और शेले जेसे लोकप्रिय कवि भी इस प्रहार से नहीं बच पाये । 
इस परम्परा-विच्छेद के दो मूल कारण बताये जाते हेँ। पहला तो यह कि विज्ञान ने जीवन को 
इतना गतिमय बना दिया है कि भ्रब वड्‌ सवर्य की तरह “शान्तिपूर्ण क्षणों में बीती भ्रनुभूति को स्मृति को 
जगाकर' कविता लिखने का समय नहीं रहा। ग्राम जीवन की निइ्चलता का स्थान नागरिक जीवन के 
कोलाहल ने ले लिया है, नगरों का दृश्य-पट विज्ञान की नित नई ईजादों के कारण निरन्तर बदलता 
श्रौर कृत्रिम बनता जा रहा है। रोमान्टिक कवियों की तरह प्राकृतिक दृश्य श्राज के कवि के सहचर 
नहीं रहे, इस कारण कविता के पुराने उपमान भी भ्राधुनिक जीवन के उपयुक्त नहीं रहे । आधुनिक 
जीवन की श्रभिव्यक्ति का माध्यम बने रहने के लिये नई कविता को पुरानी कविता की भाव- 
संवलित दली और भावुकता को त्याग कर बौद्धिक बनना होगा, क्योंकि आधुनिक जीवन के बेज्ञा- 
निक साधनों के साथ मनुष्य का रागात्मक संबंध भ्रभी नहीं बना है; भौर जब तक वह॒ नहीं बन 
जाता तब तक कविता हरी घास, भरनों , पर्बतों श्लोर सेघों के भावुक ओर काल्पनिक गीत गा कर 
जीवित नहीं रह सकती; परम्परा का पिष्टपेषण जीवन श्र प्रगति का चिन्ह नहीं है। बटर ण्ड रसेल 


काव्य-घारा १६३ 


न अपनी पुस्तक “बंज्ञानिक दृष्टिकोश' में एक स्थान पर प्राघुनिक कवि को कठिनाइयों पर विचार 
करते हुए लिखा है कि पुराने समय में कवि जिस जीवन का चित्रण करता था, वह उस्ते श्नौर उसके 
पूर्वजों तक का जाना-पहुचाना होता था। जिन वस्तुओं के चिर-संसर्ग में उसने भ्रपना जीवन 
बिताया था, उनके विषय में प्रचलित भाषा का शब्द-भंडार भी उतना ही समुद्ध और भावमय होता 
था । लेकिन श्राज यहु स्थिति नहीं है । कवि के सामने भ्राज यह समस्या है कि या तो वह नित्य- 
परिवर्तित भ्राघुनिक जोवन को छुए ही नहीं, या भ्रपनी कविता में देनिक भाषा में से नोरस और 
कर्णकटु शब्दों को भरती करे। तात्पयं यह श्राघुनिक अंग्रंजी कबिता की भाषा शौर शैली को 
विचित्रता, दुरूहता, रसहीनता भर भ्रनगढ़ता का मुख्य कारण पश्राज का यह विज्ञान युग है । 
दूसरा कारण पहले महायुद्ध को बताया जाता है, जिसने पाश्चात्य बुद्धिजीबियों के मन में 
पहले तो नई प्राशाओ्ों का संचार किया ओर बाद में उन्हों भ्राशाप्रों पर निर्भय कुठाराघात किया। 
इंगलेंड भ्रौर फ्रांस की जनता ने जनतंत्र को रक्षा और “युद्धों का प्रन्त करने के लिये युद्ध! के सपने 
जगा कर उस नरसंहार में भाग लिया था। लेकिन ये दोनों सपने युद्धोत्तर राजनीति के यथारर्य ने 
चकनाचूर कर दिये । साथ ही युद्ध ने परम्परागत जीवन की समस्त मर्यादाओ्ों, नेतिक धारणाओं 
झोर धार्मिक भ्रास्याओं को भी तोड़ डाला । युद्ध से लोटे ग्राहत श्रौर विकलाडू सेनिकों की भाँति 
कवियों को पुरानी जीवननिष्ठा, सोन्द्यंबोध झ्लोर भ्रनुभूति भी मर्माहित हो गई झोर उसका स्थान 
प्रनास्था, भ्रनिश्चितता, कुंठा, श्राकुलता ओर मानवद्रोही व्यक्तिवाद ने ले लिया। 
यीट्स ने प्राचीन रोस, शोर ग्रीस को कला झ्ौर सोन्दर्य-प्रियता को तुलना में झ्राधुनिक 
जीवन की छुद्रता को खेद भरे स्वर में व्यक्त किया--- 
“परम्पराएँ टूट रही हैं, संसार में घोर अशान्ति है, 
रक्त की नदियाँ बह निकलीं, जिसमें मानव की निर्दोषता डूब गई हे 
बुद्धिवादियों के पास आस्था नहीं, बुद्धिहीन अन्धी कट्टरता में फँसे हें /? 
योट्स बीसवों शताब्दी के संभवतः सबसे बड़े अंग्रेजी कवि हें । उन्होंने महायुद्ध से पहले 
प्रायलेण्ड को लोक-परम्परा के पुनरुत्थान में योग दिया था, बेन तो झ्राधुनिक काव्य को रसहीन 
भ्रोर बोद्धिक बताने के लिये दिये गये “बंज्ञानिक यथार्थ” के तर्क से सहमत थे, शोर न युद्ध को कारण 
मानकर भ्रनास्था और अ्रवंतिकता के पक्षपाती बन सके, उन्होंने लिखा है 'मेरी पानी को परिभाषा, 
वैज्ञानिकों को परिभाषा से भ्रलग है । मेरा पानो उस श्ञान्त सरोवर का जल है, जिसमें रंगबिरंगी 
मछलियाँ तेर रही हों ।” यीट्स ने यह भी कहा कि “काव्य कवि के व्यक्तित्व की श्रभिव्यक्ति 
(जैसा कि नये अ्रनास्थाशील कवि प्रतिपादित कर रहे थे) बल्कि एक श्राध्यात्मिक क्रिया है जिसमें 
कवि के प्रात्म-विकारों का प्रशमन होता है । व्यक्तिगत जीवन में कवि चाहे कितना ही छुद्र क्यों 
न हो, लेकिन उसकी रचनाएं महान भ्रोर उदात्त हो सकती हैं । 'झ्रात्म और श्रनात्म' के इस संघर्ष 
को यीट्स ने इस प्रकार व्यक्त किया है-- 
आत्म--यथार्थ को दूँ ढो, प्रत्यक्ष को छोड़ो ! 
हृदय--क््या कहा ? फ़िर गीत कोन-से गायें ॥ 
( भ्रन्तंद्न्द् ) 
प्राधुनिक सम्यता पर व्यंग्य करते हुए यीट्स ने लिखा-- 
“आधुनिक सिंहासन पर बेठ कर सरस्वती के स्वर बन्द हो जाते हैं ।” 
“मैं अतीत के गीत गाता हूँ, मुके आपकी सफ़लताओं से डर लगता है ।”” 


१६७ आधुनिक अंग्रेज़ी कविता 


में यहाँ यीट्स के नियतिबाद का उल्लेख आवश्यक समभती हूँ, वे पूरी तरह युद्धोत्तर 
कालीन कविता की श्रनास्था और निराशा के स्वर में स्वर मिलाकर नहीं गा सके, यहाँ इतना 
जानना ही पर्य्याप्त है । 

बिल्फ्रेड श्रोवेन, सिगफ्रिड सेसून, झौर रूपर्ट ब्रुक ने युद्ध को नज़दीक से देखा-पहचाना 
था। श्रोवेन ने भ्रपने कब्ििता-संग्रह की भूमिका में लिखा, “इस संग्रह में कवितायें नहीं हैं इसका 
विषय है, युद्ध और युद्ध की विभीषिका । इस विभीषिका में ही सारी कबिता छिपी है ।” 

“यदि भविष्य में इस हत्याकांड की पुनरावुत्ति न हुई तभी हम समभेंगे कि हमारा दुःख 
दर्द सार्थक हुआ ।” 

सिगफ्रिड संसून ने युद्ध का गौरव गाने वालों को धिक्‍्कारा -- 

“मूर्खों ! तुम युवकों को मार्च करते देखकर जयकार करते हो, 

फिर घर में दुबक कर प्रार्थना करते हो 

तुम उस नकें को क्या जानों, द 

जहाँ यौवन और हँसी जलकर भस्म हो जाती है |? 

एक और उदाहरण देखिये-- 

ओ जुमन माँ ! 

तुम अंगीठी के पास बेठी अपने बेटे के लिये ऊनी मोजे बुन रही हो, 

तुम्हें क्या पता, 

तुम्हारा बेटा इस समय, 

किसी सखँंदक में ओंधा पड़ा है। 

विल्फ्रेड श्रोवन ने युद्ध के प्रशंसकों की भर्तंसना कौ-- 

काश ! तुम वहाँ मौजूद होते, 

जब हम लोगों ने उसकी तरुण देह को गाड़ी पर लादा था | 

काश / तुम भी उसकी निष्थाण पुतलियों को देखते, 

तो फिर इतने जोश से बच्चों को युद्ध की कहानियों न सुनाते ।”” 

युद्ध की विभीषिका ने इन कवियों के स्वप्न भंग कर दिये और इससे उनके मन में जो 
कटुता आई, वह कविताओं के रूप में व्यक्त होकर भी मानववादी पथ का अनुसरण कर 
सकती थी। श्र ग्र जी कबि श्ौर उनकी कविता युद्ध के मूत्त कारणों का मूर्त और भावसय उद्घाटन 
करके मनुष्य की चेतना को गहरा बना सकती थी, ताकि इतने भीषण नरसंहारों के श्रायोजनों को 
रचने वाले केवल कुछ श्राकर्षक नारों का प्रचार करके लोगों में मिथ्या भ्रम और सपने न जगा 
पाते, और मनुष्य अपने भविष्य में पूरी श्रास्था रखकर शान्ति-संस्थापन के संघ में भाग लेते । 
लेक्षिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ । जिन कवियों ने युद्धोत्त-कालीन कविता के मंच पर श्रपता 
पूरा श्रधिकार और प्रभाव जमा लिया, वे जीवन का एक दूसरा दृष्कोण लेकर सापने श्लाये थे । - 
उनकी चेतना पर फ्रायडीय मनोविज्ञान से लेकर, कंथोलिकमत ओर नीत्शे के प्रतिक्रियादी 
विचारों की छाप थी, जिसके कारण वे झ्राधुनिक सभ्यता के हृवास को ही समग्र मानव-जाति के हास 
का प्रतीक मान बंठे । डी. एच. लारेन्‍्स के विचार में श्राधुनिक सभ्यता की थोथी पोलिश मनुष्य को 
पौरुषहीन बना रही है, जिससे उसके मन में अनेक ग्रन्थियां पड़ जातो हूँ, भ्राधुनिक संस्कृति कृत्रिम 
है भोर सनुष्य को सहज वृत्तियों के विकास में बाधा डालती है। लारेन्स के “श्रकृति की श्रोर लोढ 


काव्य-घारा १६५ 


चलो' का नारा दिया या | उस को दृष्टि में प्रकृति का का प्रर्थ है, योन सम्बन्धों को स्वच्छन्दता । 
लेकित झ्ाधुनिक अंप्रेली काव्य का रुप-निर्धारण वास्तव में एज़रा पाउंड शोर टी. एस. 
ईलियट ने किया । एज़रा पाउंड ने एक प्रारंभिक कविता में लिखा--- 
“है ईंख़र ! हे ठगों के देवता मर्करी ! 
मुझे एक तम्बाकू की दुकान खोल दो! 
में लेखक बनने से बाज आया ! 
यहाँ दिन-रात मगजुफच्ची करनी पढ़ती हे।”? 
एकरा पाउंड ने सबसे पहले कविता में शहरी और टकसाली भाषा का प्रयोग किया । 
पाउंड क्षद्र विचारों को भी दाहंनिक ढंग से कहने का प्रयास करता है, लेकित उसका जीवन-दर्शन 
बोसीदा झ्ोर मानवद्रोही है । पाउंड को कविता में एक ऐसे श्रनास्थाहीन व्यक्ति का श्रोछापन है 
जो किसी वस्तु को पवित्र नहीं समझता, जिसने मानवीय शील झोौर मर्यादात्नों को तिलांजलि दे दी 
है। झ्पनी प्रसिद्ध कविता में 525(7773 :3](४०7६ में दांते का उद्धरण देकर दाइंनिक बनने 
का उसने ढोंग रचा है, किन्तु स्पष्ट शब्दों में युद्ध की हिमायत की है--- 
“माढ़ में जाओ सब ! हमारे दक्षिणी प्रदेश में शान्ति की दुर्गन्‍्ध आती हे । 
अबे सर के बच्चे पेप्रियोल्स, श्धर आ.......... 
मुक्के केक्‍्ल तलवारों की खड़ खड़ में ही जीवन का आभास होता हे |” 
टी. एस. ईलियट ने एसरा पाऊन्ड को भ्रपता साहित्यिक ग्रृुद माना और उसे “वर्तमान 
यूग का सबसे बड़ा जीनियस' कहा है । ईलियट को सबसे प्रसिद्ध रचना “दी वेस्टलेंड' (ऊसर भूमि) 
है । इस लंबी कविता में श्राधुनिक युग के नेतिक पतन, खोखलेपन, निष्प्रयोजनता और श्राध्यात्मिक 
झुंठा का नग्न चित्रण है। ऊप्तर भूमि एक संतप्त देश है, जिसके निवासी पानी की कम्तो से भ्रभि- 
शप्त हैं । भ्रपने पापों के फलस्वरूप उन्हें तड़प-तड़प कर मरना पड़ता है । इस भूमि का ऊसरपन 
श्राष्यात्मिक है। पृष्ठभूमि में सूखी चट्टाने हें । इस संतप्त देश का वर्णण ईलियट कभी निराश्ञा से, 
कभी विक्षिप्त होकर और कभी दाशंनिक ढंग से करता है । कयावस्तु प्राचीन ईसाई “ग्रंल की गाया' 
से ली गई है । ऊसर भूमि के निवासी भ्रास्थाहीन, दुराचारी और दुर्बंलमन हें । उनकी इच्छा-शक्ष्त 
को लक़वा मार गया है । वे चाहते हुए भी अ्रपनी इच्छाग्रों को कार्यरूप में परिणत नहों कर पाते । 
एक शज्ञात निरंकता की भावना उनके व्यक्तित्व को कुंठित भ्रोर क्षुद्र बनाये हुए है। वेस्टलेंड एक 
विद्याल रेगिस्तान है जिसमें हरियाली का नाम-निश्ञान नहीं । ऊसर भूमि के अभागे निवासी यह 
नहीं जानते कि पानी उनके कितना नज्ञदीक है (श्रर्यात्‌ उनकी मुक्ति कितदी सरल है। ) 
ईलियट ने दिखाया है कि धनोपारजन झ्ौर सेक्‍स की इस युग की मुल्य प्रवृत्तियाँ हें, लेकिन 
इल प्रवृत्तियों से झ्रात्मा को शांन्ति नहीं मिलती और सत्य की उपलब्धि नहों होती (भ्रर्बात्‌ भौतिक 
समृद्धि और यौत-स्वच्छंदता से ऊसर देश को मुक्ति नहीं हो सकती, जो कि लारेंस के जीवन-दर्शन 
को ग्रालोचना है ।) 
ऊसर देश को मुक्ति दया और प्रेम से हो संभव है, लेकिन सारे ऊसर देश में मुक्ति ;त को 
एक भी ऐसी स्त्री नहीं मिलती जिसका प्रेम वासना भर पाप को छाया से मुक्त हो । इस कविता में 
कई स्त्रियाँ आतो हैं, फूलों और गहनों से लदो रूपगविता साम्नाज्ञियाँ झौर आधुनिकाएँ जो दिन भर 
मनोरंजन श्र श्ृंगार में ही लगी रहती हें। जिनके जीवनमें एक ही गंभीर समस्या है--“कल में भप्रपने 
बाल किस ढंग से सेंवारुंगी । कल क्या करूँगी ?” एक घरेलू स्त्री है जो घरेलू क्षुद्रताप्रों में प्राकंठ 


१६६ आधुनिक अंग्रेजी कविता 


ड्बी है भ्रौर जो युद्ध से लोटे पति का ठीक से स्वागत नहीं कर पाती । एक टाइपिस्ट लड़को है जो 
बेंक के कल को श्रात्मसमर्पण करती है--लेकिन उसके आत्म-समर्पण में प्रेम नहीं, बासनाजन्य 
यां त्रिकता है । ईलियट ने उस क्षुद्रता का मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है जो चरित्रहीनता से श्राती 
है । उसे मनुष्य की 'खोई हुई भ्रबोधता' पर विक्षोभ है। टेम्स नदी लाज्ञों से पटी है, इसी टेस्‍्स के 
किनारे कभी सम्नाज्ञी एलिज्ञाबेथ और लार्ड लीसेस्टर का प्रेमालाप हुआ था । लेकिन टेम्स का गौरव 
नदी की पुत्रियों के रोदन में बदल जाता है । 

ऊसर भूमि की शुष्कता बढ़ती जाती है । पबंतों पर बादल गरजते हैं, लेकिन वे वर्षा के 
बादल नहीं । स्थिति की विडंबना को झौर गहरा बनाने के लिये एक पक्षी का टप-टप-टप शब्द 
सुनाई देता है । श्राख़िरकार मुक्तिदृत नदी में क्दकर श्रात्महत्या कर लेता है । उसकी मृत्यु पर 
रोनेवाला भी कोई नहीं । पूंजी, सेक्स और साहस के टोटके श्रसफल हो जाते हे। सहसा बादलों के 
गर्जन में उपनिषद्‌ का यह वाक्य सुनाई देता है। “दत्ता, दयावान, दम्पत' (दान, दया, संयम) 

कविता के एक भाग में भगवान बुद्ध के उपदेश हें । वासना के नकंकुंड में जलती हुई 
श्रात्माश्रों को बुद्ध का संदेश है, “अपने ऊपर संयम रखो !” लेकिन लोगों के स्वार्थ की श्रादतें पक 
चुकी हें, व्यक्षितवाद ने उन्हें इतना श्रहंप्रिय बना दिया है कि वे भ्रपने घोंधे से निकलकर एक दूसरे 
का दुःख नहीं बटाना चाहते । 

प्रफ़ोक का प्रेम-गीत' ईलियट को सबसे पहली महत्वपूर्ण कबिता है। ऊसर देश की तरह 
इस रचता का भी झाधुनिक कवियों पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। इसमें ईलियट ने स्वीनी नाम के 
एक दुराचारी ओर क्षुद्र व्यक्ति के वासनापूर्ण प्रेम-संबंध को दिखाकर क्लासिकल सौन्दर्य और आधु- 
निक जीवन की भश्राचारश्रष्टता का वेषम्य चित्रित किया है। प्राचीन प्रेम-गाथा्रों की बुलबुल का 
मधुर संगीत स्वीनी के लिये नहीं है । वह श्रपनी साधारणता में तंग है, फिर भी वह अ्रपनी देनिक 
क्षुद्रताओों से ऊपर नहीं उठ पाता--वह अपने से पूछता है, “क्या संसार के विधान में हस्तक्षेप करने 
साहस मुभमें है ?” वह झ्पने जीवन को “काफी के चस्मचों में नाप चुका है।' उसके सामने एक 
ही समस्या है-- 

“में बूढ़ा हो रहा हूँ, 

क्या म॒झे अपनी पतल्बून मोड़ कर पहनना चाहिए ? 

बालों में माँग कैसे काढ ? क्‍या नाशपांती खाना ठीक रहेगा ? 

में सफेद फूलालेन की पतत्तून पहनकर समुद्र के किनारे घूमने जाऊँगा-। 

सुनते हैं--समुद्र की परियाँ अलौकिक संगीत सुनाती हें । 

लेकिन में जानता हँ--वह संगीत मुझे सुनाई नहीं देगा |? 

इसी कुंठा और प्रयोजनहीनता का एक चित्र वेस्टलेंड में मिलता है। मनोरंजन के साधन, 
शतरंज का खेल ओर रेस्त्रां बन्द हो जाने के बाद आधुनिक व्यक्तित सटपटाता है। वह कोरे शब्दों 
का भ्राश्रय लेता है, 

“गुडनाईंट बिल, गुडनाइट ल्ू,गुडनाइट मे, गुडनाइट 

टा / टा/ गुडनाइट ! गुडनाइट /! 

गुडनाइट, ग्रिय महिलाओ /?? ( बेस्टलेंड ) 

श्राधुनिक चेतना में जो भय, विक्षिप्ति और श्रनास्था व्याप्त है, जिसमें व्यभिचार, श्रूण- 
हत्या और स्वार्थलोलुपता का बोलबाला है, उसका ईलियट ने विशद चित्रण किया है। 


काव्य-धारा १६७ 


'ऊसर देश' में ईलियट ने एक नये टेकगीक का प्रयोग किया । भप्राधुनिक चित्रकला को भाँति 
कविता में भी तीनों सिम्तें ([]7722 0[7727570775) पैदा करने को कोशिश को, जिसमें परं- 
परागत एक-देशीय सामंजस्य नहीं है, बल्कि भ्रनेक पहलुओं से ययार्थ को चित्रित करना चाहा है । 
जेम्स जॉयस ने भी इस टेकनीक का प्रयोग झपने प्रसिद्ध उपन्यास “युलिसिस' में किया है, उसमें 
निस्‍्त सध्यवर्गोय युवक की चौबींस घंटे को खिन्दग्री का प्रत्यन्त विस्तुत विवरण है। “ऊसर देश' 
में भावों का वेविध्य है, भ्रतीत की परंपरा श्रौर श्राधुनिक जोवन की कुत्सा, काव्य के सुनहले- 
प्रादर्श भ्रौर जीवन के ययार्य का वेषस्य दिखाने के लिये ईलियट ने श्रनेक लेखकों झ्ौर पग्रन्यों के 
उद्धरणों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है । 'ऊसर देश' का हर वाक्य एक दृश्य-चित्र है श्रोर चित्र- 
पट के दृश्यों की तरह इस कविता के दृश्य भी बहुत जल्दी बदलते हें । पाठक को उनमें भ्रक्सर कोई 
संगति झौर तारतम्य नहीं दिखाई देता फिर भी सम्पूर्ण कबिता में एक संगति है । 

ईलियट ने भ्रपने एक लेख ( ड्राइडन को श्रद्धांजल ) में लिखा कि प्राधुनिक सम्यता 
संहिलिष्ट है, इसलिए कवि को भी भअ्न्योक्ति कथन द्वारा संहिलष्ट चित्रण करना चाहिए । यदि 
भ्रावश्यकता पड़े तो भाषा को तोड़ने-मरोड़ने से हिचकिचाना नहीं चाहिए । सत्रहवीं शताब्दी के 
कवि जॉन डन झौर अपने समकालीन कवि एज़रा पाउण्ड की तरह ईलियट को भाषा भी दुरूह और 
ब्लिष्ट है । बहुधा विषम झ्ौर विरोधी चित्रों के प्रयोग से यह दुरूहता और भी बढ़ जाती है । यह 
स्वाभाविक ही था क्‍योंकि शब्द को माध्यम या साधन न मानकर साध्य मान लेने से कवि शब्दों 
को दासता से मुक्ति नहीं पा सकता, विशेषकर तब तो और भी जब उसके पास कहने को नया 

नहो। 

कर ईलियट ने पाउण्ड से भ्रम्य कवियों की रचनाओं के उद्धरण लेना सीखा । पाठकों को यह 
जानकर आइचय होगा कि वेस्टलेंड में पेंतीस कवियों के उद्धरणों भ्लोर छे विदेशी भाषाझ्रों का 
प्रयोग किया गया है, जिनमें उपनिषद्‌ से लेकर झाधुनिक मनोविज्ञान के पारिभाषिक शब्द भी 
सम्मिलित हें । कुछ झालोचकों ने ईलियट पर आरोप लगाया है कि उसको कविता को समझने के 
लिए विश्वकोष का साय रखना ज़रूरी है। स्वयं ईलियट ने भी सुराया कि जेसी बेस्टन की प्रसिद्ध 
पुस्तक "77077 रि(ए४ ४० रि०77»7८2' को पढ़े बग्रेर वेस्टलेण्ड समर में नहीं श्रा सकती । 
ईलियट की क्लिष्टता के विषय में एक अंग्रंज्ञ ्रालोचक ने कहा था : 

“में कई दिनों से ईलियट के नाटकों की प्रशंसा सुनता झ्राया हूं, लेकिन झ्राज तक किसी 
लेखक ने यह बताने का कष्ट नहीं उठाया कि ईलियट की रचनाझ्रों की विषय-वस्तु क्‍या है ? 

ईलियट को शब्दों को ध्वनि से मोह है न कि उसके पीछे छिपी श्रनुभूति से । काब्यानुभूति 
को कमी वह भ्रन्य प्राचीन कवियों के उद्धरण लेकर पूरी करता है । इसीलिए प्राचीन साहित्य से 
झयरिचित पाठकों को ईलियट की रचनाएं स्वतंत्र श्लोर मोलिक दिखाई देती हें । स्वयं ईलियट ने 
इस रचना-पद्धति का समर्यन किया है--“नोसिखिये कवि नक़ल करते हैं, भौर प्रौढ़ कवि चुराते हें।'” 

ईलियट का जीवन-दर्शेन मानवद्रोही और भ्रनास्थावादी है। भ्रभिशप्त मानवता के लिए, 
इसमें झ्ाशा को कोई किरण नहीं । वर्तमान युग के बुर्जजा जीवन-मूल्यों श्रौर संस्कृति के बिघटन 
झौर कुत्सा का चित्रण करने में वह भ्रवश्य सफल हुआ है, लेकिन कविता केवल सफाई के इन्स- 
पेक्टर की रिपोर्ट मात्र नहीं होती । ईलियट को साधारण जनता से कोई सहानुभूति नहों, वह उसे 
'रेबड़' कह कर पुकारता है । बुर्जजा समाज और संस्कृति के विघटन के बावजूद साधारण जनता में 
भावी जीवन को भ्रधिक मानवीय झौर संस्कृत बनाने के लिए जो प्राकाक्षाएँ इस युग में जाग्रत हुई 


श्ध्८ आधुनिक अंग्रेज़ी कविता 


हैं, ईलियट उनको भय को दृष्टि से ही देखता है। उसका कहना है कि जनतंत्र में संस्कृति का दम 
घृट जाता है ।' झ्राधुनिक बुर्ज्वा संस्कृति के ह्ास का कारण भी उसे जनसंत्र ही दिखाई देता है । 
बह खुले शब्दों में फासिज्म का (विशेषकर फ्रान्सीसी ढंग के) समर्थन कर चुका है। श्रालोचक के रूप 
में ईलिपट घोर प्रतिक्रियावादी है। मिल्टल, डिकन्स, इहले, ज्योर्ज ईलियट, हाडों, बन्सं, वेल्स, शो 
जैसे विश्व-विख्यात साहित्यकारों पर उसकी श्रपमानजनक टिप्परियाँ किसी भी भाषा श्रौर जाति 
के लिए कलंक हें । 

ईलियट भ्रपनी रचनाश्रों में धर्मान्धथता (केंथोलिक मत श्रौर धर्म-संस्था) भौर सामन्तवाद का 
(शासनकर्त्ताओं के वंशानुगत श्रभिजात वर्ग के रूप में, जिसमें कवि भी शामिल हैँ) प्रचार करता 
है। उसके विचार में 'उदारपंथी दृष्टिकोण ही मानवजाति की मुसीक्तों की जड़ है ।” 

“दुख कल्याणकारी है, जाति द्वेष संगतिपर्ण है ।” 

“फेंसिज्म सत्य है”, स्त्रियों को घर की चहारदीवारी के श्रन्दर रहना चाहिए”--इस प्रति- 
क्रियावादी विचारपूंजी को लेकर कोई भी कवि गुमराह हो सकता है । 

प्रस्तुत लेख में ईलियट को इतना महत्व देने की श्रावश्यकता इसलिए पड़ी कि आधुतिक 
अंग्रेज्नी कवि एक वड़ी सीमा तक ईलियट की विचार-परिधि के भ्रन्दर ही कुछ हेर-फेर से चक्कर काटते 
झाये हैं। यह ठीक है कि किसी ने प्रचलित श्रतास्था श्रौर कुंठा के एक पहलू को श्रधिक चित्रित 
किया है, तो दूसरे ने किसी भ्रन्य को, लेकिन समग्र रूप से श्रॉडेन, स्पेम्डर, लुई, सेकनीस, सेसिल डे 
लुईस, एडवेन म्थोर, यहाँ तक कि एक हद तक एडिय, सिटवेल और क्रिस्टोफ्र फ्राई भी इस 
व्यापक प्रवृत्ति के शअ्न्तर्गत ही श्राते हैं। सन्‌ २०-४० के दकश्षक में अंग्रेजी साहित्य के पाठकों को 
भ्रम हुआ था कि शायद श्ॉडेन-स्पेन्डर श्रादि ने श्रपनो धारा बदल दी है श्लोर वे ईलियट की विचार- 
सीमाग्रों का उल्जंचन करके विश्व की संघर्बंशील जनता के शान्ति श्रोर जनवाद के संघर्ष में कूद 
पड़े हें झ्नौर मनुष्य की प्रगतिशील श्राकांक्षाओं को भ्रभिव्यक्षित देने लगे हें। यह भ्रम निराधार नहीं 
था, क्योंकि इनमें से कई कवियों ने स्पेन के गह-युद्ध में जनतंत्रवादियों की ओर से भाग भी लिया 
था। किन्तु यह एक सामयिक उच्छवास सात्र निकला । वास्तव में यदि देखा जाय तो जीवन-वास्तव 
के प्रति इत कवियों का दृष्टिकोरण उन दिनों भी मूलतः श्रदास्थापूर्ण और कुंठाग्रस्त ही बना रहा । 

झ्रॉडन ने अपनी प्रारंभिक रचनाश्रों में यूरोप के सांस्कृतिक ह्वास का चित्रर्ण करते हुए 


भविष्यवाणी की थी कि पुराना जीण्णशीर्ण समाज श्रधिक देर तक नहीं टिक सकता, वह श्रपनी 
प्रन्तिम साँसें गिन रहा है--झाडेन की कविता में महामारी शोर सड़ाँध के चित्रों का बहुत प्रयोग 
है, क्योंकि समाज में “लक्षवा, केन्सर (तासूर) और अपराध भरा पड़ा है” । झाडेन इस ह्ास की 
प्रक्रिया से आतंकित और त्रस्‍त है। उसकी कविता में त्रास और चिन्ता है, न कि श्राशा का 
उन्मेष । पुराने के ध्वंत्त के बाद उसे कोई आशा दिखाई नहीं देती । वह स्वस्थ मानव-प्रेस के गीत 
भो नहीं गाता । उसे “इंजन ड्राइवरों और फेंक्टरी में काम करने वाली छोकरियों' घुणा है, क्‍योंकि 
वे “बुद्धिजीबियों के शत्रु हें ।” सन्‌ १६३६ में भ्राडेन ने लिखा कि “इंगलेंड के निर्धनभ लोग मस्द- 
बुद्धि और व्यर्थ के जीव हें ।” “दी डबल मेन! (१६४१) में आाडल ने लिखा कि “कला की जीवन 
की समस्याओं से कोई सम्बन्ध नहीं ।” वह मानव जाति को मूर्ख, सहज-विश्वासी और शअ्रइ्लील 
समभता है श्र उन लोगों को कल्पना बिलासी (यूरोपियन) मानता है, जो स्थायी सुख, सर्वंसाधा- 
रण के लिए विटामिन और सार्वजनिक शिक्षा की कल्पना करते हैं । 


ध 
अ 
रु 


काव्य-घारा १६६ 


स्पेम्डर ने एक कविता में लिखा : 

“रेल्ों और पूंजी का शोर है । 

भोजन, एक्सचेंज, डिकेट, सिनेमा, रेडियो... ... 

सबसे बड़ी कुरीति शादी की है। 

हमारी नींद हराम हो गई है...... 

लुई मेकतोस भी “जाज के संगीत भ्रौर गितार से तंग झा गया है । वह उन लोगों को 
क्षुद्र समझता है जो “जायदाद"''चांदी के चम्मच'''झोर डिनर को घंटी“ के बग्नेर खिन्‍्दा 
नहीं रह सकते; क्योंकि “जीवन को ये सुखद वस्तुएं भ्रम्त में जहर भ्रौर पीप बन जाती हैं।' एक झोर 
कवि ने लिखा है-- 

तुम्हारी सभ्यता क्या है ? 
इश्तह्ारबाजी' * 'नालूर ओर पायरिया 

सेसिल डे लुइस ने झ्रारस्म में कवि के सामाजिक दायित्व पर जोर दिया, लेकिन धीरे-धीरे 
बह भी इलियट की तरह दुरूह होता गया । भ्रपनी प्रसिद्ध श्रालोचता पुस्तक '23 77092 6007 ?0७४- 
(79 में” लुइस ने लिखा, "कविता समभने के लिये भी उतना हो मनोयोग, ट्रेनिंग भ्रौर सब्र चाहिये 
जितना कि कविता लिखने के लिये, भ्र्यात्‌ कबिता केवल सुसंस्कृत भ्रौर भ्रभिजातबर्ग के लिये है, 
साधारण लोग उसे नहीं समझ सकते, कविता गणित नहीं एलजब्रा है ।' 

लुइस को कविता भी आध्यात्म के दलदल में घंसती गई, यहां तक कि वह मुत्यु भौर 
युद्ध को माल्यस की तरह महान शोधक शक्ति सानने लगा। उसने इस मुत्यु-कामना को ')५८७ 
श्छआा 5 टिए८' नाम की कविता में इस प्रकार व्यक्त किया है-- 

मनुष्य के अभिशाप से हम बैधे हैं-- 

अपने भविष्य में जो रहने के लिए, जो निश्चय ही 

अपनी मत्यु के लिए रहना हे--इसी कारण हम वर्तमान 

का आलिंगन स॒ह लेते हें, 

लेकिन अपने से इतर की कामना करते हुए । 

इस प्रकार की मुृत्यु-कामनाएँ श्राधुनिक अंग्र जी कविता में विरल नहों हें। जोबन को 
निरर्थंक मानकर चलने पर “वर्तमान के लिए जीवित न रहने' ओर मृत्यु को कामना करते रहने को 
प्रवृत्ति स्वयं हो प्रबल हो जाती है । 

'साहित्य जीवन की श्रालोचना है'-- इस परिभाषा के श्रनुसार पझ्राधुनिक अंग्रंजी कविता 
को, उसमें व्यक्त घोर अ्रनास्था, कुंठा त्रास भ्रोर नेराश्य के बाबजूद ह्रासोन्‍्मुखी बुर्ज्वा समाज को कड़ी 
प्रालोचना कहने में भी भ्रौचित्य होता, यदि यह गझ्रालोचना साधारएा जनों के दृष्टिकोण से की 
गई होती । लेकिन भ्रधिकांशतः यह भ्रालोचना एक ऐसे दृष्टिकोण से की गई है, जो सामाजिक 
जीवन की प्रगति के लिए घातक है। उदारपंथी विचार-धाराप्रों श्रोर जनतांत्रिक पद्धतियों का 
व्यंग भर एक वंशान॒गत भ्रभिजात वर्ग की भ्रकांक्षा श्राधुनिक भ्र ग्रेजी कविता के दृष्टिकोण श्रोर 
उसको विचार-वबस्तु में कोई ऐसा मानवीय तत्व रहने देती जिससे इस कविता को एक भ्रालोचनात्मक 
सामाजिक दस्तावेज का दरजा भी दे सकें। काव्यत्व तो उसमें नहीं के बराबर है ही, चाहे 
भाषा पहले से समृद्ध भ्रोर शब्दावली भ्रधिक संयत, नपी तुली श्लोर बोद्धिक क्‍यों न हो। 


न 


२०० आधुनिक अंग्रेज़ी कविता 


एडिथ सिटबेल, एडबिन म्योर और क्रिस्टोफर फ्राई को कविताश्रों का स्वर इतना मानव-द्रोही और 
कुंठाग्रस्त नहीं है। एडिथ को जीवन के उल्लास श्रौर ध्वनि से प्रेम है। उनकी कविता में उतनी 
निराशा भी नहीं है, बल्कि कहीं-कहीं संगीत शोर रंगों की छटा का कौशल है। एक वृद्धा स्त्री 
(१६४०-४५) का चित्र है : 
में वृद्धा हैँ, मेरा हृदय सूरज की तरह है 
जिसने जीवन में बहुत दुख देखा हे 
फिर भी उसकी चमक में अन्तर नहीं आया |”? 
एडबिन स्योर नये “गृहविहीन' युग का प्राणी है। उसकी कविता में पर्याप्त बौद्धिक गहराई 
है, भौर वड्‌ सवर्थ जेत्ती सरलता श्लौर ईमानदारी भी है । उसने श्रपनी कविता में जीवन के नेतिक 
मलयों को एक दस तिलांजलि भी नहीं दी । जिन कवियों ने ईलियट से प्रेरणा लेकर भी ईलियट से 
विद्रोह किया, उनमें क्रिस्टोफ्र फ्राई प्रमुख है। उसके काव्य-नाटक प्रसिद्ध हें। उनकी शेली सरस श्रौर 
रोचक है। उसने जीवन के श्रनेक सजीव कल्पना-चित्र खींचे हें : वीनस भ्राब्जब्ड में ड्यूक कहता है-- 
“हम भविष्य की ओर जा रहे हैं 
पृथ्वी के सातों समुद्र, आकाश गंगा, प्रातः संभ्या 
सभी भविष्य के गर्भ में छिपे हैं 
अतीत में तिवा अतीत के कुछ नहीं 
रोजबेल ! जाओ /! तुम भी संसार के साथ आनन्द मनाओ !”” 
श्राधुनिक अंग्र जी कविता में जीवनोन्मुखी, मानवतावादी प्रवृत्ति भ्रभी पूरी तरह उभर नहीं 
पायी । श्रभी तो भ्रनस्था और मानवद्रोह की प्रवृत्तियों का ही जोर है (जिसका श्रनुकरण हिन्दी में 
भी इधर होने लगा है, यद्यपि यहाँ की परिस्थिति में इस तरह का मानवद्रोही स्वर बेसुरा ही नहीं 
भ्रराष्ट्रीय भी लगता है) । 
भ्रन्त में में केवल इतना कहूँगी कि झ्राधुनिक अंग्रेजी कवियों के भाषा-प्रयोगों और शेली 
से मुझे विशेष श्रापत्ति नहीं । इन प्रयोगों ने अंग्रेजी भाषा की श्रभिव्यंजना शक्ति को बढ़ाया है, 
झौर इस प्रकार यह विकास ही कहा जायगा। मुझे यदि श्रापत्ति है--श्रौर में समभती हूँ कि मेरे 
जेसे भ्रसंख्य स्वस्थमना पाठक भी ऐसा श्रनुभव करते हें---तो उनके मानवद्रोही जीवन-दर्शन और वर्त- 
मान जीवनके प्रति भ्रनुत्तरदायित्व की भावना पर । वे श्रपने मानवद्रोह के लिए भ्राधुनिक विज्ञान और 
युद्ध के जिम्मेदार ठहराते हें । यह एक विवित्र तर्क है, जिसमें ईमानदारी की गन्ध नहीं है । इस युग 
के ही वेल्स श्लोर शा को विज्ञान श्रौर युद्ध मानवद्रोही नहीं बना पाएं, बल्कि मानव-जाति 
को समृद्ध और संस्कृत बनाने में विज्ञान ने जो योग दिया है, उसको उन्होंने सराहा । विज्ञान 
झौर कला को परस्पर-विरोधी रूप में देखना श्रपने मानवद्रोही दृष्टिकोण के लिए श्चित्य खोजना 
भर है। विज्ञान और युद्ध की विभीषिका श्राधुनिक कवि की मानवता को चुनोती थी, किन्तु उसने 
इस चुनौती को स्वीकार न करके मानव-मात्र से ही द्रोह करने की ठान ली। 
मेरी दूसरी श्रापत्ति यह है कि “परम्परा की रक्षा” का नारा उठाते हुए भी इन कवियों ने 
झधिकतर काव्य की मानवादी परम्परा से द्रोह किया है। वे परम्परा के नाम पर केवल औपचारिक 
रूप से फभी रोम के प्राचीरों की शरण लेते हैँ, कभी मेक्सिको की गुफाओ्ों की और कभी उद्ध रखों 
की । शब्दों से जूकते-जुभते सचमुच वे इलियट की तरह शब्दों के दास हो गये हें । भ्राज की विक्लुब्ध 
मानवता के लिए उनके पास कोई सन्देश या नई शअ्रनुभूति नहीं है । 


जी 3 5. ३ जे के शी जी अरकलन लिन नमकीन नरम 


सम्पादकीय 


कविता में 'प्रगति' और “प्रयोग” की समस्या 


हिन्दी कविता में 'प्रगति' भ्रोर 'प्रयोग' शब्दों का इस्तेमाल लगभग दस-पन्द्रह वर्षों से होता 
भरा रहा है--आ्रायः इस रूप में जेसे ये दोनों सर्वया भिन्‍न वस्तुएं हें। हमारी साहित्यिक विचारणा 
में इत शब्दों को इतनी धूमधाम से प्रवेश कराने वाले चिन्तकों ओर रचनाकारों के श्रपने-प्रपने 
झ्राग्रहों-दुराग्राहों ग्रोर उनको लेकर चलने वाली निरंतर की तनातनी के परिणामस्वरूप पाठकों में 
यह व्यापक घारणा बन गथी है कि 'प्रगति' का सम्बन्ध कविता की वस्तु (कम्टेंट) से है भ्रौर 
्रयोग' का सम्बन्ध कविता के बाह्य रूपाकार (फामं) से है। 

किसी गहरी अनुभूति की कलात्मक प्रभिव्यंजना के बिना भी, कविता में यदि 'सही' मानव- 
बादी दृष्टिकोश या 'सही' वामपक्षीय राजनीतिक विचार पद्च-बद्ध हें, तो उन हल्की-फुल्को तुकब- 
न्दियों को 'नये युग' की कविता घोषित करने में हमारे कतिपय प्रगतिवादी झ्ाालोचक संकोच नहों 
करते, और समझते हें कि कोरे साधारणीकृत विचारों, सिद्धान्तों श्रौर बकतब्यों में "आगे बढ़ते जाने 
या “लड़ते जाने के गर्बोक्षितपूर्ण उद्गारों शोर “अंधेरा-सबेरा' को टकसाली चित्र-कल्पनाओ्रों को 
यांत्रिक ढंग से जोड़कर तुकों की बन्दिश में बाँध देने या मुक्त-छन्द के रूप में लिख देने भर से ही 
कविता में “प्रगति-तत्व' पैदा हो जाता है | ऐसी स्थिति में काव्य की किसी भी सोन्‍्दर्य-परक कसोटी 
पर इन पद्चात्मक रचनाओं को परखने का प्रइन नहीं रहा, क्योंकि भ्रमूर्त विचार-वस्तु की शुष्क 
झौर यथातथ्य नीरस ब्यंजना भी उनकी दृष्टि में स्पुहणीय दिखायी देती है । 'सही' सिद्धान्त-कथन 
ही इन रचनाओ्रों का जेसे श्रोचित्य हो । गत पन्द्रह वर्षो में प्रगतिवादी कवियों की कविताओं के 
प्रनेक संग्रह छपे हें । उनमें कुछ श्रेष्ठ शोर सशक्त कविताएँ भी हें, किन्तु श्रधिकतर ऐसी हैं, जिन्हें 
पढ़कर यह धारणा ही पक्‍की होती है कि इन कवियों ने काव्य के रूपाकार (फार्म) को बिकृत और 
सतहीं बनाने में जेसे एक दूसरे से होड़ लगा रखी है । 

प्रयोगवादी, इसके विपरीत, 'प्रयोग' का संबंध केवल कविता के रूपाकार (फार्म) तक ही 
सीमित रखते पर जोर देते भ्राये हें । यह सच है कि रूपगत प्रयोगों को ही बे 'साध्य' घोषित नहीं 
करते, किन्तु ये प्रयोग किस विशेष “वस्तु-सत्य' की भ्रभिव्यक्ति के 'साधन' हें, इसे वे कभी खुलकर 
बताते भी नहीं श्लौर न “वस्तु' शोर “रूप' के अंगांधि संबंध पर ज़ोर ही देते । वे भ्रपने को “राहों का 
प्रस्वेषी' तो कहते हैं, लेकिन राजनीतिक बिश्वासों की भिन्‍नता के ग्राधार पर कम्युनिस्ट से लेकर 
भ्रमरीकी सास्राज्यवाद तक के हिमायती इन प्रयोगवादी कवियों की विभिन्न 'राहें' उन्हें कहाँ, किस 
झ्ोर ले जाती हूँ, उनका गन्तव्य क्‍या है, यह ॒गन्‍्तव्य उनके काव्य के रूपगत प्रयोगों से निर्सोत 
होगा या काव्य-बस्तु से, इन सभी संगत प्रइनों पर वे झ्पनो व्याख्याश्रों में मोत ही रहते प्राये हूं। 


२०२ काव्य-धारा 


अपने पन्‍द्र ह-वर्षों के 'प्रयोगों' और 'राहों के भ्रन्वेषणों' के फलस्वरूप उन्होंने श्राज तक साहस करके 
यह नहीं कहा कि उनकी कविता में “युग-सत्य' की श्रभिव्यक्ति होने लगी है। लगता है जंसे वे 
समभते हें कि काव्य-वस्तु की शोर से उदासीन रहकर भी, केवल नये शब्द-चमत्कार, उक्ति-बेचित्र्य, 
चित्रों और ध्वनियों की श्रभिनव योजना के सहारे ही कविता में 'प्रयोग' को सार्थक बनाया जासकता 
है । ऐसी स्थिति में काव्य और सौन्दर्य की किसी भी वस्तु-परक कसौटी पर इन 'प्रयोगों' को पर- 
खने का प्रइन नहीं रहा, क्‍योंकि भ्रभिव्यक्ति में किसी भी प्रकार की सार्थक श्रथवा निरर्थंक नवी- 
नता ही उनकी दृष्टि में स्पृहणीय दिखायी देती है। साहित्य के श्रेय-प्रेय से परे की यह रूपगत 
नवीनता ही इन कविताओ्रों का जेसे औचित्य हो । गत पन्द्रह वर्षो में प्रयोगवादी (?) कविताओं 
के जो कतिपय संग्रह छपे हें, उनमें कुछ कविताएँ सार्थक श्रोर सफल भी हें, किन्तु श्रधिकतर ऐसी 
हैं, जिन्हें पढ़कर पाठकों की यह धारणा ही पक्की होती है कि इन कविताश्रों ने काव्य-परम्परा से 
विच्छेद करने के साथ ही काव्य-वस्तु (कन्टेन्ट) को विक्ृत श्रौर सतही बनाने में एक-दूसरे से होड़ 
लगा रखी है । ह 
हिन्दी कविता, इस प्रकार, दोनों दिशाश्रों से एकांगी बनती जा रही हूँ । 'प्रगति' शौर 
'प्रयोग' के समर्थकों की काव्य-दृष्टियों में श्रौर भी अभ्रनेक सौलिक भेद हें, किन्तु यहाँ केवल इतना 
सूचित कर देना ही हमें श्रभीष्ट है कि “प्रगति” या 'प्रयोग' के नारे उठा कर हमारे तरुण कबियों 
नें कविता के साथ गत वर्षो में जेसा खिलवाड़ किया है, वह॒हिन्दी-पाठकों को दायित्वहीन और 
एक सीमा तक उच्छु खल भी लगा है। इन कविताश्रों में उन्हें न रस मिलता है, न कोई गहरा 
व्यापक अ्रनुभव ही, जो उनकी मृक भावनाश्रों श्ौर वस्तु-सत्य की श्ररूप भ्रनभूतियों को वाणी और 
रूप देकर प्रकाशति कर दे । यहाँ कविता की सरलता श्रौर दुरूहंता का प्रशन नहीं है, न कवि के 
समष्टिवादी या व्यष्टिवादी दृष्टिकोण का, न पुरानी या नयी पद्धति का, भर न बहुसंख्यक पाठकों में 
रुचि को गिरावट या समान-धर्मा अभिजात वर्गोय पाठकों की अल्प संख्या का ही। यह सब प्रइन तभी 
उठते हैं जब कविता वास्तव में 'कविता' हो- श्रमृत्त विचारों की तुक-बन्दी या कोरा वाग्वंचित्र्य 
नहो। 
इस युग में कविता का स्तर गिर गया है और पाठक उससे विमुख हो गये हैँं। श्राक्सफोर्ड 
यूनिवर्सिटी प्रेस (इंगिलिस्तान) ने भ्रपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि श्र ग्रेजी के पाठकों ने जंसे 
सर्वसम्मति से कटिबद्ध होकर श्राधुनिक कविता से (जो इज़्रा पाउण्ड, टी० एस० ईलियट और 
उनसे प्रभावित कवियों को प्रयोगवादी कविता है) पीठ फेर ली है। कविता श्रब बिकती ही नहीं | 
अमरीका के बारे में भी लुई भ्रन्टरमियर की ऐसी ही रिपोर्ट है। दक्षिणी श्रमरीका के बारे में चिली 
के नोबल पुरस्कार-विजेता कवि ग्रंबीता मिस्त्राल का कहना है कि वहाँ भी कविता ह्वास-'प्रस्त है 
क्योंकि कोई महान प्रतिभा का नया कवि नहीं पेदा हो रहा, और कविता का स्तर दिनोदिन गिरता 
जा रहा है। सोवियत्‌ रूस में भी माया कोव॒स्की के बाद भ्रभी तक कोई बड़ी प्रतिभा का नया कवि 
नहीं पैदा हुआ । हमारे यहां भी, प्रसाद, पंत, निराला के बाद, 'प्रयोग' या “प्रगति! की समस्याश्रों 
से जूभने वाले नये कवियों की पीढ़ी में कोई वास्तविक प्रतिभा का नया कवि नहीं पेंदा हुआ । यह 
गिरावट सार्वत्रिक है। और विचित्र बात तो यह है कि इस गिरावट का कारण दोनों विचार-कोणों 
के समर्थक केवल बाह्य ही बताते हें; वह भी जो समष्टिवादी हें श्रौर वह भी जो व्यष्टिवादी हैं । 
दोनों ही इस गिरावट की ज़िम्मेदारी समाज के कन्धों पर डाल कर श्रपनी श्रक्षमताञ्ों के लिए 
झोचित्य दू ढ़ लेते हें । ह 


कविता में प्रगति” और “प्रयोग” को समस्या २८३ 


'प्रगति' के समर्यक, जो भ्रधिकांशतः साम्यवादी हें, सम्राज-विज्ञान के श्रध्येता हें, जिन्होंने 
व्यक्ति शोर समाज तया कला भ्रौर समाज के पारस्परिक संबंब की सारी गुत्यियों को वंज्ञानिक 
रीति से सुलका कर ऐसे सटीक फार्मूले तैयार कर लिए हें कि कोई बात उनकी चेतना में प्रस्पष्ट 
या व्यास्यापेक्षित नहीं रही, उनका कहना है--झौर भ्रयती जगह पर सही कहना है-- कि वर्तमान 
पूँजीवादी समाज के वंषम्यपूर्ण वर्ग-संबन्धों की प्राधार-शिला मनुष्य द्वारा मनुष्य का श्रम-शोषरा 
करके मुनाफा कमाना है । वर्तमान समाज की चरम सीमा पर पहुँची हुई इस व्यवसायिक वृत्ति के 
कारण ही कविता श्रौर कलाप्नों में ह्वास हो रहा है। विज्ञान-युग के सांस्कृतिक साधनों (रेडियो, 
फिल्म, प्रेस,) पर पूजोपतियों को इजारेदारी है, जो अपने मुनाफे के लिए और प्रपने वर्ग का 
झ्रास्तित्व कायम रखने के लिए इन साधनों के द्वारा जंसा साहित्य और जेसी कला को प्रोत्साहन 
दे रहे हैं, वह जनता की वस्तु-सत्य की चेतना को कुंठित करती है, उसकी कला-रुचि को बिकृत 
झौर अ्इलील बनाती है, उसके मनमें बुर्जुआ भ्रमों की जड़ें पक्की करती है। लेखक भर कलाकार 
भी इस '“बाज्ञार' के हो श्राश्चित हें और ऐसी कृतियों की रचना करने के लिए विवश हूँ, जो इन 
साथनों के स्वामियों को भ्रधिक से ग्रधिक लाभ दिला सके । ऐसी स्थिति में कला का स्तर गिर 
जाना स्वाभाविक है । इसके भ्रतिरिक्त, लेखक और कलाकार स्वयं पूंजीवादी भ्रमों और मनोवृत्तियों 
से मुक्त नहीं हुए हैं, भोर वे बतंसान समाज को कलाघाती व्यवसाथिक वृत्ति और बर्ग-बंषम्य के 
प्रति पूरी तरह सचेत भी नहीं हें, भ्र्थात्‌ समाजवाद के लिए संघर्ष करने वाली जनता के साथ नहीं हें । 

किन्तु कविता की जिन धाराप्रों की हम यहाँ चर्चा कर रहे हें---प्रगति और प्रयोग की 
घाराएँ--उन पर यह वैज्ञानिक विवेचन पूरी तरह लागू नहीं होता । सबसे पहले, “प्रगति” के सम- 
थंक तो सचेतन कवि और लेखक हें, वर्ग-सम्राज के वेषम्य की जाँच-पड़ताल में ही उनका अभ्रविकांश 
समय बीतता है, और उन्हें इस बात पर गव॑ भी कम नहीं है कि वे पूंजीवादी शञ्रमों और मनो- 
वृत्तियों से अपने को मुक्त करके जनता के साथ एकजूट होकर समाजवाद के लिए संघर्ष कर रहे 
हैं । किन्तु फिर भी, उनकी कविता--क्रेवल भारत में ही नहीं, बल्कि वहाँ भी जहाँ मनुष्य पूंजी- 
बाद के वर्ग-सम्बन्धों को मिटाकर नये समाज का निर्माण कर रहा है -एक बड़ी सीमा तक रस- 
हीन और रूपहीन है, सो क्‍यों ? कम्त से कम उनकी कविता को तो पूजीवादी व्यवसाथिकता से 
उत्पन्न छासोन्‍्मुखता का भ्रपवाद होना चाहिए था । दूसरी बात यह कि, “प्रयोग' के समर्यंक कवियों 
ने, वे चाहे जिस शेली के हों--प्रतीकवादी, रूपचित्रवादी या अश्रभिव्यंजतावादी--वे सब प्‌ जीवादी 
मनोवृत्ति और दृष्टिकोर से चाहे जितने श्राक्रान्त हों, उन्होंने व्यावसायिक लाभ के लिए क्‍्वचित ही 
कभी लिखा है । उनकी कविता “पॉपुलर' नहीं है, जिस तरह सनसनीखेज्ञ उपन्यास होते हें । बल्कि 
सच तो यह है कि फ्रांस, इस्तलेण्ड या स्वयं हमारे देश में भी, व्यावसायिक लाभ की दृष्टि से रचे 
गये 'पापुलर साहित्य श्लोर कला' की तीत्र प्रतिक्रिया के रूप में ही 'कला कला के लिए' का नारा 
उठाया गया या, जो भ्रागे चलकर अनेक रूपवादी शैलियों का जनक बना। रूपगत प्रयोग ही 
मुख्यतः इस प्रतिकया के माध्यम बने । सभी जानते हें कि प्रयोगवादी रचनाएँ प्रकाशकों के लिए 
स॒ताफे की वस्तु नहीं रहों । इततलिए 'प्रगति' के समर्यकों का वेज्ञानिक तर्क वर्तमात काल में कविता 
के स्तर की गिरावट का सही-सही निदान करने में समर्य नहीं है । 

श्रयोग' के समर्यक, जो भ्रधिकांशतः व्यष्टिवादी हैं, मनोविज्ञान (विशेषकर फ्राँयडोी मनो- 
विश्लेषण शास्त्र) के मननशील श्रध्येता हें, जिन्होंने व्यक्ति के भ्रवेतन मानस को ज्ञात और भ्रज्ञात 
कन्वराप्रों में (प्रात्मापेक्षणा द्वारा) घुसकर मनुष्य के जेवी-स्तर की पाशविक वृत्तियों श्रौर भ्रन्धी 


२०४ काव्य-चारा 


काम-वासनाझ्रों का साक्षातकार किया है, जो वास्तविकता को भ्रपने से बाहर नहीं, श्रपने मन के 
भीतर ही देखते हैं, जो व्यक्ति मानस को ही समस्त घटनाश्रों श्रौर संघर्षो का केन्द्र भर कारण 
मानते हैं, जो व्यक्ति-सापेक्ष विशिष्ट अ्नुभूतियों को ही निरपेक्ष सत्य समभते हैं, जिनके लिए कला 
केवल व्यक्ति की झ्त्माभिव्यक्ति का ही साधन श्रौर साध्य है, जिन्हें भ्रपनी कला पर समाज और 
उसकी नैतिकता की छाया पड़ जाना भी स्वीकार नहीं है, उनका भी कहना है कि वर्तमान युग में 
विज्ञान की ईजादों भर युद्ध की विभीषिकाओ्रों ने व्यक्ति की सत्ता को श्रामूल ककभोर दिया है ॥ 
विज्ञान ने धर्म श्रोर ईइवर की जड़ों पर कुठाराघात करके मनुष्य से उसकी झ्रास्था का सम्बल छीन 
लिया है और इसके बदले में व्यक्ति को इस श्रनन्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य-जीवन की भ्रकिन्चनता का 
झाभास देकर उसकी चेतना को भ्रवसन्‍न्न कर डाला है। जड़ प्रकृति के इस श्रनन्त झ्राँचल में करा- 
तुल्य मनुष्य के भ्रस्तित्व का मूल्य ही क्या ? सानव-समाज के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते 
के ये सब सपने, योजनाएँ, संघर्ष और कऋ्रान्तियाँ किस हेतु हें, जब कि जीवन-मात्र एक शभ्राकस्मिक 
घटना है और श्रचेतन प्रकृति के एक ही श्राकस्मिक झ्लालोड़न में सदा के लिए उसका श्रन्त हो 
सकता है ? युद्ध की विभीषिकाश्रों, ्रान्तियों श्र नये सर्व-संहारी श्रणु-भ्रस्त्रों के निर्माण ने मानव- 
सम्यता श्र संस्कृति को ही नहीं, व्यक्ति-जीवन के श्रस्तित्व श्रौर उसकी सम्भावनाशञ्रों तक को 
भी झनिद्चितत बना दिया है। इस झ्निर््चितता ने समाज में मरण-भावना के प्रति गहरी झ्रासक्ति 
पैदा कर दी है। मरण-भावना यों भी, मनोविज्ञान के अग्रनुसार, मानव-सन की एक सूल-वृत्ति है । 
किन्तु आज प्रणु-बम या प्रकृति के कोप से मरने का त्रास ही व्यक्ति को नहीं सता रहा ॥ फ्रायडी 
मनोविज्ञान ने व्यक्ति को जीते जी मरने के---एक बार नहीं बल्कि श्रनेक बार--्नास के प्रति भी 
सचेत कर दिया है, भ्रर्यात पु सत्वहीनता के भय के प्रति, जो युद्ध, क्रान्ति या महामारी में सरने से 
कहीं भयंकर है । इसलिए इस युग में व्यक्तित के लिए श्रपने श्रस्तित्व की चिन्ता ही सबसे बड़ी ओर 
मौलिक चिन्ता है । पु सत्वहीतता का भय ही सबसे बड़ा भय है। इस चिन्ता और भय क्रे विरुद्ध 
झपने व्यक्तित्व को प्रमाणित करने के लिए आज लेखक और कलाकार विवश है। नेतिकता-प्रने- 
तिकता का प्रइन उसके सामने नहीं है । उसे इस बात से प्रयोजन नहीं कि उसकी कला स्वस्थ है या 
पस्वस्थ, सरल है या दुरूह, क्योंकि बह ईमानदारी से झपने मन की प्रतिक्रिया को व्यक्षत करने के 
लिए प्रयोग करता है। अपने व्यक्ष्तित्व को प्रमाश्ित करने का सार्ग उसके पास और है भी क्या ? 
झपने को स्वस्थ, झ्रास्थाशील, मानववादी या नेतिक दिखाने के लिए वह अ्रपत्ती कला पर किसी 
बाहरी सिद्धान्त या दृष्टिकोण का रंग नहीं चढ़ाता, क्योंकि ऐसा करके वह्‌ श्नपने प्रति ईमानदार 
नहीं रह सकता और न अपनो श्रात्मा के सत्य को व्यक्त करके श्रयने व्यक्तित्व को ही प्रमाणित 
कर सकता है । वह किसी शौर की बोली में क्‍यों बोले ? बहु किसी भी समाज-स्वीकृत भावना, 
विचार, रूढ़ि या नीति का पिण्ट-पेषण या चवित-चर्वरश क्यों करे ? इस लिए उसके प्रयोग 
मुख्यतः कला के रूप तक ही सीमित हें--ऐसे रूष की सुष्टि तक जो व्यक्ति-कलाकार की विशिष्ट 
सानसिक स्थितियों की संश्लिष्टता को भलका सके । उसकी कविता सम्ताज-वास्तव द्वारा श्रारोपषित 
बाध्यताग्रों श्रोर विवशताओं की कविता है । श्रालोचक यदि कहते हें कि यह कविता का हास है 
तो वे जानें, कवि इससे परेशान नहीं । साधारण पाठक यदि उसकी कविता को नहीं समर पाते, तो 
यह उसे झ्रभीष्ठ नहीं । समानधर्मा झ्रभिजातवर्ग का एक छोटा-सा वर्ग भी उसे समक जाय तो उसके 
प्रयोगों का भ्रौचित्य है। (सच तो यह है कि समरान-धर्मा पाठक भी कवि के मन की विशिष्ट 
प्रतिक्रियाशों को ठीक-ठोक नहीं समझ सकते, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति श्रपने जीवन के विशिष्ट श्रनु- 


कविता में प्रगति” और “प्रयोग” की लमस्या २०५ 


भव की प्रपेक्षा में ही किसी भ्रस्य की बात को समझता है, भ्रतः एक प्रयोगवादी कबि की विशज्ञिष्ट 
मानसिक प्रतिक्रियांधों को प्रत्येक समान-धर्मा पाठक भी श्रपने ढंग से ही समभझेणा, जो कि सम्भव 
है कबि के मल्तव्य झौर मनोभाव से बिल्कुल भिन्‍न हो । ) 

किन्तु “'प्रयोगवादी' जब इस प्रकार को बोद्धिक दलीलें देता है तो स्वय॑ भ्रपने व्यक्तिवाद 
को कब्र खोद कर उसमें कूद पड़ता है। यह मान लेने पर कि विज्ञान की ईजादों झोर युद्ध की 
विभीषकाध्रों ने श्रनिश्चितता श्रौर भय का वातावरण पैदा कर दिया है, जिससे समाज में कुंठा, 
लिराशा, सरखण-भावना, हिसा, पर-पींड़त, भ्रतात्या, योत-उच्छु खलता, स्वार्यपरता श्र मानवद्रोह 
की भावनाएं ऊपर से नीचे तक व्याप्त हो गई है; क्‍या प्रयोगवादी कवि का केवल अ्रपनी आत्मा 
के सत्य को व्यक्त करने या श्रपने व्यक्तित्व को प्रमाणित करने का यह सारा आडम्बर एक भयंकर 
भात्म-प्रबंचना का प्रमाण नहीं देता ?--क्ष्योंकि प्रयोगवादी कविता में श्रधिकतर इन भावनाओं 
की हो भ्रनुगुज रहती है । व्यक्ति-कलाकार की झ्रात्मा के विशिष्ट सत्य जेसी कोई चीज़ इन रच- 
जाध्ों में कौन-सी होती है ? साना कि ये भावनाएं सामाजिक नहों हैँ, नेतिकता की दृष्टि से 
भ्र-सामाजिक, भ्र-नेंतिक शोर श्र-मानवोय हें, किन्तु प्रयोगवादियों के ही कयनानुसार वे समाज में 
व्यापक रूप से प्रचलित तो हें श्रौर सामाजिक कारणों से ही तो उत्पन्न हुई है ? तो क्‍या उनका 
भ्र-सामाजिक, भ्र-नेतिक झौर भझ्र-मानवीय होना ही उनकी “'विशिष्टता' का प्रमाण है, जिससे प्रयोग- 
वादी उन्हें भ्रपती “झात्मा का विशिष्ट सत्य” बनाने के लिए इतना उतावला रहता है ! उसका 
ईमानदारी का सबूत क्या मन॒ष्य की पशुता को उधघाड़ने में ही है ? भ्रपने व्यक्तित्व को प्रमाणित 
करने का यही तरीक़ा उसके पास शेष रहा है ? इन प्रश्नों से कतराने के लिए ही वह केवल '“प्रयोग' 
: पर जोर देता है, ताकि पाठक भ्रम में पड़कर केवल वचन-भंग्रिमा, शब्दों की विचित्र योजना, 
उक्ति को बक्रता श्रोर लथ की नवीनता को हो, भ्रर्यात्‌ श्रभिव्यक्ति के विशिष्ट ढंग को ही उसकी 
भ्रात्मा के विश्विष्ट सत्य' और अपने “व्यक्तित्व को प्रमाणित' करने की चेष्टा का पर्याय मान लें 
भौर उसकी कविता में निहित मानव-जीवन और जगत के प्रति कवि के वक्तव्य, भाव, स्वर और 
प्रस्तद्‌ ष्टि के वास्तविक स्वरूप को पहचानने की चेष्टा न करें, भ्रथांत्‌ उसको वस्तु को न जाखें। 
दूसरे, जिन सामाजिक बाध्यताश्रों ओर विवशताओ्रों का प्रयोगवादी उल्लेख करते हें, वे गत पन्त्रह 
वर्षों या बीसवीं शताब्दों की कोई झाकस्मिक उपज नहों हैं। भ्रनेक युगों में, श्रनेक बार लोगों को 
अपने समय की चेतना को भ्रपेक्षा में प्रत्यक्षतः दुनिवार समस्याओ्रों श्रौर संकटों का सामना करना 
पड़ा है । वर्ग-समाज की विषमताओं के बीच प्रगति करने वाले मनुष्य के सामने संघर्ष, युद्ध और 
क्रान्तियाँ कब नहीं रहीं ? किन्तु जितनी बड़ो समस्याएं रहीं, उनका मुक़ावला करने के लिए सामू- 
हिक रूप से मनुष्य उतनी ही बड़ी शक्ति फो उत्पन्न करने में भी समर्थ होता रहा । उन युगों के 
सहाकवियों श्लौर कलाकारों ने अपने व्यक्तिगत सुख-दुःखों को संकी्णंताम्रों से उतना ही ऊपर डठ 
कर चेतना-प्रेरक, प्राणवान और जीवनाकांक्षी काव्य और कला को महान क्ृतियों का निर्माण 
किया--भाखिर समस्याएं श्रौर संकट भी तो मानवकृत ही थे श्रौर श्राज भी हें । श्राज भी मनुष्य 
युद्ध की विभीषकाओं से बचने शोर भ्रणु-दाक्षित के विध्यंसक उपयोग को रोकने के लिए सामूहिक 
रूप में शान्ति-संघर्ष में श्रपनी श्रयार शक्ति को तोल रहा है । समाज-वास्तव का यह भी तो एक 
पहलू है--अधिक सत्य, चेतत भ्लौर झ्राशामय, जो कुंठाओं से मेघाच्छन्न नहीं है। इसलिए “प्रयोग' 
के समर्थकों की बोद्धिक दलीलें वर्तमान काल में कविता के स्वर की गिरावट का सही सही निदान 
करने में समय नहों हें । 


२०१६ काव्य-धारा 


इस प्रसंग में एक बात और उल्लेखनीय है--सामान्य पाठकों के प्रति दोनों वर्ग के कवियों 
झौर झालोचकों का श्रात्मस्‍लाघा से भरा तिरस्कारपूर्ण, नकक्‍्कुशाही दृष्टिकोण, जिसे अंग्रेज्ञी में 
'स्तॉबरी' कहते हैं । दोनों के पाठक अलग-श्रलग “बन्द दापरे' के विशिष्ट पाठक हें--प्रगतिवादी 
कवि केवल वर्ग-संघर्य में भाग लेने वाले कार्यकर्त्तान्रों तक ही श्रपनी रचनाझ्रों को प्रेषित करते हु, 
क्योंकि केवल वे ही भ्रपनी उत्तेजित मनोदशा में इन पद्यवद्ध वक्‍तव्यों को पढ़कर पुलकित होते हें ॥ 
उन्हें कविता या साहित्य से कोई स्थायी मूल्य का श्रनुभव पाने की श्रपेक्षा नहीं रहती, इसलिए वे 
झ्रभिव्यक्ति के सौन्दर्य के प्रति प्रायः उदासीन होते हैं । उन्हें तो भ्रधिकतर कामचलाऊ चीज़ें 
चाहिए, जिनका उपयोग वे तुरन्त किप्ती मंच पर कर सकें। इस तात्कालिक श्रावश्यकता की पूतति 
करके ही “प्रगति” का समर्थक कवि अपने को पांच सवारों में गिनने लगता है, चाहे साधारण 
पाठक (जो श्रविकांशतः शोबित वर्गों के ही हें) स्वतंत्र रूप से उसकी रचनाग्नों को पढ़ कर द्रवित 
झौर रस-विभोर न होते हों । इन कवियों के अ्रहंकार को प्रोत्साहन देने श्रोर साधारण पाठकों के 
सहज विवेक और सोन्दर्यब्रोध को कुंठित करने के लिए 'प्रगति' के बकौल (ऐपॉलोजिस्ट) आलो- 
चकों और सम्पादकों का एक गिरोह पेदा हो गया है । उनका तक-जाल इन कवियों को भी गुमराह 
करता है और पाठकों में भी हीन-भावना पेदा करके एक विकृत और छिछली कला-रुचि फेलाता 
है। उनके तकों का सार यह है--तुम्हें (साथारण तथा प्रबुद्ध पाठकों को) ये प्रगतिवादी कवि- 
ताएँ पसन्द नहीं हे ? इन में रस नहीं मिलता ? तो निश्चय ही तुम प्रतिक्रियावादी हो, तुम्हारे 
संस्कार बुजं झा हैं, तुम 'कला कला के लिए' के समर्थक हो, कलावादी हो, रूपवादी हो, जनता से 
विमुख हो, जनता की श्रनलंकृत भाषा के विरोबी हो । तुम सत्य नहीं चाहते, केवल शब्दों का 
इन्द्रजाल तुम्हें रचता है । क्या कहा ? सत्य चाहते हो, जनवादी हो ? तो फिर इन कविताश्रों में 
सत्य! ही तो व्यक्त है ! ये कवि ही तो सच्चे जनवादी हें ! कबीर, तुलसी और भारतेन्दु श्रपने 
समय के सच्चे जनवादी कवि थे, उन्होंने जनभाषा में लिखा, उनकी परम्परा को वर्तमान युग की 
झ्रावश्यकताओं के अनुसार ये कबि ही तो विकसित कर रहे हैं। ये कविताएँ तुम्हें श्रभी नहीं रुचतों, 
क्योंकि तुम अभी इस युग की समस्याओ्रों के प्रति सचेत नहीं हो, लेकिन भविष्य की कविता पलायन- 
वादी और कल्पना-लोक में विहार करने वाली नहीं होगी, बल्कि उसमें जीवन के ठोस यथार्थों की 
ग्रभिव्यक्ति होगी, जो इन कविताओं में पर्याप्त है ।! इस प्रकार के युक्ति-पुक्त लाँछनों और उपदेशों 
को सुनकर इस कविता को तुच्छ और रद्दी कहने का साहस किसे होगा ? साधारणतया कोई व्यक्ति 
अपने को प्रतिक्रियावादी नहीं मानना चाहता । 

इसके ठीक विपरीत, प्रयोगवादी कवि ग्रभिजातवर्ग के उन अ्रल्पसंख्थक पाठकों तक ही 


झपनी कविता को प्रेषित करते हैं, जो एक श्लोर तो अपने उपजीवीं श्रौर निठल्ले जीवन के कारण” 


भावना से उच्छुखल श्नौर दायित्वहीन हूँ, दूसरी शोर वर्तमान पूंजीवादी समाज के श्रन्ततः ह्वास 
की श्राशंका से संत्रस्त और उद्श्रान्त भी हें। ऐसे ('समानवथर्मा') पाठकों को सार्थक या निरथ्थंक 
रूपगत प्रयोगों की पहेलो-बुझोवल से एक विशेष प्रकार की मानसिक तृप्ति मिलती है। उन्हें कविता 
या साहित्य से कोई गहरा मानवीय अनुभव पाने की अपेक्षा नहीं रहती । इसलिए कविता की वस्तु 
के प्रति वे प्रायः उदासीन रहते हैं। उन्हें तो भ्रक्तर ऐसी वक्र उक्तियाँ श्रौर चुटकले चाहिए, जिन्हें 
वे अपनी ऊब और कुंठा दूर करने के लिए अपने वर्ग के बीच बेठकर व्यंग-वितोद करने, एक-दूसरे 


पर फ़ब्तियाँ कतने, मुंह जिचकाने या सामाजिक भावनाप्रों और नेतिकता की खिलली उड़ाने के 
लिए तुरंत इस्तेमाल कर सकें, या जो उनकी मानवद्रोही श्रतास्थाशील और यौन-उच्छ खलतावादी 


कविता में प्रगति” और 'प्रयोग' की समस्या २०७ 


भावताप्रों का प्रोचित्य सिद्ध करके तत्काल के लिए उनके प्रन्तःकरणा को मुक्त कर दें। इस तात्का- 
लिक झ्ावश्यकता की धूरति करके हो “प्रयोग' के समर्यक कवि भ्रपने को बहुत बड़ा तीसमार खतराँ 
गिलने लगते हें, चाहे सामान्य पाठक (जिनमें प्रबुद्ध, संस्कृत भौर संवेदनशोल पाठकों की कमी नहों 
है) स्वतंत्र रूप से उनको रचनाओ्रों को पढ़कर विरक्ति झोर ग्लानि का ही प्रनुभव क्‍यों न करते 
हों । वे भ्रपने को सूर, तुलसी, ग़ालिब, रवोीस्द्र, इक़बाल, प्रसाद, पंत, निराला से किसी भी अंत में 
कम नहीं सानते । इस कवियों के भ्रहंकार को प्रोत्साहन देने श्ौर साधारणा पाठकों की सहज 
सानवीय भावनाझ्रों श्रोर वस्तु-बंध को कुंठित करने के लिए “प्रयोग! के बकील ( एपॉलोजिस्ट ) 
ध्रालोचकों, सम्पादकों झ्लोर भ्रध्यापकों का एक गिरोह पैदा होता जा रहा है (पाइचात्य देझ्ञों में तो 
इस गिरोह में बड़े बड़े नामवर लोग हे) जो उक्ति-बंचित्र्य, शब्द-चयन, ध्वनि-चित्र के टेकनिकल 
स्तर तक ही प्रयोगवादी कबिता के विवेचन को सीमित रखकर सामान्य पाठकों में एक विशेष 
प्रकार की हील-भावना पेदा करने को उद्धत चेष्टा करते हें । उनके तकों का सार यह है--+तुम्हें 
(साधारखतया प्रबुद्ध पाठकों को) ये प्रयोगवादी कविताएं पसन्द नहीं हें । तुम्हें ये दुरूह लगती हें ? 
तुम इसे भ्रनगंल प्रलाप कहते हो ? तो तुम निश्चय ही रूढ़िपन्थी हो, समय से पिछड़े हुए हो, 
तुस्हारी रुचि का आधुनिक संस्कार नहीं हुआ, तुम मतवादी हो, पूवंग्रहों से ग्रस्त हो ! तुम्हारी 
भावलाएँ दक़ियानूसी ओर भअ्रसंस्कृत हें । तुम कविता की कृत्रिम रूप से गढ़ी हुई रंगीन भाषा के 
झ्रादी हो, जिसके भाव, चित्र, अलंकार और उपमान पुराने: ओर टकसाली हों । थरुराने के प्रति मोह 
मनुष्य का स्वभाव है, क्‍योंकि दीघं परिचय के कारण वह बोधगम्य होता है। लेकिन पुराने भावों 
को व्यक्त करने में मोलिकता कहाँ है ? ओर नये भाव पुरानी भाषा में कंसे व्यक्त हो सकते हें ? 
कविता का विकास परम्परा से श्राबद्ध रहकर नहीं हो सकता । फिर इतनी संकोर्णता क्‍यों ? क्‍या 
कहा, तुम पिछड़े नहीं हो, दक़ियानूसी नहीं हो, भ्राघुनिक चेतना के मनुष्य हो ? तो फिर यह 
श्रयोगवादी कविता' ही तो अधुतातन कविता है, परम्परा से सर्वया मुक्त । वास्तव में यहो “सच्ची” 
कविता है, क्‍योंकि इतिहास में पहली बार कवि ने ईमानदारी से अपने मन की जटिल और विशिष्ट 
प्रतिक्रियाओं को भ्रभिव्यक्ति दी है--वहु अपने अन्नदाता को प्रशस्तियाँ गाने वाला राजकवि और 
चारखा-भाट नहीं रहा, वह नेतिक बच्चनों के कारण “दुलमुल चादुता से बासना को भलमला कर' 
गाने वाला भक्त कवि नहीं है, वह “कल्पना का लाड़ला' छायावादी भी नहीं है, जो 'निपट भावावेश 
से लि्वेद' भ्रवस्था में पहुंचकर जीवन-ययार्थ से ही विमुख हो गया था। यह प्रयोगवादी कवि ही 
सच्चा कवि है, जो बिना किसी लाग-लपेट के जीवन की वीभत्सता, कुत्सा और निस्सारता का सही 
चित्र अंकित कर देता है । पुराना काव्य, इसीलिए, कोरा शब्द-जाल है, थोथा कोशल है, केवल बाह्य 
की अनुकृति है। उसमें प्रौढ़ता नहीं, कवि के व्यक्तित्व का प्रकाश नहीं । सोन्‍्दर्य के पुराने मान- 
बंडों से इस नयो कविता को मत जाँचो ! यह मत देखो कि कवि ने क्‍या कहा है, क्‍योंकि यह जातता 
महत्वपूर्ण नहीं है, भर ऐसा करने से भ्रनिवायंतः तुम व्यर्थ के नेतिक पचड़ों में फंस जाझोगे । तुम्हें 
तो सिर्फ़॒यह देखना चाहिए कि कवि क्‍या कहना चाहता है--बवह चाहे जो हो, तुच्छ या महान, 
नेतिक था अनेतिक--ओर जो कहना चाहता है, वह ठीक से, निर्भाकता से, ईमानदारी से कह पाया 
है या नहीं । नयी कविता का सौन्दर्य कवि को इस ईमानदारो में है, जो उसके कहने के ढंग में 
व्यक्त होती है ।' इस प्रकार के युक्ति-युक्‍्त लांछनों को सुनकर इस कविता को मानवद्रोही और 
खोखली कहने का साहस किसे होगा ? साधारणतया कोई व्यक्ति अपने को मूखं, अ्रसंस्कृत भ्रौर 
समय से पिछड़ा हुआ नहीं मानना चाहता । तो दोनों ही भ्रपने नक्‍्कुशाही दृष्टिकोए से साधारण 


२०८ काव्य-धांरा 


पाठक के सत्य-परक विवेक झ्रोर सोन्दय्य-बोध को मूछित करना चाहते हैं । इतिहास में जान-बू के 
कर केवल इतने विशिष्ट पाठकों तक ही भ्रपनी कविता को प्रेषित करने की चेष्टा रचनाकारों ने 
कभी नहीं की । गत युगों के सभी महान कवियों ने, भ्रपने बर्गंगत संस्कारों के बावजूद, भ्रपनी जान 
में तो मनुष्य-मात्र तक अ्रपनी कविता को प्रेषित करने का ही प्रयत्न किया, जिसके कारण भी 
उनकी कविताएँ स्वंजन-संवेद्य बन सकीं । बाल्मीकि, कालिदास, होमर, शेक्सपियर भ्ौर गेटे की 
कविता रसाद्र करने के लिए किसी पाठक से विशिष्ट राजनीतिक दृष्टिकोश या अ्रभिजातवर्गीय 
अनास्था श्रोर कुंठा की श्रपेक्षा नहीं रखती । 

प्राधुनिक पाठक जैसे कविता के बीहड़ जंगल में फंस गया है, जहाँ समाज को दोषी ठहराने 
वाली क्कंश भ्रावाज्ञें तो सुनाई देती हें, लेकिन कविता की रसधारा नहीं बहती । स्वयं उस बेचारे 
को प्रतिक्रियवादी, दक्तियानूसी या मूर्ख कहकर लांछित तो किया जाता है, लेकिन उसकी विश्व- 
बोधिनी चेतना को गहरी भ्रन्तदू ष्टि श्लौर उसको भावनाश्रों को गहरा मानवीय संस्कार नहीं दियां 
जाता । ऐसे में यदि पाठक का दम घुटता है श्रौर बह इस जंगल से जान छुड़ाकर निकल भागने 
को छटपटाता है, तो इसमें झ्राइचयं की कोन-सी बात है ? कविता के स्तर की गिरावट क लिए 
समाज को व्यावसायिकता ज़िम्मेदार है, विज्ञान को ईजादें, युद्ध को विभीषकाएंँ और आझ्राधुनिक 
युग की अ्रनास्थाहीनता ज़िम्मेदार है, और इन विपरीत परिस्थितियों में भी जो कबिता रची जा 
रही है, उसको नापसन्द करने या समझ न पाने के लिए पाठकों की बुजु भ्रा मनोवृत्ति या उनकी 
रूढ़ि-प्रियता भौर मू्खता जिम्मेदार है--झ्राधुनिक कविता के पाइचात्य बकोलों की किताबों से रट- 
रटाकर, इन तकों की श्रावृत्ति भ्ौर पुनरावृत्ति करते फिरना तो एक फंशन-सा बन गया है, लेकिन 
क्‍या कभी किसी ने पाठक का मत भी जानना चाहा है ? श्राज क्रा प्रबुद्ध पाठक भी तो आधु निक 
युग को चेतना में ही पला है--विज्ञान-मनो विज्ञान के श्रन्वेषणों-विश्लेषणों, युद्धों-अणुश्रस्त्रों की 
विभीषिकाश्रों, साम्राज्यवाद-फ़ेसिज्म के श्रत्याचारों, झ्ारथिक-संकट-बे रोज़्गारी को, श्रनिश्चितताशों- 
यातनाओ्रों, स्वतंत्रता-संग्रामों--समांजवादी क्रान्तियों श्लौर शान्ति-आन्दोलनों के विप्लवकारी परि- 
बर्तनों के बीच ही उसके विश्व-बोध श्रोर भाव-प्रतिक्रियाओं का विकास हुआ है, जिनकी दुह्ाई देकर 
हमारे नये कवि भ्पनी कलागत्‌ श्रक्षमताझ्रों या सानवद्रोही भावनाओ्रों के लिए बौद्धिक श्रौचित्य 
खोजते फिरते हैं, मानो इस युग की यातनाञ्रों श्रौर उथल-पुथल के एक मात्र वे ही भुक्त-भोगी 
दृष्टा रहे हें, भौर मानो पाठक किसी प्राचीन भ्रन्धकार-युग के निहन्द्र वातावरण में रहते झ्ाये हैं । 
किन्तु झ्राधुनिक कवि की आत्म-प्रवंचनाझ्रों के ककच को छेदकर प्रबुद्ध पाठक पूछता है--उसे पूछने 
का अधिकार है क्‍योंकि इन कविताओं के लिए बह भ्रपनी कमाई के पेसे ही नहीं खर्च करता, बल्कि 
उन्हें श्रपने गले से नीचे उतारने के लिए भी बाध्य किया जाता है--इसलिए वह पृछता है कि 
कविता-क्षेत्र की इस समस्त धाँधली के लिए क्‍या कवि को ज़िम्मेदारी कुछ भी नहीं है ? जो कवि 
विषय-बस्तु पर ही ज्ञोर देते हैं श्लोर भ्रभिव्यक्ति और रूप (फार्म) के प्रति प्रायः उदासीन रूहते हें, 
वे क्या रूप (फार्म) से मुक्त कविता की सृष्टि कर सकते हैं ? रूप-सोन्दर्य भर व्यंजना-तत्व की 
झवहेलना करने से क्‍या बड़े से बड़ा विचार स्वयं विकृत होकर क्षुद्र नहीं बन जाता ? उसका कला- 
त्मक मूर्तोकरण क्या भ्रन्ततः रूप के ही आश्रित (नहीं है ? इसलिए श्रनगढ़, रुक्ष और भ्रविकसित 
रूप (फार्स) में क्या विचार-वस्तु, विश्व-बोध, भाव, स्वर सभी कुछ संकीर्ण और क्षुद्र बनकर नीरस 
झोर निर्जोब नहीं दिखता ? झौर जो कबि केवल रूप (फार्म) पर ही ज़ोर देते हें श्रोर विचार-बस्तु 
के प्रति प्रायः उदासोन रहते हें, या उसको चर्चा से कतराते हैं, बे क्या वस्तु से युक्त किसी शुद्ध 


कविता में प्रगति? और “प्रयोग” की समस्या २५६ 


रूप की सुष्टि कर सकते हें ? विचार-बस्तु को प्रवहेलना करने से क्‍या रूप-निर्माण की सूक्मातिसूक्म 
सेष्टाएँ खोखलो भ्ौर बेढंगो नहीं बन जातीं ? रूप को रेखाएं क्‍या वस्तु की व्यंजना में ही नहीं 
प्रनिवार्यंतः उभरतों-निखरतों ? इसलिए तुच्छ भ्रौर उलकी विचार-वस्तु भ्रौर क्षुद्र श्रोर कुत्सित 
भावताओं से, कुशल प्रयोगों के बावजूद, क्या रूप भी बिकृत होकर भोंडा नहीं दिखता ? ऐसी 
एकांगिता क्‍या दोनों प्रकार को कविता को समान रूप से नोरस, निरर्यक, कुरूप धर श्र-प्रेष्य 
नहीं बना देती ? कया इस एकांथिता के लिए भी कवि की जिम्मेदारी कुछ नहीं है 7--तो कवि का 
मानस क्या प्रामोफ़ोन का चकक्‍का है जिस पर सिर्फ़ राजनोतिक पार्टियों के वकतब्यों के रिक्रार्ड ही 
बजायें जा सकते हैं, या मात्र एक ऐसी विशिष्ट फोटो-प्लेट है, जिस पर समाज में व्याप्त कुत्साप्रों, 
वासना्रों और क्षुद्रताप्नों के रूप ज्यों के त्यों उतर श्राते हें, भौर वास्तविकता के भ्रन्थ संविधायक 
पहलू उस पर अपना भ्रक्स नहों छोड़ पाते ? 'कवि क्‍या कहना चाहता है, केवल इतने तक ही 
पाठक ग्रपनी जिज्ञासा को सीमित क्‍यों रखे ? पाठक भ्रन्तर्यामी तो नहीं है जो कवि के भ्रवचेतन 
सत को “उलझो संवेदनाभों' को भाँप जाये ? किसी कविता में कवि ने क्‍या कहा है, जो कहा है 
वह मनुष्य के परम्परागत झनुभव की भ्रपेक्षा में कंसा है, किस कोटि का है--नवीनता, गहराई, 
व्यापकता, जीवन-बोध झौर मानवीय रागात्मकता की दृष्टि से--इन सब सोन्‍्दर्यपरक, नेतिक झौर 
दार्शनिक स्तरों पर भी उसके कयन को वह क्‍यों न जांचे-परखे ? केवल “कंप्ते कहा है--शिल्प- 
टेकनीक के स्तर को इतनी जाँच-परख हो कया पर्याप्त है? क्‍या इतने से ही कबिता का सम्पूर्ण 
ध्र्थ ग्रहएा कर पाना सम्भव है ? झ्राधुनिक पाठक की चेतना भी इस युग के अझ्रनुसार हो संहिलष्ट 
है, ग्रतः किसी भी कबिता को पढ़ते समय शब्द-चमत्कार और ध्वनि-सोन्दर्य के प्रारम्भिक मूत्तं-स्तर 
से लेकर नेतिक श्र दाशंनिक चेतना के उज्चतर श्रमूर्त स्तरों तक को प्रक्रियाएं एक साय ही उसके 
मन में अनायास चालू हो जातो हें--उस कविता के सम्पूर्ण अनुभव को ग्रहण करने के लिए-- 
प्रौर उनके सम्मिलित निर्णय के भ्राघार पर ही पाठक उस कविता का मूल्य झँकता है । आवुनिक 
कविता को समझने का प्रयत्न करते समय वह इन उच्च-स्तर की जिज्ञासाओं को बरबस क्यों 
दवा रखे ? 

किन्तु इन उच्च-स्तर को जिज्ञासाप्रों का जिक्र श्राते ही पाठक के 'वूवंग्रहों' को रसास्वादन 
को क्रिया में विध्न डालने वाले दस्युओं के रूप में घलोट लाना क्‍या अभ्राघुनिक कविता के वकोलों 
(ऐपॉलोजिस्ट्स) को शोभा देता है ? कवि के पूबंग्रह क्‍या नहीं होते, और वे उसकी कबिता में 
क्या भ्रनिवार्यतः व्यक्त नहीं होते ? पाठक के पूबंग्रह निन्‍्दनीय हें तो कवि नामधारी व्यक्ति के 
पूर्वग्रह किस देवी पुण्य के कारण बन्दनीय हूँ, जो पाठक उन्हें झ्तकर्य अद्धा-भाव से झपने सिर-माये 
स्वीकार करता जाय ? आखिर ये “पूवंग्रह' हें कौन-सी बला, जिनसे कोई भी व्यक्ष्त मुक्त नहीं 
है--कभी नहीं रहा--और जो किन्हों दो व्यक्तियों को परस्थर पअ्रपने हृदय की बात कहने -सुनने- 
समझने के मार्ग में सदा एक वुलंध्य दीवार बनकर खड़े हो जाते हें ? वास्तव में 'पूबंप्र ह' ऐसी कोई 
भयंकर बला नहों हें, यदि होते तो ज्ञान-विज्ञान श्रोर कला का कहीं भ्रस्तित्व न होता, यहाँ तक कि 
मनुष्य की भाषा तक का विकास न होता । “पूव॑ंग्रह'! मन॒ष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक पझ्ननतुभव 
प्रौर ज्ञान के मार्ग से विकसित होने वाली चेतना, नेतिक-सेस्कार, सौन्दर्य-भावना झोर विश्व-बोध 
का अनिवार्य परिणाम हैं, जो व्यक्षित की निजी धारस्पाप्रों, मान्‍्यताप्नों श्रौर सहानुभृतियों के रूप 
में व्यक्त होते हें। किन्तु ये “पूर्व ग्रह, व्यक्ति की ऊपर से निजी दिखने बाली धारणाएं, मास्ण्ताएं, 
ग्रौर सहानुभूतियाँ, युग-बेतना के विकास झ्ोर व्यक्षिगत तया सामाजिक रुप से वस्तु-सत्य केनये 


२१० काव्य-धारा 


अनुभव की श्रपेक्षा में स्वतः बदलते भी रहते हें। कला तथा विज्ञान, जीवन भौर जगत के सत्य 
का शअ्रपने-झ्पने ढंग से उद्घाटन करके, मनुष्य के विश्व-बोध को व्यापक बनाते हें तो साथ ही उसके 
प॒बग्रह भी संकीर्णता व्यागकर श्रधिक व्यापक और मानवीय होते जाते हें । फिर 'पूव॑ग्रहों' का भूत खड़ा 
करके प्रयोगवादी कवि श्रपने श्रोर पाठक के बीच किसी गहरे चेतनाप्रद श्रनुभव के श्रादान-प्रदान की 
सम्भावना को ही बन्द क्‍यों कर देना चाहते हे ? गत युगों के महान कवियों की तरह (जो स्वयं 
अपने पूबंग्रहों, श्रपने युग की चेतना शोर शिल्प-ज्ञान की सीमाओं से मुक्त नहीं थे) जीवन-बास्तव 
और मानव-सम्बन्धों के सत्य की गहरी चेतना देने वाली मामिक कविता रचकर आधुनिक कवि भी 
मनुष्य के संकीर्णं, क्षुद्र, भ्रसंस्क्ृत, पिछड़े, श्रसामाजिक पू्ंग्रहों को तोड़ने श्लौर उसकी सहानभूतियों को 
ओर अधिक व्यापक तथा मानवीय बनाने में योग क्यों नहीं देते ? या फिर स्वयं उनकी सहानभूतियाँ, 
उनके 'पृंग्रह” इतने संकीर्ण, श्रात्म-केन्द्रिस श्र श्रसामाजिक हें कि वे श्रपने रुग्ण मानस 
के बाहर निकलकर वास्तविकता को देख-समझ ही नहीं सकते, श्रौर शायद इसी कारण उनको 
पर्दापोशी के लिए वे पाठक के “पुव॑ग्रहों' का भय दिखाते हें, ताकि पाठक की उच्चस्तर की जिज्ञा- 
साओों की अन्तर्भेदी दृष्टि के आगे उन्हें भ्रपनी क्षुद्र और सानवद्रोही आ्रात्मा की “नंगाकोरी' देने 
के लिए बाध्य न होना पड़े ? पर उनको इस दयनीय स्थिति की ज़िस्मेदारी किस पर है ? सकी 
णंता पाठक की है या श्राधुनिक कबि की, जो या तो जीवन-वास्तव के प्रति निपट अ्रसंवेदतशील 
है, या यदि संवेदनशील है तो केवल उस अंग के प्रति ही जो ह्ासोन्मुखी है, और जिसे सम्पूर्ण 
सत्य मानकर, उच्छ खलता श्रीर ग्रेरज़िम्मेदारो की भोंक में, वह श्रपनी रही-सही मानवीय सहानु- 
भूतियों का गला घोंटने पर उतारू हो गया है ? 

जीवन पर संकट के बादल छाये हें, किन्तु मनुष्य ने क्या उसके श्रागे घुटने ठेक दिये हें ? 
क्या स्वयं हमारे देश की आवाज्ञ, जो छत्तीस करोड़ जनता की श्रावाज्ञ है, इस संकट से सनृष्य 
जाति का उद्धार करने के लिए इतिहास और जीवन का आग्रह लेकर विश्व में गुंजजर लोगों में 
नयी श्राशा का संचार नहीं कर रही है ? 

इस आावाज्ञ के प्रति कवि क्‍यों कर्ण-बधिर होकर बंठ गया है, या उसको मुंह क्‍यों बिच- 
काता रहता है ? क्‍या आध्यात्मिक रंकता श्नोर पुंसत्वहीनता के वातावरण में किसी भी शाब्दिक 
तिलिस्म से वह अपने व्यक्तित्व को प्रमारिणत कर सकेगा ? 

प्रवुद्ध पाठक के प्रइनों का श्रन्त नहीं है, किन्तु हम इस सूची को भ्रनावद्यक रूप में लस्जा 
नहीं बनाता चाहते । इन प्रश्नों की गंभीरता केवल इस तथ्य को ही रेखांकित करती है कि दोनों 
पक्षों के प्रवक्ता और कवि “प्रगति” और “प्रयोग” की समस्या को जिस एकांगी दृष्टि से समझते हें 
और आधुनिक कविता में जो गिरावट दिखायी देती है--एक ओर विशेषकर शिल्प-सोन्दर्य और 
दूसरी ओर भाव-विचार-बस्तु की--उसके बारे में प्रचलित प्रवादों, मतवादों और फंशनों के चक्कर 
में न पड़कर नये कवि श्रपने महान दायित्वों को समर्कभ । प्रगति श्र प्रयोग की समस्या को वे 
समग्र रूप में देखें । श्र जिनमें प्रतिभा है वे उसको, परिस्थितियों की विषमता के बावजूद, 
“सच्ची' कविता के सूजन में लगाये । इसी में कबि का गौरव है शोर देश का गौरव है । 


“-शिवदानसिंह चोहान 


हमारा वक्‍षतव्य 


हमने काव्यधारा नाम से प्राधुनिक हिन्दी-कवियों को प्रतिनिधि रचनाझ्ों के प्रकाशन 
%। झ्रायोजन किया है । हमें पूर्ण श्राशा श्र विश्वास है कि श्रापके सक्रिय सहयोग से हम इस 
ओजमनां को कार्यान्वित ही नहीं कर पायेंगे; बल्कि हिन्दी-काव्यधारा को भ्रन्य साहित्य-रूपों को 
प्रपेक्षा में पुनः सर्वाधिक लोक-प्रिय श्रौर बलशाली धारा बनाने में सफल हो सकेंगे । श्रर्यात्‌, हिन्दों- 
कविता पुनः अपने विगत गौरव को प्राप्त कर सकेगी और नये युग की चेतना को श्रात्मसात्‌ करतो 
हुई नये सौन्दर्य भर जीवन-मूल्यों की सृष्टि करके जन-मानस में जीवन के प्रति नया अ्रनुराग, युग 
की केन्द्रीय समस्याप्रों के प्रति नई जागरूकता, नई भाव-सम्बेदना, राष्ट्र-निर्माणा झौर विश्व-शान्ति 
के सानवोचित ग्राद्ञों के प्रति नई निष्ठा और उमंग, व्यष्टि और सम्रष्टि के समन्वित विकास में 
नई आस्या और उदात्त नेतिक भावनाएं जगायेगी झऔर इस प्रकार मनुध्य-मात्र को प्रगतिशील 
आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर सकेगी । 

प्रनेक संस्कृति-विरोधी बाह्म-प्रभावों में फंशसकर गत वर्षों में पाठकों को काव्य-रुचि बिकृत 
होती गयी है श्लोर आज सामान्‍य पाठक कविता के प्रति ही नहीं, साहित्य श्रौर कला के श्रन्य रूपों 
के प्रति भी उदासीन-से होते जा रहे हें । इसको प्रतिक्रिया भी हुई है। कवि और पाठक के बीच 
छायाबाद-युगीन श्रात्मीय श्रोर अंतरंग सम्बन्ध टूट जाने से कुछ कवि अपनी वेयक्तिक, उलको, 
कुंठित, अनास्थाशील और विद्रूपात्मक संवेदनाओं या एकांगी बौद्धिक म/नन्‍्यताओरों को ऐसी श्रनुभूति- 
हीन, दुरूह और गद्यात्मक शेली में व्यक्त करने लगे हें, जिसका उद्देश्य सामान्य पाठकों तक भपने 
भाव-विचारों का प्रेषण नहीं होता; बल्कि समानधर्मा कुछ विशिष्ट व्यक्तियों का मनोरंजन करना 
मात्र होता है । इस प्रवृत्ति ने कवि श्ौर पाठक के बीच के बढ़ते हुए व्यवधान को और बढ़ाने में 
योग दिया है । कविता जन-मानस की भाव-चेतना में जीवन-सत्य को भ्रधिक गहरी और मासिक 
भ्रनभृति जगाने के दायित्व से विमख होकर युगीन भ्रथंवत्ता ओर भाव-गम्भीरता खोती जा रहो है। 
इससे काब्य-जगत में भ्रनेक प्रवाद चल पड़े हें । किन्तु जो कवि इन बिक्ृतियों के प्रति सचेत हैं-- 
ओर सौभाग्य से अभी भी उनकी संख्या भ्रधिक है--वे भी सम्प्रति कबिता के भविष्य के बारे में 
सन्देहंशील हो उठे हें। “कविता का युग बीत गया इस बहुप्रचारित, किन्तु भ्रनेतिहासिक धारणा ने 
समर्थ कवियों तक को कम हतोत्साहित नहों किया है । हिन्दी-कविता में नये प्राण शोर नई शक्ति 
भरने वाले नये अर्थ ओर भाव से संवलित रस-सोन्दर्य की प्रतिष्ठा जरूरी है. इससे कोई इन्कार 
नहीं करता, झौर हमारे प्रतिभा-सम्पन्न नये और पुराने कवियों को युग के सम्पूर्ण वेदन को उत्कृष्ट 
कलात्मक अभिव्यक्ति देने के लिए काव्य-जगत की इस केन्द्रीय समस्या का समाधान स्वयं अपनी 


काव्य-साधना द्वारा प्राप्त करमा होगा, लेकिन इस दिशख्षा में एक विराट संगठित प्रयत्न भी 
अपेक्षित है । 


२१२ काव्य-धारा 


काव्यधारा ऐसे विराट संगठित प्रयत्न का श्रायोजन करने का संकल्प लेकर ही जन्म ले रही 
है। इसलिए यह प्रयास युग-बांछित ही नहीं, श्रभूतपूर्व भी है। किसी पूर्वग्रह या एकांगी मतवाद में 
न बेंधकर काव्य-धारा सभी नये-पुराने कवियों की श्रेष्ठतम रचनाश्रों को संकलन के रूप में प्रका- 
शित करके हिन्दी की “मुख्य काव्यधारा' का प्रतिनिधित्व करेगी, तत्सामयिक फंशनवर्ता, कूल-किनारों 
पर भटकती फिरते वाली स्वेच्छाचारी फेनिल बुदबुदों का नहीं। काव्यधारा कौ प्रत्येक संख्या में 
हिन्दी-पाठक हमारे सिद्धि-प्राप्त और उदीयमान कवियों की युग-चेष्टा का स्वरूप देखकर श्रपनी 
कलाभिरुचि का संस्कार कर सकेंगे श्रौर नई चेतनादायो प्रेरणाएँ ग्रहण कर सकेंगे । 

काव्यधारा जैसी योजना की श्ननिवायंता श्राज इसलिए भी है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई 
है । हिन्दी के लेखक श्रब केवल हिन्दी-पाठकों के प्रति ही नहीं; भारत की अश्रन्य भाषाओं भ्रौर 
प्रकारान्तर से विश्व के पाठकों के प्रति भी उत्तरदायी हें। हमारे कवियों की साधना इस दायित्व 
को प्री गरिमा से निभाने में पूर्णकाम होगी, ऐसा हमारा विश्वास है, भर आशा है कि काव्यधारां 
इसका समर्थ माध्यम बन सकेगी । हिन्दी-काव्य का नया उत्थान भारतीय और इतर भारतीय 
भाषाओं के काव्यों में भी एक नये युगीन उत्थान का प्रेरक बनेगा, इस उदात्त लक्ष्य की ओर सजग- 
चरण बढ़ने का श्रनुष्ठान करके ही काव्यधारा श्राप के सहयोग की प्रार्थो है । ॥ 

'काव्यधारा' की पहली संख्या के प्रकाशन में श्रनावश्यक विलम्ब हुआ है, इसका हमें हादिक 
खेद है। आ्राशा है कि श्रगली संख्याएं अब समय पर निकलती जायेंगी। कई श्रकथनीय का<. 
कहीं -कहीं प्रूफ की श्रशुद्धियाँ रह गई हैं, उसके लिए हम क्षमा चाहते हें। ् 

शिवदानसिंद चौहान : गोपालऋृष्ण कौल 


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